श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२७
सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२७
प्रेषयामास सैन्यैश्च दासीदासैश्च गोधनैः शत्रुघ्नोऽपि तथा चक्रे यथा रामेण शिक्षितः ॥९६॥
हत्वा तं लवणं वेगान्मधुशमकरोत्पुरीम् शान्तान् जनपदांश्चक्रे माथुरान्दानमानतः ॥९७॥
मधुरायां सुबाहुं तं स्थाप्य स्त्रीभ्यां सुतादिभिः । स्त्रीभ्यां पुत्रैश्च यूपकेतुं विदिशानगरे तथा ॥९८॥
संस्थाप्य सैन्यैः शत्रुघ्नो मथुरायां कियद्दिनम् । स्थित्वा सुबाहवे मूर्तिं तदा तुष्टो ददौ सुखम् ॥ ९९॥
अद्यापि मथुरायां सा मूर्तिस्तत्रैव वर्तते शत्रुघ्नोऽप्येततः सैन्यैः शीघ्रं रामांतिकं ययौ ॥१००॥
सर्वं वृत्तं राघवाय कथयामास सादरम् । अथैकदा स भरतः कैकेयीनन्दनो महान् ॥१०१॥
युधाजिता मातुलेन शाहूतोऽगात्समन्वितः । रामाज्ञया गतस्तत्र हत्वा गंधर्वनायकान् ॥१०२॥
तिस्रः कोटीः पुरे द्वे तु निवेश्य रघुनन्दनः । पुष्करं पुष्करावत्यां पूर्वमेवाभिषेचितम् ॥१०३॥
अयोध्यायां राघवेण स्थापयामास सेनया स्त्रीभ्यां पुत्रैर्दाशदासराज्याद्यैः परिवेष्टितम् । १०४॥
ततो मुहूर्त्ते भरतस्तक्षं तक्षशिलाह्वये । नगरं स्थापयामास राघवेणाभिषेचितम् ॥१०५॥
अयोध्यायां पूर्वमेव महामंगलपूर्वकम् स्त्रीभ्यां पुत्रादिभिस्तक्षस्तस्थौ तक्षशिलाह्वये ॥१०६॥
उभौ कुमारौ सौमित्रे गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् । गत्वा मल्लांस्तन्निर्जित्य दुष्टान् सर्वोपकारिणः ॥१०७॥
पुनरागत्य नगरीं रामसेवापरोऽभवत् । ततः प्रीतो रघुपती लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । १०८॥
द्वावंगदचित्रकेतू महामत्त्वपराक्रमौ । मया विपेचितौ वीरौ स्त्रीभ्यां पुत्रबलैर्युतौ ॥१०९॥
द्वयोर्द्वे नगरे कृत्वा गजाश्वधनरत्नकैः । स्थापयित्वा नृपोः पुत्रौ शीघ्रमागच्छ मां पुनः ॥११०॥
रामाज्ञां स पुरस्कृत्य गताश्वबलवाहनैः गत्वा हत्वा रिपून सर्वान् गजाश्व बहुदनामकः ॥१११॥
धनरत्ने चित्रकेतुं स्थापयामास देहजौ । अन्यस्त्रीभ्यां शार्कश्च दासीदासबलान्वितौ ॥११२॥
सौमित्रिः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत् अथ रामः समाहूय गणकान् परिपूज्य च ॥११३॥
आगे-आगे शत्रुघ्नको और पीछे-पिया बालको समेत सुबाहु एवं यूपकेतुको उपयुक्तसंख्यक सेनाके साथ भेज दिया। वहाँ पहुँचकर शत्रुघ्नने ठीक वैसा ही किया, जैसा रामने कहा था। इस प्रकार शीघ्र ही उन्होंने लवणासुरको मारकर मथुरा नगरी बसाया। मथुरावासियोंको अनेक प्रकारका दान मान देकर मथुराको कुछ दिनोंमे ही उन्होंने एक सुन्दर नगरी बना दी। शत्रुघ्नने एक विशाल सेनाके साथ सुबाहुको वहींकी गद्दीपर बिठाला और स्त्री तथा पुत्रों समेत यूपकेतुको अपने साथ लेकर विदिशा नगरको प्रस्थान कर दिया ॥९४-९८॥ वहाँ पहुँचकर यूपकेतुको गद्दीपर बिठाया। इसके बाद फिर मथुरा लौट आये और कुछ दिन वहाँ रहे । एक रोज प्रसन्न होकर शत्रुघ्नने वह कपिलापारायणी मूर्ति सुबाहुको दे दी। आज भी मथुरामे वह मूर्ति विद्यमान है। इसके अनन्तर शत्रुघ्न सेनाके साथ रामके पास अयोध्या आय और वहाँ पहुँचकर उन्होंने रामको मथुराका सब समाचार सुनाया ॥९६, १००॥ एक समय कैकेयीनन्दन भरत अपने मामा युधाजित्के बुलावेपर रामकी आज्ञासे बहुतसे सैनिकोंके साथ ननिहाल गये। वहाँ गन्धर्वोंको मारा और तीन करोड़ नागरिकोंको विभक्त करके दो पुरी बसाया। वशिष्ठर पूर्वम ही अभिषिक्त पुष्करको राजाद्दीपर बिठाला। तदनन्तर कितने ही दासी-दास तथा स्त्री-पुत्रोंका साथ लेकर पुष्कर वहाँ रहने लगे ॥१०१-१०४ इसके बाद भरतने तक्षको तक्षशिला नामका नगरम अभिषिक्त करके बैठाला। यह सब काम करके भरत अयोध्या लौट आय और फिर पहलेकी तरह रामचन्द्रजीकी सेवा करने लगे। इसके बाद एक दिन प्रसन्न होकर रामने लक्ष्मणसे कहा—लक्ष्मण ! तुम अपने दोनो पुत्रों को साथ लेकर पश्चिम दिशाकी ओर जाओ, वहाँ सब लोगोंका अपकार करनेवाले दुष्ट मल्लों को मारकर अंगद तथा चित्रकेतु इन दोनों बेटोंको, जिनका अभिषेक में पहले ही कर चुका हूँ, वहाँकी गद्दीपर बिठााल दो। वहाँ दो पुरी बसाकर गज-वाजि तथा धनसे परिपूर्ण करके मेरे पास लौट आओ ॥१०५-११०॥ रामकी आज्ञा स्वीकार करके लक्ष्मण दोनो पुत्रोंके साथ पुष्कर बहुतेरी सेनाके साथ वहाँ पहुँचे और मल्लोको संहार
४२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
अवनीं जेतुमुद्युक्तो मुहूर्त्तं तानपृच्छत। तत्तूर्तेर्गर्गकैर्दत्तो मुहूर्त्तः परमः शुभः ॥११४॥ तं श्रुत्वा तान् पुनः पूज्य सर्वान् रामो व्यसर्जयत् । ततो रामोऽब्रवीद्वाक्यं लक्ष्मणं पुनः स्थितम् ॥११५॥ अवनिस्थाञ्छत्रून् जेतुं साङ्गं गच्छासि पाथिवैः । विमानेनैव गच्छामि सेनां चोदय सत्वरम् ॥११६॥ नानास्त्राणि यन्त्राणि वाहनानि समन्ततः । स्थापयस्व विमानेऽद्य सनथ्यः शतशो नराः ॥११७॥ धनधान्यतृणादीनां संग्रहं कुरु पुष्पक । पुरीं गोप्तुं सुमन्त्रोऽस्तु सैन्येन परिवेष्टितः ॥११८॥ एवमाज्ञाप्य सौमित्रिं श्रीरामो जानकीगृहम् । ययौ चकार सौमित्रिर्यथा रामेण शिक्षितः ॥११९॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे राज्यविभागो नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तमः सर्गः
( रामकी मारत्तवर्षपर विजय )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामो रहः सीतां स्त्रोद्योगमवदच्छनैः । अवनिस्थाञ्छत्रून् जेतुं पुत्राभ्यां बन्धुभिर्नृपैः ॥ १ ॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा जानकी प्राह लज्जिता । न हि त्वद्विरहं सोढुं समर्था रघुनन्दन ॥ २ ॥ त्वयाऽहमवनीं द्रष्टुं यास्यामि जगतां प्रभो । तथेत्युक्त्वा रघुश्रेष्ठो लालयामास जानकीम् ॥ ३ ॥ एतस्मिन्नन्तरे सद्यो ह्युर्मिलाद्याः स्त्रियश्च ताः । कुशस्य च लवस्यापि पत्न्यः श्रुत्वाऽवनेर्जयम् ॥ ४ ॥ कर्तुं रामसमुद्योगं पुत्राभ्यां बन्धुभिर्नृपैः । जानकीं प्रार्थयामासुर्यास्यामोऽद्य त्वया सह ॥ ५ ॥ स्वस्वकांतवियोगं च सोढुं नैव क्षमा वयम् । सीता तासां वचः श्रुत्वा राघव श्राम्य तद्वचः ॥ ६ ॥
शत्रुओंको परास्त करके मजाश्वपुरमें शत्रुहन्ता तथा वनस्थलपुरमें चित्रकेतुको बिठाल दिया और वहाँसे लौट-कर लक्ष्मण फिर रामकी सेवामें लग गये । इसके अनन्तर रामने ज्योतिषियोंको बुलाकर उनकी पूजा की और पृथ्वीविजय करनेके लिए शुभ मुहूर्त पूछा । उन गणकोंने भी रामको बहुत ही बढ़िया मुहूर्त बताया ॥ १११-११४ ॥ मुहूर्त सुनकर रामने फिर उनकी पूजा की और विदा कर दिया फिर रामने लक्ष्मणसे कहा-मैं पृथ्वीपर रहनेवाले समस्त गजाओंको जीतनेके लिए विमानसे यात्रा करूँगा । तुम जाकर सेनाको तैयार करके भजो । विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र और सकड़ांको संख्याम अच्छी-अच्छी तोपें लेकर मेरे विमानमें रखवाओ । खर्चके लिए धन धान्य तथा घास आदिका ठीकसे प्रबन्ध करके पुष्पक विमानमें रखवा दो । अयोध्यापुरीकी रक्षा के लिए कुछ सेनाके साथ सुमन्त्र यहींपर ही छोड़ दिये जायेंगे ॥ ११५ ॥ ॥ ११६ ॥ इस प्रकार आज्ञा देकर राम अपने रनिवासम चले गये और लक्ष्मण रामके आज्ञानुसार सेना आदिकी तैयारीमें लग गये ॥ ११७-११९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्धे षष्ठः सर्ग ॥ ६ ॥
श्रीरामदास फिर कहने लगे-इसके पश्चात् राम एकान्तमे सीतासे बोले कि मै अपने पुत्रों तथा बान्धवों-को साथ लेकर पृथ्वीके राजाओंको जीतनेके लिए जाऊंगा । इस प्रकारकी बात सुनी तो लज्जित होकर सीताने रामसे कहा-हे रघुनन्दन मै आपका विरह नहीं सहन कर सकूँगी । मैं भी इस पृथ्वीतलको देखनेके लिए आपके साथ-साथ चलूँगी । रामने सीताकी मांग स्वीकार कर ली ॥१-३॥ यह खबर धर-धारे उर्मिलादिका स्त्रियो तथा कुश लव आदिकी पत्नियोंके पास पहुंची और उन्होने सीतासे प्रार्थना की कि आप हमको भी अपने साथ ले चलें । हम भी अपने-अपने पतियोंका वियोग सहन करनेमे असमर्थ हैं । सीताने उनकी बातें सुनीं तो रामसे
सर्गः ७ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२९
सर्गः ७ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२९
रामाज्ञया तदा सर्वांस्तोषयन्ती वचोऽब्रवीत् । आगन्तव्यं मया साकं युष्माभिश्च न संशयः ॥ ७ ॥ गच्छध्वं स्वस्वगेहानि सर्वास्तूर्णं समज्ज्वलाः । एवं सीतावचः श्रुत्वा ताः सर्वाः कमलोचनाः ॥ ८ ॥ सीतां नत्वा ययुः सर्वाः सन्तुष्टा मुदिताननाः । स्वस्वगेहानि वेगेन रूपवत्पुत्रसंस्तुताः ९ । अथ रामस्तु तां रात्रिं निनाय सीतया सुखम् । ब्राह्मे मुहूर्त्ते श्रुत्वा स वन्दिगीतं मनीषिणाम् १०॥ रामः प्रबुद्धस्तु जपात्कृतशौचादिकक्रियः । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा कृत्वा शम्भोः प्रपूजनम् ११॥ कथां पौराणिकीं श्रुत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः । कृत्वोद्योगविधिं च संस्तूय गणनायकम् ॥१२॥ कृत्वाऽभ्युदयिकं श्राद्धं घृतश्राद्धं यतिव्रतम् । कामधेनुं कल्पवृक्षं पुष्पकं च सुरद्रुमम् ॥१३॥ मणिद्वयं पृथक्पूज्य सर्वाः कृत्वा तु भोजनम् । धृत्वा वस्त्राणि शस्त्राणि बहुधा मातृः प्रणम्य च ॥१४॥ ययौ स शिविकारूढः पुष्पकं बन्धुभिर्वृतः । पुरोऽग्र्याः सचिवैः सैन्यैः सेवकैर्ज्ञातिभिः सह ॥१५॥ यानमारुरुहुः सर्वाः सीताद्यास्ताः स्त्रियः शुभाः ॥१६॥ कौसल्याद्या मातरश्च सम्पूर्णा न यथासुखम् । यात्राकाण्डे यथा शिष्य विमानरचना पुरा ॥१७॥ ते वर्णिता मया तद्वदधुनाऽऽवां शृणुष्व पुनः । तदा निनेदुर्वादित्राणि तूर्यमृदङ्गकादयः ॥१८॥ ननृतुर्वारनार्य्यश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । अथ रामोऽब्रवीद्यानं गच्छ पूर्वदिशं शनैः ॥१९॥ तथेत्युक्त्वा पुष्पकं तद्ययावाकाशवर्त्मना । नत्वा रामं सुसम्प्राप नगर्य्यां गुहकं यथासुखम् ॥२०॥ पूर्वदेशे नृपाः सर्वे श्रुत्वा रामं समागतम् । प्रत्युज्जग्मुः राघवेंद्रं प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥२१॥ प्रणेमुस्ते रमानाथं नानोपायनपाणयः । पूजयित्वा श्रीरामं नीत्वा राज्यं निजं निजम् ॥२२॥ रामाज्ञया सर्वन्गाय सम्पूर्णानि नृपोत्तमाः । स्वकोशादीनि रामाय समर्प्य स्थिरमानसाः ॥२३॥ मागधान् समतिक्रम्य विमानेन रघूत्तमः । पश्यन्नानाविधान् देशान्भूर्तिकीर्तेः पुरं ययौ ॥२४॥
