श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
३२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
मुमोच बाणमाग्नेयं गरुडेऽपि मारुत्य् । तेन गच्छन्निगगद्वह्निर्मातुं तु गारुडम् ॥१२०॥
ततः कुशः संदधे य मदाख्यं गपवातरि... वच नारी सीतान्युलब्धकीर्तिं त्वया । १२१॥
जनान दर्शयितुं स्वाय पौरुषं जानकी यते । न्यक्तं यया वृथा पूर्वं जानैद्ध न चेष्टितम् १२२॥
वाल्मीकिशितिरुत्पन्नां विद्यां ममाद्य श्व विलोकया । नेचेत्य यदि दृप्तस्त्वं वाल्मीकिं जानकीमपि ॥१२३॥
तद्वाक्यैर्रिन्नमर्माऽगवन्मा विलोक्य नरा गोत्रेषु मुमुचे बांर म्नैन उत्छ्रितिमाप वै ॥१२४॥
मध्ये मान्गयाणं कुशस्तं राघव पुनः । गन्धर्वेण दोशलाश्चेण वारमयं न्यवारयन ॥१२५॥
इषुगत्रं मुमुचे घोरं कुशाऽरि राघव जवात् । तन्जगामच तद्राभो मेघ क्षेण व लीलया ॥१२६॥
पपुलपं मुमुचे गाम जानकीजटरोद्भवः । नदावारयच तद्राभ पर्वतेन लीलया । १२७।
वज्राम्रं मुमुचे शर्व यानेश्व मोऽतिमन्त्रवान् । याग श्वेनाथ रामेऽपि वज्रास्त्रं तन्न्यवादयत ॥१२८॥
अंवाश्मं मुमुचे राम मातयः परमदारुन हाहाशब्दस्तदा चार्मद्राघवस्याश्वसंगणे ॥१२९॥
अथवारयचवाश्मं वैष्णवेन रघूत्तम । ततोगम कुशश्चोष्णान्नानां बांणतस्तः पुनः ॥१३०॥
मुमोच राघवश्चापि मार्गणांश्चहुशः कुशम् । एव तत्तुल युद्धं बभूव प्रहर नयोः ॥१३१॥
तदाऽऽश्चर्याकौतुक रामकुशयोर्युद्धवामहन् गढचापार्ष मुक्ता रता ये ये पनात्रिणः ॥१३२॥
ने ने कुशशिरोन्मार्गेपतितादृष्टवान्त्वरे । पति सम् तथा ने ये कुशचापविनिर्गताः ॥१३३॥
शासने रामचंद्रस्य पतन्ति स्म पदांतिके । तद्दृष्ट्वा क्षोभक गतो दम्भाश्चर्यप्रजाप्रजः ॥१३४॥
आज्ञापयन्मंत्रिवरं गच्छ वाल्मीकिमान्तिवे । पूष्धव ग जाकन्थ्य कौन श्छावावनी वली॥१३५॥
तता गान्त्वाऽनयोर्याने करिष्यामि मनि कामतम् । श्वेत रामवचनाम् मन्त्री ददमास्थितः । १३६॥
काश्चयंतिरंरगत्र गच्छं कृत्वा कुशं त्वरात् । दृष्ट्वा वन्चाऽब्रवन्त सर्व रास्व बचनवेद्यवन् । १३७ ।
मुनिः प्राह मंत्रिवण म्व बद रामाय म वचः । सभाऽग्रे मागनश्व राल श्वा विचित्वम् ॥१३८॥
गया। ११९-१२० इसके अनन्तर कुश ने गान्धर्वास्त्र... पर चलाया... वह गरुडास्त्र नष्ट हुआ जो मृत्यु था। समरकी विद्यातक लिये तुमने अपनी सामर्थ्य दिखलाया, अब यदि मन पौरुष देखना चाहते हो तो... मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। यदि सामर्थ्य हो तो मुनि... जानकी... जीतकर दिखाओ; न कर सको तो हाथ बाँधकर जानकी के पास... आज्ञाकार बनो। १२१-१२३॥ कुशकी बात न सह सकनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने क्रोध किया। जिससे बहु भ्रान्त हो गया। फिर गान्धर्वास्त्र से जो बाण चलाया था श्रीरामचन्द्रजी ने उसका निवारण किया। कुशनें रामपर बाण चलाया और श्रीरामचन्द्रजी ने जल से उसका विनाश किया। तदनन्तर सुकुमार वीर कुशने रामपर पर्शुलपाश चलाया, तब रामने पर्बतास्त्र से उसका विनाश किया ॥ १२४-१२७॥ तब कुशने वज्रास्त्र चलाया और रामने आग्नेयास्त्र से उसका नाश किया। १२८॥ एव वृक्षन बाण के ऊपर वैष्णवास्त्र चलाया, उस समय दोनों सेनाओं में विस्मय हुआ। अपने वैष्णवास्त्र बाण उसको व्यर्थ कर दिया। इसके बाद कुशने बाण छोड़े और श्री रामचंद्रजी ने बाण चलाये ॥ १२९॥ १३०॥ रामने भी कुशके प्रती-कारार्थ बाण छोड़े। इस प्रकार एक प्रहर तक राम और कुशमें तुमुल युद्ध होता रहा ॥ १३१॥
उस समय आप-पेटके युद्धमें यह बड़ा कौतुक था कि श्री बाण श्रीरामके धनुषसे छूटे वे कुशके मस्तकपर गिरते थे तथा कुश द्वारा छूटे बाण रामके पैरोंपर गिरते थे। यह आश्चर्य देखकर विस्मित रामने अपने मंत्रीको बुलाया और उनसे कहा कि वाल्मीकि के पास जाकर पूछो कि आपके ये महाबलवान् शिष्य कौन हैं ॥ १३२-१३५ । यह जानकर मैं इनकी माताका यत्न पूर्वक उपाय करूँगा। रामके आज्ञानुसार मन्त्री रथपर सवार हुआ और दो कोस चलकर वाल्मीकिके पास जा पहुंचा। वाल्मीकिको देखकर मन्त्रीने प्रणाम किया और रामका सन्देश सुनाया ॥ १३६। १३७॥ मुनि वाल्मीकिने कहा—उनसे कह दो कि कल
सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् १२९
भविष्यति समस्तं हि वृत्तं शालकयोः शुभम् । ततो मन्त्री मुनेर्वाक्यं राघवाय न्यवेदयत् ॥१३९॥
कुशं लवं समाहूय वाल्मीकिरपि तौ मुदा । समालिङ्ग्य कथाभिस्तां निनाय रजनीं सुखम् ॥१४०॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
कुशलवयोः पराक्रमवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः
( रामका सीताको पुनः स्वीकार करना )
श्रीरामदास उवाच
अथ प्रभाते रामेण समाहूतावुभौ शिशू । नत्वा मुनिं मातरञ्च सभायां जग्मतुर्मुदा ॥ १ ॥
वाल्मीकेराज्ञया बालौ जटाकृष्णाजिनाम्बरौ । जन्मकाण्डं त्वेकमेव जग्रतुस्तौ पितुः पुरः ॥ २ ॥
जनैः श्रुत्वा स्वचरितं रामोऽभूदतिविस्मितः ॥ ३ ।
आसन् जनाश्चापि सर्वे विस्मयाविष्टमानसाः । ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ सन्तोषं परमं ययुः ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वे लवबाणस्वरूपीडिताः । शत्रुघ्नाद्या ययुस्तत्र यानस्थाश्चाप्तजीविताः ॥ ५ ॥
अंगदाद्याः पार्थिवाश्च मोहनास्त्रैकजीविताः । ययुः सवानराः सर्वे लक्ष्मणोऽपि ययावरुक् ॥ ६ ॥
सर्वे नत्वा रामचन्द्रं तस्थुश्चास्थांतिके मुदा । अथ समाप्य रामोऽपि तौ विसृज्यादरेण हि ॥ ७ ॥
राक्षसेंद्रं लक्ष्मणं च शत्रुघ्नं मकरध्वजम् । खगराजं सुषेणं च जांबवन्तं वचोऽब्रवीत् ॥ ८॥
आनयध्वं मुनिवरं समीतं देवममितम् । अद्यास्तु पर्षदां मध्ये प्रत्ययो वै सभांगणे ॥ ९ ॥
गंगाया दक्षिणे तीरे सभा कार्याऽऽयता शुभा । करोतु शपथं सीता ममाग्रे जाह्नवीतटे ॥१०॥
मुनीश्वराद्याः सर्वे तां जानन्तु गतकल्मषाम् । तथा ममापि वाल्मीके शुद्धिं जानंतु देवताः ॥११॥
जब सभामें ये दोनों रामायण गाने पहुंचेंगे, उस समय सारा वृत्तान्त ज्ञात हो जायगा । १३८ ॥ तदनुसार मंत्री लौट आया और बाल्मीकिने जो कुछ कहा था, सो रामको बतला दिया । उधर वाल्मीकिने लव और कुशको पास बुलाकर हृदयसे लगाया और अनेक प्रकारकी कहानियां कहते हुए रात बितायी ॥ १३९ ॥ १४० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योतिष्मती'भाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
श्रीरामदास बोले-दूसरे दिन सबेरे रामने उन दोनों बालकोंको बुलवाया और वे अपनी माता तथा मुनि वाल्मीकिको प्रणाम करके रामकी सभामें गये ॥ १ ॥ जटा एवं वल्कल वस्त्र धारण किये हुए उन बच्चोंने उस दिन वाल्मीकिके आज्ञानुसार केवल जन्मकाण्डका गान किया । २ ॥ रामने जब अपना चरित्र सुना तो बड़े विस्मित हुए । सभामे बैठे हुए लोगोको भी बड़ा आश्चर्य हुआ और जब यह जाना कि ये सीताके बेटे हैं तो बहुत ही प्रसन्न हुए । ३ ॥ ४॥ उसी समय लवके बाणोंसे पीड़ित लक्ष्मण-शत्रुघ्न आदि भी वहाँ आ पहुंचे । उनके साथ अङ्गद-हनुमान् आदि जो लवके मोहनास्त्रसे मूर्च्छित हो गये थे, वे भी आये। वहाँपर सबान रामको प्रणाम किया और उनके समीप जाकर बैठ गये । तब रामने अपने मंत्रियोंसे सलाह करके लव कुशको विदा कर दिया ॥ ५-७ ॥ तदनन्तर विभीषण, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, मकरध्वज तथा अङ्गदको सम्बोधित करके राम बोले-तुम सब जाकर बाल्मीकिके साथ सीताको यहाँ ले आओ। आज इस सभामे यह निश्चय किया जायगा कि सीता-का क्या अपराध है। इसी पुनीत जाह्नवीके तटपर सीता शपथ खायगी । यहाँपर आये हुए समस्त ऋषिगण जिससे यह समझ जायें कि सीता सर्वथा निष्कलंक तथा पापोंसे रहित है। साथ ही हमारो ओरसे बाल्मीकिकी भी परीक्षा होगी । इस प्रकार रामके आज्ञानुसार लक्ष्मणादि वाल्मीकिके पास गये और उन्होंने
२३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ८
इति तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणाद्या महीं गताः । ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं लक्ष्मणादिकाः ॥ १२॥ रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् । सर्वानितान् सुमंत्राद्यान् लक्ष्मणाय समर्प्य च । १३। युष्माभिः कथनीयं यद्वाक्यं श्रीराघवं प्रति । श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि । १४। योषितां परमो देवः पतिरेको न चापरः । पतिं विना गतिः काऽन्या भार्याश्चास्ति जगत्त्रये ॥१५। लक्ष्मणाद्यास्ततः सर्वे राममागम्य ते पुनः । सुमंत्रादींश्चतुर्वीरांश्चाघवाय समर्प्य च ॥१६। वाल्मीकेर्वचनं हर्षात्पुनर्मं रघुनायकम् । वाल्मीकेर्वचनं श्रुत्वा तुतोष राघवोऽपि च ॥१७। सुमन्त्रं भरतं वायुपुत्रं वानरनायकः । समालिङ्ग्य चतुर्व्यान् स पुनर्जन्ममन्यत । १८। सीतया पालिताः सर्वे वयं लवजितास्त्विति । कथयामासुः श्रीरामं सुमन्त्रादिद्विरद० ॥१९। द्वितीये दिवसे कृत्वा सभां श्रेष्ठां मनोरमाम् । सर्वानृष्यान् समाहूय रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२०॥ मुनयः पार्थिवाः सर्वे शृणुत स्वयमागताः । सीतायाः शपथं लोद्य विज्ञास्येऽनुभयं ततः॥२१ इत्युक्त्वा राघवेणाथ लोकाः सीतादिदृक्षवः । ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चैव सहस्रशः २२। सत्रावगः समाजग्मुस्तद्दिव्यं द्रष्टुमुद्यताः । ततो मुनिसंयुक्ता सीता समाययौ पुरः ॥२३। अध्रनर्त्त मुनिं कृत्वा यांती किंचिदवाङ्मुखी । तावल्लोका जनाश्चैव चक्रुर्जयजयं ततः ॥ २४। दृष्टा लक्ष्मीमिरायांतीं श्रीविष्णोरनुयायिनीम् । वाल्मीकेः पुरत स्तेषां जयघोषं प्रचक्रिरे २५। तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । माहामात्यैः वाल्मीकिर्मदा मघामब्रवीत् । २६। इयं दाशरथे सीता सुवृत्ता धर्मचारिणी । त्वया पापान्मुदा त्यक्ता ममाश्रमसमीपत २७। लोकापवादभीतेन यमुनादक्षिणे तटे । प्रत्यक्षं दास्यते मह्यं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥२८॥ इमौ तु सीतातनयौ कुशश्चवत्तो लवे मया । लवैर्वनिर्मितः सीताप्रत्ययञ्चाग्रवेचनमा ॥२९।
