श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
मुमोच बाणमाग्नेयं गरुडेऽपि मारुत्य् । तेन गच्छन्निगगद्वह्निर्मातुं तु गारुडम् ॥१२०॥
ततः कुशः संदधे य मदाख्यं गपवातरि... वच नारी सीतान्युलब्धकीर्तिं त्वया । १२१॥
जनान दर्शयितुं स्वाय पौरुषं जानकी यते । न्यक्तं यया वृथा पूर्वं जानैद्ध न चेष्टितम् १२२॥
वाल्मीकिशितिरुत्पन्नां विद्यां ममाद्य श्व विलोकया । नेचेत्य यदि दृप्तस्त्वं वाल्मीकिं जानकीमपि ॥१२३॥
तद्वाक्यैर्रिन्नमर्माऽगवन्मा विलोक्य नरा गोत्रेषु मुमुचे बांर म्नैन उत्छ्रितिमाप वै ॥१२४॥
मध्ये मान्गयाणं कुशस्तं राघव पुनः । गन्धर्वेण दोशलाश्चेण वारमयं न्यवारयन ॥१२५॥
इषुगत्रं मुमुचे घोरं कुशाऽरि राघव जवात् । तन्जगामच तद्राभो मेघ क्षेण व लीलया ॥१२६॥
पपुलपं मुमुचे गाम जानकीजटरोद्भवः । नदावारयच तद्राभ पर्वतेन लीलया । १२७।
वज्राम्रं मुमुचे शर्व यानेश्व मोऽतिमन्त्रवान् । याग श्वेनाथ रामेऽपि वज्रास्त्रं तन्न्यवादयत ॥१२८॥
अंवाश्मं मुमुचे राम मातयः परमदारुन हाहाशब्दस्तदा चार्मद्राघवस्याश्वसंगणे ॥१२९॥
अथवारयचवाश्मं वैष्णवेन रघूत्तम । ततोगम कुशश्चोष्णान्नानां बांणतस्तः पुनः ॥१३०॥
मुमोच राघवश्चापि मार्गणांश्चहुशः कुशम् । एव तत्तुल युद्धं बभूव प्रहर नयोः ॥१३१॥
तदाऽऽश्चर्याकौतुक रामकुशयोर्युद्धवामहन् गढचापार्ष मुक्ता रता ये ये पनात्रिणः ॥१३२॥
ने ने कुशशिरोन्मार्गेपतितादृष्टवान्त्वरे । पति सम् तथा ने ये कुशचापविनिर्गताः ॥१३३॥
शासने रामचंद्रस्य पतन्ति स्म पदांतिके । तद्दृष्ट्वा क्षोभक गतो दम्भाश्चर्यप्रजाप्रजः ॥१३४॥
आज्ञापयन्मंत्रिवरं गच्छ वाल्मीकिमान्तिवे । पूष्धव ग जाकन्थ्य कौन श्छावावनी वली॥१३५॥
तता गान्त्वाऽनयोर्याने करिष्यामि मनि कामतम् । श्वेत रामवचनाम् मन्त्री ददमास्थितः । १३६॥
काश्चयंतिरंरगत्र गच्छं कृत्वा कुशं त्वरात् । दृष्ट्वा वन्चाऽब्रवन्त सर्व रास्व बचनवेद्यवन् । १३७ ।
मुनिः प्राह मंत्रिवण म्व बद रामाय म वचः । सभाऽग्रे मागनश्व राल श्वा विचित्वम् ॥१३८॥
गया। ११९-१२० इसके अनन्तर कुश ने गान्धर्वास्त्र... पर चलाया... वह गरुडास्त्र नष्ट हुआ जो मृत्यु था। समरकी विद्यातक लिये तुमने अपनी सामर्थ्य दिखलाया, अब यदि मन पौरुष देखना चाहते हो तो... मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। यदि सामर्थ्य हो तो मुनि... जानकी... जीतकर दिखाओ; न कर सको तो हाथ बाँधकर जानकी के पास... आज्ञाकार बनो। १२१-१२३॥ कुशकी बात न सह सकनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने क्रोध किया। जिससे बहु भ्रान्त हो गया। फिर गान्धर्वास्त्र से जो बाण चलाया था श्रीरामचन्द्रजी ने उसका निवारण किया। कुशनें रामपर बाण चलाया और श्रीरामचन्द्रजी ने जल से उसका विनाश किया। तदनन्तर सुकुमार वीर कुशने रामपर पर्शुलपाश चलाया, तब रामने पर्बतास्त्र से उसका विनाश किया ॥ १२४-१२७॥ तब कुशने वज्रास्त्र चलाया और रामने आग्नेयास्त्र से उसका नाश किया। १२८॥ एव वृक्षन बाण के ऊपर वैष्णवास्त्र चलाया, उस समय दोनों सेनाओं में विस्मय हुआ। अपने वैष्णवास्त्र बाण उसको व्यर्थ कर दिया। इसके बाद कुशने बाण छोड़े और श्री रामचंद्रजी ने बाण चलाये ॥ १२९॥ १३०॥ रामने भी कुशके प्रती-कारार्थ बाण छोड़े। इस प्रकार एक प्रहर तक राम और कुशमें तुमुल युद्ध होता रहा ॥ १३१॥
उस समय आप-पेटके युद्धमें यह बड़ा कौतुक था कि श्री बाण श्रीरामके धनुषसे छूटे वे कुशके मस्तकपर गिरते थे तथा कुश द्वारा छूटे बाण रामके पैरोंपर गिरते थे। यह आश्चर्य देखकर विस्मित रामने अपने मंत्रीको बुलाया और उनसे कहा कि वाल्मीकि के पास जाकर पूछो कि आपके ये महाबलवान् शिष्य कौन हैं ॥ १३२-१३५ । यह जानकर मैं इनकी माताका यत्न पूर्वक उपाय करूँगा। रामके आज्ञानुसार मन्त्री रथपर सवार हुआ और दो कोस चलकर वाल्मीकिके पास जा पहुंचा। वाल्मीकिको देखकर मन्त्रीने प्रणाम किया और रामका सन्देश सुनाया ॥ १३६। १३७॥ मुनि वाल्मीकिने कहा—उनसे कह दो कि कल