सलाह की। फिर रामके आज्ञानुसार सीता सबको प्रसन्न करती हुई कहने लगी—तुमलोग भी मेरे साथ चलो। अब कोई चिन्ता मत करो और अपने अपने महलोंमें जाकर हमारे साथ चलनेकी तैयारी करो। इस तरह सीताकी बात सुनकर कमल सदृश नेत्रोंवाली उन स्त्रियोंने सीताको प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक सुन्दरत्न नूपुरोंका झंकार करती हुई अपने महलोंको चली गयीं ॥ ६-८ ॥ तदनन्तर रामने सीताके साथ वह रात्रि सुखपूर्वक बितायी। ब्राह्म मुहूर्त्तमें उन्होंने बन्दीजनोंके मुखसे स्तुति सुनी। तब शीघ्र शौचादि क्रियायों की और स्नानादि नित्यकर्म करके पश्चात् शिवजीका विधिवत् पूजन किया ॥ १० । ११ ॥ बादमें पौराणिकी कथाएं सुनीं, अनेक प्रकारके दान दिये और अनेक उत्सव शिव गणनादि का पूजा की ॥ १२ ॥ तब आभ्युदयिक श्राद्ध तथा घृतश्राद्ध करके कामधेनु, कल्पवृक्ष, पुष्पक, पारिजात वृक्ष तथा दोनों मणियोंका पूजन किया। इसके बाद अपनी समस्त माताओंको प्रणाम करके बहुमूल्य अनेक प्रकारके वस्त्र बांटे और बन्धुओं तथा कितने ही राजाओंके साथ पालकीपर सवार होकर पुष्पक विमानके पास जा पहुंचे ॥ १३-१५ ॥ वहीं अपने पुत्रों, मन्त्रियों, सेनाओं, सेवकों तथा कहनों समेत बहुत-सी सीतादि स्त्रियां और कौशल्यादि माताएं सवार हुईं। रामदासने कहा- हे शिष्य ! यात्राकाण्ड प्रथम में जिस प्रकार यानकी रचना कह आया हूँ ॥ १६ ॥ १७ ॥ ठीक उसी तरह इस यानका भी रचना था। उनकी यात्राके समय अनेक प्रकारके बाजे बजे और मगध तथा बन्दीजनोंने स्तुति की, वेश्यायें नाचीं और गायकोंने गान गाये। इसके अनन्तर रामने विमानको पूर्व दिशाकी ओर चलनेकी आज्ञा दी ॥ १८ । १९ ॥ सब पुष्पक रामके आज्ञानुसार आकाशमार्गसे उड़ता हुआ चला। रामको प्रणाम करके सुमुख म... पूर्व दिशामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ २० ॥ जब पूर्व देशके लोगोंने सुना कि राम आये हैं तो बहुतके बड़े-बड़े राजे हाथ जोड़कर उनके पास गये ॥ २१ ॥ सामन्त पहुंचकर उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया और अनेक प्रकारके भेंट उनकी सेवामें उपस्थित की और विधिवत् पूजन किया ॥ २२ ॥ इसके बाद उन्होंने अपना समस्त कोष आदि रामको अर्पण कर दिया और उनकी आज्ञासे
४२० आनन्दरामायणे [ सर्ग ७
तैनातिपूजितो रामः शनैश्शनैर्न दक्षिणाम् । ययावब्धितटेनैव द्राविडं देशमुत्तमम् ॥२५॥ कृष्णातीरेप्रदेशांश्चान्वपश्यन् रामः शनैः शनैः । कांची ययौ विमानेन कंचुकंठोऽपि राघवम् ॥२६॥ पूजयामास विधिवत्स्वाद्याद्यैः सुहृदं निजम् । आरवारं महादेवं तथा तच्चोलमण्डलम् ॥२७॥ उल्लङ्घ्य श्रीरामस्तत्रस्थैः पूजितो नृपैः । ययौ स केरलान् ईशान्यैश्च कर्णाटकं ययौ ॥२८॥ पूजितो विजयेनापि विजयापुरस्वामिना । क्रौञ्चाख्यान्नृपान् जित्वा महाराष्ट्रं ययौ प्रभुः ॥२९॥ दुर्गं देवगिरिं नाम चकार स्ववशं क्षणात् । वश्यान्यान्यपि दुर्गाणि स्वाधीनान्यकरोद्विभुः ॥३०॥ कृत्वा विराट्देशं च देशान् विन्ध्याचलाश्रितान् । पश्यन् ययौ स रेवायास्तीरेणोङ्कारमीश्वरम् ॥३१॥ मालवस्थान्नृपान् जित्वा ययौ रामः स उज्जयाम् । उग्रबाहुं रणे जित्वा ययौ हैहयपत्तनम् ॥३२॥ जित्वा प्रतीपं श्रीरामः स ययौ हस्तिनापुरम् । एतस्मिन्नन्तरे सोमवंशजास्ते त्रयो नृपाः ॥३३॥ पुरूरवास्तथाऽनुरुच्चान्यसैन्येन वै पुरात् । रामेण संगरं कर्तुं नानावाहनसंस्थितः ॥३४॥ ववृषुर्वपुः शस्त्राणि पुष्पकस्थं रघूत्तमम् । युद्धं बभूव तैः साकं त्रिदिनं रोमहर्षणम् ॥३५॥ तदार्यद्रक्तपूर्णा सा जाह्नवी पापहारिणी । चतुर्थे दिवसे रामस्तान् जित्वा तत्पुरं ययौ ॥३६॥ सुषेणं वानराणां च वैद्यं वानरसेनया । गजाह्वये पुरे स्थाप्य तांस्त्रीन् सोमान्वयोद्भवान् ७॥ कारगृहस्थितान् कृत्वा सुग्राह्याशु रघूत्तमः । ययौ स मथुरां द्रष्टुं सुबाहुपरिपालिताम् ॥३८॥ दृष्ट्वा सुबाहुं राज्यस्थं विदिशानगरं ययौ । यूपकेतुं तत्र दृष्ट्वा राज्यस्थं तेन वन्दितः ॥३९॥ कुरुक्षेत्रं पुष्करं च दृष्ट्वा रामो विहायसा । मरुं च समतिक्रम्य ययौ गुर्जरामुत्तमम् ॥४०॥ प्रभासं च ततो गत्वा महादेवं ययौ ततः । गजाह्वयनगरं दृष्ट्वाऽङ्गदं राज्यपदस्थितम् ॥४१॥ धनरत्नैश्चित्रकेतुं दृष्ट्वा राज्यपदास्थितम् । आनर्त्तं च ययौ रामस्तत्स्थैः परिपूजितः ॥४२॥
अपने स्थान से, व पुष्पक विमानपर सवार होकर गन्धके साथ साथ चले ॥ २३॥ मगध देशको लांघकर राम शस्तक अनेक देशोंको देखा हुआ भूरिकीर्ति नामक राजाकी राजधानीमें पहुंचे ॥ २४॥ उनसे पूजित होकर विमान द्वारा धीरे धीरे दक्षिण दिशाकी ओर समुद्रतटसे चलकर द्राविड़ देशमे जा पहुंचे ॥ २५॥ कृष्णा नदीके आस पासवाले देशोंको दखते हुए राम काशिकाश जा पहुंचे। वहां कञ्चुकण्ठ नामके राजाने उनका आदर-सत्कार किया और फिर वहाँसे आरवार महादेव और चोलदेशको लांघकर ॥ २६ ॥ २७॥ वहाँके राजाओंसे पूजित होते हुए केरल देशको गए वहां विजयपुरम रहनेवाले विजय नामके राजासे पूजित होकर क्रौञ्चाख्यदेशके रहनेवाले राजाओंको परास्त कर महाराष्ट्रमें पहुंचे ॥२८ ॥ २९॥ वहाँ देवगिरि नामके किलेको क्षणभरमें अपने अधीन करके और भी बहुतसे किलोंको अपने कब्जेमें कर लिया ॥ ३०॥ इसके अनन्तर विराट देश नामक विन्ध्याचलके आसपासवाले देशोंको देखते हुए रेवातटसे ओंकारेश्वर पहुंचे। यहाँ मालव देशके राजाओंको जीतकर उज्जैनको गए। वहींपर राजा उग्रबाहुके जीतकर हैहयनगरमें गये ॥ ३१ ॥ ३२॥ उसके समीपवर्ती राजाओंको ... कर श्री रामचन्द्र हस्तिनापुरमें पहुंचे, तिमें सोमवंशी तीन राजे तथा पुरूरवा नामके राजा घंटा... सेना लेकर रामचन्द्रसे युद्ध करनेके लिए आ पहुंचे ॥ ३३ ॥ ३४॥ वहाँ पहुंचते ही पुष्पक विमानपर बैठे हुए रामके ऊपर उन लोगोने शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। तब उनके साथ रामने तीन दिन तक लोमहर्षण युद्ध किया। उस समय जाह्नवी रक्तसे पूर्ण हो गयी थी। चौथे दिन रामने उनको परास्त करके उनकी पुरीपर अधिकार कर लिया ॥ ३५ ॥ ३६॥ हस्तिनापुरीमें बानरोंके वैद्य सुषेणको गद्दीपर बिठाकर सोमवंशी राजाओंको जेलमें ठूंस दिया और वहाँसे सुबाहु परिपालित मथुरा पुरीको देखनेके लिए गये । ३७। ३८॥ सुबाहुको राजगद्दीपर आसीन देखकर विदिशा नगरको गये, वहां यूपकेतुने रामका विधिवत् आदर सत्कार किया वहाँसे कुरुक्षेत्र पुष्कर आदि तीर्थोंको देखकर आकाशमार्गसे रामचन्द्रजी मरुदेशका लंघन हुए गुजरात गये ॥ ३९ । ४० ॥ फिर प्रभासक्षेत्र आकर मरुदेश गये। वहाँ राजखपुरमें अङ्गदको राज्यासनपर रखकर घनरत्न नामक नगरके राज्यासनपर बैठे हुए चित्रकेतुको देखा।
सर्गः ८ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४३१
प्रययौ पुष्करं द्रष्टुं राज्यस्थं पुष्करावतीम् । ततो रामो विमानेन ययौ तक्षशिलाह्वये ॥४३॥
तक्षं दृष्ट्वा पदस्थं तं ययौ भरतमातुलम् । युधाजिता पूजितः स रामो राजीवलोचनः ॥४४॥
ययौ विहायसा शीघ्रं शकदेशं मनोरमम् । जित्वा यवनदेशस्थान्भूपतीन् सर्वान् रघूत्तमः । ४५।
पश्यन्नानाविधान् देशांस्ताम्रदक्ष ययौ ततः । ततो मायापुरीं गत्वा कलापग्राममाययौ ।४६॥
नरनारायणौ दृष्ट्वा चोपास्यौ रघुनन्दनः । उपागर्क नारदं च वर्षं भारतसंज्ञके ।४७।
ताम्रत्वाऽर्च्यं रघुश्रेष्ठस्तत्रस्थैः परिपूजितः । भारतनरेशं रणे हत्वा नन्वदे स्थाप्य स्वानुगम् ।४८॥
भारतं पृष्ठतः कृत्वा पुण्यदेशं मनोज्ञकम् । योजनानां सहस्रैश्च नवभिः परिविस्तृतम् ॥४९॥
अग्रे ददर्श श्रीरामो हिमालयमहाचलम् । योजनानां सहस्राभ्यां रम्यं विपुलमुत्तमम् ॥५०।
त्रिसप्ततिसहस्रैश्च दीर्घः प्रोक्तस्तु योजनैः । तत्र नानाकोतुकानि ददर्श रघुनन्दनः ।
दर्शयामास वैदेहीं विमानस्थो मुदान्वितः । ५१॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे भारतवर्षजयो नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः
( रामद्वारा जम्बूद्वीप-विजय )
श्रीरामदास उवाच
अथ ह स किंपुरुषं नाम वर्षं नवसहस्रयोजनविस्तीर्णे स्थीयानादिमिद्धराममूर्तिर्देवेनोपास्य-विराजमानपवनसुतोपासकमधिष्ठितमुपजगाम ॥ १ ॥ तत्र ह वाव दर्शितनानेकौतुकस्तद्दर्पन्नृप-समूहपरिवेष्टितः पुष्पकसमधिरूढो नवद्राद्यस्त्वनःपुरःसरः पुरतोऽनुससार ॥ २ ॥ अथ हेमकूटं नाम पर्वतमतिक्रमनीय द्विसहस्रयोजनविपुलमेकाशीतिमहस्रयोजनदीर्घं नानाव्यातुविराजितं समुन्नत-
इसके बाद आनर्त देशको गये । वहाँवालोंने रामका अच्छी तरह सत्कार किया ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ वहाँसे पुष्करावती-के राज्यासनपर बैठे हुए पुष्करको देखने गये । फिर तक्षशिलाकी राजधानीमें सिंहासनपर बैठे हुए तक्षको देख-कर भरतके ननिहाल गये । वहाँ पहुँचनेपर राजा युधाजित्ने रामका पूजन किया ॥ ४३ ॥ ४४ । इसके बाद आकाशमार्गसे सुन्दर शकदेशको गये । यहाँ यवनदेशमें रहनेवाले राजाओंको जीतकर अनेक प्रकारके देशोंको देखते हुए ताम्रदेशको गये । फिर मायापुरी होते हुए कलापग्रामको गये ॥४५ । ४६ । वहाँ सबके उपास्य नर-नारायणका दर्शन करके नारदका दर्शन किया । फिर भारतसंज्ञक देशमें गये । वहाँ संग्राम करके भारतनरेशको मार डाला और अपने किसी सेवकको वहाँका राजा बनाकर नौ हजार योजन विस्तृत पुण्यदेश ( पूना ) को गये ॥ ४७-४९ । इसके अनन्तर महापर्वत हिमालयके पास गये, जो एक हजार योजन है वहाँ रामने अनेक प्रकारके कौतुक देखे । फिर विमानपरसे ही सीताजी भी यहाँका कौतुक दिखाया ॥ ५० ॥ ५१ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेय-विरचित"ज्योत्स्ना"भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे सप्तमः सर्ग ॥ ७ ॥
श्रीरामदास कहने लगे- इसके अनन्तर राम नौ हजार योजन विस्तृत किम्पुरुष नामक देशको गये । जहाँ बहुतसे देवताओं साथ हनुमान्जीकी मूर्तिके साथ रामकी अनादि मूर्ति स्थापित थी ॥ १ ॥ उस देशमें अनेक प्रकारके कौतुक देखते हुए वहाँके राजाओंसे परिवेष्टित होकर पुष्पक विमानपर बैठे-बैठे आगे बढ़े ॥ २ ॥ जाते-जाते अतिशय कमनीय हेमकूट पर्वतपर पहुंचे, जो दो हजार योजन विस्तृत
आनन्दरामायणे [ सर्गः ८ ]
शिखरशिरोऽग्रमानं पुष्पकसधिष्ठितो रघुनाथ उपजगाम । ३ । अथ तृतीयं वर्षं नाम नवसहस्र- योजनपरिमितं नृसिंहोपास्यप्रह्लादोपासकविराजमानमतिकमनीयं दाशरथस्तनयः समनुययौ । ४ ।। तद्वर्षवासिनृपवरवृन्दतुङ्गसमग्राममप्यादितजयश्रीविपुलोक्षादिसहितनृपदयितागर्भनर्त्तनारिजननजनक- जादाशितमानकीर्तुकध्वजतोरणतोरणघण्टाकिंकिणीविराजमानपुष्पकमधिष्ठितः श्रीरघुनन्दन उपज- गाम ।। ५ ।। अथ निषधं नाम पर्वतं द्विसहस्रयोजनविपुलं नवनिंसहस्रायोजनदैर्घ्यमतिकमनीयं स रघुनन्दनो नयनगोचरं चकार । ६ ।। अथ सुवर्णद्रिमंडनतश्चतुर्दिक्षु समानमानमिलावृतं नाम चतुर्थं वर्षं चतुस्त्रिंशत्सहस्रयोजनपरिमितं स रघुनायक उपजगाम ।। ७ । तत्र ह वात्र मेरोराश्रय- भूते मेरोर्दक्षिणदिक्स्थिते मेरुमदारपर्वतेनेतिविराजमाने मयुकृतजम्बूवृक्षमभिविशालं जंबूद्वीपाख्यसूचकं सफलमपूर्वमतिकमनीयं स रामचन्द्रोऽवनिदुहित्रे दर्शयामास । ८ ।।