जो कुछ कहा था, सो कह सुनाया ॥ ६-११॥ रामके मनकी बात जानकर वाल्मीकिने कहा - आज तुम लोग जाओ और रामसे कह दो कि कल सभामे जाकर सीता सब लोगोके सामने शपथ खायगी ॥ १२-१४॥ स्त्रियोंके लिए पतिके सिवाय और कोई देवता नही होता ! इसी अवस्थामें सीता और कर ही क्या सकती है। पतिके बिना स्त्रीके लिए लोकमें और कोई गति भी नहीं है ॥ १५। तब लक्ष्मण आदि वहाँसे लौट आये। रामने उनके मुखसे वाल्मीकिका सन्देश सुना तो परम प्रसन्न हुए। वे लोग वहांसे लौटते समय सुमन्त्र आदि चारों वीरोंको, जिनको कि लवने बन्दी बना रक्खा था, साथ में लाये थे। राम उन सबको अपनी छातीसे लगाकर मिले और यह समझा कि इन चारोंका पुनर्जन्म हुआ है ॥ १६-१८ उन सबोंने अपना हाल बतलाते हुए कहा कि यद्यपि लवने हम सबको कैद कर दिया था किन्तु सीताने पूर्णरूपसे हमारी रक्षा की ॥ १९॥ दूसरे दिन एक विशाल सभा आयोजित की गयी। उसमें सब लोगोंको सम्बोधित करके रामने कहा- हे देशविदेशसे आये हुए ऋषियों ! आज इस सभामे आप लोगोंके समक्ष सीता शपथ खायगी। इससे आप लोगोंको उसके शुद्धता तथा दुष्टताका पता लग जायगा। इस प्रकार राम-के वचन सुनते ही सब लोग माताको देखनेके लिए उतावले हो उठे। नगरमें भी यह समाचार पहुँच गया। अतएव इस दिव्य शपथको देखनेकी लालसासे कितने ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वहाँ आ पहुँचे ॥ २०-२२॥ थोड़ी देर बाद सीताके साथ वाल्मीकि जी सभा में पधारे। आगे आगे वाल्मीकि थे और उनके पीछे नीचा सिर किये सीता मन्दगतिसे सभा में आयीं। उस समय सीता और वाल्मीकिको देखकर ऐसा लगता था कि मानों विधातुके पीछे पीछे लक्ष्मी चली आ रही हैं। सीताको देखते ही लोगोंने जयजयकार किया और वाल्मीकिजी सभाके बीचमे पहुँचकर रामसे कहने लगे - । २३-२६॥ हे राम ! कुछ दिन हुए जब आपने लोकापवादके भयसे सीताको मेरे आश्रमके समीप छोड़वा दिया था । आज वह ही सीता आपके सामने शपथ खायगी, आप इसके लिए आज्ञा दें । सीताके इन दोनों पुत्रोंमें कुश आपका सगा रूप (कुशकी दूर्वोंसे) बनाया हुआ मेरा वेटा है। उसे मैंने सहसा सीताके डरस बनाया था। ये दोनों बेटे
॥ सर्गः ८ ॥ जन्मकाण्डम् १३१
मुक्ताविमौ तु दुर्धर्षौ मध्यमेन्द्रावपि ते । प्रचेतासोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३०॥ अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ । बहुवर्षसहस्राणां सम्यक् तपश्चर्या मया कृता ॥३१॥ नोपभोक्ता फलं तस्या भवेयं यदि मे ऽनिला । इत्युक्त्वा राघवस्यांके दक्षिणे स्थाप्य वै कुशम् ॥३२॥ लवं विन्यस्य वामांके तस्यान्वेवापरासने मूर्त्तः । गतोऽपि तौ समालिंग्य मूर्ध्न्यावघ्राय सादरम् ॥३३॥ लक्ष्म्य हस्तेके हस्तं संस्थाप्य आशीश्वरः । प्रतिष्ठास्ततं बालं पूर्ववन्मोऽकरोत् च तम् ॥३४॥ ततो रामोऽपि तां सीतां दृष्ट्वा बुद्धयन्विताम् । अथात इव सम्प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥३५॥ त्वया सूनः ममानीतः सीतायाश्च प्रदर्शितुम् । पुरा तमानयस्वाद्य खेदस्ति शशिनस्त्वया ॥३६॥ तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि पेटिकान्निहितं भुजम् । सीतायाः पुरतो राम दर्शयामास सादरम् ॥३७॥ सीताभुजोपमं दृष्ट्वा भुजं मारुतिनिर्मितम् । वस्त्ररुपांतरे काले सामन् सर्वऽतिविस्मिताः ॥३८॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र पश्यत्सु सकलेष्वपि । भुजः स गुप्ततां प्राप्तो विश्वकर्मोद्भवः क्षणात् ॥३९॥ तद्दृष्ट्वा कौतुकं लोका अभूवन्नतिविस्मिताः । रामोऽपि विस्मितः प्राह वाल्मीकिं प्रणिपत्य च ॥४०॥ एवमेव महाप्राज्ञ यदुक्तं मा मया ऽनृतम् । प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्बिषैः ॥४१॥ लङ्कायामपि दृष्टा मे चैरेवाऽप्रतप्तः शपतः । इन्द्राद्यैः सुरतस्तेन मन्दिरं सम्प्रवेशिता ॥४२॥ सेयं लोकापवादेन मयाऽपि मतिमाऽधुना । मया त्यक्ता परित्यक्ता तद्गतान् क्षन्तुमर्हसि ॥४३॥ ममार्जुनोऽर्कश्चारूपं कुशीऽय वलवान्मया। सर्वशौर्या कृतो वेद्मि सीतायामप्यनसूये ॥४४॥ तथापि लोकसङ्गह्यान्कुरुतां शपयं त्वयि । जगत्सु शपयं नापि ममाद्यो तव सन्निधौ ॥४५॥ शुद्धायां जगतामध्ये सीतामंगीकरोम्यहम् । तदा तच्छपथं द्रष्टुमामन्लोकाः समुत्सुकाः ॥४६॥ समग्रा जानकी चाथ तदा कौशेयवासिनी । उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥४७॥
असाधारण बल हैं। कोई भी योद्धा इनके सामने नहीं टिक सकता। विधाताका मैं दसवाँ पुत्र हूँ। आज तक मैं कभी झूठ नहीं बोला। अनेक वर्षोंतक मैने घोर तपस्या की है। यदि सीता किसी तरह भी पापाचारिणी हुई तो मैं उस तपस्याके फलका उपभोग न ग्रहण करूंगा। इतना कहकर वाल्मीकिने कुशको रामके दाहिना बगल तथा लवको बायीं ओर बिठाया और स्वयं उनके सामने एक ऊँचे आसनपर बैठे। रामने इन भाइयों उस बालकोंका आलिंगन किया, माथा सूंघा और उनके मस्तकपर अपना दाहिना हाथ रखकर कुशके समान उस अवसरपर उनका नाम बता दिया ॥ २७ से ३४ ॥ इसके अनन्तर रामने सीताकी ओर देखा तो सीताका शरीर देखकर बहुत शोक देखा। उन्होंने मज सभासद लक्ष्मणको आज्ञा दी कि उस समय जो सुवर्ण भुज काटकर हनुमान तुम दिखाये लाये थे, यदि वह सुरक्षित रीतिसे रक्खी हो तो यहाँ ले आओ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर पटाम रक्खी भुजा लाकर रामके सामने रख दी ॥ ३७ ॥ दृश्न दिन दसोरपर भी ठंक सीताकी भुजाओंके समान लटकते चामके चीथड़े तथा रुधिरसंयुक्त भूषाप्रथा देखकर सभासद जितने लोग बैठे थे वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३८ ॥ इसी बीच लोगोंके देखते ही देखते वह विश्वकर्माकी बनायी भुजा गायब हो गयी। यह कौतुक देखकर लोगोंको और भी आश्चर्य हुआ। तब रामने विस्मित होकर वाल्मीकिसे कहा—हे महाराज ! मुझे तो आपकी बातोंसे ही विश्वास हो गया था कि सीता परम पवित्र है ॥ ३९-४१ । लङ्कामें भी मैंने सीताका शपथ देखी थी। उस समय देवताओंके समक्ष शपथ लेनेपर ही मैंने उसे अपने घर किया था ॥ ४२ । तथापि लोकापवादके भयसे पवित्र समझकर भी मैंने सीताका परित्योग किया। आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें ॥ ४३ ॥ यह भी मैं जानता हूँ कि कुश मेरा पुत्र है और लवको आपने सीताके गर्भसे उत्पन्न किया था ॥ ४४ । यह सब होते हुए भी इन संसारवालोंको विश्वास दिलानेके लिये सीता इस सभा में शपथ ले ॥ ४५ । यदि इस जनसमाजमें और इस संसारमे सीता शुद्ध सिद्ध हो गयी तो मैं इसको फिर अङ्गीकार कर लूँगा। उस समय सीताकी शपथको देखनेके लिए वहाँ बैठे हुए सब लोग उत्सुक हो रहे थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर सभामें रेशमी कपड़े पहने सीता खड़ी हो गयी और हाथ
३३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
रामादन्यमहं चेद्धि मनसाऽपि न चिन्तये । तर्हि मे धरणी देवि विवरं दातुमर्हसि ॥४८॥ एवं शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् । भूतलाद्दिव्यरूपार्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४९॥ धृतो दिव्यरसै रोषैः समानीतं मनोहरम् । नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं तद्दिव्यदेहं रविप्रभम् ॥५०॥ मूर्द्ध्ना जानकीं दोर्भ्यां धृत्वा दुहितरं निजाम् । स्वागतामीति तामुक्त्वाऽऽसने मा मन्यवेशयत् ॥५१॥ वस्त्राऽलङ्कारसम्पन्नमुदधैः पूज्य मैथिलीम् । समालिङ्ग्याथ भूदेवी वीजयामास सादरम् ॥५२॥ तदा शनैः शनैर्भूम्यां सुतं सिंहासनं त्वभूत् । सिंहासनस्थ वैदेही प्रविशन्ती रसातलम् ॥५३॥ दृष्ट्वाऽऽकाशस्थिता देवाश्चैव सर्वांस्तु मन्त्रमन्त् । निरन्तरं भिर्र्वैदेही ववपुः पुष्पवृष्टिभिः ॥५४॥ साधुवादश्च सुमहान्बभूव सुरकीर्त्तितः । अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥५५॥ तदा बभूव चकितं सीतापथदर्शनात् । ऊचुश्चे वसुधा वाचो वानराश्च नगादिकाः ॥५६॥ केचिच्चिन्तापराः केचिदासन्ध्यानपरायणाः । केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ॥५७॥ मुहूर्त्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णींभूतमचेतनम् । प्रविशन्तीं भुवं सीतां दृष्ट्वा संमोहितं जगत् ॥५८॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रविशन्तीं दृ भूतले । विदेहजां तदा दृष्ट्वा वामहस्तेन संभ्रमात् ॥५९॥ यां दधार करेणादौ धन्वा हस्तेन वै भुवम् । ततम्भो प्रार्थयामास भुवं स रघुनन्दनः ॥६०॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
देवि त्वं सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् । अपि लोकमाता त्वं महानीरोपरिवृतः सदा ॥६१॥ वर्तसे पुण्यरूपान्वं सम्पुदा सकलान् जनान् । स्वजठरोर्ध्वौषधीभ्यश्च करोषि विभृतन्विद्राः ॥६२॥ त्वं दुर्गा त्वं स्वरा लक्ष्मीरभमं विष्णोः प्रिया शुभा त्वमेवाद्यात्र मे शुक्तिर्निमिताऽसि मयैव हि ॥६३॥ निजोधराद्ददासि त्वं धातून्बीज्या जनान्मदा अभायुक्ता त्वमेवासि सूक्ताष्टाकादिकर्मसु ॥६४॥
की ओर नीचे निगाह तथा ऊपर मुँह करके बोली—॥४७॥ हे पृथ्वि माता ! यदि रामके सिवाय अन्य किसीको मैंने अपने हृदयमें भी न ठाना हो, तो आप मुझे ऐसी जगह दीजिए कि जिससे मैं आपमें समा जाऊँ ॥ ४८ ॥ इस प्रकार सीताके प्रार्थना करनेपर तुरन्त एक दिव्य सिंहासन पृथ्वीके भीतरसे निकला । उसको बड़े-बड़े नाग अपने शिरपर उठाये हुए थे सूर्यके समान देदीप्यमान उन नागोंका प्रकाश था ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इतनेमें साक्षात् पृथ्वी देवीने अपनी दोनों भुजाओंमें सीताका स्वागत किया। फिर छातीसे लगा तथा गोदमें लेकर उन्हें उस सिंहासनपर बिठाल दिया । इसके अनन्तर वस्त्र अलङ्कार माला-फल आदिसे सीताकी पूजा की और छातासे लगाकर पङ्खा झलने लगी । ५१ । ५२ ॥ इसके बाद धीरे-धीरे वह सिंहासन पृथ्वीके भीतर घूमने लगा । सिंहासनपर बैठी हुई सीताको पातालमें जाती देखकर आकाशमें स्थित सारी देवांगनाएँ उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं ॥ ५३ । ५४ ॥ आकाश और पृथ्वीमें देवताओं और मनुष्योंने साधुवाद किया । सीताकी उस शपथको देखकर समस्त स्थावर-जंगम प्राणी चकित हो गये और अपनी बुद्धि-बुद्धि भूलकर परस्पर बात करने लगे ॥ ५५ । ५६ ॥ उनमें कुछ लोग चिन्तित थे और कुछ ध्यानमग्न । कुछ लोग रामको देख रहे थे । कुछ लोग अपनी सुधि-बुद्धि भूलकर सीताकी ओर निहार रह थे ॥ ५७ ॥ मुहूर्तभरके लिए वही सारा समाज सन्न हो गया । सीताको पृथ्वीके भीतर समाती देखकर समस्त संसार मुग्ध हो गया ॥ ५८ ॥ राम सीताको पृथ्वीमें धंसती देखकर अपने सिंहासनसे कूद पड़े और पृथ्वीके पास जा पहुंचे। वे उनका हाथ अपने हाथसे पकड़कर इस प्रकार पृथ्वीसे प्रार्थना करने लगे । ५९ । ६० । श्रीरामचन्द्र बोले— हे देवि ! आप सारे संसारकी निवासभूमि हैं समस्त जगत्की माता होकर महानीरके ऊपर आप स्थित हैं ॥६१॥ आप पुण्यरूप हैं । समस्त जनोंको हर प्रकारकी सम्पत्तियां देनेको सामर्थ्य रखती हैं । आप अपने उदरसे अनेक प्रकारकी औषधियाँ उत्पन्न करके सबका रक्षा करती हैं । आप दुर्गा, रुद्रा और विष्णुकी प्रिया लक्ष्मी हैं । आप आदिशक्ति हैं और मैंने ही आपको बनाया है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ आप अपने उदरसे भाँति-भांतिके धातु निकालकर
सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् ३३३
जानकी तव कन्येयं श्वश्रूस्त्वं मेऽधुना प्रिये । कन्यादानं कुरु मुदा यत्त्वया पूर्वं कृतं न हि ॥६५। प्रसीद देवि नोचेन्मे त्वयि क्रोधो भविष्यति । श्रीरामदास उवाच इति संप्रार्थिता साऽथ शश्वत्तु महात्मना ॥६६। नारी काठिन्यभावाच्या नाश्रृणोद्रघवेश्चित् । शनैः शनैः समाविष्टा सा जगाम ह ॥६७। तां गच्छन्तीं पुनर्दृष्ट्वा भृशं रामो रुषान्वितः । बभूव क्रोधताम्राक्षस्तदा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥६८। चापमानय सौमित्रे शिक्षयेऽहं भुवं त्विमाम् । मन्मुखोपेक्षरूपेण वसुधेयं विदेहजाम् ॥६९॥ मामकं दास्यति क्षिप्रमन्यथा घातं न संशयः । ततोऽसौ लक्ष्मणस्तूर्णं करे कोदण्डमुक्तवान् ॥७०॥ धृत्वा ज्यारोपणं कृत्वा शरसंधानमातनोत् । तदा ववौ महन्वायुरुद्भूमे लवणार्णवः ॥७१॥ तारा निपेतुर्धरणीं बभूवुः सरजा दिशः । चकम्पे धरणी भीता त्राह्यत्राह्यति वदती मुहुः ॥७२॥ कराभ्यां जानकीं धृत्वा रामस्याङ्के न्यवेशयत् । श्रीरामचरणयोः पृथ्वी शिरसा नमनं व्यधात् ॥७३॥ तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । ववृषुर्जाानकीं रामं देवसङ्घा मुदान्विताः ॥७४॥ ततो रामोऽपि तां दृष्ट्वा पदयोर्नमतीं भुवाम् । स्वक्रोधं शान्तमकरोत्त्यक्त्वा चापमथोऽसृजत् ॥७५॥ विस्मृत्योत्थापयामास स्वकराभ्यामपि प्रभुः । ततः सा राघवं नत्वा प्रसाद्य च पुनः पुनः ॥७६॥ दत्त्वा विदेहकन्यायै तन्सिंहासनमुत्तमम् । सीतां स्तुत्वाऽथ तां पृष्ट्वा तया संपूजिताऽपि च ॥७७॥ आमन्त्र्य राघवं पृथ्वी क्षणदन्तरहिताऽभवत् । तदा सीतां जनाः सर्वे पुनर्जातान्तु मेनिरे ॥७८॥ अयोध्यास्थाः प्रणमुस्तां चक्रुः पूजां पृथक् पृथक् । ददौ दानान्यनेकानि तदा रामो मुदान्वितः ॥७९॥ नवरत्नादिनिम्नाश्च सम्बभूवुः समन्ततः । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः ॥८०॥
संसारी मायाका प्रीतिपूर्वक प्रदान करता है। मुझ और अमुक जितना था कम है, उनमें आप सहायका हैं ॥ ६४ ॥ यह सीता आपका कन्या है। इस नाते आप मम सास हैं। आपने विवाहके समय कन्यादान नहीं किया था, सो अब कर दीजिए ॥ ६५ ॥ हे देवि ! आप मेरेपर प्रसन्न हो जावें । नहीं तो मैं आपपर क्रुद्ध हो जाऊँगा । श्रीरामदासवत कहा—रामके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी पृथ्वीने उनकी एक न सुनी। क्योंकि स्वभावतः ही नायिकाका हृदय कठिन हुआ करता है। सीता धीरे-धीरे पृथ्वितलम समाती जा रही थी ॥ ६६।६७ ॥ विनय करनेपर भी जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरी बातोंपर कुछ ध्यान नहीं दे रही है तो मारे क्रोधके उनका आँख लाल हो गयी और लक्ष्मणसे बाले—॥ ६८ ॥ लक्ष्मण ! मेरा धनुष तो उठा लाओ, मैं पृथ्वीका उसके दुराग्रहका दण्ड दे दूँ। मेरे छूटे सदृश तीक्ष्ण बाणसे डरकर यह सीताको लौटा देगी। इस मैं मारना नहीं चाहता, चाहता हूँ केवल साताको इसके हाथोंसे लोटना। तदनुसार तुरन्त लक्ष्मण धनुष उठा लाये। रामने उस लेकर राजा ठाक किया और बाण चढ़ाया। उस समय जोरास बांय चलन लगा, समुद्रमे प्रलयसदृशकी लहरें उठने लगीं, तारे टूट-टूटकर गिरने लगे और चारों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयी। ऐसी अवस्था में 'त्राहि त्राहि' करती हुई पृथ्वी काँपने लगी और उसने अपने हाथो साताका उठाकर रामकी गोदमें बिठा दिया। इसके बाद पृथ्वीने सिर भुकाकर रामके चरणोंकी वन्दना की ॥ ६९-७३ ॥ उस समय स्वर्गमें देवताओंने देवबाय बज ये और राम तथा सीतापर फूलोंकी वर्षा की ॥ ७४ । इसके बाद जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरे चरणम मुकी हुई विनती कर रही है तो अपना कोप शान्त कर लिया तथा धनुष-बाणका परित्याग करके अपन दत्तो हाथोंसे पृथ्वीको उठाया । इसके अनन्तर पृथ्वीने किन्द भगवान्को बार-बार नमस्कार किया, प्रार्थना की और सीता तथा यह सुवर्णमय सिहासन रामको समपर्ण कर दिया। फिर सीताकी स्तुति की। सीताने भी पृथ्वीकी विधिवत् पूजा का। तत्पश्चात् रामकी आज्ञा लेकर क्षण भरके भीतर ही पृथ्वी अन्तर्धान हो गयीं। उस समय सभामें बैठे हुए लोगोंने सीताका पुनर्जन्म समना ॥ ७५-७८ ॥ सब लोगोंने सीताकी विधिवत् पूजा की और जय-जयकार करके प्रणाम किया। तब रामने अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ७९ ॥ भाँति-भाँतिके नवीन बाजे बजे,
३३४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८
सीतायाः शपथो यत्र जाह्नव्या दक्षिणे तटे । सीताकुण्डमिति ख्यातं तत्र तीर्थं बभूव ह ॥८१॥
पातालस्थं जलं पुण्यं सन्तप्तमनलोपमम् । दर्शनेष्वपि यत्तीर्थे सीतोष्णोष्णमुपद्रवात् ॥८२॥
तदत्र जानकीकुण्डं स्मरणान्घविनाशनम् । पुत्पुत्रायुषवृद्ध्यर्थं स्त्रीभिः सेव्यं सदा भुवि ॥८३॥
ततः सीतायुतो रामः पुत्राभ्यां सहितो मुदा । वसिष्ठऋश्यशृङ्गाभ्यां स्नानं सर्वमृषेर्गणैः ॥८४॥
चकार ऋषिमिश्रैश्च पूर्ववच्च सविस्तरम् । अथ यज्ञसुतं पूर्णमेव कृत्वा रघूत्तमः ॥८५॥
जातकर्मादिसंस्कारान् लवस्य विधिनाऽकरोत् । चकार नानादानानि देवान् सपूज्य भक्तितः ॥८६॥
ततो मुनीश्वरान् पूज्य पूजयामास पार्थिवान् । जनकं च सुमेधां च पूजयामास राघवः ॥८७॥
विससर्ज ऋषीन्सर्वान् ऋत्विजो ये समागताः । द्विजाद्यखिलाञ्जन्तून्धनाद्यैश्च तोषयामासुर्मुदं गतान् ॥८८॥
ततो विसृज्य विप्रांश्च पार्थिवैः सह राघवः । कुशाभ्यां सीतया च बन्धुभिश्चागमत्पुरीम् ॥८९॥
नीराजितः पुरस्त्रीभिर्हस्तिष्ठो रघूत्तमः । सीतया तनयाभ्यां च ययौ निजगृहे प्रति ॥९०॥
तदा महोत्सवेनासीदयोध्यायां समन्ततः । चिरकालेन वैदेह्या दर्शनं च जनैः कृतम् ॥९१॥
ततो नृपादिकान् पूज्य विससर्ज रघूद्वहः । जनकं च सुमेधां च ददवाज्ञां निजां पुरीम् ॥९२॥
सुतः सीतायुतो रामः पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । पूर्ववच्च सुखं रेमे चिरकालं रघूद्वहः ॥९३॥
रामेण सीतया सार्थं सहस्राणि त्रयोदश । वर्षाण्यत्र कृतं राज्यं कस्मिन्कल्पे द्विजोत्तम ॥९४॥
एकादश सहस्राणि वत्सराणि महान्ति च । वर्षान्कादश वर्षाणि मासा एकादशैव तु ॥९५॥
दिनान्येकादशैवात्र रामेण सीतया सह । अयोध्यायां कृतं राज्यं कस्मिन्कल्पे द्विजोत्तम ॥९६॥
एकादश सहस्राणि चैकादश दिनानि च । समहीपवनेनापि रामेणाभूत् कल्पभेदतः ॥९७॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । गायन् सीतया राज्यं कस्मिन्कल्पे कृत द्विज ॥९८॥
इति श्रीमत्कोटिसंहितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे जानकीग्रहणं नामाष्टमः सर्गः ॥८॥
वैभवपूर्वक नृत्य किया और बन्दियों तथा मागधोंने विविध प्रकारसे स्तुति की ॥८०॥ जाह्नवीके दक्षिणी तटपर जहां सीताने शपथ ली थी, वह सीताकुण्डके नामसे एक विख्यात तीर्थ बन गया ॥८१॥ सीताके उष्ण उच्छ्वास निकलनेके कारण आज भी वहां अग्निके सदृश तपता हुआ पवित्र जल निकलता रहता है ॥८२॥ इस जानकीकुण्डके स्मरणमात्रसे सब अघ नष्ट हो जाते हैं। अपने पतिकी आयुवृद्धिके लिए स्त्रियोंको इसमें स्नान करना चाहिये ॥८३॥ इसके बाद सीता तथा अपने पुत्रोंके साथ रामने यज्ञशाला सम्बन्धी स्नान किया। यह अवभृथ स्नान था पूर्वकथित स्नानके सदृश ही उत्साहयुक्त हुआ। इस प्रकार रामने सो यज्ञ पूर्ण करके विधिवूर्वक लवका जातकर्मादि संस्कार किया। अनेक प्रकारके दान दिये और देवताओंका विधिवत् पूजन किया। इसके अनन्तर यज्ञमें आये हुए समस्त ऋषियों तथा राजाओंकी पूजा की और जनक तथा सुमेधाका भी पूजन किया। इसके बाद ऋषियों तथा ऋत्विजोंको धनादिसे सन्तुष्ट करके विदा किया ॥८४-८८॥ साथ ही ब्राह्मणों तथा राजाओंको भी विदा किया और सीता, पुत्रों तथा बन्धुबान्धवोंके साथ राम अपनी अयोध्यापुरीको गये ॥८९॥ अयोध्यामें जाते ही राम हाथ पर सवार होकर पहुंचे, त्यों ही नगरकी स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और सब लोग अपने महलोंमें गये। उस समय अयोध्यामें चारों ओर महान् उत्सव हो रहा था। बहुत दिनोंके वियुक्त सीताका लोगोंने दर्शन पाया ॥९०।९१॥ कई दिनों बाद रामने जनक, सुमेधा तथा अन्य राजाओंको अपने-अपने नगर जानेकी आज्ञा दी ॥९२॥ इसके अनन्तर फिर पहिलेके समान रामचन्द्रजी सीता तथा पुत्रोंके साथ आनन्दपूर्वक अयोध्यामें रहने लगे ॥९३॥ किसी कल्पमें रामने सीताके साथ तेरह हजार वर्ष तक राज्य किया, किसी कल्पमें ग्यारह हजार वर्ष तथा किसी कल्पमें ग्यारह हजार वर्ष ग्यारह मास और ग्यारह दिनतक राज्य किया ॥९४-९७॥ किसी कल्पमें रामने दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य किया है ॥९८॥ इति श्रीमत्कोटिसंहितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेय-कृत ज्योतिष्मतीभाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे अष्टमः सर्गः । ८॥
सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् ११५
सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् ११५
नवमः सर्गः
( रामादिके बालकोंका उपनयन-संस्कार )
श्रीरामदास उवाच
अथोर्मिला मांडवी च श्रुतकीर्त्तिः सहैव ताः । बभूवुर्गर्भिण्यश्चिद्दनैर्गम्यो महोदराः ॥ १ ॥
तासां चकार श्रीरामः कौतुकानि च चादरम् । तासां पुंसवनादीनि विधिवत्तानि रघूत्तमः ॥ २ ॥
आहूय पत्या जनकं कुशध्वजं च बन्धुभिः । दौहित्रान् पूरयामासुस्तासां पौरसुहृत्त्रियः ॥ ३ ॥
