श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यान्वयोस्तदा । एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥२२॥ तदाऽऽह शमदूतोऽपि लवबाणरुजं स्मरन् । रामचंद्रं यजुर्वाट्स्थितं वै संभ्रमेण हि ॥२३॥ लवमंगुलिना वीरं दर्शयंश्च मुहुर्मुहुः राम राम महाबाहो तमेनं पश्य वै लवम् ॥२४॥ येनास्माकं शरौघैश्च प्रक्षिप्य तव सन्निधौ । नीतानि कनकच्छानेि सुगंधीनि निरंतरम् ॥२५॥ सीतान्यागनिमित्तेन येन तेनापि वा मुहुः । कृता निंदा गरिष्ठेन त्वद्दण्डस्यार्थिना प्रभो ॥२६॥ ननु दण्डभयादेव पूर्ववेषं विलोपितः । रथशस्त्राभरणानि शस्त्राण्यपि विहाय च ॥२७॥ धृतानि वल्कलादीनि दीनरूपोऽत्र दृश्यते । न्यायोऽय दण्डनीयोऽय वधुभागनिवर्हितः ॥२८॥ इति स्वदूतवाक्यानि शृण्वन्नपि रघूत्तमः । प्रेम्णाऽवलोकयामास सुधाक्षिभ्यां शिशू मुहुः ॥२९॥ मध्याह्वारि सभास्थानान्मस्कृत्य यथाक्रमम् । राघवं स्वपितृव्यांश्च वसिष्ठ प्रणिपत्य च ॥३०॥ उपाचक्रमतुर्गातुं वीणे रणयतः शुभे । ततः प्रवृत्तं मधुरं गांधर्वं गतिनुत्तमम् ॥३१॥ श्रुत्वा तन्मधुरं गीतं रामस्नोपमवाप ह । ताभ्यां श्रुतं स्वचरितं विलासाद्यद्यनुक्रमात् ॥३२॥ यद्यदाचरितं पूर्वं सीतया सह मौख्यदम् । ततोऽपराह्ने श्रीरामः प्रसन्नवदनांबुजः ॥३३॥ उवाच तौ समग्रं वै श्रो गेयं मम सन्निधौ । नवेति रामवचन तावंगीनकृतून्वदा ॥३४॥ ततो रामो लवं प्राह मे यद्यप्यपराधिनम् । त्वया पूर्वं तथापि त्वां तुष्टोऽह नात्र संशयः ॥३५॥ स्वद्गीतिमच्चरित्रादि श्रवणादय मे मनः । परं विश्रांतिमापन्नं त्वत्कृतं क्षमितं मया ॥३६॥ अधुना मद्भयं त्यक्त्वा त्वं सुखं विचरस्व हि । तद्रामवचन श्रुत्वा नयो राघवमब्रवीत् । ३७॥ मयाऽपराचितं राजंस्तव दर्शनकाम्यया । मदपराधिन ब्भून्वान्नाहान्तोऽहं यनस्त्वया । ३८॥
और वे आपसमें कहने लगे-२०। एक बिम्बसे निकले दूसरे प्रतिबिम्बकी भाँत ये दोनो बालक बिल्कुल रामचन्द्रके समान हैं। यदि इनके मस्तकपर जटा न रहे और वल्कल वस्त्र उतार दिये जायें तो इनमें तथा राममें कोई अन्तर ही नहीं रह जाता। जब सब लोग विस्मित होकर परस्पर इस प्रकार बात कर रहे थे। तभी उनके बाणोम बाघनेवाले मारको पाड़ाका स्मरण करता हुआ रामका एक दूत घबड़ाकर बोला -२१-२३॥ हे राम! हे महाबाहो! देखिये, यही लव है। जिसने अपने बाणोसे उठाकर मुझे आपके पास फेंक दिया था और सुगन्धित कनककमलके फूलोंको हठात् तोड़कर ले जाया करता था। २४। २५॥ आपके सीन्तात्यागविषयक बालक होकर इसीने बड़े घमण्डके साथ आपकी निन्दा की दी। २६॥ ज्ञान होता है कि आपके दण्डसे डरकर इसने रथ तथा वस्त्राभरण त्याग दिये हैं ओर वल्कलवस्त्र आदि पहन तथा दीनरूप धारण करके आया है। किन्तु मेरा यह परामर्श है कि इस अभिमानीको अवश्य दण्ड दीजिये। २७।२८॥ इस प्रकार दूतकी बातें सुन करके भी रामचन्द्र अपनी अमृतभरी आँखोंसे उन बच्चियोंको प्रेमपूर्वक देख रहे थे ॥ २९॥ उन्होंने सभाभें पहुँचकर वहाँ बैठे हुए लोगोंको प्रणाम करके रामको, लक्ष्मण आदि अपने चाचाओं को तथा वसिष्ठ आदि गुरुजनोंको प्रणाम किया और वीणा बजाते हुए रामचरित्र गान लगे। उस समय मघाम जैसे गान्धर्व गायनका रंग बरसने लगा ॥ ३० ॥ ३१ ॥ राम उनका मधुर गायन सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। गायनमे रामके उस चरित्रका वर्णन था, जो जन्मसे लेकर विलासकाण्ड पर्यन्त सीताके साथ उन्होंने किया था॥ ३२॥ गान-गाते दोपहरका समय हो गया। तब रामचन्द्रन प्रसन्नतापूर्वक उन बच्चास कहा-बच्चो, आज समय अधिक बीत चुका। इसलिये रहने दो। कल मेरे पास फिर आना और मुझे सारी रामायण सुनाना। रामकी बातको उन्होंने अङ्गीकार कर लिया ॥ ३३ ॥ ३४॥ इसके अनन्तर रामने लवस कहा-यद्यपि तुम हमारे अपराधी हो फिर भी मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हें कोई दण्ड देनेकी इच्छा ही नहीं होती। तुम्हार गानभीम अपनी चरित्रसुली सुनकर मेरा हृदय शान्त हो गया है और तुमने जो अपराध किया था, उसे क्षमा करता हूँ । ३५ ॥ ३६ ॥ अब तुम मुझसे डरो नहीं निर्भय होकर जहाँ चाहो घूमो। इस प्रकार रामकी बातें सुनकर सबने उत्तर दिया-राजन् ! उस समय