ततो मेरुपश्चिमतो मेरोराश्रयभूते सुपार्श्वपर्वते विराजमानकदम्बवृक्षमभिममुन्नतमतिविपुल- मतिकमनीयं पुष्परराजितं स रघुनायको नेत्रविषयं चकार । ९ ।। अथ मेरोरुत्तरतस्तस्याश्रयभूते कुमुदनाम्नि पर्वते विराजमानमतिसमुन्नतं वटवृक्षमभिविशालमतिवृद्धं स कौसल्यानन्दनो नृपसमूह- विराजितो जनकर्जायै दर्शयामास ।। १० ।। अथ मेरुपूर्वतस्तस्याश्रयभूते मन्दरपर्वते विराजमानमति- विशालमतिसमुन्नतमतिस्थूलं सहकारवृक्षमतिमनायं सुपक्कमधुरघटतुल्यफलभारविनम्रं पश्यन्म रघुवंशभूषणो जनकज ज निः ।। ११ ।। तत्रेलावृते विराजमानमरूपणोपास्यरुद्रोपासकः स रघुनायको दयितासहायः शिरसा प्रणनाम ।। १२ ।। तद्वर्षवासिनृपप्रबद्धकमलशिरोवंदितपदजलहृद्वरः स रघुनायकः पूर्वदिशमनुजगाम । १३ ।। अथ स गन्धमादनपर्वतं द्विसहस्रयोजनविपुलं चतुस्त्रिंशत्- हस्रयोजनदीर्घं नयनगोचरं चकार ।। १४ ।। अथ भद्राश्वं नाम पञ्चमं वर्षमेकत्रिंशत्सहस्रयोजनदीर्घं हयग्रीवोपास्यभद्राश्वोपासकसमधिष्ठितं स रघुनायक उपजगाम । १५ ।। तत्र कश्चित्संग्रामस्तद्वर्ष- विराजमाननृपसमूहैभ्यः कश्चिच्छरणागतप्रबद्धकरायुगलावर्तिपतिभ्यः स्वकरभारामत्समपाद स
तथा इतना ही हजार योजन लम्बा था, जिसपर अनेक प्रबन्नों के थान विद्यमान् थीं। जिसके ऊंचे-ऊंचे शिखर आकाशसे बात कर रहे थे ।। ३ ।। उसके आगे तीसरे वर्षमें गये, जो नृसिंह भगवान्के भक्त प्रह्लादका बसाया हुआ था । ४ ।। उस देशके राजाओंका बहुत संग्राम करके राम उनको परास्त करत हुए शत्रुओकी सम्पत्ति अपने अर्थ में करते सीतोके मार्गमें दिखाय उस देशके राजाओंके दिये हुए बहुत ही ध्वजा पताका, तोरण, घंटा और किंकिणीसे मण्डित पुष्पकविमानपर बैठकर आगे बढ़े ।। ५ ।। इसके अनन्तर दो हजार योजन विस्तृत तथा नौ हजार योजन लम्बा अति सुन्दर निषध नामक पर्वतको देखा ।। ६ ।। उसके आगे चारों ओर सुवर्ण पर्वतोसे परिवेष्टित इलावृत नामक चतुर्थ देशमें गये। जो चौवालिस हजार योजन लम्बा-चौड़ा था ।। ७ ।। वहाँ सीताको समग्र देशके दक्षिण ओर खूब ऊंच और अतिशय विशाल जम्बू-द्वीपको सूचित करनेवाले एक बड़े भारी जामुनके वृक्षको दिखाया । ८ ।। इसके अनन्तर पश्चिमकी ओर सुपार्श्व पर्वतपर बड़े भारी कदम्ब वृक्षको देखा, जो बहुत ऊँचा और पुष्पोंसे लदा हुआ था । ९ ।। इसके अनन्तर मेरुके उत्तर ओर कुमुद नामक पर्वतपर अतिशय विशाल अत्यन्त एक वटवृक्ष सीताको दिखाया ।। १० ।। मेरुके उत्तर ओर एक पासवाले मंदर पर्वतपर स्थित खूब लम्बे चौड़े, खूब पके तथा घटके बराबर फलोंसे लदे एक आम्रवृक्षको देखा ।। ११ ।। उस इलावृत्तमे वलरामोपासके पूज्य श्रीभगवन्तरुद्रको सीताके साथ रामने प्रणाम किया ।। १२ ।। उस देशके निवासी राजाओंने हाथ जोड़कर रामको प्रणाम किया और राम वहाँसे आगे पूर्व दिशाकी ओर बढ़े ।। १३ ।। तदनन्तर वे गन्धमादन पर्वतपर पहुंचे, जो दो हजार योजन चौड़ा तथा चौतीस हजार योजन लम्बा था ।। १४ ।। तदनन्तर भद्राश्व नामक पांचवें देशमें पहुंचे, जो एक-तीस हजार योजन लम्बा था और वहाँ हयग्रीवके उपास्य भद्राश्व भगवान रहते थे ।। १५ ।। उस देशके बहुतसे
सर्गः ८ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ५३३
सर्गः ८ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ५३३
जनकजाजानिरुपययौ पश्चिमाभिमुखः ॥ १६ ॥ अथ मेरोः पश्चिमदिक्संस्थितं माल्यवन्तं पर्वतं द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं चतुस्त्रिंशत्सहस्रयोजनदीर्घमतिक्रमणीयं स जनकजाजनो नयनगोचरं चकार ॥ १७ ॥ ततश्चिमनः केतुमालं नाम षष्ठं वर्षं एकत्रिंशत्सहस्रयोजनविस्तीर्णं चतुस्त्रिंशत्स- हस्रयोजनदीर्घं कामदेवोपास्यलक्ष्म्युपासिकाममर्षाणस्तमनोहरं स रामचन्द्रोऽनुजगाम ॥ १८ । तद्वर्षनृपसमूहमुकुटावतंसपरागपूजितचरणारविन्दयुगलः स रघुकुलदीपकः सीतया पुष्पकमण्डि- तमुदमाप ॥ १९ ॥ अथ मेरोरुत्तरतः स नीलपर्वतं द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं नवतिसहस्रयोजनदीर्घं रघुकुलतिलको नयनविषयं चकार । २० ॥ अथ रम्यकं नाम सप्तमं वर्षं नवसहस्रयोजनपरिमितं मत्स्योपास्यमनूणामकशियानमधितिष्ठितः स रघुनन्दन उपजगाम ॥ २१ ॥ तत्रत्यैर्नृपतिभिः स्वको- शादिपूजितः स रघुनायकः सीतां सुखयन् पुरतोऽनुससार ॥ २२ ॥ तस्योत्तरतः श्वेतपर्वतं द्विसहस्र- योजनविस्तीर्णमष्टाशीतिसहस्रयोजनदीर्घमतिक्रमणीयं स स्वलोचनविषयं चकार । २३ । अथ हिरण्मयं नामाष्टमं वर्षं नवसहस्रयोजनपरिमितं कूर्मोपास्यार्यमोपासक्रमधितिष्ठितमतिक्रमणीयं स समुपययौ । २४ ॥ तद्वर्षगामिन्नृपदंयित्ताभिरांगभूपप्रमपिजेन्यो द्वापि जानकीचरणारविन्दयुगलवीक्षमाणः स रघुनन्दनो मुदमाप ॥ २५ ॥ तस्योत्तरतः शृङ्गवन्तं पर्वत द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं त्रिसप्ततिसहस्र- योजनदीर्घं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ २६ ॥ अथोत्तरकुरुवर्षं नवमं नवसहस्रयोजनपरिमितं वाराहोपास्यभूम्युपासिकाममधितिष्ठितमनोहरं स रामचन्द्रस्तमनुययौ ॥ २७ ॥ तद्वर्षवासिकृत्स्न- पिताववन्नृपमदावनपमपिमुनकाविशिजपदनचरुहद्वंद्वः स रघुनायको मुदमाप । २८ ॥ अथ रामो लवं जम्बूद्वीपपतिं कृतियानीति निश्चित्य कियदद्दिनं तदधिकारे विजय नाम स्वमन्त्रिणं स्थापयामास ॥ २९ ॥ एतेषां जम्बूद्वीपांतर्गतवर्षाणां तथा मर्यादापर्वतनववर्षाणां यानि यानि नामानि
राजाओंके साथ साम संग्राम किया और बहुतोंका शरणम आ जानपर क्षमा प्रदान किया तदनन्तर शयन कर लेते हुए वहांसे लौटकर पश्चिम दिशाकी ओर बढ़े ॥ १६ । इसके बाद मह पर्वतके पश्चिम माल्यवान् पर्वतपर पहुंचे, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा चौंतीस हजार योजना लम्बा था ॥ १७ ॥ इसके आगे केतुमाल नामक छठ देशमें पहुंचे, जो इकतीस हजार योजन विस्तृत एवं चौंतीस हजार याजन लम्बा था और वहीं कामदेवकी उपासिकाएँ रहती थीं ॥ १८ जब उस देशके राजाओंने अपना मुकुटाभिमंडित मस्तक रामचन्द्रजीके चरणोंपर रख दिया तो सीता तथा रामको बड़ा प्रसन्नता हुई ॥ १९ ॥ फिर मेरु पर्वतके उत्तर ओर विराजमान नील पर्वतको देखा, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा नब्बे हजार योजन लम्बा था ॥ २० ॥ इसके अनन्तर रम्यक नामके सातवें देशमे पहुंचे, जो नौ हजार योजन विस्तृत था । वहीं मत्स्यभगवान्के बहुतस उपासक लोग रहा करते थे ॥ २१ ॥ वहाँके राजाओने अपना राज्यादि देकर रामकी पूजा की और रघुनाथजी सीताको प्रसन्न करते हुए आगे बढ़े ॥ २२ ॥ उनके उत्तर ओर रामने श्वेत पर्वतको देखा, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा इक्यासी हजार याजन लम्बा था ॥ २३ । इसके बाद हिरण्मय नामके आठवें देशमे पहुंचे, जहाँ अधिकांश कूर्म भगवान् तथा सूर्य नारायणक उपासक लोग रहा करते थे ॥ २४ ॥ उस देशके राजाओंकी स्त्रियोन सब जानकीक चरणोम मस्तक रखकर प्रणाम किया तो रामचन्द्रजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २५ ॥ उसक उत्तर दो हजार योजन विस्तृत तथा त्रिहत्तर हजार याजन लम्बा शृङ्गवान् नामक पर्वतको देखा ॥ २६ । इसके अनन्तर नवें देश उत्तर कुरुम पहुंचे, जो हजार योजन लम्बा-चौड़ा था । वहीं वाराह भगवान्के उपासक तथा भूमिकी उपासिका स्त्रियां रहा करती थीं ॥ २७ ॥ जब उस देशके राजे तथा प्रजाने भयसे कांपकर रामके चरणोंमें लोट गये, तब रामको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २८ ॥ इसके बाद रामने जम्बूद्वीपके राजाको मार डाला और मनमे यह निश्चय किया कि यहाँसे लौटकर अयोध्या पहुंचनेपर लवको जम्बूद्वीपका अधिपति बनाऊंगा। तबतक कुछ दिनोंके लिए अपने विजय नामके मन्त्रीको वहाँकी देख भाल करनेके लिए छोड़ दिया ॥ २९ ॥ जम्बूद्वीपके अन्तर्गत जितने राज्य थे, वे सब प्रियव्रत नामक राजाके पौत्रोंके नामसे प्रसिद्ध
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तानि प्रियव्रतनृपपौत्रनामसूचितानि सन्ति । तेषु ये ये नृपा जायन्ते ते तद्वर्णनामयुक्ता एव भवन्त्यतः सर्वेषां पृथक् नामानि मयाऽत्र नोच्यन्ते ॥ ३० ॥ एवं जम्बूद्वीपमायामविस्ताराभ्यां लक्षयोजनपरिमितमनिकपनीयं समवर्तुलं पुष्करपत्रोपमं नववर्षमण्डितं स रघुनायकः स्ववशं चकार ॥ ३१ ॥ मेरुपर्वताग्रेऽष्टपुर्योऽष्टदिक्पालानां संति । तन्पालकाः मुग्धाश्चाग्नियमनिर्रतिवरुणवायु- कुबेरेशास्ते सर्वे ममाज्ञां परिपालयन्विति निश्चित्य स रघुनायकस्मान प्रति जगाम ॥ ३२ ॥ ता अष्टपुर्यः पृथक् पृथक् सार्धद्विसहस्रयोजनपरिमाणेनायामविस्तारतो ज्ञातव्याः ॥ ३३ ॥ मेरुलक्षयोजनयुक्तो मूर्ध्नि द्वात्रिंशत्सहस्रयोजनविततो मूले षोडशसहस्रयोजनविततश्चाधः षोडश- सहस्रयोजनमितो भूम्यां प्रविष्टश्चतुरशीतिसहस्रयोजनमितो भूम्या बहिर्धतूरापुष्पवद्दृश्यते ॥ ३४ ॥ तत्र मेरुपर्वतग्रेऽष्टदिक्पुरीणां मध्ये ब्रह्मपुरी दशसहस्रयोजनायामविस्तारतो ज्ञातव्या ॥ ३५ ॥ सर्वे वर्षमर्यादीभूताष्टपर्वता दशसहस्रयोजनसमुन्नता ज्ञातव्याः । ३६ । वर्षदीर्घेना पर्वतासमाना ज्ञातव्या ॥ ३७ ॥ जम्बूद्वीपस्योपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशंति ॥ ३८ । सगरस्तनयानन्वेषण क्षां महीं परितो निखनद्भिरूपकल्पितान् ॥ ३९ ॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थः चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणकः मन्दरहरिणः पाञ्चजन्य सिंहलो लङ्का चेति ॥ ४० । तेषु लङ्कां विना मप्रसु यदा यद्यत्समीपं यदा तत्र तत्र गत्वा तत्तस्थानुपद्वीपपालकान् श्रीरामचन्द्रः स्ववशांश्चकार । ४१ । भारतेला- वृतवर्षाभ्यां विना सप्तसु वर्षेष्वसंख्याका नद्यो गिरयश्च संति । तेषां विस्तार को वक्तुं क्षमः ॥४२॥ अथैलावृतसंस्थिता मुख्यनद्य एवोच्यन्त । ४३ ।। अरुणोदाजंबुनदी पयोदसिधुमधुगुड़ान्नांबर- छाव्यासनाभरणसंज्ञा नदास्तदा पञ्च मधुधास्रान्वस्तथा सीताऽलकनंदाचक्षुर्भद्रेति मेरोरधश्चतुर्दिक्षु पतिता जाह्नवीभेदाश्चत्वार एवमिलावृतनद्यः ॥४४। तासु मीता पूर्वसमुद्रं चक्षुभद्रा पश्चिमसमुद्रं महोक्षगसमुद्रमलकनंदा दक्षिणस्यां दिशि शास्ते वर्ष जलनिधि प्रविशति ॥ ४५ ॥ भारतेऽस्मिन्