तासां मन्थान् समुत्सङ्गे कृत्वा नृत्तमः । वस्त्रालङ्कारभूषाभिस्तोषयामास ताः मुदास् ॥ ४ ॥
अथोर्मिला सा तनयं सुषुवे चात्मोदयम् । ततः सा मण्डवी पुत्रं सुषुवे परमे दिने ॥ ५ ॥
ततः सा श्रुतकीर्त्तिश्च सुषुवे यमलौ सुतौ । अन्यां रक्षोभिसाया द्वितीयस्तनयोऽभवत् ॥ ६ ॥
तथाऽपरस्तु मांडव्याः पुत्रः कायादजायत । जनकश्चोदितान् सर्वान् कुमारांस्तोषयन् पृथक् ॥ ७ ॥
चकार गुरुणा विधीन्सोन्मादं परां मुदा । ज्येष्ठमङ्गदाख्यं ज्येष्ठं चित्रकेतुं कनिष्ठकम् ॥ ८ ॥
मांडव्याः पुत्रयोर्ज्येष्ठः पुष्कलस्तदनन्तरम् । बाहुं चाप्यनुजं तूपकेतुं यः स्मृतः ॥ ९ ॥
एवं कुमारांस्तेषां च गुरुणा विधिवत्कृताः । नामकरणं दत्वानां काले काले क्रमेण च ॥ १० ॥
तेषामेव मया प्रोक्तः संक्षेपेणैकमात्रतः । तेषां जन्मकालेषु सुराः सर्वे मुदान्विताः ॥ ११ ॥
वादयामासुर्वाद्यानि ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । मातरोः पितृभिर्युक्तान् बालकान् सूर्यसन्निभान् ॥ १२ ॥
राजद्वारे महानासीदुत्सवश्च नृपाज्ञया । निनेदुर्नववाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १३ ॥
शंसयन्ति स्म नृपतिं स्तुववन्दितमागधाः । नगरीं शोभयामासुः पताकाध्वजतोरणैः ॥ १४ ॥
सुहृदः पार्थिवाः सर्वे रामादीनां च पूजनम् । वस्त्रैराभरणाद्यैश्च चक्रिरे ते पृथक् पृथक् ॥ १५ ॥
ददुर्जानानि विप्रेभ्यो राम श्या भ्रातृवश्च ते । ब्राह्मणान् भोजयामासुः श्राद्धानि चकुरादरात् ॥ १६ ॥
श्रीरामदास बोले-कुछ काल बाद उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने साथ-साथ गर्भ धारण किया ॥ १ ॥
श्रीराम ने इस समयपर बड़ा स्वागतादि की और रदन विधिपूर्वक पुंसवनादि संस्कार किये ॥ २ ॥ इस संस्कारके समय जनक तथा कुशध्वजको भी रामने बुलवा लिया और उन्हींके द्वारा यह कार्य सम्पन्न हुआ । पुरवासिनी स्त्रियोंने उर्मिलादिकी जो इच्छा हुई, सो पूर्ण किया ॥ ३ ॥ रामने इस प्रकार उत्सव करके अनेक तरहके वस्त्र और आभूषण दिये ॥ ४ ॥ इसके बाद समय पूरा होनेपर उर्मिलान एक परम तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया और दूसरे दिन माण्डवी को एक पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ ॥ ५ ॥ इसके अनन्तर श्रुतकीर्तिने एक साथ दो पुत्र उत्पन्न किये। कुछ दिनों बाद उर्मिलाने एक दूसरा पुत्र और उत्पन्न किया ॥ ६ ॥ इसी प्रकार कालान्तरमें माण्डवी के भी एक और पुत्र हुआ । रामने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा उन पुत्रोंका जातकर्मादि संस्कार किया । लक्ष्मणके ज्येष्ठ पुत्रका नाम अङ्गद और दूसरे बेटेका नाम चित्रकेतु पड़ा ॥ ७ ॥ ८ ॥
माण्डवीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम पुष्कर तथा कनिष्ठका तक्ष नाम पड़ा । इसी तरह श्रुतकीर्तिके ज्येष्ठ पुत्रका नाम सुबाहु तथा कनिष्ठ बेटेका नाम यूपकेतु पड़ा ॥ ९ ॥ १० ॥ गुरु वसिष्ठने विधिपूर्वक सबका नामकरणादि संस्कार किया । हे शिष्य ! यहाँपर मैंने तुम्हें संक्षेपमें एक ही एक पुत्रका नाम बतलाया है। इनके सिवाय भी बहुतसे पुत्र हुए। प्रत्येक पुत्रके जन्मसमयपर देवतागण हर्षपूर्वक अपने बाजे बजाते और उनपर तथा उनके माता-पितापर पुष्पोंकी वृष्टि किया करते थे । रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार राजद्वारपर बड़े-बड़े उत्सव रचाये जाते, नये-नये बाजे बजते और वेश्याएँ नृत्य करती थीं । वन्दीजन तथा सूत मागध आ-आकर विविध प्रकारकी स्तुतियाँ किया करते थे । पताका-ध्वजा तथा तोरणादिकोंसे अयोध्या नगरीका शृङ्गार किया गया था। रामके मित्र समस्त राजे अनेक प्रकारके वस्त्राभूषणोंको देखकर उनका पूजन करते थे ॥ ११-१५ ॥
राम-लक्ष्मण आदि चारो भ्राता भी ब्राह्मणों को दान देते उन्हें भोजन कराते एवं नान्दीशाखादि कृत्योंको
११६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
एवमष्टौ कुमारास्ते रामादीनां मनोरमाः । ववृधुश्चन्द्रवदना मातृभिर्लालिताः सुखम् ॥१७॥ शृङ्खलावद्धरत्नौघनिर्मितेषु वरेषु च । प्रखेषु हि कुमारास्ते विरेजू रत्नभूषिताः ॥१८॥ भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णाभ्यतिमहान्ति च । मुक्ताफलाग्रलम्बीनि शोभयन्ति स्म बालकान् ॥१९॥ कण्ठे रत्नमणीवानमध्यगौपन्नखाञ्चिताः । कर्णयोः स्वर्णसंपन्नरत्नाज्जुनसुतालकाः ॥२०॥ सिंजानमणिमंजीरकट्सूत्रार्गदैर्युताः । स्निग्धवक्त्र लपदशना इंद्रनीलमणिप्रभाः ॥२१॥ मंगणे रिंगमाणाश्च मस्कारैः मण्डनाः शुभाः । ते पितॄन् रञ्जयामासुर्भाताश्चापि विशेषतः ॥२२॥ नाना शिशु क्रीडनैश्चैव प्रमंग्मुखचुम्बनैः । बालकविभ्रमैर्मुग्धैर्गमनैर्मधुरैरितैः ॥२३॥ ततस्ते बालकाः सर्व्वे वस्त्रालङ्कारभूषिताः । सभायां राघवं नत्वा तस्थुः सिंहासनेोपरि । २४। एकदा राघवः प्राह वसिष्ठं सदसि स्थितम् । अवलोक्य बालानां त्वं चिह्नानि यथाक्रमम् । २५। तच्छ्रुत्वा रामवचनं वसिष्ठो भूसुरैः सह । आदौ कुशं समाहूय दृष्ट्वा रामं वचोऽब्रवीत् ॥२६॥
वसिष्ठ उवाच
पंचसूक्ष्मः पंचदीर्घः सप्तरक्तः षडुन्नतः त्रिषुयुक्तंषुगंभीरो द्वात्रिंशल्लक्षणव्ययम् ॥२७॥ पंच दीर्घाणि शस्तानि यथा दीर्घायुरोऽत्र च । भुजौ नेत्रं हनुर्जान् नासा च तनयस्य ते ॥२८॥ ग्रीवा जंघा मेढ़नैश्च त्रिभिर्ह्रस्वोऽयर्मडितः । स्वरेण सत्त्वनाभिभ्यां त्रिगंभीरः शिशुः शुभः । २९॥ त्वक्केशंगुलिदशनाः पत्रांण्यङ्गुलिजान्यपि । तथाऽम्य पंच सूक्ष्माणि सूचयन्ति परां श्रियम् ॥३०॥ पाण्र्यङ्घ्रितलनेत्रांते तालुजिह्वाधरोष्ठकम् सप्तरूष्ण च सनममस्मिन् राज्यसुखप्रदम् ॥३१॥ वक्षः कुक्ष्वालिकस्कन्धकरवक्त्रं षडुन्नतम् । तथाऽत्र दृश्यते बाले महदैश्वर्य्यभोगभाक् ॥३२॥
किया करते थे इस तरह रामादि चारों भ्राताओंके आठो कुमार—जिनका चन्द्रमाके समान मुखमण्डल था—माताओसे लालित होकर बढ़न आत थे। सोनेके जंजीरोंसे बधे हुए एवं तरह-तरहके रत्नोंसे सुसज्जित पालनोंपर ये आनन्दकी किलकारियां भरा करत थे । १६ , उन बच्चोंका कितने ही प्रकारके स्वर्णमय आभूषण पहनाये जाते और माथेपर पीपलके पत्तेकी नई सुवर्णका पत्ता बनाकर लगाया जाता था। जिसमें छोटे छोटे मोतियोंके गुच्छ लटकते हुए बड़े भले लगते थे । १७ ।। १८ । गलेमें रत्नों और मणियोंके समूहके बीचमें व्याघ्रका नख शोभायमान हो रहा था। कानामे सुवर्णक कुण्डल झूलते रहते थे और उनमें लगा हुआ हीरा प्रकाशित हो रहा था । १९ ।। २० ।। रुनझुन करती हुई मणियोंकी करधनी पड़ी थी । हाथोंमें कङ्कण तथा विजायत अपना असाधारण निखार दिखा रहा था। जिस समय वे बच्चे तनिक मुस्करा देते तो इन्द्रनीलमणिके समान उनके छोटे छोटे दांत दीखने लगत थे । हाथ और पैरके सहारे आँगनमें रंगते हुए वे बालक नाना प्रकारके बालविनोद तरह तरहके बाल, मुखचुम्बन, बालकीय कृत्रिम युद्ध ओर मोडामोंड़ा बोलोंसे अपने-अपने माता-पिताको आनन्दित करते रहते थे। कुछ दिनों बाद वे अच्छे अच्छे वस्त्रालभूषण पहिनकर राजसभाम जाते और वहाँ नियमत रामचन्द्रको प्रणाम करके अपने आसनपर बैठ जाते थे ॥ २१-२४॥
एक दिन राजसभाम बैठे हुए वसिष्ठजीसे रामन कहा—आप कृपया इन बालकोंका शुभाशुभ लक्षण देखकर हमें बतलाइए । यह बात सुनकर वसिष्ठने सबसे पहले कुशको अपने सामने बुलाया और रामसे कहने लगे—॥ २५ ॥ २६ ॥ पाँच प्रकारके लक्षण सूक्ष्म, पाँच ही तरहके दीर्घ, सात रक्त, छः उन्नत, तीन विस्तृत, तीन ही सांग लघु तथा तीन गंभीर सब मिलाकर ३२ प्रकारके लक्षण होते हैं ॥ २७॥ जैसे कि इस चिरंजीवी कुशके हाथ, नेत्र, बाहु घुटने, नाक ये पाँच दीर्घ हैं। अतएव ये बहुत अच्छे हैं। ग्रीवा, जंघा और लिंग इन तीनोंके छोटे होनेसे इसके तीन ह्रस्व हैं। ये भी अच्छे हैं। शब्द, बल तथा नाभि ये तीन गंभीर हैं। इसकी त्वचा, केश उँगलियां, दाँत, शरीरकी संधियां तथा नख ये पाँच सूक्ष्म इसकी श्रीकी सूचना दे रहे हैं। हाथ, पैर, तलवे, नेत्रके आस-पासवाले भाग तथा तालु, जिह्वा, अधरोष्ठ और नख ये रक्तवर्णके होनेसे राज्यसुख देनेवाले हैं ॥ २८-३१॥ छाती, पेट, कन्धा,
सर्गः ९] जन्मकाण्डम् ३३७
ललाटकटिवक्षोभिस्त्रिभिर्विस्तीर्णैः यथा ह्यसौ। सर्वतेजो महैश्वर्यं तथा प्राप्स्यति नान्यथा ॥३३॥
अविच्छिन्नां तर्जनीं प्राप्य तथा रेखाऽस्य दृश्यते। कनिष्ठामूलनिर्याता दीर्घायुष्यं यया भवेत् ॥३४॥
कमठपृष्ठकठिनावूर्ध्वकण्ठौ करौ। राज्यहेतू शिरोऽस्य पादौ चाप्यति कोमलौ ॥३५॥
पादौ समामलौ रक्तौ समौ सूक्ष्मौ सुशोभनौ। समगूढ...म्वशब्देन स्निग्धार्थदर्शनैस्तथा ॥३६॥
स्कन्धाभिः कररेखाभिश्चारुकाभिः सदा सुखी। लिंग... कूहस्वनेन राज्ञां राजा भविष्यति ॥३७॥
उन्नतशमनगुल्फस्निग्धनाभिस्तथापि च। जंघा राजन वर्तुलस्या महदैश्वर्यसूचकम् ॥३८॥
धारैका मूत्रके यस्य दक्षिणावर्तनी यदि। मद्यश्च मानमधुनोर्यदि वीर्यं तदा नृपः ॥३९॥
विस्तीर्णा पीवरी स्निग्धी भुजावस्य सुखोचितौ। वामावर्ती सप्रसक्तौ भुजौ भूरथगोचितौ ॥४०॥
श्रीवत्सवज्रचक्राब्जमत्स्यकोदण्डदण्डभृत् । तथाऽस्य कण्ठगा रेखा यथा स्यात्त्रिदिवम्पतिः ॥४१॥
द्वात्रिंशल्लक्षणधायं वरंबुद्धिगोचरः। कोचदुदुमिहंसास्वरः सर्वैश्चाधिकः ॥४२॥
मधुपिंगलनेत्रोऽसौ नैनं श्रीन्त्यजति क्वचित्। पंचरेखाललाटस्थु तथा सिंहोदरः शुभः ॥४३॥
ऊर्ध्वरेखांकितपदो निःश्वसनपद्मगन्धवान्। आंक्षाद्रघ्राणिः सुसमो महालक्षणवानयम् ॥४४॥
एवं कुशं निरीक्ष्याथ सर्वान् दृष्ट्वा क्रमेण सः। लवादीनां मचिह्नानि पूर्ववत्प्राह राघवम् ॥४५॥
ततः प्रीतमना रामः पूजयामास तं गुरुम्। वस्त्रैराभरणैश्चैव ययौ हर्षात्ततो गृहम् ॥४६॥
एतस्मिन्नंतरे सीता भूमिदत्त्यवरामने। संस्थिता चामरैर्दर्पदर्शनीभिः परिवीजिता ॥४७॥
सखीभिः सेविता रम्या श्वेताभांसोपवस्त्रगा। मुहुर् म्वं निरक्षन्ती मुखं चन्द्रनिभं वरम् ॥४८॥
