श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ३२५
न मत्सौढोऽसि हे व्यर्थं गच्छ नोचेन्न रिष्यसि । शमं न गमयन्नद्य भग्नोऽहं स्यां न संशयः ॥७२॥
त्वयाऽपराधिनं बालं रामस्य सुतमेककम् । नाहं हन्मीह नानेनात्मानं निहन्म्यहम् ॥७३॥
नीतान् वीरान् समर्प्यथ बद्धांस्तुल्यान्निजैः सुतैः । सपुत्रं रघुपत्याशु प्राप्नुयान्मम संमुहात् ॥७४॥
तत्सौमित्रेर्वचः श्रुत्वा लवोऽपीत्थमभाषत । जानेऽहं राघवौ चाथ सौन्दर्याणामपौरुषम् ॥७५॥
सीतायामेव युष्माकं पौरुषं न त्वन्यतः । सम्भूताऽपनादार्थं मुनिना निर्मितस्त्वहम् ॥७६॥
यूयं जित्वाऽथ समरे मातुस्तापं प्रमार्क्ष्यहे । मुरा नृपाश्चापि या माना ल्लवनात्पापिनोवता ॥७७॥
तस्या विनिष्कृतिं कर्तुं कङ्कपत्रं समागतः । मातर्दुःखाग्निना युष्मत्पापं दग्धमवेहि तत् ॥७८॥
न स्वातन्त्र्यं ममाग्रेऽत्र गच्छध्वं विधयोपमाः । इति ते लववाणौघैर्हृत्प्रमथ्यदलश्च वै ॥७९॥
लक्ष्मणायो यत्प्रयुक्तं शस्त्रमस्त्रं च वृथा ततो मन्त्रश्च तैर्र्बाणैः शस्त्रैश्चैव निवारिते च ॥८०॥
श्रीरामसचिवार्दींश्च प्राधमद्यज्ञमण्डपे । ते सर्व सचिवा व्याध लक्ष्मणगताऽद्वताः ॥८१॥
भिन्नदेहा लोहिताङ्गा मेनू रामं व्यजिज्ञपन् । पश्य त्वं भो पश्याम किं तूष्णामध्यक्षमण्डपे ॥८२॥
उपायं चिन्तयस्यान्यं वधेऽन्यस्य लवस्य च । शस्त्रास्त्रैरिति युद्धं न गच्छति लवः प्रभो ॥८३॥
साहाय्यं कुरु सौमित्रेर्यदि बन्धुं मनीषितम् । लवशरप्रहारैश्चातुमुत्सलम् ॥८४॥
इत्युक्त्वा सर्ववाक्यानि राघवं ते न्यवेदयन् । तानि श्रुत्वा राघवोऽपि तूष्णामप्यासीत्तदा क्षणम् ॥८५॥
लवाऽपि लक्ष्मणं बाणैर्विद्व्याध दशभिर्दृढम् । अपृच्छन्मज्जने बाणाः शरीरे लक्ष्मणस्य च ॥८६॥
ततः क्रोधपरोतात्मा लक्ष्मणो वेगवत्तरः । स्वदेहं स्वशस्त्राणि भवन्ति विफ़लानि हि ॥८७॥
बालकका सामन देख तो दुखपूर्वक कहने लगे- देख, वत्स! अब मैं आया हूँ। मेरे सामने किसी तरहकी दुष्टता न करना। तुम मेरे सामने नहीं ठहर सकते। जाओ, चले जाओ, नहीं तो तुम नहीं बच सकते। अभी तुम तुम्हारे उत्तम व्यर्थ रामका काम भुगता है। इसलिए नहीं मार रहा हूँ हे अज्ञान बालक ! तुमने कई बार रामको अपराध किया है। मैं सब जानता हूँ। फिर भी मैं तुमको नहीं मारता ॥७१-७३॥ यदि तुम्हें अपने प्राणोंका लोभ हो तो तुमने जिन लोगोंको पकड़ लिया है, उन्हें लाकर हम दे दो और भाइयोंको लेकर मेरे साथ रामचन्द्रजी के पास चलो। -७४ इस तरह लक्ष्मणजीकी बात सुनकर लबने कहा- बेचारी सीताके ऊपर अपना वीरता दिखलानेवाले तुमको और रामको मैं अच्छी तरह जानता हूँ। सीताके ऊपर तुम्हारा जो पुरुषार्थ चला था, वह संसार नहीं भूल सकता। सीताके दुःखको दूर करनेके लिए ही महर्षि बाल्मीकिने मेरा रचना की है। ७५, ७६, अब मैं तुम दोनोंको जीतकर सीताका दुःख दूर करूँगा। तुमने भोलीभाली सीताके साथ कपटपूर्ण व्यवहार किया है। उसका प्रायश्चित्त करनेके लिए ही मैं यहाँ आया हूँ। सीताके दुःखरूपी अग्निमें तुमलोगोंका दुष्कर्म जल चुका है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ तुमलोगोंको चाहिए कि मेरे सामनेसे हट जाओ। इस प्रकार लवके चलाये हुए बाणोंसे लक्ष्मणका हृदय विदीर्ण हो गया। ७९ । ८० ॥ अतः क्रुद्ध होकर सब एक साथ लवपर बाणवर्षा करने लगे। लवने भी अस्त्रसे उनके शस्त्रास्त्रका निवारण किया और लक्ष्मणके साथ आये हुए मन्त्रिसैनिक आदिको अपने बाणोंसे उठा उठाकर रामके यज्ञमण्डपमें फेंक दिया। लवके बाणोंसे आहत मन्त्री आदिका दङ्गल जहाँतहाँ पाथ हो गये थे और उनसे रुधिर बह रहा था। इस दशामें वे सब रामके पास जाकर कहने लगे- हे राम ! इस यज्ञमण्डपं चुपचाप बैठे बैठे आप क्या देख रहे हैं । ८१॥ ८२ ॥ लवको मारनेके लिए कोई दूसरा उपाय सोचिये। हे प्रभो ! लव संग्राममें किस तरहके अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मर रहा है। हे बन्धुवत्सल ! यदि लक्ष्मणको जीवित देखना चाहते हो तो उनकी सहायता करिये क्योंकि वे बाणोंके प्रहारसे बहुत थकगये। इस तरह वहाँका समाचार सुनानेके बाद उन बातोंको बतलाया, जो लवने रामके विषयमें कहा थी। उनकी बातें सुनकर राम कुछ देरतक चुप बैठे रहे। उधर लबने दश बाणोंसे लक्ष्मणको घायल कर दिया और वे दसों बाण लक्ष्मणके शरीरमें सिरसे लेकर पूँछतक घुस गये थे ॥ ८३-८६ । ऐसी अवस्थामें लक्ष्मण क्रोधसे आग-