थे । जहाँका जो राजा था, उसीके नामसे वह राज्य विख्यात था। इसीलिये सबका अलग-अलग नाम मै नही बतला रहा हूँ ॥ ३० ॥ इस प्रकार एक लक्ष योजन लम्बा चौडा, अतिशय सुन्दर एवं वर्तुलाकार कमल- पत्रके समान विराजमान जम्बूद्वीपको उन्होंने जीत लिया ॥ ३१ ॥ मेरुपर्वतके आगे आठ दिक्पालोंकी आठ पुरियां है। वे सब भी मेरी आज्ञाका पालन करें। ऐसा विचारके रामचन्द्रजी आगे बढ़े ॥ ३२ ॥ वे आठों पुरियाँ अलग-अलग अढाई अढाई हजार योजन लम्बी चौड़ा है। मेरु पर्वत एक लाख योजन ऊँचा है और उसकी चोटीपर बत्तीस हजार योजन लम्बा चौड़ा मैदान है। नीचे सोलह हजार योजन विस्तृत है और सोलह ही हजार योजन वह पृथ्वीके भीतर समाया हुआ है चौरासी हजार योजनको लम्बाई चौड़ाईवाला यह पर्वत धतूरेके फूलकी तरह दीखता है ॥ ३३ ॥ ३४ मेरुपर्वतके आगे पूर्वोक्त आठ पुरियोंके ब्रह्मपुरीकी लंबाई- चौड़ाई विस्तारम ठीक दस हजार योजन है । ३५ ॥ जिन-जिन पर्वतोंपर वे आठों पुरियाँ हैं, वे प्रत्येक पर्वत दस-दस हजार योजन ऊँच हैं ॥ ३६ । प्रत्येक पुरीका विस्तार पर्वतके विस्तारकी तरह ही समझना चाहिए । ३७॥ जंबूद्वीपके भी आठ उपद्वीप हैं ॥३८॥ जिस समय महाराज सगरके साठ हजार पुत्र समुद्रको खोद रहे थे, तब उन्होंने ही इन द्वीपोंकी रचना की थी । ३९ । उन आठ द्वीपकि नाम इस प्रकार हैं स्वर्णप्रस्थ, चंद्रशुक्ल, आवर्त रमणक, मन्दरहरिण पाञ्चजन्य, सिंहल और लङ्का ॥ ४० ॥ इनमेंसे लङ्काको छोड़कर शेष सब द्वीपोंमें आकर वहांके राजाओंको रामने अपने वशम कर लिया । ४१ । भारत और इलावृतको छोड़कर सातो देशोंमें असंख्य पर्वत और नदियाँ है, जिनका विस्तार बतलाना कोई समर्थ नही है। ४२ । इलावृत द्वीपमें जो मुख्य मुख्य नदियाँ हैं, उन्हें ही हम बतलाते हैं। वे हैं-॥ ४३ ॥ अरुणीदा, जंबूनदी, दूध, घी, मधु गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन और आभरणसंज्ञक नदियां हैं, इनमें पाँच नदियाँ तो ऐसी हैं, जिनमें सदा मधुकी धारा बहती रहती है। मेरु पर्वतसे सीता, अलकनंदा, चक्षु, भद्रा तथा जाह्नवी ये पाँच नदियाँ निकली है
सर्गः ९ ] | राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) | ४३५
| सर्गः ९ ] | राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) | ४३५ |
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वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवः ॥ ४५ ॥ तद्यथा मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूटः ऋषभः कूटकः सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो वेंकटो महेंद्रो वारिधरो विंध्यः शक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरित्यन्ये च शतसहस्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च संत्यसंख्यताः ॥ ४७ ॥ चन्द्रवशा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावती तुंगभद्रा कृष्णा वेणा भीमरथी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी मही सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिंधुः शोणश्च नदौ महानदी वेदस्मृतिः ऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मंदाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रुश्चन्द्रभागा मरुद्वन्धा वितस्ता असिक्नी विश्वेति महानद्यः । ४८ । एवं शिष्य रघुनायको नायकः सोपदीपं जम्बूद्वीपं स्ववशं कृत्वा लक्षयोजनविस्तीर्णं जंबूद्वीपपरिखोपमं समुल्लंघ्य पुष्पकस्थः प्लक्षं नाम द्वितीयं द्वीपं ददर्श ॥ ४९ ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे पूर्वार्धे जंबूद्वीपजयो नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
( राम द्वारा प्लक्षादि छः द्वीपोंकी विजय )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामो ययौ श्रीमान् प्लक्षद्वीपं मनोरमम् । द्विलक्षयोजनमितं सप्तवर्षसमन्वितम् ॥ १ ॥
उपास्यो यत्र वै सूर्यो ब्राह्मणैश्च शुपामकाः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति प्लक्षवृक्षो हिरण्मयः । २ ॥
यथाऽऽरामाद्बहिर्नीयाः परिखाश्च समंततः । जंबूद्वीपाच्च क्षारोदोऽद्विद्व्रीपस्तथा त्वयम् ॥ ३ ॥
॥ ४४ ॥ उनमेंस सीता पूर्व समुद्रमें, चक्षुर्भद्रा पश्चिम समुद्रमें और अलकनन्दा दक्षिण समुद्रमें जाकर मिलती है ॥ ४५ ॥ भारतवर्षमें भी बहुत-सी नदियां और पर्वत हैं, ४६ ॥ मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिवर, विन्ध्य, शक्तिमान्, ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि ये पर्वत हैं। इनके अतिरिक्त और भी बहुत से पर्वत हैं, जिनकी तलैटीसे बहुतसे नद और नदियां निकली हैं। जैसे— ॥ ४७ । चन्द्रवशा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावती, तुङ्गभद्रा, कृष्णा, वेणा, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, तापी, मही, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती। सिंधु और शोण ये दोनों महानद हैं। वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद्वन्धा, वितस्ता, असिक्नी और विश्वा ये महानदियां हैं ॥ ४८ । हे शिष्य ! इस प्रकार उपद्वीपों समेत जम्बूद्वीपको अपने वशमें करके राम एक लाख योजन विस्तृत लवणसमुद्र, जो कि जम्बूद्वी पकी खाईके समान था उसे पार करके पुष्पक विमान द्वारा प्लक्ष नामके एक दूसरे द्वीपमे जा पहुंचे ॥ ४९ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते आनन्दरामायणे राज्यकांडे पूर्वार्धे अष्टमः सर्गः । ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—इसके बाद श्रीमान् रामचन्द्र अतिशय मनोरम प्लक्षद्वीपको गये, जो दो लाख योजन विस्तृत था और उसमे सात देश थे । १ ॥ वहां सबके आराध्य देवता सूर्य और देवाराधक ब्राह्मण थे। वहाँ सुवर्णका एक बड़ा-सा प्लक्ष (पाकड) का वृक्ष था और उस प्लक्षके ही कारण उसका प्लक्षद्वीप नाम पड़ा था ॥ २ ॥ जिस तरह किसी बगीचेके चारों ओर खाई बना दी जाय, ठीक उसी तरह उसको चारों ओरसे
४३६ आनन्दरामायणे • [सर्गः ९
मेरोः पूर्वदिशायां वै तत्र वर्षं शिवाङ्गकम् । आदौ ययौ रामचन्द्रः क्षणादेव विहायसा ॥ ४ ॥ नदी यत्राऽरुणा नाम्नी सर्वपापप्रणाशिनी । तस्यां स्नात्वा रघुश्रेष्ठः शीघ्रं तद्वर्षपं ययौ ॥ ५ ॥ तेन वर्षाधिपेनैव युद्धमासीत्सुदारुणम् । तं जित्वा पञ्चमासेंश्च तैश्च पार्थिवसत्तमैः ॥ ६ ॥ पूजितो रघुनाथस्तु वज्रकूटाचलं ययौ । वज्रकूटं महाश्रेष्ठं द्वयोः सागरयोः स्थितम् ॥ ७ ॥ परस्परं वर्षयोश्च सीमाभूतं ददर्श सः । तं गिरि पृष्ठतः कृत्वा वर्षं पयसमं ययौ ॥ ८ ॥ नुम्णानदीजले स्नात्वा ययौ यावयसेश्वरम् । तेन सम्पूजितो रामस्ततस्तद्वर्षपार्थिवैः ॥ ९ ॥ सहितः पुष्पकैनैवमुपेंद्रसेनपर्वतम् । दृष्ट्वा कृत्वा पृष्ठतस्तं सुभद्रं वर्षमाययौ ॥ १० ॥ अगौग्मींनदीतोये स्नात्वा स रघूनायकः । वर्षाधिपेन कोशैः संपूजितः पार्थिवैः सह ॥ ११ ॥ ज्योतिष्मन्तं गिरि गत्वा तं कृत्वा पृष्ठतः क्षणात् । शान्तिवर्षेश्च सावित्रानदीतोये विगाह्य च ॥ १२ ॥ तद्वर्षेशं नृपं जित्वा तथा तद्वर्षसंस्थितान् । नृपान् जित्वा क्षणादेव सुवर्णपर्वतं ययौ ॥ १३ ॥ ततो गत्वा क्षेमवर्षं सुप्रभातानदीजले । स्नात्वा रामः क्षेमपेन स्वकोशैः परिपूजितः ॥ १४ ॥ हिरण्यग्रीवनामानं गिरि रम्यं विलंघ्य च । वयऽमृते तन्नृपेण पार्थिवैः परिपूजितः ॥ १५ ॥ ऋतंभरानदीतोये चकार स्नानमादरात् मेघमालं गिरि त्यक्त्वा पृष्ठतः पुष्पकेण हि ॥ १६ ॥ वर्षेऽभये तन्नृपतिं क्षणाञ्जित्वा रणे प्रभुः । सत्यधरानदीतोये स्नात्वा स रघूत्तमः ॥ १७ ॥ सुचंद्राख्यं नृपं प्लक्षद्वीपेशं तीक्ष्णसङ्गरैः । कृत्वा तं स्वपदाक्रान्तं तेन तद्द्द्दीपपार्थिवैः ॥ १८ ॥ मणिष्टूटं गिरिवरं समातिक्रम्य वै क्षणात् । इक्षुरसोदनामानं द्विलक्षयोजनं वरम् ॥ १९ ॥ तीर्त्वा तं सागरं भीमं प्लक्षस्य परिखोपमम् । तथा च शाल्मलीद्वीप चतुर्लक्षमितं ययौ ॥ २० ॥ द्वीपस्तुरूपवान्कुत्र यत्रास्ति शाल्मली द्वीपपादपः । यत्रोपास्थ्यश्च सोमोऽस्ति तत्रस्थास्तदुपासकाः ॥ २१ ॥ विस्तारद्दीपमानानि दीर्घतायाः स्मृतानि च । तत्र क्रमेण वर्षाणि कथ्यते पूर्ववन्मया ॥ २२ ॥
लवण समुद्र घेरे हुए था। ३ ॥ मंदरपर्वतकी पूर्व ओर प्लक्षद्वीपमें शिवाङ्कक नामका एक देश था। रामचन्द्रजी क्षणमात्रमें आकाशमार्गसे वहाँ पहुंचे। ४ ॥ वहाँपर सब पापोंका नाश करनेवाली अरुणा नदी बहती थी। जिस-में उन्होंने स्नान किया और उस देशके राजाके पास गये। ५ ॥ उस राजाके साथ रामका भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच महीनेतक घमासान युद्ध होनेके पश्चात् वहाँका राजा रामके वशमें आ गया और उसने उनकी पूजा की ॥ ६ ॥ फिर वहाँसे वज्रकूटाचलपर गये। वह पर्वत दो सागरोंके बीचमें स्थित होकर दोनों देशोंकी सीमा-का काम कर रहा था। उसको लाँघकर पयसम नामक देशको गये ॥ ७॥८॥ वहाँ उन्होंने नुम्णा नदीमें स्नान किया और थवयस देशवाले राजाके पास गये। उसने रामकी पूजा की। इसके बाद रामने वहाँके भी बहुतसे राजाओंको अपने पुष्पक विमानपर बिठा लिया और आगे उपेन्द्रसेन नामक पर्वतपर पहुंचे। उसे देखकर वे सुभद्र देशको गये। ९॥ १०॥ वहाँ आगस्तं नदीमें स्नान करनेके पश्चात् वहाँके राजासे मिले। उसने बहुतसे धनका व्यय करके रामचन्द्र तथा उनके साथवाले राजाओंका सत्कार किया। ११ ॥ फिर ज्योतिष्मान् नामक पर्वतको लाँघकर वे शान्तिदेशको गये। वहाँ सावित्री नदीमें स्नान करके उस देशके राजाको परास्त किया और उसके आगे सुवर्ण पर्वतपर गये। वहाँसे क्षेमदेशमें पहुंचे। वहाँ रामने सुप्रभाता नामकी नदीमें स्नान किया और क्षेमदेशके राजाने रामका विधिवत् पूजन किया ॥ १२-१५ ॥ इसके अनन्तर ऋतंभरा नदीमें स्नान करके मेघमाल नामके पर्वतको लाँघते हुए राम अभय देशमें पहुंचे। वहाँके राजाको क्षणमात्रमें जीतकर सत्यधरा नदीम स्नान किया। फिर सुचन्द्र नामक राजा जो प्लक्षद्वीपका शासक था उसे भयानक युद्धमें हराकर वहाँके बहुत-से राजाओंको अपने साथ लेकर इक्षुरसोद नामके भयंकर समुद्रको पार किया। वह प्लक्षद्वीपकी खाईके समान दो लाख योजन विस्तृत था। वहाँसे चलकर शाल्मली द्वीपमें पहुंचे, जो चार लाख योजन विस्तृत था। १६-२० ॥ वहाँ एक विशालका शाल्मली (सेमर) का
सर्गः ९] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४३७
मेरोः पूर्वदिशामारभ्य सर्वत्र क्रम उच्यते सुलोचनं सौमनस्यं तथा रम्यकं शुभम् ॥२३॥
देववर्षं पारिभद्रमाप्यायनमनुत्तमम् । अविज्ञातं सप्तमं च सप्त वर्षाणि वै क्रमात् ॥ २४॥
अनुमती सिनीवाली तथैव च सरस्वती । कुहूश्च रजनी नन्दा च राका नद्यः प्रकीर्त्तिताः ॥२५॥
शतशृङ्गो वामदेवो कुन्दश्च कुमुदस्तथा । पुष्पवर्षः पदभ्रश्च सहस्रश्रुतिनभसः ।२६॥
स्वरसः पर्वता सप्त ज्ञेयाः सीमासु वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु वर्षपानान् विजित्य सः ॥२७॥
जित्वा द्वीपेश्वरं रामः सुबाहुं मुदमभ्ययात् । सुरोदं च चतुर्लक्षमितं तीर्त्वा पयोनिधिम् ॥२८॥
कुशद्वीपं महालक्षमितं रामो ययौ क्षणात् । तत्रोपास्यो जातवेदाः सर्वेषां द्वीपवासिनाम् ॥२९॥
द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति कुशस्तम्बः सुरैः कृतः । तत्र क्रमेण वर्षाणि कीर्त्यन्ते सप्त वै मया ३०॥
