श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] जन्मकाण्डम् ३२१
सेनया चतुरङ्गिण्या च दशसाहस्रसंख्यया ।
तस्मिन्विमाने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा ॥ ५ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुः सहस्रशः ।
यज्ञाश्चर्यमयं द्रष्टुं हर्षेणोन्मत्तमागताः ॥ ६ ॥
दान्तौ चिरेऽपि संगृह्य गायन्तौ भूमिजात्मजौ ।
अगाम यज्ञवाटस्य समीपं सीतया सुखम् ॥ ६ ॥
मार्गे नृपसमूहेषु शिविकास्थां हि जानकीम् ।
न विदुः पांथाः सर्वे जानन्नपि यथेतरे ॥ ७ ॥
तथैव या जनकोऽपि ययौ रामाश्रयं प्रति ।
क्रोशार्धान्तरे पूर्वं पश्चादापन्मुनीश्वरः ॥ ८ ॥
कृत्वा पर्णकुटीं रम्यां ताभ्यां युक्तः स सीतया ।
वाल्मीकिर्निवासयामास पर्णकुट्यां विदेहजाम् ॥ ९ ॥
नृपसेनानिवासेषु जनकश्च सुमेधया ।
स्वसैन्येन ययौ तूष्णीं रामेणापि निरीक्षितः ॥ १० ॥
वाल्मीकिस्तौ प्राह तन्मान्तरमण्डितौ ।
जटाचीरधराधर्मी वीरपुत्रौ महाधियौ ॥ ११ ॥
यत्र यत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ।
रामस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः ॥ १२ ॥
आश्रमकाण्डकाण्डानि न गेयमथ बालकौ ।
यदा दयेत्सहं चाहो गायतां सकलं तदा ॥ १३ ॥
न ग्राह्यं नृपवर्याभ्यां यत्किंचिन्नृपमर्हति ।
इति तौ वाल्मीकिनात्र गान्धार्यौ विचेरतुः ॥ १४ ॥
तथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्र व्यगायतम् ।
तौ तु शुश्रुव ऋषयः पूर्वमश्रुतं ततः ॥ १५ ॥
अपूर्वरसवादिनौ तौ समाविदुर्ब्रह्म बालकौ ।
सधनाः सर्वेऽनुसस्रुस्तेऽब्रवन् ॥ १६ ॥
अथ कर्मान्तरे रामः समाहूय मुनीश्वरान् ।
गान्धर्वं गायतामेतौ पृष्टवांश्च नृपोत्तमः ॥ १७ ॥
पौरांश्चित्रांश्छन्दविदो गाथाश्च विविधान्यतः ।
ज्ञातादींश्चैव नैपुण्यात्तथाऽऽहूय द्विजादिकान् ॥ १८ ॥
यज्ञवाटे तु वाल्मीक्ये गच्छन्तौ जनतो भयात् ।
ते सर्वे दृष्टमनसो बालौ ब्राह्मणादयः ॥ १९ ॥
रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता निर्निमेषकः ।
अथोऽन्योन्यं पूर्वत परस्परमथानयोः ॥ २० ॥
इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्बिम्बिनिभाविनौ ।
जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधारिणौ ॥ २१ ॥
अश्वमेधके समीप आ पहुंचे ॥ ५ ॥ उस समय अयोध्यामें उस हजार चतुरङ्गिणी सेना थी। इसके अतिरिक्त उस विमानमें कितने ही ऋषि, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यगण इस दृश्यमें रामचन्द्रके इस अन्तिम यज्ञको देखने आये थे ॥ ५ ॥ ५ ॥ वाल्मीकि जी भी चुप रूप सीताको अपने साथ लेकर गएक यज्ञमण्डपकी ओर चल पड़े ॥ ६ ॥ रास्तेमें जाते समय न कोई लोग नहीं जान पाये कि इनमें कौन है। तब जनक और सुमित्रा ने भी रामाश्रय को गए। जब एक कोश बाकी रह गया, वहीं पर वाल्मीकिजी सीताजीके साथ ठहर गये और सुन्दर पर्णकुटी बनाकर पर्णकुटीके अन्दर सीताको छुपा दिया ॥ ८ ॥ ९ ॥ जनक अपना पड़ाव सेनाके पड़ावके पास ही डालकर ठहर गये। वहीं रामसे भेंट हुई ॥ १० ॥ वाल्मीकिने उन दोनों राजकुमारोंको वस्त्र भूषण उतार तथा जटा और अजिन पहन कर कहा कि तुम नगर भरमें घूमकर गाओ और जो रामचन्द्रजीको गाना यदि रामचन्द्र स्वयं सुनना चाहें तो उनको भी सुना देना ॥ ११ । १२ । लेकिन आश्रम काण्डका पूर्व भाग नहीं गाना, जब वे कहें कि हमसे लेकर बालकाण्ड पर्यन्तका गाओ बिल्कुल आवाज़ साफ़ रखकर उस समय कुछ देना चाहें तो ऐसा इन्कार कर देना। इस प्रकार वाल्मीकिजीके आज्ञानुसार वे दोनों बालक गान्धर्व गान गाते हुए घूमने लगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ जहां-जहां और जिस-जिस प्रकार गुरुजीने आदर गान को कहा था, वहां-वहां जाकर दोनोंने गाया। रामचन्द्रजीके पास भी यह खबर पहुंची और उन्होंने सर्वोत्तम उत्तम गानकी प्रशंसा सुना ॥ १५ ॥ उस तरह बालक युगल इस प्रकार आश्चर्यजनक गानकी वान सुनकर तो सबका बड़ा कौतूहल हुआ ॥ १६ ॥ विश्राम के समय उन्होंने यज्ञमण्डपमें वाल्मीकि आश्रम, नैमिषारण्यके अन्यान्य मुनियों, राजाओं, ब्राह्मणों, पौराणिक पण्डितों, वैय्याकरणों तथा विभिन्न प्रकारके अन्य विद्वान लोगों को इस गानको सुनने बुलाया। इसके बाद सब गाने वालेका पूजा कर और उन दोनों कुमारोंको बुलाया। उन राजाओं और ब्राह्मणादि लोग दोनों बालकों को प्रथम देखा ॥ १७-२१ ॥ वहां लोगोंने एक बार रामकी ओर देखा, फिर बच्चोंकी तरफ निहारा तो उनके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा। उनकी आँख निर्निमेष हो गयी