हाथ, पसलियां और मुंड यः छः उन्नत दृश्यते हैं, नासिका, नख और कर्ण ये रक्त दाता हैं ॥३२॥ मस्तक, कमर और छाती ये तीन विस्तीर्ण हैं, जो सब ऐश्वर्य देने वाले हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है। ३३॥ हाथकी एक रेखा ठीक तर्जनी पर्यन्त चला गया है कनिष्ठाङ्गुलीपर्यन्त । ३४ । कछुएकी पीठके समान कड़े-कड़े इसके हाथ राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं, इसके कपोल, वृत्ताकार, लाल, पतले, सुन्दर और बराबर एंडीवाले पैर भी इसके राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं ॥ ३५ ॥ इसके कंधे और सरल सुन्दर रेखाएं यह बतलाती हैं कि यह सदा सुखी रहेगा। इसका लिंग पतला और गोल है। इससे यह जाना जाता है कि यह बच्चा भविष्यमें राजाओंका भी राजा होगा। इसका नितम्ब तथा गुल्फ मजबूत है और नाभि गहरी तथा दक्षिणावर्त होकर लाल रङ्गुली है ये सब भी महान् ऐश्वर्यकी सूचना देते हैं। लक्षणशास्त्रमें कहा गया है कि मूत्रत्यागके समय जिसके लिंगसे मूत्रकी केवल एक धार दक्षिणावर्त हो और उसके वीर्यसे मछली तथा शहदके समान गन्ध निकले तो वह मनुष्य राजा होता है ॥ ३६-३९ ॥ इसके बड़े मोटे और चिकनी भुजाएं सुख भोगने लायक हैं। लम्बी और वामावर्त बाहुदण्ड पृथिवीका राज्य भुगताने वाले हैं ॥ ४० ॥ इसके हाथमें वज्र, चक्र, कमल, मत्स्य, धनुष तथा दण्ड आदिके आकारकी ऐसी रेखाएं दृष्टिगोचर होती हैं जिससे ज्ञात होता है कि यह देवताओंका भी राजा होगा ॥ ४१ ॥ इसके मुखमें बत्तीस लक्षण हैं। शंखके समान सुन्दर इसकी ग्रीवा है। ग्रीव पक्षी, क्रौञ्च, हंस तथा मेघके समान गम्भीर इसका स्वर है। इससे जान पड़ता है कि यह संसारके समस्त राजाओंसे बढ़कर होगा ॥ ४२ ॥ मधु (शहद) के समान पिंगल वर्ण इसकी आंखें हैं, इसके ललाटमें पांच रेखाएं हैं, सिंहके समान उदर है, इसके पैरोंकी रेखाएं ऊपरको गयी हैं, इसके श्वाससे कमलकी गन्ध आती है और सुन्दर-सी नासिका है इन सब लक्षणोंसे ज्ञात होता है कि यह असाधारण लक्षणसम्पन्न बालक है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इस प्रकार कुशके लक्षणोंको बतलाकर वशिष्ठने बाकी लव आदि बालकोंके भी लक्षण बतलाये। तदनन्तर रामने अनेक प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे वसिष्ठकी पूजा की और उनकी आज्ञा लेकर रामचन्द्रजी अपने महलमें चले गये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ वहां सीताजी पृथ्वीके दिये हुए सुन्दर सिंहासनपर बैठी थी। कितनी ही सखियां चंवर पंखे आदि झल रही थीं। बहुत सी सखियें तरह-तरहका सेवामें लगी थीं। उस समय सीताजी पीछे तकिया लगाकर बैठी हुई दर्पणमें अपना मुख देख रही थीं। सब उन्होंने सुना कि
| ११८ | आनन्दरामायणे | [सर्गः ९ |
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रामस्यागमनं श्रुत्वा सचचालासनाज्जवात् । ततो ददर्श श्रीरामं बालकैः परिवेष्टितम् ॥४९॥
स्वकक्ष्यां यूपकेतुं च दधानमपरं शिशुम् । तथैव दक्षिणे हस्ते दधानं चाङ्गदं शुभम् ॥५०॥
कुशं लवं पुरस्कृत्य सभायां तं शनैः शनैः । तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ लक्ष्मणं बालकान्वितम् ॥५१॥
तक्षं कक्ष्यां पुष्करं च दधानं दक्षिणे करे । तत्पृष्ठे भरतं सीता ददर्श हरितानना ॥५२॥
चित्रकेतुं शिशुं कक्ष्यां दधानं रुक्ममण्डितम् । तथैव दक्षिणे हस्ते सुबाहुं पङ्कजेक्षणम् ॥५३॥
तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ शत्रुघ्नं जनकात्मजा । रामशस्त्राणि विभ्रतं सभायांतं शनैः शनैः ॥५४॥
एवं सा राघवं दृष्ट्वा सीता प्रत्युज्जगाम तम् । शिञ्जन्मणीन्द्रकञ्चना पीतकौशेयधारिणी ॥५५॥
कराभ्यां पुरतो यांतं लवं धृत्वा चुचुंब सा । निधाय तं लवं कक्ष्यां धृत्वा हस्तेन हं कुशम् ॥५६॥
ययौ शनैः सा रामेण वदती स्वस्थलं पुरः । सखीभिर्वेष्टिता मंद्रा रञ्जयन्तीव राघवम् ॥५७॥
अथ रामोऽपि सीतायाः स्थित्वा सिंहासनोपरि । अङ्कयोः पुरतश्चापि बालकान्सन्निधाय सः ॥५८॥
सीतायै दर्शयन् प्रीत्या लालयामास सादरम् । सीतायै राघवः प्राह सभायां गुरुणा पुरा ॥५९॥
यान्युक्तानि सुलक्षणानि शिशूनां तानि विस्तरात् । श्रुत्वा राममुखात्तानि माता तोषं परं ययौ । ६०॥
राघवः प्राह वैदेहीमूर्भिलापार्श्वराजिताम् । सीतेऽङ्गदं चित्रकेतुं लक्ष्मणांके निवेशय । ६१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता शीघ्रं शिशून् ययौ । तावदुत्थाय सौमित्रिर्लज्जया गंतुमुद्यतः ॥६२॥
तं गन्तुकामरामोऽपि दृष्ट्वा तौ मांडवीं तथा । श्रुतकीर्तिं कञ्जनयनाऽबोधयत्तदा । ६३॥
ताभ्यां धृतोऽथ सौमित्रिः स्मितास्याभ्यामुपाविशत्। तावत्तदङ्कयोः सीता तत्पुत्रौ सन्न्यवेशयत् ॥६४॥
तद्वच्च भरतस्यांके निवेश्य तद्वत्पुत्रकौ । शत्रुघ्नस्यांके सुबाहुं च यूपकेतुं न्यवेशयत् ॥६५॥
ततः सीतां पुनः प्राह स्मितास्यः स रघूद्वहः । राजयन्त्वूर्मिलाद्याश्च स्व स्व स्वामिनमादरात् । ६६॥
राम आ रहे हैं तो आसनसे उठ खड़ी हुई। उधरसे राम भी बालकोंके साथ सीताके समक्ष आगये । ४७-४९। उस समय वे अपनी बायीं गोदमे यूपकेतु तथा दाहिनी गोदमे अंगदको लिये हुए थे और सब कुश आगे-आगे चल रहे थे। उनके पीछे बालकोंको लिए लक्ष्मणको भी आते हुए सीताने देखा ॥ ५० ॥ ५१ ॥ लक्ष्मण तक्षकको गोदमें लिय थे और पुष्करका अपने दहिने हाथकी उँगली पकडाये चल आ रहे थे। उनके बाद सीताने भरतको आते देखा ॥ ५२ ॥ वे भी चित्रकेतु नामक बच्चेको बायीं गोदमें लिये और दाहिना बांहमें कमलकी नाईं आँखोंवाले सुबाहु नामक बेटेको लिये हुए थे । ५३ ॥ उनके पीछे सीताने शत्रुघ्नको देखा। वे रामजीके शस्त्रोंको लिये धीरे धीरे मण्डपोंकी ओर आ रहे थे ॥ ५४ ॥ इस प्रकार उन्हें आते देखकर सीता रामकी ओर बढ़ीं। कमरकी करधनी अहैर क्षुद्रघंटिका अपनी झनझुनाकी ध्वनि कर रही थी और शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित हो रहा था ॥ ५५ ॥ उन्होंने रामके पास पहुंचते ही लवका मुख चूमा । फिर गोदमे उठा लिया और कुशकी दाहिने हाथकी उंगली पकड़ाकर रामस बात करती हुई चलीं। उस समय भी चारों ओरसे कितनी ही सखियाँ घेरकर सीता सण रामको प्रसन्न करतो हुई चल रही थीं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी सीताके सिंहासनपर बैठ गये और बच्चोंको गोदमें लेकर खेलाने लगे। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने सीताकी बहिनके सुने हुए बालकोंके शुभ लक्षण कह सुनाये। जिन्हें सुनकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं । ५८-६० । उर्मिला सीताके ऊपर पंखा झल रही थीं। इसी समय रामने सीतासे कहा कि अङ्गद और चित्रकेतुको ले जाकर लक्ष्मणकी गोदमें बिठा दो ॥ ६१ ॥ रामकी यह बात सुनकर सीता झटपट बच्चोंके पास पहुंची और उन्हें लक्ष्मणकी गोदमें बिठाना ही चाहती थीं कि लक्ष्मण लज्जाके मारे चलनेको तैयार हो गये ॥ ६२ ॥ लक्ष्मणकी बात देखकर रामने आँखसे संकेत कर दिया, जिससे श्रुतकीर्त्ति और माण्डवीने लक्ष्मणको पकड़ लिया। तभी सीताने उन दोनों बच्चोंको लक्ष्मणकी गोदमे बिठा दिया । ६३ ॥ ६४ ॥ उसी प्रकार भरतकी गोदमें तक्ष और पुष्कर तथा शत्रुघ्नकी गोदमें सुबाहु ओर यूपकेतुको बिठलवाया ॥ ६५ ॥ इसके बाद मुस्कराते हुए रामचन्द्रने
सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९
सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९
ततस्ता दुद्रुवुः सर्वाः सर्वैर्भिलाषिता नृपाः । व्यजनेनैर्विजयामासुः स्वं स्वं कांतं सुलज्जिताः ॥६७॥ एवं नानाकोतुकारि भोजनायनकर्मसु । कारयामास वैदेह्या बंध्वादीनां रघूत्तमः ॥६८॥ अथ रामो वसिष्ठं च एकदा वाक्यमब्रवीत् । कुशस्याथ लवस्यापि व्रतबन्धो विधीयताम् ॥६९॥ तथेति गुरुणा प्रोक्तस्ततो रामः शुभे दिने । गणकान् स समाहूय मंत्रयामास सादरम् ॥७०॥ कुशाय पंचमं वर्षं किञ्चिन्न्यूनं लवाय च । ज्ञात्वा ते गणकाः सर्वे गुरुशुक्रादिकं बलम् ॥७१॥ दृष्ट्वा पंचांगपट्टेषु राघवं वाक्यमब्रुवन् । ब्राह्मणस्याष्टमे प्रोक्तो द्वादशे क्षत्रियस्य च ॥७२॥ वैश्यस्य षोडशे वर्षे व्रतबंधो मुनीश्वरैः । जन्मात् षष्ठे तथा गर्भात्सप्तमेऽब्दे नृपस्य च ॥७३॥ व्रतबंधो विधातव्यो यन्मनश्च यथाविधिः । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यों विप्रस्य पंचमे ॥७४॥ राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे । विद्वद्भिचोपनयनमेव शास्त्रेषु निर्णयः ॥७५॥ अतो गर्भाच्च षष्ठेऽब्दे पुत्रयोर्धर्म रन्दन । मुखं कुरुपनयनं मुहूर्त्तं शृणु सादरम् ॥७६॥ अद्यप्रभृत्य पंचदशदिने दर्श कुशाय ह । पश्चात्परेण च श्रुत्वा मुहूर्त रघुनंदनः ॥७७॥ गणकान् धनवस्त्राद्यैः पूज्य लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारणीया राजानः सुहृदश्च मुनीश्वराः ॥७८॥ सांतःपुराः सर्वराज्ञः स्वस्वजानपदैः सह । शृङ्गारणीयोऽयोध्याथ वसिष्ठैः सह सादरम् ॥७९॥ शोधनीयास्तथा मार्गाश्चमूहैषु सुधाः शुभाः । दृश्या चित्राणि लेख्यानि प्रासादेषु समंततः । ८०॥ देवालयेषु सर्वेषु सुधा देया मनोरमा । लेखनीयानि चित्राणि स्थाप्यतां दल्पयः पृथक् ॥८१॥ बन्धनीयाः पताकाश्च रोषणीया ध्वजा अपि । मयतश्चस्तोरणानि बंधनीयानि लक्ष्मण । ८२॥
सीताने कहा-अब उर्मिला, श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी अपने-अपने पतियोंको पंखा झलें ॥ ६६ । इस बातको सुनकर वे स्त्रियाँ लज्जाके मारे वहाँसे भागने लगीं । किन्तु सखियां रोककर उन्हें पकड़ लायीं और अन्तमें उन्हें रामके आज्ञानुसार अपने-अपने पति ऊपर पंखे झलने पड़े ॥ ६७ ॥ इस तरह भोजन, आचमन तथा शयनके समय रामचन्द्रजी सीता तथा भ्राताओंके साथ विविध प्रकारके कौतुक किया करते थे । ६८ ॥ कुछ दिन बीतनेपर एक दिन वसिष्ठसे रामने कहा-अब कुश और लवका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत-संस्कार) कर डालना चाहिए ॥ ६९ ॥ वसिष्ठने कहा-अच्छी बात है । एक पवित्र दिवसको रामने बहुतसे ज्योतिर्विदोंको बुलाकर सलाह की ॥ ७० ॥ जब ज्योतिर्विदोंको यह बात मालूम हुई कि कुशका पाँचवां वर्ष चल रहा है और लवका कुछ कम है । तब उन्होंने गुरु शुक्रादिका बलाबल देखा ॥ ७१ ॥ पंचांगमें सब देख-सुनकर उन्होंने रामसे कहा-ब्राह्मणका उपनयन आठवें वर्षमें, क्षत्रियका बारहवें वर्षमें और वैश्यका सोलहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार होना चाहिए । यह बड़े-बड़े ऋषियोंने कहा है । अपना वर्चस्व बढ़ानेकी इच्छा रखनेवाले विप्र-को गर्भसे पाँचवें वर्षमें, बलवृद्धिकी कामनावाले राजाको छठे वर्षमें एवं धनवृद्धिकी इच्छा रखनेवाले वैश्यको आठवें वर्षमें ही उपनयन-संस्कार करना उचित है । यह शास्त्रोंका निर्णय है ॥ ७२-७५ ॥ अतएव हे रघुनन्दन ! आपके बच्चोंका गर्भसे लेकर यह छठां वर्ष चल रहा है । इसलिए इस समय इनका व्रतबन्ध करना अतिशय श्रेयस्कर है । अब बच्चोंके व्रतबन्धके लिए सुन्दर मुहूर्त बतलाता हूँ, सो सुनिए ॥ ७६ ॥ आजसे पन्द्रहवें दिन कुशके यज्ञोपवीतका पवित्र मुहूर्त मिलता है । इस प्रकार एक पक्षके बाद यज्ञोपवीतका मुहूर्त सुनकर राम-चन्द्रजीने अनेक प्रकारके धन-वस्त्रसे उन गणकोंकी पूजा की और लक्ष्मणसे कहा कि समस्त राजाओं, मित्रों तथा मुनियोंके पास निमन्त्रण भेजकर कहला दो कि सब लोग अपनी स्त्रियों, पुरवासियों तथा देशवासियोंके साथ इस उपनयनसंस्कार के उत्सवमें मेरे यहाँ पधारें । इस अयोध्या नगरीको अच्छी तरह सजवाओ । इसके आस-पासकी गलियोंको साफ करवा दो ॥ ७७-७९ ॥ महलोंको चूनेसे पुतवा दो । कटहरियों और दीवारोंपर नाना प्रकारके चित्र बनवाओ । अयोध्याके समस्त देवालयोंको चूनेसे पुतवाकर उनमें नाना प्रकारकी चित्रकारियां करवाओ और तरह-तरहके पूजनका प्रबन्ध कर दो ॥ ८० ॥ ८१ ॥ चारों ओर पताका