बर्भू च वसुदानं च तथा दृढरुचिं शुभम् । नाभिगुप्तं तथा सत्यव्रतं विविक्तमत्तमम् ॥३१॥
वामदेवं सप्तमं च वर्षं ज्ञेयं क्रमेण हि । मस्कुल्या मधुकुल्या मित्रविंदा नदी शुभा ॥३२॥
श्रुतिविंदा देवगर्भा तथा चैव धूतच्युता । मंत्रमाला क्रमाद्य नद्यः सप्तसु वै क्रमात् ॥३३॥
वतुःशृङ्गः कपिलाश्चित्रकूटो मनोरमः । देहानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविणश्चक्र ईरितः ॥३४॥
एते सीमासु वर्षाणां गिरयः सप्त वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु मन्त्रितान्वार्थिवोनभान् । ३५॥
राघवः समरे जित्वा लब्ध्वा चानुत्तमं यशः । कुशद्वीपपतिं जित्वा महासेनं तुतोष सः । ३६॥
अष्टलक्षमितं तीर्त्वा घृतोदं सागश्रोत्तमम् । क्रौञ्चद्वीपं ययौ रामः पुष्पकेणातिभास्वता । ३७।
कुशद्वीपाच्च स ज्ञेयो द्विगुणो द्वीप उत्तमः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति क्रौञ्चनामा गिरिर्महान् । ३८॥
यत्रोपास्योऽस्मयो देवो हविष्मद्वीपवासिनाम् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंतेऽथ क्रमेण हि ॥३९॥
शामं मधुरूहं मेघपृष्ठं चैव मनोहरम् । सुभ्रमानं च भ्राजिष्ठ लोहिताणं वनस्पतिम् ॥४०॥
युक्त था। इसीलिए वह देश शल्मली द्वीपके नामसे विख्यात था वहाँ चन्द्रदेव सब के आराध्य देवता हैं और वहाँके निवासी चन्द्रमाकी ही उपासना करते हैं। पीछे जिन द्वीपोंका जो विस्तार कह आये हैं, उन्हींके अनुसार यह भी विस्तृत था, वहाँके जो देश हैं, अब उनको बतलाता हूँ ॥ २१ ॥ २२ ॥ मेरुके पूर्व ओरसे लेकर क्रमशः सब देशोंका नाम कहूँगा। जैसे—सुलोचन, सौमनस्य, रम्यक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात ये सात देश उस द्वीपमें हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ वहाँपर अनुमती, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका ये नदियाँ हैं ॥ २५ ॥ शतशृङ्ग, वामदेव, कुन्द, कुमुद, पुष्पवर्ष, सहस्रश्रुति और स्वरस ये उस देशके सात पर्वत हैं जो उसकी सीमाका काम कर रहे हैं। इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीत लिया ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके अनन्तर उस द्वीपके अधीश्वरको जीतकर चार लाख योजनके लगभग लम्बे-चौड़े सुरोदसमुद्रको लाँघकर वे सुबाहुके पास पहुँचे ॥ २८ ॥ फिर क्षणमात्रमें राम आठ लाख योजन विस्तृत समुद्रको लांघकर कुशद्वीप गये । उस द्वीपके समस्त निवासी अग्निके उपासक हैं ॥ २९ । द्वीपके नामका स्पष्ट करनेके लिए वहाँपर एक कुशका जंगल देवताओं द्वारा लगाया हुआ है। अब वहाँके जो सात देश हैं, उनको बतलाते हैं— ३० । बभ्रु, वसुदान, दृढरुचि, नाभिगुप्त, सत्यव्रत, विविक्त और सातवाँ वामदेव नामक देश हैं। उन सातों देशोंमें मस्कुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतिविन्दा, देवगर्भा, धूतच्युता तथा मन्त्रमाला ये सात नदियां हैं, बभ्रु शृङ्ग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा, द्रविण और चक्र ये सात पर्वत उस द्वीपमें हैं ॥ ३१-३४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीतकर कुशद्वीपके अधिपति महासेन नामक राजाको उन्होंने जीत लिया। इससे रामको प्रसन्नता हुई । ३५ ॥ ३६ ॥ फिर आठ लाख योजन विशाल घृतोद सागरको पार करके वे अपने देदीप्यमान पुष्पक विमान द्वारा क्रौञ्चद्वीप गये ॥ ३७ ॥ कुशद्वीपकी अपेक्षा यह द्वीप दूना लम्बा-चौड़ा है। वहाँ उस द्वीपका नाम सार्थक करनेके लिये एक विशाल क्रौञ्च पर्वत है ॥ ३८ ॥ वहाँके समस्त निवासी वरुणके उपासक हैं और विष्णुभगवान्
[४३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ९
एतानि सप्त रूपाणि कृतवानुरुशक्तिभिः । वर्धमानो भोजनश्च तथोद्बर्हणो महान् ॥४१॥ नन्दश्च नन्दनश्चैव सर्वतोभद्र एव च । शुक्लाभ्रभाश्चलाः प्रोक्ता मण्डलायुः परन्तः शुभाः ॥४२॥ अमृता अमृतौघा च तथा वैरम्भिरामथा । ज्योतिष्मती रम्या वृष्टिरूपवती तथा ॥४३॥ पवित्रवन्ता सुपुण्या द्वे शुकोक्तं मत्र कीर्तिताः । सप्तद्वैपेषु नद्यश्च स्नानात्पातकनाशनाः ॥४४॥ एतेषु सप्तवर्षेषु पार्थिवेभ्यो निजं प्रभु । कन्यारत्नं मुदाऽऽच्छाद्य तैः सर्वैः परिपूजितः ॥४५॥ क्रौञ्चद्वीपपतिं युद्धे जित्वा तु शङ्खलोचनम् । हयकुञ्जररथतुरगं कोषाद्यैस्तेन पूजितः ॥४६॥ स्तुतो मागधवृन्दैश्च नितरां मुदमाप सः । ततस्तीर्त्वा तु क्षीरोदं क्रौञ्चद्वीपसमं मुदा ॥४७॥ शाकद्वीपं ययौ रामो द्वात्रिंशल्लक्षममितम् । द्वीपरूप्याक्रुञ्चयत्रास्ति शाकवृक्षोऽतिरङ्गनः॥४८॥ यत्रोपास्यो वायुरूपी हरिनिरुद्धापनाभिमान् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंते पूर्वजन्मना ॥४९॥ पुरोजवं नाम वर्षं तथा तच्च मनोजवम् । पवमानं महच्छुद्धं धूम्रानीकं मनो मयम् ॥५०॥ बहुरूपं चित्ररूपं विद्याधारं तथा स्मृतम् । एवं सप्तसु वर्षेषु नद्यश्चापि ब्रवीम्यहम् ॥५१॥ अनघा च तथाऽऽयुर्दा चोभयसृष्टिश्च वै तथाऽपराजिता पुण्या शुभा पञ्चपदी स्मृता ॥५२॥ सहस्रश्रुतिरन्या सा प्रोक्ता निजवृत्तित्तथा । एव सप्तसु वर्षेषु सप्त नद्यः शुभानहाः ॥५३॥ उरुशृङ्गो बलभद्रस्तथाऽन्यः शतकेसरः । सहस्रस्रोतोऽन्य प्रोक्तो देवपालो महानमः ॥५४॥ ईशानाः पर्वताः सप्त सीमाम्ध्येते प्रकीर्तिताः । एवं सप्तसु वर्षेषु तत्र तत्र नृपोत्तमैः ॥५५॥ पूजितो रघुनाथः स शाकद्वीपपतिं रणे । सुन्दरारव्यं नृपं युद्धे सप्ताहोभिर्महाबलम् ॥५६॥ जित्वा स्पृ जनस्तेन वादयाम स दुन्दुभीम् । तीर्त्वा तं दधिमण्डोदं द्वात्रिंशल्लक्षसस्मितम् ॥५७॥ चतुःषष्टिलक्षमितं पुष्करद्वीपमाययौ । मेखलावत्तस्य मध्ये पर्वत चक्रपोपमम् ॥५८॥ मानसोत्तराचलाख्यं तं ददर्श रघूद्वहः । द्वे वर्षे तत्र वै प्रोक्ते पूर्वं रमणकं शुभम् ॥५९॥
वह्निके देवता हैं । उस द्वीपमें भी बड़े-बड़े सात देश हैं । उन बनतांन है—॥३९॥ आम्र, मधुष्ट, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, व्यतिहाय और वनस्पति । ४०॥ ये सा कौंचद्वीपके सात देश हैं वर्धमान, भोजन, उपवर्हण, नन्द नन्दन, सर्वतोभद्र और शुक्ल ये सात स्थिर रहने वाले शोभन इस द्वीपको घेरे हुए हैं । ४१ ॥ ४२ ॥ अमृता, अमृतौघा, आरंभा, सुवर्णा, वृष्टिरूपवती, पवित्रवती और पुण्या ये पवित्र नदियां उन सातो देशामें बहती हैं। जिनम स्नान करनस समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंसे रामनं कन्या-रत्नोंको प्राप्त किया और उन राजाओंने रामकी पूजा की ॥ ४५ । तत्पश्चात् रामने क्रौञ्चद्वीपके अधीशमको संग्रामभूमिमें परास्त किया और उनपर प्रसन्न होकर, घोड़े, रथ, ऊंट आदिका उपहार पाकर पूजित हुए ॥ ४६ ॥ स्तुतिपाठकजनोंके द्वारा कीर्तिगायन सुनकर रामचन्द्रजी परम प्रसन्न हुए इसके बाद क्षीरोदनामक समुद्रको पार करके क्रौञ्चद्वीपके समान ही बत्तीस लाख योजनक लगभग विस्तृत शाकद्वीपमें गये। जहाँपर द्वीपके नामकी भाँति वटवृक्षके समान बहुत बड़ा ही सुन्दर शाकवृक्ष है । ४७-४८ ॥ वहाँपर वायुरूप धारण करनवाले विष्णुभगवान्के उपासक रहते हैं । उस द्वीपके जो सात देश हैं, उनको कह रहा हूँ ॥ ४९ ॥ पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररूप, बहुरूप और विद्याधार ये ही सात देश हैं। अनघा, आयुर्दा, उभयसृष्टि, अपराजिता, पञ्चपदी, सहस्रश्रुति तथा निजवृत्ति ये नदियाँ उन सातो देशामें बहती हैं। उरुशृङ्ग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल, महानस और ईशान ये सात पर्वत इन देशोंकी सीमापर स्थित हैं। उन सातों देशोंके राजाओंने रामका पूजाकी और सुन्दर नामक महाबली अर्द्धस्वरयसे उन्होंने सात दिन पर्यन्त युद्ध करके हरा दिया ॥ ५०-५६ ॥ इसके बाद उसन भी रामकी पूजा की । रामके इस मनुष्यसे प्रसन्न होकर देवताओंने दुन्दुभी बजायी । तत्पश्चात् बत्तीस लाख योजन विस्तृत दधिमण्डोद नामक समुद्रको पार करके चौसठ लाख योजन विस्तृत पुष्करद्वीपमें पहुंचे, जिसके मध्यमे मेखलाके समान मानसोत्तर
सर्गः ९ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) २३९
अपरं तद्गतञ्चैतत्स्वरूपान्नं ते कङ्कणोपमम् तद्वर्षपौ नृपौ जित्वा ततो द्वीपेश्वरं नृपम् ॥ ६०॥
उत्तराङ्गाह्वयं रामः परां मुदमवाप सः । ददर्श पुष्करं तत्र द्वीपसंज्ञाकारकं वरम् ॥६१॥
कमलासनम्य यज्ज्ञेयं ब्रह्मणः परमासनम् तत्र कूर्म्ममयं लिंगं ब्रह्मलिंगं जनोऽर्चयत् ॥६२।
वर्षयोर्बहुला नद्यः पापहन्त्रीरुनत्तमाः दशलक्षप्रमानेन प्रागुत्तंगः स पर्वतः ॥६३॥
तस्मिन् गिरी पूर्वभागे पुरी मद्यवतः शुभा । देवभाविति नाम्ना सा मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६४॥
गिरीतस्मिन् दक्षिणस्यां दिशि संयमनी पुरी। यमराज्ञस्य सा ज्ञेया मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६५॥
पश्चिमे वरुणस्याथ पुरी निम्लोचनी स्मृता । उत्तरस्यां तु कौबेरी पुरी ख्याता विभावरी ॥६६।
भिन्नाः पुर्य्यस्तिस्रो ज्ञेया मेरुश्याभ्यः शुभावहाः यथा नृपस्य स्थानानि ह्यनेकानि महीनिभाः ॥
सर्व्वे सीमापर्वतास्ते विस्तीर्णाश्च पृथक स्मृताः । द्विसहस्रैर्योजनैश्च प्राञ्चस्तां ते वदाम्यहम् ॥६८॥
सर्व्वेषां दशलक्षैश्चयोजनैः प्रोच्यते, नृप । उत्सर्गा वां तु शुद्धोदं पुष्करद्वीपममितम् ॥६९॥
सीतायाः कौतुकार्थं हि स जगाम ०धुजमः । उद्गगं व्याहलोकान्तस्त्यानां नृणामपि ॥७०॥
ततोऽग्रे भूमिं सार्द्धमसलक्षोत्तरमर्ककोटि ( १५७५०००० ) परिमितां कंचिन्न प्राप्तिसहितां रघुनन्दनो ददर्श । ७१। तैः सर्वभूमिभिनिवासिभिः सुपूजितो रघुनन्दनो मैथिलीरंजनार्थमग्रे जगाम ॥ ७२ ॥ मेरुमन्दारोन्त्यसमपञ्चशताधिकं सार्द्धकोटि ( १५७५००० ) योजनपरिमितं मेरुमान-मान्गवलयान्तरंगले भन्न ज्ञात्वेयम् ॥७३ । ततोऽग्रे आदर्ष तापनां काञ्चनीं भूमं देवैर्यधिष्ठितां चैकोनचत्वारिंशल्लक्षोत्तरकोट्यष्ट ( ८३९००००० परिमिमां दृष्ट्वा देवैः संपूजितः श्रीरामचन्द्रो मुदमवाप ॥ ७४ ॥ ततोऽग्रे लोकालोकपर्वतं सार्द्धद्वादशकाट ( १२५०००००० ) परिमितं विस्ती-र्णावत्तया भूमिप्राकारोपमं केनाप्यनलङ्घयं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ ७५ ॥ यस्मिंश्चतसृदिषु द्विरदप-तयः ऋषभः पुंडरीकः पुष्पदन्तः कुमुदो वामनः पृषदन्तःउपराजितः सुप्रतीक इत्यष्टौ दिग्गजाः
