श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २] मनोहरकाण्डम् ५६७
तदा ह्यहं मानुषीन्द्रमन्य जन्म्यां घटेन्न मे । यदाहं मानुषी नैव न चैवान्या कदाचन ॥१०९॥ मानुषी राक्षसी चैवीत्यादि नामानि यानि च । देहापेक्षेण वर्त्तन्ते देहस्तु नश्वरः स्मृतः ॥११०॥ देहाद्भिन्नोऽस्मि काष्ठेभ्यो यथा वह्निर्विवेकिनाम् । धार्यमाणोऽथ भूत्वाऽहं धारये चेति वेद्म्यहम् ॥१११॥ इदानीं तु मया ज्ञातं यथा विष्णुस्तथा त्वहम् । नानारूपाणि सोऽप्यत्र मत्स्यादीनि दधाति हि ॥११२॥ तथा नानाम्वरूपाणि धार्यन्तेऽत्रापि वै मया । एवमेव हि वस्त्वस्ति नहि मे तस्य चान्तरम् ॥११३॥ स्वतन्त्रोऽस्ति महाविष्णुस्त्वहं विष्णुवशा गता । अतो विष्णोः कला चाहं मन्येयं मदाशयः ॥११४॥ विष्णोर्मे नैव भेदोऽस्ति यथा गङ्गाजले घटे । तत्रैवाssपत्य तद्गच्छे द्विश्वगेवाह्यमस्मि हि ॥११५ । अहमेव यदा विष्णुस्तदा किं चावशेषितम् । व्यष्टव्यं न ममाद्य जीवन्मुक्ताऽहमस्मि वै ॥११६॥ एवं सुमित्रा संचिन्त्य गताज्ञाना मुदान्विता । अतिलङ्घ्य निशां सा भा प्रभाते राघवं ययौ ॥११७॥ गत्वा रामं तदा प्राह मया सर्वं विचिन्तितम् । का त्वं पृष्टो मया पूर्वं तदहं ननु राघव ॥११८॥ स्वतो नान्यच्च प्रष्टव्यं त्वद्विद्वाऽहं कदापि न । इत्युक्त्वा सा यथा गेहे निश्चित्य हृदि मद्रितम् ॥११९॥ तत्सर्वं श्रावयित्वा तं जीवन्मुक्ताऽभवत्तदा सुमित्रां राघवोऽप्याह गच्छाय यथा विचिन्तितम् १२०। जीवन्मुक्ताऽसि चाध्वन्त्वं गच्छ गेहं सुखं वस । ततः सुमित्रा नमस्कृत्य गच्छेण नृपसत्तम ॥१२१॥ सीतां चापि पृथक् नीत्वा ययौ लक्ष्मणगेहकम् । एवं विचार्य मया प्रोक्तं काऽहं चेति विचारणः ॥१२२॥ जीवन्मुक्ता सुमित्रा सा बभूव सुवनिर्मला । अन्यच्च ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व द्विजोत्तम ॥१२३॥
रामने हमसे यही पूछा है न कि मै कान हूं ? सो इसका क्या उत्तर दे । आखिर मै देवी हूं, दानवी हूं, राक्षसी हूं या मानुषी या क्या हूं ? यदि रामसे जाकर कहूं कि मै मानुषी हूं, तो भी नहीं बनता । क्योंकि ऐसा कहना हम नाटकक पात्रका तरह अनेक रूप धारण करने वाले हैं । इससे निश्चय हुआ कि मैं न मानुषी हूं, न और हो कुछ । पूर्वापर बात मानुषी आदि सारे शरीरों हम देखती हूँ और यह देह नाशवान् पदार्थ है। इससे यह मालूम होता है कि इन समस्त पूर्व्व हो मै धारि हूं और पूर्वापर तरह तरहके रूप धारण करती हूँ। लेकिन यह जो मैं हूँ वह तो नहीं नष्ट जान पड़ता ॥ ११० - १११ ॥ हाँ, सब यह ज्ञात हुआ। जिस तरह भगवान् अनेक रूप धारण करके इस दृष्टिमण्डलमे आते हैं ठीक उसीकी तरह मै भी हूं । वे भी मत्स्य-कूर्म आदि कितने अवतार धारण करके आते हैं तो मैं भी इस समय मनुष्य विवेचक प्रकारक रूप धारण करके जगतम मै भी जाती आती हूं । फिर हम और विष्णु भगवान्मे अन्तर ही क्या है ? ॥११२॥११३॥ अन्तर यही है कि विष्णु स्वाधीन है और मै विष्णुभगवान केही अधीन हूं। अतएव यह निश्चय हुआ कि मै विष्णुभगवान्की एक कला हूँ ॥ ११४ ॥ अब यह भी निश्चित हो गया कि हममे और भगवानमे कोई भेद नहीं है। जिस तरह गङ्गाका जल गङ्गाके प्रवाहस बहता हुआ गङ्गाजल रहता है, उसी तरह घटमे आकर भी गङ्गाजल ही रहता है। इसका सार यह निकला कि हममें और भगवान्में कोई भेद नहीं है। हम और भगवान् एक ही है। जब मै स्वयं विष्णुभगवान् हूं तो बाकी क्या रहा जो जाकर रामसे पूछूं । मैं तो जीवन्मुक्त हूँ ॥११५॥११६॥ इस प्रकार विचार करनेसे उनका अज्ञान नष्ट हो गया। वह रात्रि बिताकर सवेरे प्रसन्नतापूर्वक रामके पास पहुंचीं । ११७ ॥ वहां रामको प्रणाम करके सुमित्रा कहने लगीं-कल आपने मुझसे जो पूछा था कि मै कौन हूं ? सो विचार करनेपर मुझे मालूम हुआ कि मैं साक्षात् ब्रह्म ही हूं ॥ ११८ ॥ अब मुझे आपसे कुछ भी नहीं पूछना है । क्योंकि मैं आपसे पृथक् हूँ ही नहीं ऐसा कहकर रात्रिमे उन्होंने अपने हृदयमें जैसा विचार किया था सो कह सुनाया । वह सब सुनकर वह वास्तवमे जीवन्मुक्त हो गयी यह सीखकर रामने कहा- हे माता ! तुमने बहुत ठीक विचार किया है ॥ ११९ ॥ १२० ॥ अब तुम जीवन्मुक्त हो गयी। जाकर आनन्दसे अपने घरमे निवास करो। इससे सुमित्राका मोह नष्ट हो गया और वे राम तथा सीता दोनोंको अलग अलग प्रणाम करके लक्ष्मणके यहां चली गयी। हे शिष्य ! इस विचारसे कि मै कौन हूं, सुमित्रा जीवन्मुक्त हो गयीं और उनके आनन्दका ठिकाना नहीं रहा। हे द्विजोत्तम ! मै तुम्हें एक और वृतान्त बतलाता हूं, सो सुनो