३४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
वेद्याः कार्या ह्यसमग्रग्यो वस्त्रैर्नानाथ मंतपाः भूषणीया ह्ययोध्यायाश्चत्वराः सदसस्तथा ॥८३॥ अन्यच्चापि यथायोग्यं यद्यज्जानासि लक्ष्मणः । तत्कुरुष्व त्वया नैव मया तत्र रघूत्तम ॥८४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा च लक्ष्मणः । तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितः ॥८५॥ ततो मुहूर्ते श्रीरामः स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् । कृत्वा कुमारैर्देव्या च पुत्रैश्चैव वधूभिः ॥८६॥ नानालंकारवस्त्राणि परिधायाथ तैः सह । पुण्याहवचनं चक्रे गुरुं पूज्य ऋषींस्तरान् ॥८७॥ नांदीश्राद्धादिकं कृत्वा प्रतिष्ठां देवतास्य च । चकार मङ्गलैस्तूर्यैर्नादैः सीतासमन्वितः ॥८८॥ ततो ययुः कोटिशस्ते पार्थिवाश्च मुनीश्वराः । यमद्रोपांतस्त्स्याश्च यच्छोभाः सराङ्गनाः ॥८९॥ तैः साऽयोध्या तदा व्योम्ना विरेजे नितरां यदा । ततो महूतेदिवसे वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युतः ॥९०॥ रामस्याथ कुशस्याथ मध्ये धृत्वा वरं पटम् । उवाच मन्त्रान्तेऽथ सुस्वरैर्मधुरक्षरैः ॥९१॥ ध्यान्ता श्रीगणनायकं विधिसुतां शंभुं विधिं माधव लक्ष्मीं शैलसुतां विधेस्तु दयितामिन्द्रं सुरैस्नान् ग्रहान् । पुण्यान्स्थावरनिम्नगाश्च मुमुनीन्भूमीपां कुलस्यांबिकां तात मातग्मादरेण वटवे भूयात्सदा मङ्गलम् ॥९२॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव नागबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव सीताफ्तेर्यत्स्मरणं विधेयम् ॥९३॥ इति नानामंगलवाद्यैस्तूर्यघोषैर्मनोहरैः । ॐकारघोषैः स गुरुर्मुमोचांतःपटं तदा ॥९४॥ ततस्तं राघवस्याङ्के निवेश्य हवनादिकम् । विधिं कृत्वाय कौपीनं दण्डं चाथ कमण्डलुम् । ९५॥ बबन्धौदी रुक्मजां मौञ्जीं बबन्धेणाजिनं तदा । ततः कुशाय स गुरुर्गायत्रीमुपदिश्यरात् ॥९६॥ ब्रह्मचर्यव्रतादीनि स कुशायापदिश्यवान् । कुव्वोक्तावोघेता श्वीच कुर्यादाचमनं तथा ॥९७॥
लगवाओ और जगह-जगहपर ध्वजा आरोपित करो। सुवर्णकी वेदियाँ बनवायी जावें ॥ ८२ । ८३ ॥ इनके सिवाय भी जो-जो बात तुम्ह मालूम हो और मैंने न बतलायी हो, उन्हें भी ठीक कर देना ॥ ८४ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर लक्ष्मण चल गये और रामने जैसा बतलाया था, वह सब प्रबन्ध कर दिया ॥ ८५ ॥ जिस दिन मुहूर्त था, उस रोज उबटन लगाकर उन कुमारों तथा सीता और भाइयोंके साथ रामने स्नान किया। नाना प्रकारके वस्त्र-अलंकारोको पहन । ब्राह्मण तथा निमन्त्रणमें आय हुए ऋषियोंका पूजन करके पुण्याहवाचन नान्दीश्राद्ध, देवताओंकी स्थापना आदि कार्य गृहकी और नगाडेके मङ्गलमय निनादके साथ राम तथा सीताने सम्पादित किय ॥ ८६-८८ ॥ इसके बाद सातों द्वीपोंके करोड़ों राजे तथा ऋषि अपने-अपने परिवार एवं वाहनाके साथ वहाँ आ पहुंच। उन लोगोसे सारी अयोध्या भरकर बड़ी सुन्दर मालूम पड़ने लगी। पञ्चोपवीत मुहूर्तके अवसरपर बहुतसे ब्राह्मणोके साथ बसिष्ठजी राम ओर कुशके मध्यमे एक सुन्दर कपड़ेका पर्दा बाँधकर मांड़े तथा स्पष्ट स्वरमें मङ्गलपाठ करने लगे ॥ ८६-६१ ॥ उन मङ्गलमय श्लोकोंका अर्थ इस प्रकार है-गणेश, सरस्वती, शिव, ब्रह्मा, विष्णु, लक्ष्मी, पार्वती, ब्रह्माणी, इन्द्र, समस्त देवता, सम्पूर्ण ग्रह, पवित्र पर्वत तथा नदियाँ, अच्छे-अच्छे ऋषि, अपनी कुलदेवी तथा माता पिता इन सबको प्रणाम करके आपलोग प्रार्थना करें कि जिस बच्चेका यज्ञोपवीत संस्कार होनेवाला है, उसका कल्याण हो ॥ ९२ ॥ वही लग्न लग्न है, वही दिन दिन है, वही विद्याबल तथा दैवबल है, जिसमें सीतापति रामचन्द्रका स्मरण किया जाय। ९३ । इस तरह विविध प्रकारके मङ्गलमय मन्त्रोंका पाठ करके गुरु वसिष्ठने ॐकार शब्दके साथ पर्दा डाल दिया। तदनन्तर वसिष्ठने लव-कुशको रामकी गोदमें बिठाकर हवनादि विधियोंको सम्पन्न किया । इसके अनंतर कुशका मुञ्जक तागस बनी करधनी पहनायी, मृगचर्म बाँधा और कौपीन पहनायी । फिर उस ब्रह्मयज्ञ कराके वसिष्ठजीने कुशको गायत्री मन्त्रका उपदेश दिया । ६४-९६ ।। फिर ब्रह्मचर्यव्रतके नियम आदि बतलाते हुए कहने लगे कि शास्त्रोम जो नियम बतलाये
सर्गः ९ ] उत्तरकाण्डम् २४१
दन्तान् जिह्वां विशोध्याथ कृत्वामलविशोधनम् । स्नात्वाऽऽप्यैर्वर्तयेन्मन्त्रैः प्राणानायम्य यत्नतः ॥९८॥
उपस्थानं रवेः कृत्वा संध्ययोरुभयोरपि । अग्निकार्यं ततः कृत्वा ब्राह्मणानभिवादयेत् ॥९९॥
अमुकशर्मन्गोत्रोऽहमभिवादय इत्यपि । धारयेन्मेखलां दण्डापवीताजिनमेव च ॥१००॥
अनिन्द्यं चरेद्भैक्ष्यं ब्राह्मणेभ्याऽमत्सये । वाग्यतो गुर्वनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् ॥१०१॥
एकान्नं च समश्नीयाच्छ्राद्धेऽश्नीयान्नचाऽऽपदि । द्विवारं नैव भुञ्जीत दिवा कापि द्विजोत्तमः ॥१०२॥
सायंप्रातर्द्विजोऽश्नीयादग्निहोत्रविधानवित् । मधु मांसं प्राणिहिंसां नास्तङ्गलोकनं जले ॥१०३॥
स्त्रियं स्पृष्टिनोच्छिष्टं परिवादं विवर्जयेत् । यथेष्टचेष्टो न भवेद्गुरोर्नयनगोचरे ॥१०४॥
न नाम परिगृह्णीयात्परोक्षेऽप्यविशेषणम् । गुरुनिन्दा भवेद्यत्र परिवादस्तु यत्र च ॥१०५॥
श्रुती विधाय स्थातव्यं गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।
न मात्रा न पितुः स्वस्रा न स्वस्रैकान्तवांस्तथा ॥१०६॥
बलवंतीन्द्रियाण्यत्र मोहयन्त्यपि कोविदान् । एवमादीन्यनेकानि ब्रह्मचारिव्रतानि हि ॥१०७॥
तस्मै गुरुरुपदिश्य ददौ दानान्यनेकशः । भोजयामास तं मात्रा सह मानोत्सवैस्तदा ॥१०८॥
कारयित्वाऽथ पालाशपूजनं विधिवत्पूर्वकम् । तेनापि कुशहोत्रेण देवकस्य विसर्जनम् ॥१०९॥
चकार राघवश्चैव सीतया स गुरुस्तदा । ततो रामो नृपतिभिर्जनकेनापि पूजितः ॥११०॥
चकार धनवस्त्राद्यैस्तुष्टान् विप्रान्नृपादिकांन् । आचांडालांन्सदा रामस्तोषयामास सादरम् ॥१११॥
एवं नानामहोत्सवैर्यन्मासमेकं विनाय सः । रामो विसर्जयामास तत्रत्यान्नृपार्थिकादिकान् ॥११२॥
एवं कालांतराद्रामो व्रतबंधं लवस्य च । चकार पूर्ववत्सर्वान्समाहूय नृपादिकान् ॥११३॥
गये हैं, उनके अनुसार शौचसे निवृत्त होकर दाँत तथा जीभ साफ कर लेनेके बाद वरुण दैवत्य से सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रोंका पाठ करता हुआ स्नान करे । फिर आचमन-प्राणायामादि करके दोनो समयको सूर्यका उपस्थान करना चाहिये । इसके पश्चात् हवन करके ब्राह्मणोंका प्रणाम करे ॥ ९७-९९ ॥ प्रणाम करते समय यह भी कहना जाय कि अमुक नामका अमुक व्यक्ति मैं आपको प्रणाम करता हूँ । उच्च जातिके लोगों अथवा जहाँतक हो सके, सुपात्र ब्राह्मणोंके यहाँसे भिक्षा माँगकर अपनी जीविका चलाय । किसीकी निन्दा न करे तथा मौनव्रतका पालन करे और जब गुरुकी अनुमति मिल जाय, तभी भोजन करे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ सदा केवल एक समयका भोजन करे । श्राद्धोंमें तथा किसी आपत्समय कायक आ आनेपर भी दिनमें दो बार भोजन न करे । ब्राह्मणको चाहिये कि केवल सुबहशाम भोजन करे । मधु तथा मांसका आहार, प्राणिहिंसा, जलमें सूर्यके प्रतिबिम्बका दर्शन, स्त्रीप्रसंग, बासी और जूठा भोजन तथा दूसरेकी निन्दा इन कामोंको छोड़ दे । गुरुके सामने अपने इच्छानुसार जो चाहै, सो न कर डाल ॥ १०२-१०४ ॥ परोक्षमें भी बिना विशेषण लगाये गुरुका नाम न ले । जहाँपर गुरुकी निन्दा हो रही हों अथवा उनकी ठठोली की जाती हो, वहाँ कान ढांककर बैठे या वहाँसे उठ जाय । अपनी माता, बुआ अथवा बहिनके साथ भी एकान्तमें न बैठे ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। वे बड़े बड़े पण्डितोंको भी बातकी बातमें विचलित कर देता है। इस प्रकार गुरुने बहुतसे ब्रह्मचर्य व्रतसम्बन्धी नियम बतलाये ॥ १०७ ॥ इसके अनन्तर अनेक तरहके दान दिये गये । कुशको माताके साथ भोजन कराया गया ॥ १०८ ॥ तब विधिवूर्वक पलाशका पूजन कराया । फिर कुश, होता तथा रामके द्वारा आहूत देवताओंका पूजन कराया ॥ १०९ ॥ इसके बाद बहुतसे राजाओं तथा जनकजीने रामका पूजन किया । रामने बहुतसे धन-वस्त्रों द्वारा आये हुए राजाओं तथा ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके अयोध्यानिवासी चाण्डालसे लेकर ऊँचसे ऊँचे कुल तकके लोगोंको आदर प्रसन्न किया ॥ ११० ॥ १११ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवोंके साथ एक महीनेका समय बिताकर मेहमानीमें आये हुए राजाओं और ऋषियोंको विदा किया ॥ ११२ ॥ कुछ समय बीतनेके बाद उसी तरह कुशकेही
२४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