पर्वत विद्यमान है, उसे रामने देखा । उस द्वीपका प्रथम देश — पहला मण्डल देश और दूसरा घातकी ये दोनों देश उस द्वीपके कङ्कणके समान । रामने उन देशोके राजाओ तथा पुष्करद्वीपके स्वामी उत्तराङ्गको जीत लिया, जिससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । इसके अनन्तर उस द्वीपके नामको सार्थक करनेवाले पुष्कर सरोवरको देखा ॥ ५७-६१ ॥ कमलका एक मात्र आसन है। यहाँपर कूर्ममय ब्रह्माकी मूर्त्तिका लोग पूजते हैं ॥ ६२ ॥ उन दोनों देशों में बहुत-सी पाप हरनेसमर्थ बहुत-सी नदियाँ बहती हैं। यह पर्वत दस हजार योजनके लगभग ऊंचा है। इसके पूर्व भागपर इन्द्रकी देववतीपुरी है। पश्चिम ओर वरुणकी निम्लोचनी नामकी पुरी । ... ... उत्तरमें कुबेरकी कुबेरीपुरी है ॥ ६३-६६ ॥ मेरु पर्वतपर इन्द्रादिकोंका जो पुरी ... ... ... स्थान वह है। जैसे राजाके एक देशमें अनेक स्थान होते हैं, उसी तरह इनके विषयमें भी जानना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥ सबवे सब आपसमें जितने सीमापर्वत हैं। वे सब अलग-अलग दो हजार योजन ऊंचे हैं। इस तरह सब मिलाकर दस हजार योजन उनकी उंचाई है। इसके बाद रामचन्द्रजी शुद्धोद समुद्रको पार करके सीताके कौतुक या यह कहिये कि उस द्वीपके निवासियांको अपने दर्शन देनेके लिये आगे बढे ॥ ६९-७० ॥ डेढ करोड अडतालीस लाख योजन विस्तृत भूभाग ऐसा है कि जिसको रघुनन्दन श्रीरामजीने देखा ॥ ७१ ॥ वहाँके निवासिगण सीतारामकी पूजा की और ये लोग आगे बढ गये ॥ ७२ ॥ मेरु और मानसलोचनाके बीचमें डेढ करोड साढे सात लाख एकचालीस हजार योजन परिमित अन्तरकाल है इसके अनन्तर दर्पणके शीशेके समान चमकती कांचनमयी भूमि देखी जहाँ कि देवता लोग रहते हैं। जिसका विस्तार आठ करोड़ उनतालीस लाख योजन है। वहाँके भी निवासियोने रामकी पूजा की और वे प्रसन्न हुए । इसके अनन्तर साढ़े बारह करोड़ योजन परिमित विस्तीर्ण तथा ऊंचे लोकालोक नामक पर्वतको देखा, जिसे कि आजतक कोई नहीं लांघ सका है ॥ ७३-७५ ॥ जहाँकी
४९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
सकलाकाशावस्थानहेतवः ॥ ७६ ॥ तस्मिन्नेव गिरिवरे भगवान् परममहापुरुषो महाविभूतिपतिः सकललोकहिताय आस्ते । ७७ । ततः परस्ताद्योगेश्वराणां विशुद्धामुदाहरन्ति ॥ ७८ ॥ एव पञ्चा- शत्कोटिगुणिता भूगोलोऽयं ज्ञेयः । ७९ ।। एवं पञ्चविंशतिकोटिमितां भूमिं लोकालोकमध्यवर्तिनीं स रघुनन्दनः स्ववशां कृत्वाऽऽकाशपथा परिक्रम्य सर्वान् द्वीपान् पूर्ववत्पश्यन् जंबुद्वीपं भारत- वर्षमध्यगतां स्वां राजधानीमोध्यां सप्तद्वीपेश्वरैः परिवेष्टितोऽनुययौ । ८० । ततो रामोऽयोध्या- निकटं गत्वा दूतैः स्वागमनं सुमंत्रं सूचयामास । ८१ । समायातं रामचंद्रं श्रुत्वा स मंत्रिसत्तमः । अयोध्यां भूषयामास पताकाध्वजतोरणैः । ८२ । वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य पौरैर्जानपदैः सह । प्रत्युद्गम्य रामचन्द्रं नत्वाऽयोध्यां निनाय सः । ८३ । तदा निनेंदुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । तुष्टुवुर्मार्गधाद्याश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । ८४॥ रामागमनमाकर्ण्य पौरनार्यः सुलंकृताः । प्रासादाजिरमारूढा ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ८५॥ राजद्वारं विमानेन शनैः स रघुनन्दनः । गृह्णन् पौरौपायनानि स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ॥ ८६॥ ययौ यानादवरुह्य सभायां निज आयतः । तस्थौ समन्ततः सर्वैर्नृपैश्च परिवेष्टितः । ८७॥ दत्त्वा स्थलानि सर्वेषां वस्तुमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । दक्षिणाद्यादि सम्पाद्य कृतकार्यममन्यत ॥८८॥ आत्मानं सकलान्पृथ्वीस्थितान् जित्वा समुद्धतान् । ततस्तैः सप्तद्वीपस्थैः पार्थिवैः परिपूजितः ॥८९॥ रामः स्वभ्रातरं विप्रेर्मंत्रं भारताधिपम् । चकार पार्थिवैर्युक्तं लक्षणानुमतेन सः ॥ ९०॥ आदावेव वसिष्ठेन ह्युक्तं भरतनाम तत् । विचिंत्येदं भावि वृत्तं जातकर्मणि निश्चितम् । ९१॥ पूर्वमाज्ञापितं स्वाप्तसेवकं भरतस्य च । रक्षणे तं रामचन्द्रः कार्यान्तरमकल्पयत् । ९२॥
चारों दिशाओंमें ऋषभ, पुण्डरीक, पुष्करचूड, कुमुद, वामन, मुखदन्त, अपराजित और सुप्रतीक ये सभी लोकोंको अपने सिरपर धारण करनेवाले आठ दिग्गज विद्यमान हैं । ७६ । उसी पर्वतके ऊपर परममहा- पुरुष और महाविभूतिपति भगवान् समस्त संसारके हितकी कामनामे वास करते हैं ॥ ७७ । इसके आगे विशुद्ध योगेश्वरोकी ही गति है, ऐसा लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥ इस प्रकार सब मिलाकर पचास करोडगुना विस्तृत भूगोल है उनमेंसे पचीसको अपने वशमे करके राम आकाशमार्गसे लौटकर सम्विक विविध द्वीपो- को देखते हुए जम्बूद्वीपके भारतवर्षमध्य अयोध्या नामकी अपनी राजधानीमे सातो द्वीपोके राजाओोके साथ वापस आये ।७९-८१। अयोध्याके समीप पहुँचकर रामने एक दूत द्वारा सुमन्त्रको अपने आगमनकी सूचना दी । सुमंत्रने रामका आगमन सुना तो पताका, ध्वजा तथा तोरणादिकसे अयोध्याको सज्जित करवाया । ८२ ॥ फिर एक बडे भारी हाथीको आगे करके पुरवासी लोगोंके साथ रामके समक्ष पहुंच और उन्हें प्रणाम करके अयोध्या लाये ॥ ८३ । उस समय अनेक प्रकारके बजे बाजे अप्सराएं नाचीं गायकोने गाने गाये और बन्दीजनोंने स्तुति की । ८४ । रामका आगमन सुनकर अयोध्याकी स्त्रियां भांति-भांतिके वस्त्राभरण पहनकर अपने कोठोंपर चढ गयीं और वहाँसे फूलोंका वर्षा करने लगीं । ८५ । रामचन्द्रजी धीरे-धीरे पुरवासियोंकी भेटें स्वीकार करते हुए पुष्पक विमान द्वारा अपने राजद्वारपर पहुंचे। रास्तेम स्त्रियोने रामकी आरती उतारी ॥ ८६ ॥ राजद्वारपर पहुंच ता पुष्पक विमानसे उतरकर सभाभवनमें गये और अपने सिंहासनपर बैठे । उनके साथ जो राजा आये थे, वे भी सिंहासनके चारो ओर बैठ गये ॥ ८७ ॥ इसके अनन्तर सब मेहमानोंको ठहरनेके लिए स्थान बतलानेके निमित्त लक्ष्मणसे कहकर राम दक्षिणाद्यादि कार्योंमें लग गये, इस प्रकार पृथ्वीपर रहनेवाले उद्दण्ड राजाओका परास्त करके रामने अपनेको कृतकृत्य समझा। इसके अनन्तर उन सातो द्वीपके राजाओने फिरसे रामकी पूजा की ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तदनन्तर लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामने भरतको भारतवर्षका अधिपति बना दिया ॥ ९० ॥ इस भावी बातको सोचकर ही वसिष्ठने भरतका नाम भरत रक्खा था ॥ ९१॥ पहले जिस सेवकको रामचन्द्रजीने भरत देशकी रक्षाके
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
जम्बुद्वीपपतिं रामश्चकार स्वसुतं लवम् । लवोऽपि विजयं स्वीयसचिवं चाकरोन्मुदा ॥९३॥ नवस्वपि च वर्षेषु यातायातं पुनः पुनः। चकार विजयेनैव पुनः कार्यार्थमादरात् ॥९४॥ शत्रुघ्नो यौवराज्ये स्वे भरतेनाभिषेचितः । यौवराज्यपदे स्वेऽपि कृत्वा रामः कुशं सुतम् ॥९५। चकार लक्ष्मणं मुख्यं सचिवेषु सुमन्त्रणम्। सप्तद्वीपपतिः श्रीमान्स्वयमासीद्रघूत्तमः ॥९६॥ स्वस्वकार्येषु सर्वे ते रामन् तत्परमानसाः । ततः सर्वांन्नृपान्पूज्य ददावाज्ञां रघूद्वहः ॥९७॥ ततस्ते राघवं न्त्वा ययुः स्वं स्व स्थलं मुदा । ततो भारतवर्षस्य परामर्शं सदा मुदा ॥९८॥ चकार भरतः श्रीमान् भरताधिपतिः प्रभुः । जम्बुद्वीपपरामर्शं च पकार लवस्तथा ॥९९॥ सप्तद्वीपपरामर्शं रामचन्द्रः कुशेन च । लक्ष्मणेन सहैवासि स्वयमेवाकरोत्प्रभुः ॥१००॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे कुशादिषड्द्वीपविजयदर्शन नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ।
दशमः सर्गः
( रामका संन्यासी, शूद्र तथा गृध्रको दण्डदान )
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवः सारमेयदीर्घारवं मुहुः । राजद्वाराद्बहि श्रुत्वा सभास्थो दूतमब्रवीत् ॥१॥ कथं दीर्घस्वरेणैव श्वाऽद्य क्रोशति पश्यताम् । तथेति रामदूतोऽपि गत्वा राजसभाद्बहिः ॥२॥ न्यवारयत्सारमेयं राजद्वारात्स्वधर्षणैः । रामं नत्वाऽब्रवीद्वाक्यं तूष्णीं श्वा क्रोशति प्रभो ॥३॥ मया निवारितो दूरं गतः स राक्षसान्तक । ततो द्वितीयदिवसे तच्छब्दान् राघवोऽशृणोत् ॥४॥ दूतेन पूर्ववच्चापि सारमेयो निवारितः । ततस्तृतीये दिवसे तद्रावानशृणोत्प्रभुः ॥५॥ तदाविस्मितः प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् । श्वाऽयं दिनत्रयं बन्धो कथं क्रोशति संततम् ॥६॥
लिए नियुक्त किया था, उसे दूसरे काममें लगा दिया ॥ ९२ । इसके अनन्तर अपने लव नामक वंटको जंबूद्वीपका अधिपति बनाया लवने विजय नामके उस सेवकको मंत्री बना दिया, जिसे कि रामचन्द्रजीने कुछ दिन तक भरतखण्डको देखभाल करनेके लिए नियुक्त किया था । ९३॥ उस विजयके साथ कार्यवश नवों द्वीपोंमें बराबर आवा-जाया करते थे । ९४ । भरतने अपनी जगह शत्रुघ्नका युवराजपदपर अभिषेक कर दिया । रामने कुशको युवराजके पदपर अभिषिक्त करके लक्ष्मणको अपना सर्वश्रेष्ठ मन्त्री बनाया । किन्तु सातो द्वीपोंके अधिपति राम स्वयं थे ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ ये सब लोग अपने कार्योंको बड़ी तत्परताके साथ निभाते थे। इसके अनन्तर रामने साथ आये हुए राजाओंको अपने देश जानेका आज्ञा दी ओर वे रामचन्द्रजीको प्रणाम करके अपने-अपने देशको चल गये । ९७ ॥ भारतवर्षका शासन भरतजी प्रसन्नतापूर्वक करते थे। जंबूद्वीपका शासन लव करते थे और भरत, कुश तथा लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामचन्द्रजी सातों द्वीपोंका शासन कर रहे थे ॥ ९८-१०० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ।
श्रीरामदास कहने लगे—एक समय रामचन्द्रजी सभामें बैठे थे । सहसा कई वार एक कुत्तेके रोनेकी आवाज सुनी तो दूतसे बोले- १ ॥ देखो तो इतने ऊंचे स्वरमें कुत्ता क्यों चिल्ला रहा है। रामके आज्ञानुसार दूत कुत्तेके पास गया । उसे धमकाकर वहाँसे हटा दिया और रामसे जाकर कहा—हे राक्षसान्तक ! उसे मैने दूर भगा दिया है, अब वह नहीं चिल्लायेगा । दूसरे दिन फिर रामने उसी प्रकार उस कुत्तेका रोदन सुना तो दूतसे भगवाया ॥२-५॥ तीसरे दिन फिर उसका रुदन सुनकर रामने लक्ष्मणसे कहा-आज तीन दिनसे
४४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
किं दुःखं सारमेयस्य प्रष्टव्यं मत्पुरस्त्वया । तथेति लक्ष्मणो दूतानब्रवीत्सम्भ्रमान्वितः ॥७॥
समामाकारणीयः श्वा युष्माभिस्त्वथ सादरम् । तथेति रामदूतास्ते सारमेयं वचोऽब्रुवन् ॥८॥
आकारितोऽसि रामेण त्वमेहि राघवांतिकम् । त्वद्यैवं फलितं चाद्य पूर्वपुण्योदयेन हि ॥९॥
रामदूतवचः श्रुत्वा तुष्टः श्वा तान्यचोऽब्रवीत् । देवगृहे यज्ञवाटहोमशालासु वै तथा ॥१०॥
वृन्दावने सभायां च मठे पार्थिवसद्गृहे । गोष्ठे पुण्यस्थले पुण्ये तीर्थे देवालयोऽपि च ॥११॥
पाकस्थाने रतिस्थाने स्नानसंध्यास्थलादिषु । गन्तु नार्हा वयं पापयोनित्वाद् बाह्यनां प्रभुः ॥१२॥
तत्रस्ते विस्मयाविष्टास्तद्वाक्यं राममब्रवन् । राघवस्तद्वचः श्रुत्वा विहस्य सम्भ्रमेण च । १३॥
