श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 336, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७ |
|---|
विस्मृत्यापूर्वमेव त्वं नाहूतोऽसि क्षमस्व तत् । तद्दूतवचनं श्रुत्वा रामीयं मुनिरब्रवीत् ॥६१॥
शिष्यान्साकं वा समाहूय यास्यामि त्वं व्रज । तथोक्तः रामदूतोऽपि मुनिं नत्वा ययौ मखम् ॥ ६२॥
जानन्नेव भावि वृत्तमादौ रामो मुनिं मखम् । नाहूयामास शिष्याभ्यां लौकिकीं रीतिमाश्रितः ॥६३॥
स्वीयव्रतसमाप्तिं साऽकरोत्सीताऽपि सादरम् ।
विष्णुदास उवाच
अशक्तश्च कथं पार्थ व्रतमपेतद्वदस्व माम् ॥६४॥
श्रीरामदास उवाच
काञ्चनस्याथवा रौप्यस्याथवा ताम्रनिर्मिते । कार्ये द्वे पादुके रम्ये राघवस्य यथासुखम् ॥६५॥
अभावे कमलानां च पुष्पैर्जलिरीरिता । एकाशीतिदंपतीनां न शक्तिः पूजने तदा । ६६।
पूजनीयानि युगलानि नव शक्त्याऽथवा सुखम् । स्वशक्त्या पूजनं कार्यं वित्तशाठ्यं परित्यजेत् । ६७॥
अनेकदूरगस्यापि संयोगश्च भवेद्ध्रुवात् । भाविकार्याणि वेगेन भविष्यन्ति न संशयः ॥६८।
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तमः सर्गः
( राम लक्ष्मण आदिका लव-कुशके साथ युद्ध )
श्रीरामचन्द्र उवाच
अथ रामोऽपि धर्मात्मा चरमे तुरगाध्वरे । हयं मुमोच शत्रुघ्नस्तस्य पृष्ठे ययौ जवात् ॥१॥
दक्षिणां पश्चिमामाशासुत्तरां तुरगोत्तमः । अतिक्रम्य तथा प्राचीं यज्ञस्थानं न्यवर्तत ॥२।
नृपतिभ्यः समस्तेभ्यः शत्रुघ्नो वसु कोटिशः । गृहीत्वा नैरुपैर्युक्तस्तुरगस्यानुगो ययौ ॥३॥
दूतोंके साथ भेज दीजिए अथवा आप स्वयं अपने साथ लेकर हमारे यज्ञमण्डपमें आइए ॥६०। भूलसे मैंने आपको पहले निमन्त्रण नहीं दिया था, सो क्षमा कीजिएगा। इस प्रकार दूतोंके मुखसे रामका सन्देश सुनकर महर्षि वाल्मीकिने कहा- ॥ ६१ ॥ हम अपने शिष्योंके साथ स्वयं यज्ञमण्डपमें आयेंगे, तुम लोग जाओ। रामके दूतोंने ऋषिराजके वचन सुनकर प्रणाम किया और वहांसे प्रस्थान करके रामकी यज्ञशालाको चल पड़े ॥ ६२॥ राम इस भावी घटनाको पहिलेसे ही जानते थे। इसीलिए लौकिक रीति निभाते हुए शिष्योंके साथ वाल्मीकि-जीको पहले यज्ञमें नहीं बुलाया था । ६३ ॥ उधर सीताने भी नौ दिनवाला व्रत समाप्त कर लिया।
विष्णुदासने पूछा जो लोग सामर्थ्यहीन हैं, वे इस व्रतको कैसे करेंगे ? सो बताइए ॥ ६४॥ श्रीरामदासने उत्तर दिया यदि सुवर्णकी पादुका न बनवा सकें तो चांदीकी बनवा लें, वह भी न हो सके तो तांबेकी दो चरणपादुकाएं बनवानी चाहिए ॥ ६५ ॥ यदि उतने कमलक फल न मिल सकें तो साधारणतया किसी भी फलकी अञ्जली दे। यदि इक्यासी द्विजदम्पतीकी पूजा करनेकी सामर्थ्य न हो तो नौ द्विजदम्पतीका ही पूजन करे। उसके भी अभावमें अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करे, लेकिन उनम कंजूसी न होने पाये ॥ ६६ ॥ ६७॥ इस व्रतको करनेसे चाहे कितनों ही दूरीपर रहनवाला भी प्रियजनका मिलाप अवश्य हो जाता है इसके अतिरिक्त जितने भी भविष्यके कार्य होंगे वे सब सम्पन्न हो जायेंगे। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६८ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना आख्याटीकासमन्विते जन्मकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामदास बोले—इस प्रकार रामचन्द्रने ९९ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये, अन्तिम सौवें यज्ञके लिए भी घोड़ा अभिषिक्त करके छोड़ा और शत्रुघ्न उसकी रक्षा करनेके लिए इसके साथ गये ॥ १ ॥ दक्षिण, पश्चिम, पूर्व और उत्तर दिशाकी प्रदक्षिणा करक घोड़ा रामचन्द्रजीके यज्ञमण्डपकी ओर लौट पड़ा ॥ २॥ रास्तेमें कितने ही राजाओंसे अनेक प्रकारकी भेंटे ले लेकर उन राजाओंको अपने साथ लिये शत्रुघ्न अश्वसमेत