ततस्तौ बालकौ रम्यौ वेदाध्ययनमुत्तमम् । चक्रतुर्गुरुसन्निधौ विधिवद् द्विसत्तमौ ॥११४॥ एवं तेषां तु बालानां सर्वेषां रघुनन्दनः । व्रतबन्धविधानानि यथाकाले महोत्सवैः ॥११५॥ चकार गुरुणा विप्रैः समाहूय नृपादिकान् । विशेषं निजपुत्राभ्यां चकार स महोत्सवैः ॥११६॥ अकरोदधिकं किञ्चिन्न न्यूनमकरोद्विभुः । ततस्ते बालकाः सर्वे ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः ॥११७॥ चक्रिरे गुरुसान्निध्ये वेदाध्ययनमुत्तमम् । अथ रामोऽपि तैर्दृष्ट्वा बालकैः परिवारितः ॥११८॥ विरेजे स्कन्दगणपादिभिर्देव्यै यथा शिवः । अथ ते बालकाः सर्वे कृत्वाऽध्ययनमुत्तमम् ॥११९॥ वेदादीनां गुरुस्यानुज्ञया ज्ञानं गुरोस्ततः । जग्मुस्तीर्थानि वै कर्तुं सेनया गुरुवह्निभिः ॥१२०॥ पृथिव्यां भरते खण्डे यानि तीर्थानि यानि ते । कृत्वा समाप्त्यैः पञ्च मासैः स्वां नगरीं शनैः ॥१२१॥ बालान्समागताञ् श्रुत्वा शोभयित्वा निजां पुरीम् । प्रत्युज्जगाम सौमित्रिः पुरस्कृत्याथ वारणम् ॥१२२॥ ते दृष्ट्वा लक्ष्मणं नेमुस्तेनालिङ्गिता अपि । नानोत्सवैर्ययुर्हत्वा अयोध्यायां गृहं प्रति ॥१२३॥ मार्गे मार्गे पुरस्त्रीभिः सौधस्थाभिस्तु वर्षिताः । वृष्टिभिः कुसुमादीनां दीपैर्नीराजिता अपि ॥१२४॥ ततस्ते बालकाः सर्वे सभायां रघुनन्दनम् । नेमुस्तेनालिङ्गिताश्च ययुः सीतागृहं ततः ॥१२५॥ एतस्मिन्नन्तरे सीतोर्मिला माण्डवी तथा । श्रुतकीर्तिश्च वेगेन चक्रुर्नीराजनं पृथक् ॥१२६॥ दध्योदनैर्यवार्दिद्यैः पक्वान्नैस्तैलपाचितैः । सर्षपैर्लवणैर्माषैस्तोयकुम्भैश्च सादरम् ॥१२७॥ ततस्ते बालकाः सर्वे नेमुः सीतां पृथक् पृथक् । ततो नेमुः स्वमातॄंश्च पश्चा नत्वा पितामहीः ॥१२८॥ ततस्ते बालकाः सर्वे ददुर्दानान्यनेकशः ब्राह्मणान् भोजयामासुः कोटिशस्ते पृथक् पृथक् ॥१२९॥
साथ सब लोगोंको बुलाकर लवका यज्ञोपवीतसंस्कार किया ॥११३॥ फिर वे दोनों बालक गुरु वसिष्ठके पास विधिपूर्वक वेदाध्ययन करने लगे । इसी रीतिसे रामचन्द्रने समय-समयपर लक्ष्मण भरत आदिके बच्चों-का भी व्रतबन्ध-संस्कार कराया और अपने लड़कोंसे बढ़कर उत्सव-दानादि किये । उसमें किसी प्रकारकी न्यूनता नहीं होन दी वे बच्चे भी संस्कृत होकर विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यके नियमोंका पालन करते हुए गुरुके पास वेदाध्ययन करने लगे। यह सब ही ज्ञानके साथ-साथ सदा पुत्रोंके साथ बैठे हुए रामचन्द्रजी पार्वती, गणेश तथा स्वामिकार्तिकेयके साथ बैठे शिवजीके सदृश सुन्दर लगते थे । इसके बाद सब उन बालकोंने अच्छी तरह विद्याध्ययन कर लिया तो एक विशाल सेना, गुरु तथा कितने ही मन्त्रियोंको साथ लेकर तीर्थयात्रा करनेको निकले ॥११४-१२०॥ पृथ्वीके भरतखण्डमें जितने तीर्थ हैं, उन करके पांच महीनेमें वे सब बालक अयोध्या वापस आ गये ॥१२१॥ लक्ष्मणने जब सुना कि लड़के तीर्थयात्रासे अयोध्या लौट आये हैं तो बहुतसे बाजे-गाजे तथा हाथीयोंको साथ लेकर अगवानी करने गये ॥१२२॥ जब उन्होंने लक्ष्मणको देखा तो मस्तक झुका-झुकाकर प्रणाम किया और लक्ष्मणने उनको अपनी छातीसे लगा-लगाकर आलिंगन किया । फिर अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ उनका महलोंमें ले चले । रास्तेमें अयोध्याकी नारियां अट्टारियोंपर चढ़-चढ़कर उनपर फूलोंकी वर्षा करतीं और आरती उतारती थीं । इसके बाद बालकोंने राजदरबारमें जाकर रामको प्रणाम किया और वहाँसे सीताके महलोंको गये । वहाँ पहुंचनेपर सीता, उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने अलग-अलग उन बालकोंकी आरती उतारी पक्वान्न, दही, भात तैलके बने पक्वान्न, सरसों, नमक, उड़द तथा पानी भरे कलश आदि हरकाफर बलि दी गयीं। इसके बाद उन सबोंने कौशल्या आदि तथा पिता और भाइयोंको प्रणाम करके सीता आदि माताओंको प्रणाम किया ॥१२३-१२८॥ इसके बाद उन बालकोंने भाँति-भांतिके दान दिये और अलग-अलग करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराया।
सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३
सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३
एवं नानोत्सवास्तत्र बभूवु रामवेश्मनि । अथ ते बालकाः सर्वे स्यन्दनादिषु संस्थिताः ॥१३०॥ दिव्यवस्त्राणि चित्राणि परिधाय समंततः । अयोध्याराजमार्गेषु हट्टेषु च चतुष्पथे ॥१३१॥ आरामोपवनारण्यवाटिकासु नदीतटे गमनागमने चक्रुः सेनया मंत्रिबालकैः ॥१३२। एवं साकेतनगरे बालकैः सीतया सुखम् । रेमे स बंधुभिर्युक्तश्चिरं राजा रघूद्वहः ॥१३३। एवं शिष्य मया प्रोक्तं जन्मकांडमिदं तव । कुशादीनां च जन्मानि वर्णितान्यत्र विस्तरात् ॥१३४॥ रम्यं पवित्रमानंददायकं च मनोहरम् । पुत्रपौत्रप्रदं जन्मकांडमेतत्सुखावहम् ॥१३५॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं ये शृण्वंति नरोत्तमाः । तेषां पुत्रैश्च पौत्रैश्च वियोगो न भविष्यति ॥१३६॥ जन्मकांडमिदं ये भक्त्या शृण्वंति मानवाः । तेषां स्त्रीणां वियोगो हि न कदाप्यत्र जायते ॥१३७॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं याः शृण्वंत्यत्र वै स्त्रियः । स्वभर्तृभिर्वियोगं ता न गच्छंति यथा रमा ॥१३८। ग्रामं देशान्तरं तीर्थं ये गताश्चिरं नराः । तेषामागमनार्थे हि जन्मकांडं पठेदिदम् ॥१३९। येषां भावीनि कार्याणि लब्धुं त्वरयते मनः । तैनरैः पठनीयं वै जन्मकांडं दिने दिने ।१४०॥ पूर्वे दिने चैकवारं द्विवारं चापरे दिने । एवं नवदिनं वृद्धिन्नयैकं क्षयोऽपि हि ।१४१। कार्यो नरैः स्वस्थचित्तैस्तेषां कार्यं भविष्यति । वर्षमेकं पठेद्भक्त्या ह्यपुत्रोऽपि लभे सुतम् ॥१४२॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इष्टान् कामांश्च कल्याणं जन्मकाण्डश्रवणालभेत् ॥१४३॥
इस तरह रामचन्द्रजीके भवनमे अनेक प्रकारके उत्सव हुए । वे सब रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियोंपर सवार हो-होकर बगीचे, उपवन, वन तथा नदीतट आदिपर अयोध्याके चौराहों तथा बाजारमें अनेक प्रकारके वस्त्र-आभूषण पहनकर मन्त्रियोंके लड़कोंके साथ आने जाने लगे ॥ १२६-१३२ ॥ इस तरह उस साकेतपुरमें उन बालकों तथा सीताके साथ आनन्दपूर्वक रामचन्द्रजी रहने लगे । हे शिष्य ! यह जन्मकाण्ड मैंने तुम्हें सुनाया । जिसमें कुश आदि बालकोंकी विस्तृत जीवनी वर्णित है । १३३ ॥ १३४ ॥ यह जन्मकाण्ड परम रम्य आनन्ददायक, मनोहर, सुखसौभाग्यका देनेवाला और पुत्र पौत्रादिका दाता है । जो लोग जन्मकाण्डको सुनते हैं, उनका कभी अपने पुत्रपौत्रादिके वियोगका दुःख नहीं उठाना पड़ता । जो लोग भक्तिपूर्वक इस जन्मकाण्डका श्रवण करते हैं, उनका अपनी स्त्री का भी वियोग कभी नहीं होता । यदि स्त्रियां इसे सुनती हैं तो उन्हें अपने स्वामीसे कभी वियुक्त नहीं होना पड़ता बल्कि लक्ष्मीके समान वे जन्मभर आनन्दसे अपना जीवन बिताती हैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ यदि किसीके परिवारका कोई मनुष्य किसी तीर्थ या परदेशको चला गया हो तो उस लोगनके लिए इस जन्मकाण्डका पाठ करना चाहिए । जिसको अपना कोई भावी कार्य सिद्ध करना हो उसको चाहिए कि पहले दिन एक बार, दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, इस क्रमसे बढ़ाते-बढ़ाते नवें दिन नौ बार जन्मकाण्डका पाठ करे । नवें दिनसे एक-एक पाठ घटाता हुआ फिर नवें दिन केवल एक पाठ करे । इस तरह यदि स्वस्थचित्तसे इसका पाठ किया जाय तो प्रत्येक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। यदि इस विधिसे एक वर्ष पर्यन्त जन्मकाण्डका पाठ किया जाय तो पुत्रहीन व्यक्ति भी पुत्र प्राप्त कर सकता है । १३७-१४२ ॥ कहनेका
३४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
आनन्दरामायणमध्यसंस्थं श्रीजन्मकाण्डं तनयप्रदं च ।
पारायणं संश्रवणं तथा वा करोति यो ना स लभेत्सुपुत्रम् ॥१४४॥
इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
कुशलवादीनां जन्मकथनयतवंशविस्तारो नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
जन्मकाण्डे सर्गा आनन्दरामायणे नवैव ज्ञातव्याः । चतुरुत्तराष्टशतश्लोका विष्णुदासरूपरामदासामुखोपदिष्टाः ॥१॥
उपवनदर्शनम् ॥ १ ॥ उपवनक्रीडा ॥ २ ॥ सीतातत्यागः ॥ ३ ॥ कुशलवोत्पत्तिः ॥ ४ ॥ रामरक्षा ॥ ५ ॥
कमलहरणम् ॥ ६ ॥ पुत्रभ्यां संग्रामः ॥ ७ ॥ सीताग्रहणम् ॥ ८ ॥ बालकानामुपनयनम् ॥ ९ ॥
मतलब यह कि जन्मकाण्डका पाठ करनेसे पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन तथा किसी भी प्रकारकी कामनावालेकी कामनापूर्ण हो सकती है इस आनन्दरामायणके मध्यमें स्थित जन्मकाण्ड सन्तानदायक है। जो मनुष्य इसका पारायण करता या सुनता है, उसे सुपुत्रकी प्राप्ति होती है ॥ १४३ ॥ १४४ ॥ इति श्रीमत्शतकोटिरामचरि-तान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचितज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
इस जन्मकाण्डमें कुल नौ सर्ग तथा आठ सौ चार श्लोकों द्वारा श्रीरामदासने विष्णुदासको उपदेश दिया है। ॥ १ ॥ उन नवों सर्गोंमें ये कथाएँ वर्णित हैं (१) उपवनदर्शन, (२) उपवनक्रीडा, (३) सीतातत्याग, (४) कुशलवकी उत्पत्ति, (५) रामरक्षा, (६) लव द्वारा कमलहरण, (७) पुत्रोंके साथ रामका संग्राम, (८) सीताका पुनर्ग्रहण और (९) बालकोंका उपनयनसंस्कार ।
इति श्रीमदानन्दरामायणे जन्मकाण्ड समाप्तम् ।
श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत–
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
विवाहकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
(स्वयंवरके प्रसंगमें रामका तथा भूरिकीर्तिकी पुरीको प्रस्थान)
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः सभामध्ये मन्त्रिभिः परिवेष्टितः । तस्थौ सिंहासने रम्ये वरच्छत्रोपशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र कश्चिद्दूतः समाययौ । नत्वा सभायां श्रीरामं स्वामिवृत्तं न्यवेदयत् ॥ २ ॥
पूर्वदेशाधिपतिना राज्ञा श्रीभूरिकीर्तिना । प्रेषितोऽस्मि महाराज द्रष्टुं त्वत्पादपङ्कजे ॥ ३ ॥
पत्रं पाठयित्वा श्रीराम कार्या मत्स्वामिने कृपा । इत्युक्त्वा रामदूतस्य करे पत्रं समर्पयत् ॥ ४ ॥
रामदूतोऽपि सौमित्रेः पुरस्तात्पत्रमादधात् । नत्वाऽऽयामास वेगेन गत्वा तस्थौ निजस्थलीम् ॥ ५ ॥
ततः स लक्ष्मणः पत्रं वस्त्रबन्धनवेष्टितम् । समुद्घाट्य राघवाग्रे पपाठ मञ्जुलस्वरः ॥ ६ ॥
हेमकृत्रिमपुष्पाद्यैरङ्कितं कुङ्कुमान्वितम् । दर्शनादेव माङ्गल्यसूचकं तोषकारकम् ॥ ७ ॥
उवाच पत्रलिखितैरक्षरैर्लक्ष्मणः शनैः । स्थितः श्रीरामपुरतो वरासिंहासनांतिके ॥ ८ ॥
श्रीमान् श्रीराघवेन्द्रो जयतु दशशिरश्छेदनाथं जगत्त्यां
कौसल्यायां नृपेंद्राद्दशरथतनयोऽसि नाम्नाऽवतीर्णः ।
तस्याहं भूरिकीर्तिः पदजलहरुहयोगन्धमात्रातुकामः