आनीयतां पादुके मे त्विति दूतान वचोऽब्रवीत् । ततस्तैरर्पिते दिव्ये पादुके कृत्य पादयोः ॥१४॥
रत्नदण्डं करे धृत्वा शनैः सर्वैः समन्वितः । मुद्रिकाग्लन्द्धारेव मणिनूपुरशिञ्जितः । १५॥
मुकुटेनावतंसेन केयूराभ्यां समन्वितः । नूपुराभ्यां कंकणाभ्यां कुण्डलाभ्यां सुशोभितः । १६॥
पदकैः शृखलाभिश्च वरवस्त्रैर्विराजितः । गजद्वाराद्वहिर्देशे श्वाभ्येवांतिकं ययौ ॥१७॥
कृत्वा दंडं त्वरुक्षेऽथ किंचिद्वक्रः स्थितः प्रभुः । कृत्वा वामं जान्वधो स्वां जंघां रामः स दक्षिणाम् ॥१८॥
अब्रवीत्सारमेयं तं किंचित्कृत्वा स्मिताननम् । मदग्रे वद किं दुःखं सारमेय तवास्ति यत् ॥१९॥
भद्रान्ये सहसा माऽस्तु दुःखं केषां कदापि च । इति रामगिरं श्रुत्वा सारमेयः पुनः पुनः ॥२०॥
नमस्कृत्या राघवेंद्रं छिन्नपादोऽब्रवीन्मुदा । मदर्थं श्रमितोऽत्र त्वं चिरं जीव दयानिधे ॥२१॥
निरपराधो यतिना प्राप्याऽत्राहं प्रताडितः । छिन्नपादोऽस्मि राजेंद्र त्वामद्य शरणं गतः । २२।
तद्वाक्यं राघवः श्रुत्वाऽऽकारयामास दण्डिनम् । राजाज्ञया यतिश्चापि विह्वलो राघव ययौ ॥२३॥
दृष्ट्वा यतिं तं श्रीरामस्तदा वचनमब्रवीत् । स्वामिन् किमर्थं युष्माभिश्छिन्नः पादोऽस्य वै शुनः॥२४॥
यह कुत्ता क्यों राजदरबारके समक्ष आकर रोता है। मेरे सामने बुलाकर पूछो कि उसे किस बातका कष्ट है। लक्ष्मणने भी घबड़ाकर दूतोंको आज्ञा दी कि जाओ और आदरपूर्वक उस कुत्तेको सामने ले आओ। "बहुत अच्छा" कहकर दूत कुत्तेके पास पहुंचे और उससे कहने लगे- ॥६-८॥ आज पूर्वसंचित पुण्योंसे तुम्हारा भाग्योदय हुआ है। चलो, श्रीरामचन्द्रजी तुम्हें बुला रहे हैं। ९॥ दूतोंकी बात सुनी तो प्रसन्न होकर कुत्ता कहने लगा- देवालय, यज्ञशाला, हवनगृह, तुलसीका बगीचा, सभा, मठ, राज-भवन, गोशाला, पवित्र तीर्थ, रसोईघर, रतिस्थान तथा स्नान-सन्ध्यादि करनेके स्थानोंपर मै जानेके अयोग्य हूँ। क्योंकि मेरा जन्म पापयोनिमें हुआ है। तुम जाकर रामसे कह दो ॥१०॥ ११॥ इतनी सुनकर वे दूत बड़े विस्मित हुए और जैसा उसने कहा था, जाकर रामको सुना दिया। राम उसकी बात सुनकर हँस पड़े और दूतोंसे कहा कि हमारी खड़ाऊँ ले आओ! दूतोंने आज्ञाका पालन किया। रामने खड़ाऊँ पहिना, एक रत्नजटित छड़ी हाथमें ली और सब लोगोंके साथ उस कुत्तेकी ओर चले। उस समय रामचन्द्रके हाथोंमे अंगुलियाँ थीं, रत्नजटित हार गलेमें था, मस्तकपर मुकुट तथा कानोमे कुण्डल झूल रहे थे, भुजाओमे बिजयठ और कङ्कण था। गलेमें हार तथा सिकडियाँ शोभित हो रही थी। इनके सिवाय और भी कई प्रकारके आभूषण और सुन्दर वस्त्र सुशोभित हो रहे थे। इस तरह सज-धजकर राम कुत्तेके पास जा पहुँचे ॥१२-१७॥ वहाँ पहुँच तो छड़ी बगलमे दबा ली और बायें घुटनेको तनिक मोड़कर कुछ तिरछे खड़े हो गये ॥१८॥ पुचकारकर राम कुत्तेसे बोले- हे सारमेय! तुम्हें जो कुछ कष्ट हो वह मुझे बताओ ॥१९॥ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्यमें किसीको किसी प्रकारका कष्ट न हो। इस तरह प्रभुकी बात सुनकर कुत्तेने रामको अनेकशः प्रणाम किया और हर्षित होकर कहने लगा- हे दयानिधे ! आपने मेरे लिए बड़ा कष्ट किया, जो यहाँ पधारे। हे महाराज ! मैने कोई अपराध नहीं किया था। फिर भी एक संन्यासीने पत्थरसे मुझे ऐसा मारा कि जिससे मेरा पैर टूट गया। इसीसे दुःखी होकर मै आप की शरणमे आया हूँ। २०॥ २१॥ २२॥ उसकी बात सुनकर रामने उस संन्यासीको बुलवाया।
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
तद्रामवचनं श्रुत्वा यतिः प्राह रघूत्तमम् । भिक्षार्थं भ्रमतो मार्गे भिक्षात्रं स्पृशितं मम ॥२५॥
शुनाऽनेन राघवेंद्र मध्याह्ने क्षुधितस्य च । मयाऽतः क्रोधचित्तेन शुनेऽस्मै अपराधिने ॥२६॥
अर्पितं लोष्टकं क्षिप्तेन भिन्नं पदं शुनः । तद्यतेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः ॥२७॥
ज्ञानहीनः पशुश्चायं भक्ष्यं दृष्ट्वायं निर्दोष च । स्वाभाविकी तस्य दोषो नैवार्य वेद्मयहं यते ॥२८॥
स्वमेवास्यैवापराधी तद्दण्डं प्राप्तुमर्हसि । इत्युक्त्वा मारगेयं तु राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥२९॥
यदिश्रायं तैऽपराधी तत्र हस्तेऽर्पितो मया । यं त्वमिच्छसि वै कर्तुं तस्मै दण्डं सुखं कुरु ॥३०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सारमेयोऽब्रवीत् प्रभुम् । शिवालयस्याधिपत्ये च स्थापनीयो यति प्रभो ॥३१॥
तथेति रामचन्द्रोऽपि शिविकायां निवेश्य तम् । स्रग्वस्त्रचन्दनाद्यैश्च सम्पूज्याथ यतिं मुदा ॥३२॥
वाद्यघोषैर्नर्तनाद्यैर्ब्राह्मणैश्च शिवालयाम् । नीत्वा शिवालयस्याधिपत्ये संस्थापयत्प्रभुः ॥३३॥
तदाऽज्ञानाद्यतिर्देवं फलितं वेत्यमन्यत । ततो रामो जनैर्युक्तः स्वां सभां संविवेश ह ॥३४॥
तत्सर्वे कौतुकं दृष्ट्वा पौराः प्रोचु रघूत्तमम् । कथं शुनाऽद्य यतये शिक्षेत्प्रसाधिता प्रभो ॥३५॥
अन्नार्थं भ्रमतस्तस्य यनेदेशं पदं सदन् । नैतादृशारूपं सञ्जातं यतये शिक्षितं न तत् ॥३६॥
तत्पौराणां वचः श्रुत्वा राघवस्तान् वचोऽब्रवीत् । प्रष्टव्यः श्वा तु युष्माभिः सन्देहं हरिष्यति ॥३७॥
तथेति मारगेयं तं पप्रच्छुर्नागराश्च तत् । तन्त्रोवाच सारमेयः शृणुध्वं यन्मयोच्यते ॥३८॥
कुपिप्रज्ञानभार्यापत्यबलसम्मानकारिणः । शिवालयमठारामतटाकग्रामाधिकारिणः ॥३९॥
अनाथस्त्रीबालवित्तहारिणः क्रूरमानसाः । गौविप्रशिववित्तेम्ब हारिणोऽन्यासकारिणः ॥४०॥
रामके आज्ञानुसार वह संन्यासी भी सिर झुकाये रामके पास आया ॥ २३ ॥ रामने उनको प्रणाम किया और कहने लगे-कहो स्वामिंवा ! आपने किस अपराधमें इस कुत्तेका पैर तोड़ डाला ? ॥ २४ ॥ उसने उत्तर दिया कि मैं भिक्षा लिये रास्तेसे जा रहा था। तभी इसने मेरा भिक्षान्न छू दिया। वह मध्याह्नका समय था। मैं भूखा था । इसके उस अपराधपर मुझे क्रोध आ गया और इसको चमकानेकी इच्छासे मैंने एक पत्थर फेंककर मारा। वह इसके पैरमें लगा, जिससे इसका पैर टूट गया ।। यतिकी बात सुनकर राम उससे कहने लगे—॥ २५, २७ ॥ यह एक ज्ञानविहीन पशु है। यदि इसने अपना भक्ष्य पदार्थ देखकर आपको छू दिया तो मैं इसमें इसका कोई दोष नहीं समझता। यह तो इसकी स्वाभाविक प्रकृति है। इसलिए आप ही इसके अपराधी हैं। यतिके प्रति इतना कहकर कुत्तेसे कहने लगे-यह संन्यासी तुम्हारा अपराधी है। मैं इसे तुम्हे सौंपता हूँ। तुम जो दण्ड चाहो, इसे दे सकते हो ॥ २८-३० । रामकी बात सुनकर कुत्तेने कहा-इसे किसी शिवालय का महन्त बना दिया जाय। ३१॥ रामने उसकी बात स्वीकार कर ली और सुन्दर वस्त्र, चन्दन तथा माला आदिसे यतिको सुशोभित करके एक पालकीमें बिठाया और विविध प्रकारके बाजे यगान हुए उत्सवके साथ एक शिवालयमें ले गये और उसे वहाँका महन्त बना दिया ॥ ३२ ।। ३३ । उस समय अज्ञानतावश यतिने अपना भाग्योदय समझा । कुछ देर बाद रामचन्द्रजी अपने सचिवों समेत राजसभामें लौट आये ॥ ३४ ॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर कितने ही उत्सुक नागरिकोंने रामसे कहा-हे प्रभो ! इस कुत्तेने यति- को इस प्रकारका दण्ड क्यों दिया ? यतिका तो कर्तव्य उसकी टांग तोड़ दी और जब आपने कुत्तेको उसके कियेका दण्ड देनेके लिए कहा तो उसने इतरुक स्थानपर दनिकी महन्थ बनवा दिया । ३५ ॥ ३६ ॥ इस प्रकार नागरिकोंकी बात सुनकर रामने कहा कि आप लोग इस कुत्तेसे ही पूछ लें कि उसने ऐसा क्यों किया। यह आप लोगोंकी शङ्काका भली भाँति समाधान कर देगा । ३७॥ रामके आज्ञानुसार उन लोगोंने कुत्तेसे पूछा तो उसने कहा-मै जो कुछ कहता हूँ, उसे सावधान होकर आप लोग सुनें ॥ ३८॥ मनमें उत्पन्न अन्न रखनेवाले, शिवालय, मठ, बगीचा तालाब राजग्राम इन स्थानोंके अधिपति, अनाथ स्त्री तथा बालकोंके धनका अपहरण करनेवाले, गाली-गलौज करनेवाले, गौ-विप्र तथा शिवके लिए अर्पित धनका अपहरण करनेवाले, अन्याय करनेवाले, राजाके घरपर पहुँचे हुए याचकका अपमानवान् दूसरेका धन हड़पनेवाले, प्राणभित्रके
४१४ आनन्दरामायणे [ सर्ग० १०
नृपगेहे प्रविष्टानां याचकानां निवारिणः । परद्रव्यपहर्तारः प्रत्यशिनाञ्चिकारिणः ॥४१॥ विप्रभोजनद्रव्यस्य होमद्रव्यस्य हारिणः । बहुद्रव्यापहर्त्तारश्चैते सर्व्वेऽप्यन्यन्मनि ॥४२॥ गच्छन्ति वै शुनो योनिं मत्समेतद्वचा मम । मया मठाधिपत्याञ्च लब्धा योनिः शुनः स्वयम् ॥४३॥ अतो मयाऽद्य यतये दित्सितं पदमीरितम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य नागरादिच्छिन्नसंशयाः ॥४४॥ ते ययुः स्वीयगेहानि यथौवाऽपि निजस्थलम् । ईदाने स यतिजीतः शुनो योनौ स्वकिल्विषत् ॥४५॥ आप्तमश्चाशुभां मुक्ति भुक्त्वाऽसौ स्वीयकिल्विषम् । न तस्योऽयं यतिः शिष्य मार्केनेऽत्र मृतस्त्विति॥४६ स्थलान्तरे मृतश्चायं शतैः कार्यार्थमान्नरः । अयोध्यायां मृतानां च पुनर्जन्म न विद्यते ॥४७॥ क्व यतिः सारमेयत्वं क्व स श्वा मुक्तिमाप्तवान् । गहना कर्मणश्चात्र गतिस्तया महात्मनः ॥४८॥ क्व यतिः सारमेयः क्व न्यायश्चेत्थं समापने । आभीक्ष्म्यतः सर्व्वचात्र नान्यायस्तन्मुखेक्षणात् ॥४९॥ अथैकदा तु साकेतवासिनो भूसुरस्य च । पञ्चत्वं पञ्चवर्षीयः पुत्रः प्राप्तः शिशुः प्रियः ॥५०॥ तदा विप्रः सपत्नीकस्तन्प्रेतमरुणोदये । राजद्वार मपानीथ रुरोदोच्चैः सुविद्रुतः ॥५१॥ अब्रवीत् पुत्रशोकेन व्यथितः क्रोधसंयुतः । सीतामालिङ्गय गजेन्द्र कथं न्वं निद्रितोऽसि हि ॥५२॥ त्वद्राज्येऽधर्मतः कस्य मृतो मे बालकः प्रियः । त्वत्तोऽप्यधमॊऽथवान्याच्च अतोऽधर्मी न संशयम्५३॥ नृपे पापििन म्रियन्ते नरा ह्यल्पायुषः भुक्तम् । यस्य राज्ये जनैः सर्व्वैरापाधर्मः क्रियते भुवि ॥५४॥ सोऽपि ज्ञेयो नृपस्यैव यत्तन्नेषां न शिक्षितम् । अस्मन्नेऽधारिणो राज्ञो राज्ये मेऽय शिशुर्मृतः ॥५५॥ उपायं चिंतयस्वाम्य जीवनेऽद्य यवान्वभूः । नोचेदावां विनिं वारोहावस्तनपेन हि ॥५६॥ स्मर वृत्तं श्रवणस्य हेतोर्यत्तनकञ्च ने जानं शापादिकं पूर्व्वं तद्वदत्रापि ते भवेत् ॥५७॥
