श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] जन्मकाण्डम् १२७
भस्त्रात्रेण विनिर्मुक्तः प्रजवाल ह्यमन्दहा । मुग्धावागङ्गलवाभाम सद्योरु बाललीलथा ॥१०५॥ तं दृष्ट्वा दुद्रुवुः सर्वे त्यक्त्वा तोयघटानपि । शकृन्मूत्रं प्रमुञ्चन्तो मुक्तकच्छा लवेषवः ॥१०६॥ एतस्मिन्नन्तरे क्रीडन्गङ्गायां तानूजनान्दृशः । पप्रच्छाथ मुहूर्तीर किमर्थं नीयते जलान् ॥१०७॥ जनाः प्रोचुर्लवं हन्तुमस्माभिर्नीयते जलम् । दिव्यमैलरवास्त्रेण तन्मुग्धा मययौ कुशः ॥१०८॥ संगृह्य स्वाश्रमाच्चापं तूणीरं देगशत्रुतः । लव मोचयितुं चापं टान्कुन्वाऽश्वत्थशाखे ॥१०९॥ कुशचावध्वनिं श्रुत्वा तस्थौ तूष्णीं लवः क्षणम् । मनो दृष्ट्वा कुशं प्राप्तं ययौ योद्धं म लक्ष्मणः ॥११०॥ तं दृष्ट्वा म कुशः प्राह छलिनौ जानकीसूतौ । त्वदा गमण नोकेंश्च गयोः कर्तुं विनिष्कृतिम् ॥१११॥ अह हाहोपमंय मां बाल लक्सन्न न यानय । युवयोः रीक्ष्यं नार्था शिक्षावन्मीति वेदम्यम् ॥११२॥ गंतवकेशान्तुलम्बतासद्धर्षं पुरयोर्वलम् । न ममाग्रे स्फुटं कार्यं युवाभ्यामुपहामकन् ॥११३॥ वाञ्चार्काक्षाक्षतां विद्यां राम स्वामद्य दर्शये । इत्युक्त्वा तुमुलं युद्धं विक्षुब्धेन चकार मः ॥११४॥ आसन् वृथा जानकीये लक्ष्मणेन्मुष्टमार्षणाः । रामायणानुक्तौ ज्ञात्वा ज्ञेय एवात्र लक्ष्मणः ॥११५॥ जातोऽर्थादिति वधे मस्य गरुडास्त्र मुमोच सः । क्षात्रधर्मं पुरस्कृत्य न तद्धिमाभयं दधे ॥११६॥ जानन् युद्धं पितुर्हन्ता ज्ञानं चैव मय न्विति । तदृष्ट्वा स्वगताश्चासं सौमित्रिः कु ठेना मतिः ॥११७॥ भयभीतः पृथिव्यां हि पपात लक्ष्मणो रथात् । च्युतं दृष्ट्वा स्वयं तत्र दीक्षायुक्तोऽपि वेगतः ॥११८॥ धृन्वा चापं च तूणीरं यज्ञकुण्डप्रवः स्थितः । चाप संधाय ब्रह्मात्रं सौमित्रेर्जी विनाशश ॥११९॥
जल भर-भरकर लाया जा रहा था और स ही लगाकर लवलर उसकी आग डाला जाता थी ॥ १०४ ॥ उसी समय सबके देखत ही इसन सब ब्रह्मास्त्रस्त्र छूट गया और अगार मय वाल डोगत हुआ दौड़ने लगा। उसको देखकर वहाँके सारे नर-नारग अपने अपने कलसानी छु ड-छाडकर भाग गये। उसक उस विकराल रूपको देखकर बहुतोंकी बालियाँ सुन्त गयीं। कई एकका तो मारे डरके पशाव टट्टी तक हा गयी । १०५ ॥ १०६ ॥
उधर कुश बच्चोकी तरह खेलत-कूदता गङ्गाजीके किनारे गया। वहीं उसन देखा कि बहुतस लोग पानी भर रहे हैं। उनस कुशल पूछा-तुमलोग इतना पानी क्यों भरे लिये जा रह हो ? ॥ १०७ ॥ उन्होने कहा— लवको मारनेके लिए। यह सुनकर कुश अपने आश्रमपर गया और धनुष-बाण लेकर लवको छुड़ानेके लिए रावणके यज्ञशालाके समान जा पहुंचा और ध.णुषका भीषण टंकार किया ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ कुशके धनुषकी टंकार सुनकर लव कुछ देरके लिए शान्त खडा हो गया और कुशसे युद्ध करनेके लिए लक्ष्मणके सामने जा पहुँचा । ११० ॥ लक्ष्मणको देखकर कुशने कहा—तुमन और रामन लव तथा सीताके साथ बडा छल किया है। उसीका बदला लनक लिए मैं आ रहा हूँ। मुझको लवकी तरह साधरण बालक न समझना। तुम लोगोंका औरना स्वा और छाट-छाट बच्चोंपर ही चल सकता है यह में जानता हूँ। सीताके बलक्षयकी कुरुना आदिम तुम्हारा श्रम जल चुका है। अब अपना उपहास करानेके लिए मेर सामने लड़नेको व्यर्थ आये हैं। अच्छा, यदि तुम्हारी यही इच्छा है ता वाणवार्षिकी शिक्षाकी विद्या आज में तुम्हें और रामको दिखाता हूँ। ऐसा कहकर कुशने लक्ष्मणके साथ तुमुल युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ १११-११४ ॥ लक्ष्मणने कुशपर जितने वाण चलाये, वे सब व्यथ गये। रामायणकी भविष्यवार्तासे कुशने ज्ञात हो चुका था कि अब लक्ष्मणके सिवाय और कोई वीर बांकी बचा हा नहीं है कि जिसके साथ युद्ध करके हारनेकी आवश्यकता हो। यह सोचकर क्षात्रधर्मके अनुसार उसने बालकके मारनेम कई अपराध न समझकर उन्हें मारनेके लिए गरुडास्त्रका प्रयोग किया ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ उस गरुडास्त्रको अपने ऊपर आते देखकर लक्ष्मण सिटपिटा गये उनको सारी चतुरी भूल गयी और मूर्छित होकर रथसे पृथ्वोपर गिर पड़े। लक्ष्मणको रथसे गिरते देखकर राम दीक्षित होते हुए भी धनुष बाण लेकर दौड़े और लक्ष्मणको बचानेके लिए उन्होंने कुशके छोड़े हुए गरुडास्त्रपर अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्रके पहुँचनेपर गरुडास्त्र आकाशमें ही ठंडा हो