भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२७

प्रेषयामास सैन्यैश्च दासीदासैश्च गोधनैः शत्रुघ्नोऽपि तथा चक्रे यथा रामेण शिक्षितः ॥९६॥
हत्वा तं लवणं वेगान्मधुशमकरोत्पुरीम् शान्तान् जनपदांश्चक्रे माथुरान्दानमानतः ॥९७॥
मधुरायां सुबाहुं तं स्थाप्य स्त्रीभ्यां सुतादिभिः । स्त्रीभ्यां पुत्रैश्च यूपकेतुं विदिशानगरे तथा ॥९८॥
संस्थाप्य सैन्यैः शत्रुघ्नो मथुरायां कियद्दिनम् । स्थित्वा सुबाहवे मूर्तिं तदा तुष्टो ददौ सुखम् ॥ ९९॥
अद्यापि मथुरायां सा मूर्तिस्तत्रैव वर्तते शत्रुघ्नोऽप्येततः सैन्यैः शीघ्रं रामांतिकं ययौ ॥१००॥
सर्वं वृत्तं राघवाय कथयामास सादरम् । अथैकदा स भरतः कैकेयीनन्दनो महान् ॥१०१॥
युधाजिता मातुलेन शाहूतोऽगात्समन्वितः । रामाज्ञया गतस्तत्र हत्वा गंधर्वनायकान् ॥१०२॥
तिस्रः कोटीः पुरे द्वे तु निवेश्य रघुनन्दनः । पुष्करं पुष्करावत्यां पूर्वमेवाभिषेचितम् ॥१०३॥
अयोध्यायां राघवेण स्थापयामास सेनया स्त्रीभ्यां पुत्रैर्दाशदासराज्याद्यैः परिवेष्टितम् । १०४॥
ततो मुहूर्त्ते भरतस्तक्षं तक्षशिलाह्वये । नगरं स्थापयामास राघवेणाभिषेचितम् ॥१०५॥
अयोध्यायां पूर्वमेव महामंगलपूर्वकम् स्त्रीभ्यां पुत्रादिभिस्तक्षस्तस्थौ तक्षशिलाह्वये ॥१०६॥
उभौ कुमारौ सौमित्रे गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् । गत्वा मल्लांस्तन्निर्जित्य दुष्टान् सर्वोपकारिणः ॥१०७॥
पुनरागत्य नगरीं रामसेवापरोऽभवत् । ततः प्रीतो रघुपती लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । १०८॥
द्वावंगदचित्रकेतू महामत्त्वपराक्रमौ । मया विपेचितौ वीरौ स्त्रीभ्यां पुत्रबलैर्युतौ ॥१०९॥
द्वयोर्द्वे नगरे कृत्वा गजाश्वधनरत्नकैः । स्थापयित्वा नृपोः पुत्रौ शीघ्रमागच्छ मां पुनः ॥११०॥
रामाज्ञां स पुरस्कृत्य गताश्वबलवाहनैः गत्वा हत्वा रिपून सर्वान् गजाश्व बहुदनामकः ॥१११॥
धनरत्ने चित्रकेतुं स्थापयामास देहजौ । अन्यस्त्रीभ्यां शार्कश्च दासीदासबलान्वितौ ॥११२॥
सौमित्रिः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत् अथ रामः समाहूय गणकान् परिपूज्य च ॥११३॥


आगे-आगे शत्रुघ्नको और पीछे-पिया बालको समेत सुबाहु एवं यूपकेतुको उपयुक्तसंख्यक सेनाके साथ भेज दिया। वहाँ पहुँचकर शत्रुघ्नने ठीक वैसा ही किया, जैसा रामने कहा था। इस प्रकार शीघ्र ही उन्होंने लवणासुरको मारकर मथुरा नगरी बसाया। मथुरावासियोंको अनेक प्रकारका दान मान देकर मथुराको कुछ दिनोंमे ही उन्होंने एक सुन्दर नगरी बना दी। शत्रुघ्नने एक विशाल सेनाके साथ सुबाहुको वहींकी गद्दीपर बिठाला और स्त्री तथा पुत्रों समेत यूपकेतुको अपने साथ लेकर विदिशा नगरको प्रस्थान कर दिया ॥९४-९८॥ वहाँ पहुँचकर यूपकेतुको गद्दीपर बिठाया। इसके बाद फिर मथुरा लौट आये और कुछ दिन वहाँ रहे । एक रोज प्रसन्न होकर शत्रुघ्नने वह कपिलापारायणी मूर्ति सुबाहुको दे दी। आज भी मथुरामे वह मूर्ति विद्यमान है। इसके अनन्तर शत्रुघ्न सेनाके साथ रामके पास अयोध्या आय और वहाँ पहुँचकर उन्होंने रामको मथुराका सब समाचार सुनाया ॥९६, १००॥ एक समय कैकेयीनन्दन भरत अपने मामा युधाजित्‌के बुलावेपर रामकी आज्ञासे बहुतसे सैनिकोंके साथ ननिहाल गये। वहाँ गन्धर्वोंको मारा और तीन करोड़ नागरिकोंको विभक्त करके दो पुरी बसाया। वशिष्ठर पूर्वम ही अभिषिक्त पुष्करको राजाद्दीपर बिठाला। तदनन्तर कितने ही दासी-दास तथा स्त्री-पुत्रोंका साथ लेकर पुष्कर वहाँ रहने लगे ॥१०१-१०४ इसके बाद भरतने तक्षको तक्षशिला नामका नगरम अभिषिक्त करके बैठाला। यह सब काम करके भरत अयोध्या लौट आय और फिर पहलेकी तरह रामचन्द्रजीकी सेवा करने लगे। इसके बाद एक दिन प्रसन्न होकर रामने लक्ष्मणसे कहा—लक्ष्मण ! तुम अपने दोनो पुत्रों को साथ लेकर पश्चिम दिशाकी ओर जाओ, वहाँ सब लोगोंका अपकार करनेवाले दुष्ट मल्लों को मारकर अंगद तथा चित्रकेतु इन दोनों बेटोंको, जिनका अभिषेक में पहले ही कर चुका हूँ, वहाँकी गद्दीपर बिठााल दो। वहाँ दो पुरी बसाकर गज-वाजि तथा धनसे परिपूर्ण करके मेरे पास लौट आओ ॥१०५-११०॥ रामकी आज्ञा स्वीकार करके लक्ष्मण दोनो पुत्रोंके साथ पुष्कर बहुतेरी सेनाके साथ वहाँ पहुँचे और मल्लोको संहार