विप्र निज धनको ग्रहण करनेवाले व ज्ञानभाजनके लिये जुटाई सामग्रीसे चोरी करनेवाले और बेईमानी करके अधिक धन इकट्ठा करनेवाले लोग मरकर दूसरे जन्ममें कुत्तेकी योनिम जन्म पाते हैं ॥३६-४२॥ इस प्रसङ्गमें मैंने जो बात कही है, व सब सत्य है। मैंने स्वयं मठाधिपत्यके कारण ही कुत्तेकी योनि पायी है ॥४३॥ इस संन्यास को उसकी करनीका फल देने के लिए मैंने उसे यह पद दिलाया है। इस प्रकार उसकी बात सुनकर सारे पुरवासिजनका स देह निवृत्त हो गया और सब लोग अपने-अपने घरको चले गये। कुत्ता भी अपने स्थानको चला गया। उस संन्यासी ने मठाधिपत्यके मदमें आकर जा पाप किये, उत्तम जन्मान्तरम उसे कुत्तेकी योनि मिली ॥४४ ।४५। वह कुत्ता जिसको रामचन्द्रजीके यहाँ दावा किया था उसे कुछ दिनो बाद शुभ गति मिली, किन्तु वह पनि जो अपने पापोसे कुत्ता हुआ था अयोध्यामे न मरकर किसी दूसरे स्थानपर मरा। इम लिए उसे मुक्ति नहीं मिला। जो लोग अयोध्यामे शरीर त्याग करत है ये जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। कर्मनी गति बड़ी विचित्र होती है। कहाँ वह कुत्ता होकर भी मुक्त हो गया और वह यति होकर भी कुत्ता हो गया ॥४६॥४७॥४८॥ कहाँ तुत्ता और कहाँ मंन्यासी । रामने उस श्वानका कितना अच्छा न्याय किया । सच तो यह है कि रामक राज्यम किसोका मुँह देखकर न्याय नहीं किया जाता था। बल्कि जा न्याय्य बात होती, वही होती थी ॥४९। एक समय अयोध्यामे एक ब्राह्मणके पंचवर्षीय बालककी मृत्यु हो गयी ॥५०॥ सबेरा होते ही वे ब्राह्मणदम्पती बच्चेके शवको लेकर राजद्वारपर आये और बड़े जोर-जारसे रोने लगे ॥५१॥ पुत्रशोकसे कुपित होकर उस ब्राह्मणने कहा हे राम! सीताको गोदमे लेकर तुम भय भाः आनन्दके साथ पड़े सो रहे हो ? ॥५२॥ तुम्हारे राज्यमे किसीके अपराधस मेरे बच्चेको मृत्यु हुई है। इसमे तुम्हारा कोई अधर्म है अथवा किसी दूसरेका। यह मै नहीं जानता ॥५३॥ मैने ऐसा सुना है कि राजक अधर्मी होनेस ही उसके राज्यम अकाल मृत्यु होती है जिस राजाक राज्यम अधर्म होता है, उसका भी कारण राजा ही होता है क्योंकि वह अपनी प्रजाका अच्छी तरह शिक्षा नहीं देता। इससे यह निश्चित है कि तुम अधर्मी हो। इसी लिए मेरे बालककी मृत्यु हुई है ॥५४॥ ५५॥ अतएव हे राजन् ! इसके लिए शीप्र ही कोई उपाय करो, नही तो हम दोनों (स्त्री-पुरुष)
सर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४४५
वसो विप्रप्रिया प्राह साता प्रोत्कण्ठयेव हि । कथञ्चेन्निधिनिद्रां गते मुत्रे शुभे ॥५८॥
त्वमप्यसि पुत्रवती मे दुःखं शाम्यन् कुरु । उपायं कारयाद्याद्य भर्त्राऽद्य जीवने शिशोः ॥५९॥
इति तद्दर्शनीवाक्यं श्रुत्वा सर्वे पुरीजनः । आपन्नद्रव्यनिक्षिप्तो प्रमत्तार्य मस्थिताः ॥६०॥
सीतारामावपि तयोर्वाक्यं श्रुत्वाऽतिविह्वलौ । विनिर्गतौ मणिशालाद्बहिस्तद्रुद्धहृद्दुःखितौ ॥६१॥
निवार्य वन्दिगीनानि गजद्दारं तयोः पुरः । वेगेन जग्मतुः सद्धिः सीतागमी गतभियौ ॥६२॥
दृष्ट्वा सीतां च रामं च तौ शोकं चक्रतुर्मुहुः नाद्याद्याम्य रामचन्द्रभ्बदाऽऽह गद्गदाक्षरः ॥६३॥
मा शोकं कुरुतोभोभी मद्भिरं शृणुताम्विति । कृत्योपायं हि युत्रयोः पुत्रं संजीव्यपाम्यहम् ॥६४॥
न जीवितंश्चेद्युवयोर पुत्रस्तर्पये कुशम् गिर् सत्याऽभिर्यो नोभो पश्यतस्स्विह मेऽय हि ॥६५॥
ततः सीता विप्रपत्नीम आख्याह गिरं शुभाभ् । रामेण ते प्रतिज्ञातं कुशदानेन मामिनि ॥६६॥
अहमप्यद्य ते दन्मि तव दुःखस्य शांतये । न जीविश्चेद्रामेण भयाऽय व्यधिदुः प्रियः ॥६७॥
तर्हि त्वमुद्भवोऽन्यं धर्मपेयेट् लवं प्रियम् नाभ्यां कुशलदाग्यां त्वं पुत्रदुःखं त्यजिष्यसि ॥६८॥
भजिष्यसि च धर्मौघयत्नतः शोकं कुरुष्व मा । ततः प्राह द्विजं रामस्त्वं पत्न्याऽत्र स्थितो भव ॥६९॥
मा कुरुष्व मुहुः खेदं त्वत्पुत्रं शिल्याभ्यहम् । इत्युक्त्वा लक्ष्मणैनैन तैलद्रोण्यां शव शिशोः ॥७०॥
निधाय कृमिदंग्येद्गन्धद्रुतप्रशांतये । स्वयं स्नात्वा निर्य्यादधि चाक्रानिस्त्रकशानमः ॥७१॥
ततः सभासन्धितः सन् वसिष्ठ प्राह राघवः । राज्यं शुमति धर्मेण नन्नायं वै शिशुः कथम् ॥७२॥
अपने प्रिय पुत्रके साथ चिताम जमकर भस्म हो जावेंगे ॥ ५६ । अनन्तर पूर्वोक्तका स्मरण कर जिस प्रकार तुम्हारे पिता द्वारा अपने पुत्रवधका दुःख हुआ होकर उमके मोर पण दशरथका शव देकर अपने प्राण त्याग दिये थे, वही दशा हमारा भा हागा ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर ब्राह्मण आराम साथ साताकी सम्भाषित करके कहा—हे शुभे ! तुम बतो पतिका आगमन करके आनन्दक साथ सा रहो हा ? तुम ता पुत्रवती हो । इस कारण मेर दुःखका भार श्यान दकर मर बच्चाका जिलानेके लिय अपन पति द्वारा काई उपाय करवाआ ॥ ५८ । ५९ ॥ इस प्रकार उस विप्रदम्पतीका गम्द सुनकर वहाँक सब पुरवासी व्याकुल हो उठे और उस शवका चारो बारस धरकर गड़ हा गय ॥ ६० ॥ इधर गम तथा साता दानों ब्राह्मणका बातांस विह्वल हांकर रतिशब्दाग बाहर निकल आये । नाच गाकर राजन वन्दानन का स्तुति तथा गान-बजानावालोंक गान-बाज गक दिय और वह सब दाड़त हुए उन दानांक पास पहुँचे । उस समय उस दुःखम सीता तथा रामका मुख धुन्धला गया था ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ महाराज राम तथा साताका दख्कर व दानो ओर भी जोर-जारसे चिल्ला चिल्लाकर रोन लग ॥ उनमा आश्वासन दत हुए गद्गद कण्ठस रामन कहा कि आप लाग इतना व्याकुल न हा, में जो कुछ कह रहा हूँ उस सुना। म काई उपाय करक तुम्हारे पुत्रको जीवित करूँगा । ६३,। ६४।। याद तुम्हार बच्चा जीवित न कर सकूँगा ता मैं अपना पुत्र कुश आपको दे दूंगा । भग वाक्यो बात समझकर आप विश्वाम कर ॥ ६५ ॥ इसके अनन्तर साताने विप्रपल्न क पास जाकर कहा—ह भामना । तुम सुन रहा हा कि रामने क्या प्रतिज्ञा की है ? तुम्हार मतोषक लिए मैं भा प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि रामचन्द्रजा आपक बच्चे का जीवित न कर सक ता मैं अपन छाट पुत्र लवका दे दूंगा । उन दोना पुत्रांक पासस तुम्हारा पुत्रशाक दूर हो जायगा । ६६-६८ ॥ अब शोक मत करा । तुम्हारे पुत्र न जिला ता अधा जा मूल में भाग रहीं हूँ, वह तुमको प्राप्त होगा । इसके अनन्तर र मने ब्राह्मणस कहा कि आप अपना पत्नाक साथ यहाँ बैठ ओर किसी प्रकारका खेद न करें मैं आपके बटक जीवित करूँगा । इतन कहकर रामन लक्ष्मास कहकर एक तैलसे भरी हुई नौका मँगवायी । जिससे शव सड़े-गले नहीं, उसमह दुर्गन्ध न निकल या कीड़े न पड़ें । इस विचारसे उस शवको उसम रखवा दिया और स्वयं खिन्न होकर सम्पूनादि निष्कण्टक करनका चल गये । इसके अनन्तर समामें बैठकर रामन अपन कुलगुरु वसिष्ठसे कहा कि जब मैं धर्मपूर्वक राज्यशासन कर रहा हूँ तब
| ४४६ | आनन्दरामायणे | [सर्गः १० |
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बाल्येऽन्ते अस्यतो प्राप्तस्त्वोपायं विचिन्त्यताम् । | इति यावद्द्रुतं रामः प्रोवाच तावदम्बरात् ॥७३॥ नारदः प्रययौ वीणां रणयन् तत्सभां जयन् । | प्रत्युद्गम्याथ तं रामः परिपूज्य यथाविधि ॥७४॥ सम्भार्य्य सकलं वृत्तं पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । | त्वयोपायोऽत्र वक्तव्यः शिशोश्चास्य प्रजीवने ॥७५॥ पुत्राभ्यां हि प्रतिज्ञातं द्विजाय सीतया मया । | किमर्थं मम राज्येऽसौ मृतस्त्रीदृङ् न वेद्यहम् ॥७६॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा राघव प्राह नारदः । | राम स्वद्विषयेऽधर्मं न कोऽप्याचरते जनः ॥७७॥ भूम्यां सर्वत्र द्रष्टव्यं गत्वा गत्वाऽथ मद्गिरा । | यद्यप्यहं विजानामि भूम्यां वृत्तं च जानतः ॥७८॥ तथापि जनशिक्षार्थं त्वामेव प्रेषयाम्यहम् । | त्वं दृष्ट्वाऽधर्मनिरतं जनं शिक्षय सादरम् ॥७९॥ अधर्मोच्छेदनेनायं जीविष्यति वै द्विजः । | तथेति राघवश्चोक्त्वा विसर्ज्य नारदं मुनिम् ॥८०॥ सीतया नागरैः सर्वैर्भ्रातृभिर्गुरुणा सह । | पुत्राभ्यां मन्त्रिभिर्युक्तः पुष्पकं चारुरोह सः ॥८१॥ एतस्मिन्नन्तरेऽग्रेऽभून्महान्कोलाहलस्तदा । | तं श्रुत्वा चकितो रामः स ददर्श समन्ततः ॥८२॥ तावद्ददर्श पुरतः पौरैः संवेष्ठितां स्त्रियम् । | पृष्ठतोऽपरं शवमुद्वहन्तं समागतम् ॥८३॥ रामं दृष्ट्वा पुष्पकस्थं रुदती ब्राह्मणी पुरः । | दीनस्वरेण प्रोवाच हस्ताभ्यां हृदि ताड्य सा ॥८४॥ राम राम महाबाहो ते राज्ये गतमर्तृका । | अहं जाताऽस्मि त्वद्दोषान्मां दृष्ट्वा त्वं न लज्जसे ॥८५॥ मद्भर्तारं जीवयेनं नोचेच्छापं ददामि ते । | इति तस्या वचः श्रुत्वा राघवः विस्मयान्वितः ॥८६॥ स मयान्मधुरं वाक्यं ब्राह्मणीं तोषयन्मुहुः । | कोऽयं श्रमस्त्वया रम्भोरु ते भर्तारं प्रजीवये ॥८७॥ अस्यैव हेतोर्गच्छामि त्वं मद्गेहे सुखं वस । | इत्युक्त्वाऽऽश्वास्य तां रामस्तच्छवञ्चापिपूर्ववत् ॥८८॥ तैलद्रोण्यां स्थापयित्वा सुमन्त्रं वाक्यमब्रवीत् । | आगमिष्याम्यहं यावत्तावद्रक्ष्यसि मे शवम् ॥८९॥
इस ब्राह्मणके बालककी अकाल मृत्यु क्यों हुई ॥६०-२॥ इसके लिये कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार रामने गुरु वसिष्ठसे प्रश्न किया ही था कि इतनेमें आकाशमार्गसे वीणा बजाते हुए नारदजी उस सभामण्डपमें आ पहुंचे। रामचन्द्रजीने उठकर नारदकी पूजा की और सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इसके पश्चात् वे बोले- हे मुनिराज आप ही इस विप्रपुत्रके जीवनका कोई उपाय बतलाइये। हमने तथा सीताने यह प्रतिज्ञा की है कि यदि हम बालकको मैं जीवित न कर सका तो अपने दोनों पुत्र कुश तथा लव इस विप्रको अपर्ण कर दूंगा। मेरे राज्यम इस प्रकार अकाल मृत्यु कैसे हुई, यह मुझ मालूम नहीं हो रहा है॥७२-७६॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर नारदने कहा—हे राम! तुम्हारे राज्यम कोई भी मनुष्य किसी प्रकारका अधर्म नहीं करता। फिर भी मेरे कथनानुसार आपको यह उचित है कि आप गन्धर्वथरमे घूमकर देख यदि कहीं कोई किसी तरहका अधर्माचरण करता हुआ दीखे तो उसे आप दण्ड दें इस प्रकार अधर्मका मूलोच्छेद करनेपर यह ब्राह्मणबालक जीवित हो जायगा राजन आपकी सन्तुष्ट मान हैं। नारद मुनिको सादर विदा करके राम सीता, कुछ नगरवासी जना, अपने ३ ताभ्रा, गुरु वसिष्ठ दोनों पुत्रों तथा मन्त्रियोंको साथ लेकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए ॥७९-८१॥ उसी समय आगेके आगम जोरोंका कोलाहल सुनाई पड़ा। उसे सुनकर राम और भी विस्मित हुए और चहु ओर निहारन लगे। तबतक उन्होने देखा कि एक स्त्रीको चारो ओरसे बहुतसे पुरवासी घेरे हुए हैं। उनके आगे पृष्टतम्पुत्रकी सडकमे एक और शव लदा हुआ आ रहा है। स्त्रीने जब रामको पुष्पक विमानपर बैठे देखा तो अपने हथोस छाती पीटकर कहने लगी-हे राम ! हे राम !! तुम्हारे राजकाल्म दिववा होकर मैं यहाँ आरी हूँ मुझ इस दशाम देखकर तुम्हे लाजे नही आती? मेरे पतिका मृत्यु तुम्हारे ही अधर्मत हुई है। इस कारण जैसे बने, वैसे मेरे पतिको जिलाओ ! नही तो मै शाप दे दूँगी। इस प्रकार उस स्त्रीकी बात सुनकर रामने विस्मितहोकर मीठी वाणीसे आश्वासन देते हुए उत्तर दिया-हे रंभोरु तुम कायका क्षन्त्यिग करके शान्त हओ। मै तुम्हारे पतिकी जिला दूँगा। मैं भी इसी कामके लिए जा रहा हूँ। तुम आनन्दके साथ मेरे भवनम चलकर रहो। इस तरह उसे समझा-बुझाकर रामने उस शवको भी पहलेके समान तैलके नौकाम रखवाया और सुमन्त्रको वचन कर दिया कि