श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २
मेमेमत्या बहिर्जाता चाऽस्माकं सकला जनाः। मेमेबुद्धिगता ह्येषुत्वां गतिः सैव भविष्यति ॥९१॥
एवं तो बोधयन्त्यत्र जनान्प्रत्यवचोभिः सदा। न तद्वाक्यं जनैर्बुद्ध्या कदा चित्ते विचार्यते ॥९२॥
तासां वाक्यौघदाहेन प्रनष्टा मेमतेः स्मरा। मेमेबुद्धिर्गता प्रत्यक्सोऽहं मुक्तोऽस्म्यहं न्विह ॥९३॥
मे देहोऽस्तिति संबुद्धेर्यत् मनः संप्रदाह तदा कि शेषमत्र्यत्र संसारे दुःखदायके ॥९४॥
अस्त्वद्य वाऽद्य यातु देहः सोऽस्त्वस्तु न । कः पुत्रः कस्य को भ्राता सर्वं ब्रह्म न संशयः ॥९५॥
अहमेवं परं ब्रह्म मनो मत्परं न हि। यत् यदुच्यते चेदं मायैषा तव राघव ॥९६॥
नश्वरां बुद्बुदाकारं ज्ञानं चेदं सदा प्रभो । इत्येवं वचः श्रुत्वा श्रीरामः प्राह सस्मितः ॥९७॥
सम्यग् विचारितं बुद्ध्या त्वयाऽपि भवनाशनम् । गच्छेतानीं सुखं गेहे जीवन्मुक्ताऽधुना ह्यसि ॥९८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कैकेयी तोषमागता। देहाभिमानहीना सा नत्वा सीतां रघूत्तमम् ॥९९॥
ययौ भरतगेहे हि नामक्ता क्वापि मानव्रते । एवं शिष्य मया प्रोक्तमवियाक्योपदेशतः ॥१००॥
यथा ज्ञानं हि कैकेय्यै ज्ञातं तल्लिखितं तव । इदानीं शृणु यच्चान्यत्ते वदामि कुतूहलम् ॥१०१॥
सुमित्रा त्वेकदा रामं सीतया रहसि स्थितम् । विलोक्य नत्वा तं प्राह राम राजीवलोचन ॥१०२॥
किंचिते प्रार्थयाम्यद्य किंचिदुपदिशस्व माम् । तस्या वचनं श्रुत्वा तामाह रघुनन्दनः ॥१०३॥
का त्वं चेति वदाग्रे मां पश्चादुपदिशामि ते । गच्छ गेहं स्वस्थ्यबुद्ध्या हृदि सम्यग्विचार्य च ॥१०४॥
श्वो मामेत्य मम प्रश्नस्योत्तरं देहि वै ततः। महदुपदेशमास्येऽद्य येन तुष्टा भविष्यसि ॥१०५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सुमित्रा विस्मितानना। तूष्णीमेव ययौ गेहं रामवाक्यं व्यचिन्तयत् ॥१०६॥
काऽहं पृष्टा राघवेण किं वा देयं मयोत्तरम् । काऽहं देवी चामुता वा मानवी राक्षसी तथा ॥१०७॥
मानुषी चेत्पदं मत्वा यदि रामं वदामि वै। तर्हि नानादुरीराणि ध्रियन्ते नटवन्मया ॥१०८॥
छोड़ना चाहिए कि इस ममताका परित्याग कर दें, इसका आधार बर्त्ताव करें ॥ ९० ॥ ९०॥ 'यह मेरा है' इस बुद्धिमें पड़ने कि प्राप्त सङ्कटा जो गति हमारी हुई है वही गति तुम्हारी भी होगी ॥ ९१ ॥ अपनी वचनोंसे वे सबदा सब लोगोंको उपदेश देती रहती है। किन्तु संसारी लोग उनका बातोंपर विचार नहीं करते ॥ ९२ ॥ हे राघव ! आपको कृपा और उन बातोंके सदृश मेरा ममतामोह नष्ट हो गया है। इसलिए अब मैं मुक्त हो गयी हूँ ॥ ९३ ॥ 'यह देह मेरा है' इस अवस्था में आमत्व था। वह दम्भदायिनी भ्रान्ति नष्ट हो गयी तब और रह ही क्या गया है। यहां कौन किसका बेटा है, कौन किसकी माता है? सब सच्चिदानन्दमय ब्रह्मका रूप है। इसमें न संशय नहीं है। ९४-९५ ॥ यह जो प्रकष्ट है। मुझमें दरे कुछ है ही नहीं। हे राघव ! संसारमें जो कुछ दिखायी पड़ रहा है, वह सब तुम्हारा माया है। ९६ ॥ मैंने इस अध्रुव शरीरको पानीके बुलबुलेकी तरह नश्वर समझ लिया है। इस प्रकार कैकेयीकी बात सुनकर मुस्कराते हुए राम बोले - ॥ ९७ ॥ ठीक है, तुमने भेदोंकी बातपर बहुत अच्छा विचार किया है। अब जाओ और सुखसे अपने घरमें बैठो। हे कैकेयी ! अब तुम जीवन्मुक्त हो गयी हो ॥ ९८ ॥ रामका ज्ञान सुनकर प्रसन्न मन कैकेयी देहाभिमानसे रहित होकर सीता तथा रामको प्रणाम करके अपने बेटे भरतके भवनमें चली गयी और तबसे वह किसी वस्तुमें आसक्त नहीं हुई। इस प्रकार ब्रह्माकी बातसे कैकेयीको जिस तरह ज्ञान प्राप्त हुआ था, सो वृत्तांत कह सुनाया। अब मैं तुम्हें एक और कुतूहल भरा वृत्तांत सुनाता हूँ। ९९-१०१ । एक दिन राम सीताके साथ किसी एकान्त स्थानमे बैठे थे। तब तक सुमित्रा वहाँ आ पहुंची और कहने लगीं हे राजीवलोचन राम ! मै तुमसे विनय करती हूँ कि मुझे भी कुछ उपदेश दे दो। उसकी बात सुनकर रामने कहा- पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो? अपने घर जाओ और स्वस्थबुद्धिसे विचार करके कल मेरे पास आकर बताओ। उस समय मै तुम्हें ऐसा उपदेश दूंगा, जिससे तुम बहुत प्रसन्न होओगी ॥ १०२-१०५ ॥ इस तरह रामका आदेश सुनकर वह आश्चर्य भरे मनसे उसी बातको सोचती हुई चुपचाप चली गयीं ॥ १०६ ॥ वह सोचने लगी कि