श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] अष्टमकाण्डम् ३२१
अद्य ते दर्शनेनैव पौरुषं वृद्धिमङ्गतम् । कीर्तिर्न महती जाता तवाग्रे गायनादपि ॥३९॥ इत्युक्त्वाऽऽर्याज्ञयाऽऽपूर्णा बन्धुना गन्तुमुद्यतः । मखयात्रौ संतुकामो स्थलन्मीय निरीक्ष्य च । ४०॥ रत्नोऽयुतं वसु तपोऽर्थिनांवेन प्रदापयन् । दीयमानं सुवर्णं तौ न मजग्गृहतुस्तदा ॥४१॥ राजन् हेम्ना किमेतेन पात्रौ वै वन्यभोजिनौ । कृपालोकनेनैव यदि न्याय्योः सदा ॥४२॥ इति संत्यज्य तद्दत्तं जग्मतुर्मुनिमाश्रिषम् । आत्मानम्वृत्ता स्वचरितं रामो हृद्यतिविस्मितः । ४३॥ कुशोऽपि सकलं वृत्तं वाल्मीकिं मानदं तदा । निवेद्य बाहुवीर्यं स्नातुं कौतुकेन ययौ सुतम् ॥४४॥ लवो मुनीनां शिशुभिः शिशुक्रीडनमथाचरत् । एतस्मिन्नन्तरे यत्र लवः क्रीडां चकार ह ॥४५॥ बालकैस्तत्र संत्राप्तास्तुरगं ध्वजकारिणः । त्यक्त्वा क्रीडां लवः शीघ्रमुपमूर्वीटजान्तिके ॥४६॥ वृक्षे बबंध शिशुभिः पूर्ववत् क्रीडन व्यधात् । ततः से पुष्पकं प्राप्त दृष्ट्वा बहु तुरङ्गवम् ॥४७॥ श्रान्त्वा बालकृतं सर्वे शत्रुघ्नाया निवेद्य ते । दूतानाज्ञापयामासुर्न्नयतां तुरगः सुखम् ॥४८॥ लवस्तानागतान् दृष्ट्वा वायव्यास्त्रेण वै तृणम् संमन्त्र्य तान् सुमोधाय नीलपा शिशुसंयुतः ॥४९॥ सञ्चार्नस्तदा यातं हन्यश्चाथतुरङ्गितम् । शत्रुघ्नेनापि तैर्दूतैः खेडभूत्तद्रमगोपमम् ॥५०॥ तच्छ्रुत्वा राघवचन्द्रोऽपि प्रेषयामास सादरम् । सुग्रीवमङ्गदं नीलं मैन्दं जाम्बवन्तं नलम् ॥५१॥ सुषेणं भरतं वायुपुत्रं ताक्ष्यं विभीषणम् । नृपेण पार्थिवान्सर्वान् स्वस्त्रांस्तर्बलपेतान् ॥५२॥ द्विविदं दधिवक्त्रं च वानरान्मकराध्वजम् । ते सर्व दुद्रुवुर्योद्धुं चक्रुस्त्त्वरान्विताः ॥५३॥ तानागतान कपी दृष्ट्वा कस्यचित्पतितं भुवि । दूतस्याश्वमोचनायायातस्य शरासनम् ॥५४॥ तूणीरं च स्वयं धृत्वा ययौ योद्धुं त्वरान्वितः । टणत्कृत्य महच्चापं चिन्तयामास चेतसि ॥५५॥
मैंने जो अपराध किया था, उसका उद्देश्य एकमात्र यही था कि मैं किस प्रकार आपसे मिलूँ। आपने भी मेरे अपराधका स्मरण करके भी मुझे बुलाया साधुवत् कृपा की ॥ ३७ । ३८ ॥ आज आपके दर्शन करते ही मेरा पुरुषार्थ बढ़ गया और आपके सामने रामचरित गायन बड़ी कीर्ति की बात ॥ ३९ ॥ इतना कहकर कुश धूप दाशद और अपने भ्राताके साथ आश्रमको जानेकी तैयारी करने लगे। उधर रामने उन बच्चोंके लिए दस हजार स्वर्णमुद्रायें अवश्य दिलवायीं। किन्तु उन्होंने वह धन नहीं लिया। उन्होंने कहा—राजन् अरण्यमें फल-मूलपर जीवन बितानेवाले हम वगवाका काम आपकी इस सुवर्णराशिको लेकर क्या करेंगे। बस, आप अपनी कृपादृष्टिसे हमारी रक्षा करते रहिए ॥ ४०-४२ ॥ इस प्रकार उस दानद्रव्यका परित्याग करके वे दोनों वाल्मीकिजीके पास चले गये। वन्ताके मुखसे अपना चरित्र सुनकर रामचन्द्रजी बहुत विस्मित हुए ॥ ४३ ॥ उधर कुश आश्रमपर पहुँचे तो वहाँ वाल्मीकि तथा माताको उस दिनका वृत्तान्त सुनाया और स्नान करनेके लिए गङ्गाजी-को चले गये ॥ ४४ ॥ इधर लव कुछ मुनिकुमारोंके साथ खेलने लगे। इसी बीच जहाँ वे सब खेल रहे, उस तरफका अश्वमेघका घोड़ा चारों ओर घूमकर रामकी यज्ञशालामे जा रहा था। उसे देखते ही कौतुकवश भटोंने घेर लिया। लवने आगे बढ़कर घोड़ेको पकड़ा और अपने कुटियाके किनार ले जाकर एक वृक्षमें बाँध दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ लडक फिर खेलने लगे। उस समय म.काश्रम पूरवक विमानपर बैठे हुए शत्रुघ्नने देखा तो बहुत हँसे। उन्होंने सोचा कि यह बच्चोंने खेलवाड़ किया है। शत्रुघ्नने दूतोंसे कहा जाओ और घोड़ेको यहाँम छुड़ा लान ओ। दूत लवके पास पहुँचे। ज्यों ही लवने एक तिनका उठाया और वायुव्य मन्त्रस अभिमन्त्रित करके उनपर डाल दिया। उसके डालते ही बड़ा जोरसा आँधी चलने लगी ओर शत्रुघ्न तथा उनके सैनिक हाथी, घोड़े, रथ आदि आकाशमें औरोंकी तरह उड़ने लगे ॥ ४७-५० ॥ यह समाचार सुनकर रामने अपने यहाँसे सुग्रीव, अङ्गद, नील, जाम्बवान् नल, सुषेण, भरत, हनुमान्, गरुड़, विभीषण, सुषेण तथा देश-देशान्तरसे आये हुए राजाओंको शत्रुघ्नकी सहायताके लिए भेजा। इनके अतिरिक्त द्विविद-दधिवक्त्र आदि वानर तथा मकरध्वज आदि वीर गर्जनाके साथ युद्धभूमिकी ओर दौड़ पड़े ॥ ५१-५३ ॥ इतनी बड़ी सेनाको सामने देखकर लवने एक साधारण मनुष्यको, जो घोड़ा छुड़ानेके लिए आये हुए किसी सैनिकका गिर पड़ा था,