भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 340
३२५आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

पितृव्याद्याः स्थिता योद्धुं ममाद्य पुरतःस्थले। इदमेवाथ सोढव्यं मया च महासंगरे ॥५६॥
कथं तीक्ष्णानथ शरांस्तेषु प्रक्षिपाम्यहम्। मन्मन्त्रादिशरैर्नाद्या मा भवन्तुनिगोचराः ॥५७॥
महिक्षतिं कथं दृष्ट्वा कर्तव्यं किं मयाऽधुना। सीतां गन्तुं पश्चिमेऽन्वा गच्छामि तं मुनिम्॥५८
वाल्मीकिशिक्षिता विद्या नष्टा स्यान्निष्फला मयि। अत्रोपायोऽथ विना युद्धं करोम्यहम् ॥५९
इति निश्चित्य मनसि मेघवल्लक्ष्मणो वदन्। प्रहसन्वै किमर्थं मा मुग्धा मित्रैव वेगतः ॥६०॥
न सीतास्वङ्गुलभोऽहं पीडनान्मोहनाय हि मोहास्त्रेणाऽन्मुह्वं मां मेवं वेत्थ भो खलाः ॥६१॥
सीतास्योच्छ्विसितेनाऽग्निरुत्थास्यतिभिड्ङिव पौरुषम्।
त्रिदग्ध न स्फुटं लोकेऽदर्शयन्मे समापि च ॥ ६२॥
इति स्ववाक्यैर्गर्जन्त्सहस्यान्यं मथ पुनः माहायामन्त्रमादाय मोहनास्त्रं विसृज्य च ॥ ६३ ।
ततो लवः सं विजया सुमंत्र दग्त तथा कृत्वा मर्कटशः प्राप्तै लब्ध्वा वायुनन्दनम्। ६४
सुग्रीवं च मुदा युक्तो मानायं तान प्रदर्शयत्। दृष्ट्वा मोहाविदान् वीरान् मोहनास्त्रं प्रमोहितान् ॥६५॥
पुत्रान्न मोचयामास क्षपयामास तानू रहः नानानानाविधैः श्रुत्वा लक्ष्मण बाष्पमब्रवीत् । ६६।
ईदृशं पौरुषं तथा रावणेनापि ना कृतर् यथा कृत बालकर इत्यायं किमत्र वै । ६७।
श्रीरामवचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः प्राह राघवं मा विनेश वश कामं तृत्वाऽहं न शिशुं तुमाम् । ६८।
त्वन्मन्त्रिभारानयामि सिंहो मृगशिशुं यथा। इत्युक्त्वा माधव नत्वा रथाऽऽरूढो ययौ जवात् ॥६९।
सेनया मन्त्रिर्युक्ता वाग्माक्यव्योममण्डलम् । तत्रागतं धनुष्पाणिं लव दृष्ट्वा तन्मुखे ययौ ॥७०।
न दृष्ट्वा बालकं रम्यं कृपया लक्ष्णोऽब्रवीत् । मा शिशो त्व कुपर्याय माहवे मन्पुरस्थित ॥७१॥


उसका हाथ न हिलावेगा न लगावेगा और युद्ध करने के लिये राजी न होगा। हे देव ! यह तो मेरे सम्बन्धी सब इकट्ठे होकर मेरे चाचा आदि युद्ध करनेके लिए सामने आये हैं, इसलिए मैं इनपर अस्त्र न चलाऊंगा क्यों कि महात्माओंने स्वजनोंका वध करावर माना गया है । इस कारण यह मेरे दुष्कर्मोंको भला कैसे सहेंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूँ ? यदि युद्धसे मुँह मोडूँगा तो वाल्मीकिजीके आश्रम में न जाउँ तो महर्षिकी सिखायी विद्या निष्फल हो जायगी। अनन्तर कोई ऐसा उपाय सोचना होगा, जिसमें किसीका वध न हो ॥ ५४-५९ ॥ ऐसा निश्चय करके मेघकी तरह गर्जते हुए लवने कहा- हे दुष्ट ! तुमलोग किसलिये मेरी ओर दौड़े चले आ रहे हो ? ॥६०॥ तुम लोग धोके में न रहना । श्रीरामकी दी हुई मोहास्त्रको चुपचाप सह लूंगा। देखो मेरे समान बन्ध्य अग्निका दूसरा रूप ही मैं स्वयं हूँ। सीताकी उष्ण उच्छ्वासकी यह ज्वालाके समान आज बन गया है । इसलिए तुमलोगोने मेरे सामने व्यर्थ होगा और दुःख पायेगा इस प्रकार कहकर अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढाकर बाणोंका तीक्ष्णतर प्रहार किया। तदनन्तर अपने माहेश्वरास्त्र और जीवास्त्र नाम बाणोंका संधान कर दिया ॥ ६१-६३ ॥ इसतरह विजय प्राप्त करके लवने सुमन्त्र और अन्य सबोंको बान्ध लिया। प्रयोग हनुमान्जी तथा सुग्रीवको दबाकर प्रसन्नतापूर्वक माताके पास ले गये और सबोंको दिखाया। उन वानरोंको माहास्त्रसहित देखकर सीताने उन्हें मुक्त करा दिया। उधर जब रामने यह सुना कि लव मोहनास्त्रसे मन्त्रियोंको मोहित करके बान्धके आश्रमको पकड़ ले गया है। तब एकान्तमें लक्ष्मणसे कहने लगे— हे लक्ष्मण ! इस प्रकारका पराक्रम तो रावण भी नहीं दिखा सका था, जैसा कि यहाँ वह छोकरा दिखा रहा है। इस विषयमें क्या करना चाहिये यह मैं कुछ भी नहीं सोच सका हूँ इस प्रकार रामकी बात सुनकर लक्ष्मण बोले- आप कुछ चिन्ता न करें। मैं अभी जाता हूँ और क्षणमात्र में उस बच्चेको बन्दी बनाकर आपके पास लाता हूँ ॥६४-६८॥ ऐसा कहकर लक्ष्मण रथपर बैठे और सेनाके साथ चल दिये। एक बड़ी सेना और मन्त्रियोंके साथ लक्ष्मण थोड़ी ही देरमें अश्वमेधके पास जा पहुँचे। जब लवने सुना कि लक्ष्मण आये हैं तो वे स्वयं उनके सामने गये। लक्ष्मण जब उस सुन्दर और सुकुमार किन्तु वीर