कृत्वा नैजं शिरस्तु भ्रमरवदनिशं प्रार्थनां प्रार्थयामि ॥ ९ ॥
श्रीरामदास बोले—एक दिन रामचन्द्र सभामें अपने राजसिंहासनपर बैठे थे। उनके ऊपर सुन्दर छत्र लगा हुआ था और उनके चारों ओर कितने ही मंत्री बैठे हुए थे। इसी समय एक दूत आया और वह अपने प्रभुका सन्देश सुनाने लगा। उसने कहा— पूर्व देशके अधिपति महाराज भूरिकीर्तिने आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिए मुझे भेजा है। आप मेरे स्वामीपर कृपा करके यह पत्र पढ़ लीजिए। इतना कहकर उसने वह पत्र रामके दूतको दे दिया। उस दूतने लक्ष्मणके हाथमें दिया और प्रणाम करके पूर्ववत् बैठ गया ॥ १-५ ॥
लक्ष्मणने सुन्दर कपड़ेमें बँधे हुए उस पत्रको खोला और मधुर स्वरसे बाँचकर रामको सुनाने लगे। पत्रपर सुवर्णके फूल बने हुए थे और कुमकुमके छींटे पड़े थे। जिसे देखनमात्रसे वह मांगल्यसूचक तथा आनन्ददायक प्रतीत होता था ॥ ६॥ ७ । पत्रमें जो लिखा था, उसे रामके पास जाकर धीरे-धीरे लक्ष्मण सुनाने लगे—। ८॥ रघुकुलमें उत्पन्न श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो राम रावणको मारनेके लिए दशरथके पुत्र
२४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १ ]
मम पौत्र्यावुभे राम चंपिका सुमतिरिति च । तयोः स्वयंवरार्थं ह्यायाताश्च बहवो नृपाः ॥ १०॥ बंधुपुत्रैर्बंधुभिस्त्वं स्वसुताभ्यां च मंत्रिभिः । सुहृज्जनैस्तथा पौरैः सावरोधः स्वसेनया ॥ ११॥ आगच्छस्व मम पुरं मयि कृत्वा महन्कृपाम् । द्विषतां प्रार्थनां मे त्वं मा कुरुष्व विफ्लां प्रभो । १२॥ इति पत्रार्थमाकर्ण्य स्वस्थचित्तो रघूत्तमः । स्वयंवरं ततो गन्तुं गुरुणा निश्चय व्यधात् ॥ १३॥ ततोऽब्रवीन्म सौमित्रिमद्य सेनां प्रषोदय । श्वोऽहं गच्छामि युष्माभ्यां स्वया मंत्रिजनैः सह ॥ १४॥ भरतेनापि युष्माकं पुत्रैः शत्रुघ्नसंयुतः । स्वयंवरं सावरोधः पौरैर्जानपदैः सह ॥ १५॥ विजयो नगरीं गन्तुं पालितुं स्थापितो मया । अद्य वै वस्त्रगेहानि बहिर्नेयानि लक्ष्मण ॥ १६॥ पंथानं शोधयंत्वद्य नानादातृनरान्विताः । गच्छन्तु सकला नार्यः पुष्पकेण विहायसा ॥ १७॥ तथेति लक्ष्मणश्चोक्त्वा सत्कार स गशोधितम् । राघवेण समाभव्ये प्रबद्धकरसंपुटः ॥ १८॥ ततो द्वितीयदिवसे प्रभाते रघुनन्दनः । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा निनाग्नीन्वै स पुष्पके । १९॥ स्थापयामास कुण्डेषु भुक्त्वा सह सुहृज्जनैः । ततः सीतां समाहूय त्वरयामास राघवः ॥ २०॥ ततः स्त्रियस्तदा सर्वाः सीताद्या रत्नभूषिताः । यानमञ्जुरुहुः शीघ्रं दिव्यवस्त्रादिमण्डिताः ॥ २१॥ ततो रामो गजारूढो वरच्छत्रोपशोभितः । ययौचाग्रे चामरैर्वीजितश्च मुहुर्मुहुः ॥ २२॥ रामाग्रे वारणारूढो ययौ शीघ्रं गुरुस्तदा । राघवस्य पृष्ठभागे करिस्थो लक्ष्मणो ययौ ॥ २३॥ ततः कुशाद्यास्ते हृष्टा बाला जग्मुर्गजस्थिताः । ततो भरतशत्रुघ्नौ नामतुर्गजसंस्थितौ । २४॥ ततः सर्वे मंत्रियश्च पौर जानपदादयः । नानावहनसंस्थास्ते ययुः सर्वे त्वरान्विताः ॥ २५॥ चतुर्दन्ते शुक्लवर्णं वारणंश्वतरोद्भवे । संस्थितो राघवो रेजे मुक्ताजालविराजिते ॥ २६॥ एवं रामः सुनेमार्गे वंदिमंगलशब्दनुतः । मृदंगद वाद्यनिनादैश्च ययौ पूर्वदिशं शनैः ॥ २७॥
होकर कौशल्याभी काममे अस्मे है। मैं मूर्खकीकी आपकी नाई जनक चरणकमलोंके संघनकी कामनासे रात-दिन प्रार्थना करता रहता हूँ ॥ ६ ॥ हे राम ! मेरो चम्पिका तथा सुमति नामकी दो पोतियां हैं। उनके स्वयंवरमें बहुतसे राजे आये हुए हैं। अतएव आपस भी प्रार्थना है कि अपने भ्राताओं पुत्रों, भ्राताओंके पुत्रों, मंत्रियों, मित्रों, घरकी नारियों, पुरवासियो तथा सेनाके साथ मेरे यहाँ पधारे हे प्रभो ! मेरी इस प्रार्थनाको विफल मत कीजिये ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकार उस पत्रके अर्थको स्वस्थचित्त होकर रामचन्द्रजीने सुना और स्वयंवरमें जानेके लिए गुरु सहित निश्चय किया । इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि आज सेना भेज दो । कल हम, तुम, सब, दूता, मंत्रियों, भरत तथा तुम लोगोंके पुत्रों, स्त्रियों तथा पुरवासियोंको साथ लेकर स्वयंवरमे चलेंगे। विजयको अयोध्या नगरी तथा दशकी रक्षाके लिए नियुक्त कर दिया जाय । हे लक्ष्मण ! तुम आज अभी तम्बूकनात आदि भेज दो १. १३-१६ ॥ झम्पट कुछ दूतोंको रास्ता साफ करनेके लिए आगे भेज दो। घरकी सारी स्त्रियं को पुष्पक विमान द्वारा पहले ही भेज दो । १७ ॥ लक्ष्मणने रामकी सब बातें मान लीं और जैसा उन्होंने कहा था, सो सब ठीक कर दिया । १८ । दूसरे दिन रामने सवेरे उठकर स्नान और नित्यकर्म करनेके अनन्तर सब बालकोंके साथ बैठकर भोजन किया । अग्निहोत्रकी अग्नि मँगवाकर पुष्पक विमानपर रखी ॥ १९ ॥ इसके बाद सीताको बुलाया और जल्दी तैयार होनेके लिये कहा ॥ २० ॥ सीता आदि नारियोंने सुनहले वस्त्र एवं आभूषण पहने और पुष्पक विमान पर जा बैठीं ॥ २१ ॥ इसके बाद राम एक सुन्दर हाथीपर बैठकर चले । उस समय उनके ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था और सेवक उनपर चंवर डुला रहे थ ॥ २२ ॥ सबसे आगे गुरु वसिष्ठका हाथी था, उनके पीछे राम और रामके पीछे लक्ष्मणका हाथी था ॥ २३ ॥ उनके पीछे कुश आदि शांडों इष्टों और भरत-शत्रुघ्नका हाथी चल रहा था ॥ २४ ॥ इन सबके पीछे मन्त्री तथा पुरवासी अनेक प्रकारकी सवारियोंपर सवार होकर शीघ्रतासे चले जा रहे थे ॥ २५ । रामचन्द्रजी ऐरावतके कुलमे उत्पन्न चार दांतवाले तथा मोतियोंके झुमकेसे सुशोभित हाथीपर बैठे हुए बड़े सुन्दर लग रहे थे ॥ २६ ॥ इस तरह बन्दीजन-मगाध आदिकोंके हाथ
सर्गः ३] विवाहकाण्डम् ३६७
लवादिनेत्रगां बत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्वीकर्त्तुं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रूपं कृशानुजम् ३३॥ गुणोपेतेन मुखेनैव कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशार्क चपिकंर ते मग्ना पद्धस्तिथाऽद्य हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवांके संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मितानना ।३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जाऽवनतमानना । समर्पिनिजबाहुभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वादित्राणि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः । ३७॥ भूरिकीर्त्तिर्नृपस्तुष्टो लवांके सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः । ३८॥ तोषमाप रघुश्रेष्ठः सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सञ्चनाश्च लवं दृष्ट्वा तुतोष सा । ३९॥ ततः सर्वांन्नृपान् पूज्य भूरिकीर्त्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनेनभृगुत्तमः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपाः प्रोचुर्ययुर्मार्गस्थलांनि हि ॥४१॥ रामार्थे समरं कर्त्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना गतोत्साहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुभिश्चालेयैयीं वामस्थल मुदः । अथपरे दिने गत्वा भूरिकीर्त्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्मन्त्वा रामं रथोऽब्रवीत् । द्रष्टव्या लग्नदिवासाः सुमुहूर्त्तः सुखावहः ॥४४॥ मामङ्गीकृत्य रामाय त्वत्पादाश्रयकामुकम् । उभयोश्च मण्डपयाः कार्याण्याज्ञापय प्रभो । ४५॥ तथेति राघवोक्त्वा वसिष्ठ चादचत्तदा । सोऽपि गमाज्ञया ज्योतिःशास्त्रज्ञः परिवेष्टितः ॥४६। मुहूर्त्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्त्तिर्गणेशां लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥
सुनन्दाका आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार स्वादु, पुष्कर, तैल, चित्रकेतु तथा अंगदको छाडता हुई वह लवके पास पहुंचा । ३१॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगा तब सुनन्दा बाला -ने बोले। इस बालकको देख, यह रामका पुत्र है । यह अपना विवाह करना चाहता है। इनकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है। वाल्मीकिजी कृपासे इस लब्ध विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू मानन्द इस अपना दान बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमे बैठी हे उस तरह मा तुम तू भी उसकी गोदमें बैठ जा इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुसकुराता ओर लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमें वरमाला डाल दी ॥ ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बज बज, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगी और बन्दीजन स्तुति करने लगे । ३७॥ महाराज भूरिकीर्त्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमे बिठा दिया । ३८ । यह देखकर रामचन्द्रजी तथा मंदारोपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए। जब जानकीने सीताने सबवा मानन्द सुमतिकी देखा तब ता उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्त्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइयेगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपन डेरेपर चल गये ॥ ४१ ॥ वे सब राज रामसे युद्ध करनेम असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, मुख कुम्हला गया था, उत्साह भंग हो गया था और बेजार कामके बाणोंसे पाडित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बच्चोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्त्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था, वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त्त विचारिए । फिर कहा हे राम ! मदने वरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अंगीकार करके दोनों मण्डपं के लिए जो कार्य करने हों, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ "अच्छा" कहकर रामने वसिष्ठकी ओर सङ्केत किया । वसिष्ठने रामकी आज्ञा से ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पंडितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्त्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक बादियों तथा रामके साथवाले बंधुजनों को