श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७
दृष्ट्वेत्यूचुर्भृशं वित्रस्ताः सः क्षणं सन्विचिन्त्य वै हृदि । ब्रह्मास्त्रेण लवं बद्ध्वा साश्वं गङ्गे न्यवेदयत् ॥८८॥
ब्रह्मास्त्रं मानयंस्तूणीं ययौ राम लवेऽपि सः । पश्चादस्तं समायांतं दृष्ट्वा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥८९॥
जानन्नपि सुतं स्वोष कौतुकं दर्शयञ्जनान् । महत्कार्यं कृतं बन्धो त्वयाऽत्र विद्धि बहुजम् ॥९०॥
द्विजहत्यामय त्यक्त्वा घातयस्सैनमद्य हि। राम प्रोवाच सौमित्रिर्नायं शस्त्रैर्मरिष्यति ।९१।
भरताद्यैर्मया चापि नायं किं ताडितोऽग्निभिः । यस्य देहे क्षतं चैकमपि किं दृश्यते त्वया ।९२॥
तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह प्रष्टव्यो बालकोऽन्यथा। केनोपायेन ते मृत्युर्भवेदिति समाग्रतः ।९३॥
गोपायन्ति निजं मृत्युं न शूरा वधशङ्कया । न वदन्त्यनृतं क्वापि स्वबलेनैव जीविताः । ९४॥
वतः पृष्टो लक्ष्मणेन लवः प्राहाथ लक्ष्मणम् । जलस्य सेचनाद्वृद्धिं स्वीयां ज्ञात्वा मुनेर्गिरा ॥९५॥
ज्ञापयन्बुद्ध्या लोकांश्च दर्शयन् स्वपराक्रमम् । जलस्य सेचनान्मे मृत्युर्मे निश्चितो भवत् ॥९६।
ततस्त्य वचनं श्रुत्वा शिलायां तं निवेश्य च । सेचनं तोयकलशैः कारयामास लक्ष्मणः ॥
अयोध्यावासिभिर्नारैः पुरुषैः परमादरात् । ९७॥
चतुर्मुखैश्च घटैर्पानीयंश्च कोटिशः । तथा कार्पटिकैश्चापि रथौष्ट्रवारणादिभिः ॥९८॥
आनयित्वा जलं शीघ्रं सिषेचु लवालकम् । यथा यथा जलैस्त हि सेचन चक्रिरे जनाः ॥९९॥
तथा तथा लवस्तत्र व्यवर्द्धत घनो यथा । सप्ततालप्रमाणोऽभूदृष्ट्वा ताम्पसत्तमम् ॥१००॥
ततस्तं लक्ष्मण, प्राह त्वया लव मुषेरितम् । नाय तव वधोपायः स्ववृद्धयर्थे कृतः खलु । १०१॥
लवोऽप्याहाय सौमित्र कोटिन्येन प्रनाश्यन् । यथा तैरुद्यने दीपो वृद्धिमते प्रणश्यति । १०२।
तथायुषः क्षये मेऽपि वृद्धिं पश्य क्षणं निशम् । तद्वाक्यं मानयन्नन्य सेचयत् स लक्ष्मणः । १०३॥
जलेर्मागैः समानीतैः पूर्ववच्च पुनः पुनः । कष्टमोषानमार्गेण सेचन चक्रिरे जनाः । १०४॥
बबुल हो उठे। उन्होंने कई शस्त्र लवपर चलाये, लेकिन जब उन्हें बेकार होते देखा तो घबड़ा उठे। क्षण भर उन्होंने न जाने क्या सोचा और तब ब्रह्मास्त्रसे लवको बाध लिया और घोलाको भी साथ लेकर अयोध्यामे रामके पास ले आये ॥८७॥ ८८ ॥ ब्रह्मास्त्रका मर्यादा रखकर लिए लव भी चुपचाप लक्ष्मणके साथ चल दिये। जब रामने लवको देखा तो कौतुकावश कहा यद्यपि मै जानता हूँ कि यह मेरा ही पुत्र है। फिर भी संसारको शिक्षा दनक लिय मै आज्ञा देता हूँ कि द्विजहत्याके भयको दूर करके आज ही इसे मार डालो। इसने बड़े अपराध किये हैं। लक्ष्मणने उत्तर दिया कि यह किसी शस्त्रास्त्रस नहीं मरेगा ॥ ८९-९१॥ हमने तथा भरतजीने इसपर कितना ही बार शस्त्रास्त्रके प्रहार किये है, किन्तु देखिए न ! इसके शरीरमे कहीं कोई घाव दीखता है ! ॥ ९२ ॥ रामने कहा- इससे पूछो कि तू किस प्रकार मर सकेगा। जो सच्चे शूरवीर होते है, वे अपनी मृत्युके उपायको भी नही छिपाते। राज्य बार कभी झूठ नही बोलते ॥ ९३॥ ॥९४॥ इस प्रकार पूछनेपर लव कुछ सोचने लगा। एक बार महर्षि वाल्मीकिने लवस कहा था कि तुम्हारे ऊपर जितना जल डाला जायगा, तुम उतने ही बढ़ोगे । इसी बातका ख्याल करके लवने समारको अपना पराक्रम दिखाने-के लिए लक्ष्मणसे कहा- जलके सींचनेपर मेरी मृत्यु होगा ॥ ९५ । ६६ ॥ लवकी बात सुनकर लक्ष्मणने लवको पास ही एक पत्थरपर बिठाया और पानके घडासे नहलाने लगे। अयोध्यानिवासी बहुतसे नरनारी बड़े आदरके साथ लवपर जल डालने लगे । चार मुंहवाले बड़े-बड़े घमडकर झट बेल रथ हाथी, घाड़े, ओर ऊँटपर लाद-लादकर कराडोका सख्यामे वहाँ आन लग और व सब उसके ऊपर डाल दिये गये। जैसे-जैसे पानी पड़ता था, त्यो त्यो लव मेघके समान बढ़ने जाते थे। बहु परम वीर बढ़ते-बढ़ते जब सात ताड़का ऊँचाई तक बढ़ा ॥ ९७-१०० ॥ तब लक्ष्मणने कहा-लव ! जान होता है कि तुम झूठ बोल हो। तुमने मरनेके लिये नहीं, अपने बढ़नेका उपाय बताया था ॥ १०१ ॥ लवने भी लक्ष्मणका बहकाकर कहा-न एक जब बुझनेवाला होता है तो उसकी ली कितना बढ़ जाया करता है। उसी तरह आयुके क्षय होनेसे मै भी बढ़ रहा हूँ। अबकी बार भी लक्ष्मणने लवका बात सच मानी और उसी तरह लवके ऊपर जलके कमसे डालते रहे ॥ १०२।१०३। बहुत्तणोके