श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५१८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २ |
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एकदा राघवं दृष्ट्वा कौसल्या जानकी रहः । आसने चित्रशालायां सीतया सह संस्थितम् ॥ १२४॥ एकान्तेऽथ समेत्याथ श्रीरामं सान्त्व्य विष्णुमव्ययम् । राम त्वं महतामहो किञ्चिदुपदिशस्व माम् ॥ १२५॥ तन्मातृवचनं श्रुत्वा श्रीरामो विस्मयं ह्यगात् । चाप्रभाते समुत्थाय गन्ता गोष्ठं कियान्क्षणम् ॥ १२६॥ धन्या गोस्तनदुग्धाशनिमग्नास्ता न संशयः । मयात्रिकथ्यते नाहि त्वमस्य वचनान्मम ॥ १२७॥ उपदेशं करिष्यामि नतोऽहं तव वत्सलः । इत्याद्यं वचनं श्रुत्वा कौसल्या विस्मिता तदा ॥ १२८॥ मत्वा रामं ममार्तं न तूर्णमेव गृहं ययौ । ततो निजं समभ्यर्च्य कौसल्याऽथारुणोदये ॥ १२९॥ गोष्ठं गत्वा क्षणं स्थित्वा धेनुवत्सरवाञ्च सा । अह मा नित्विति श्रुत्वा सुश्रवा वै मुहुर्मुहुः ॥ १३०॥ तानि वाक्यानि वत्सानां श्रुत्वा चित्तेऽविचारयत् । अह मानित्विति रुतस्य किं भवेदिति सुस्पष्टुम् ॥ १३१॥ इमानि किं बोधयन्ति मां वत्साश्च मुहुर्मुहुः । इत्यात्माराममथ ध्यात्वा हृदि सम्यग्विचार्य च ॥ १३२॥ वत्सवक्यार्थं कौसल्या गताऽथात्मारामं ययौ । तत्र गत्वाऽथ तं रामं नत्वा तं प्राह हर्षिता ॥ १३३॥ राम विष्णो रमानाथ वनदाऽहं परात्मने । भव्यंऽहं रामचन्द्र गताज्ञानाऽस्मि राघव ॥ १३४॥ तवोपदेशवाञ्छा मे न किञ्चिद्रामचन्द्र मयि । लब्धत्वाज्ज्ञानं मया रामावनावस्मिन् कदापि न ॥ १३५॥ तन्मातृवचनं श्रुत्वा कौसल्यां प्राह राघवः । वत्सानां वैः कथं लब्धं त्वया ज्ञानं वदस्व माम् ॥ १३६॥ तद्राघववचनं श्रुत्वा कौसल्या प्राह राघवम् । अह मानित्वि वाक्यानि तेषां श्रुत्वा रघूत्तम ॥ १३७॥ इमानि किं बोधयन्ति मां वत्सोक्तिरिति वै मुहुः । एवं विचारितं ध्यात्वा क्षणं स्वहृदये मया ॥ १३८॥ वाक्यार्थश्च मया ज्ञातस्त्वहं मानं करोति जनः । यस्तस्माद्देव वेश्यन्ति न ज्ञानेन जनेन्सु यत् ॥ १३९॥ अहङ्कारी देहपदो यदा स्यात्सो व्यर्थश्च हि । अतः देहि वह मावा चेति बुद्धिर्गता मम ॥ १४०॥
॥ १२१-१२३ ॥ एक दिन सीताके साथ रामको चित्रशालामें देखकर उनकी माता कौसल्या उन एकान्त स्थानमें रामके पास आ गई और उस प्रकार सन्मान किया और कहने लगी— हे महाबाहो राम ! मुझे भी कुछ उपदेश दे दो। तुम साक्षात् प्रभु जुझ भक्तोंकी भक्ति ही जानते ॥ १२४॥ १२५॥ माताकी ऐसी बात सुनी तो उन्होंने मुस्कराकर कहा कि आप गोशालामें जाइए और वहांपर कुछ देर तक बछड़ोंकी आवाज सुनकर उसपर ध्यानकर के विचार कर फिर मेरे पास आइए। उस समय इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मैं आपको उपदेश दूंगा। रामका यह वचन सुनकर कौसल्या विस्मित भावसे सोचा और रामको प्रणाम करके अपने महलमें चली गईं। तदनन्तर अपने नित्यकर्म समाप्तकरके अरुणोदयके समय कौसल्या गोशालेमें पहुँचीं, वहाँ थोड़ी देर तक उन्होंने बछड़ोंकी आवाज सुनी। बछड़े "अहंभा-अहंमा" की आवाज लगा रहे थे और कौसल्या शान्त चित्तसे विचारने लगीं ॥ १२६-१३० ॥ बछड़ोंके इन वाक्योंको सुनकर उन्होंने अपने मनमें विचार किया कि यह बछड़ा बार-बार "अहं मा" कह कर चिल्ला रहा है इसका क्या मतलब है। ये बछड़े बार-बार चिल्ला कर क्या शिक्षा सीख रहे हैं। ऐसा सोचकर कौसल्या ने थोड़ी देर तक ध्यानपूर्वक इन बातोंपर विचार किया जिससे क्षणभरमें उनका अज्ञान नष्ट हो गया और प्रसन्न मनसे रामके पास पहुंचीं। वहाँ रामको प्रणाम करके कहने लगीं ॥ १३१-१३३ ॥ हे रमानाथ ! हे राम ! हे विष्णो ! आपके कथनानुसार मैंने बछड़ोंकी आवाज सुनी जिससे मेरा अज्ञान नष्ट हो गया, इससे अब हमें आपका उपदेश सुननेकी इच्छा नहीं है। इस प्रकार अज्ञान दूर होनेपर मैं जन्म और मरणसे कोई भय नहीं देखती ॥ १३४, १३५ ॥ इस प्रकार कौसल्याके वचन सुनकर रामने उनसे कहा कि उन बछड़ोंके शब्दसे तुमने ज्ञान किस प्रकार प्राप्त हुआ, कृपाकरके बताइए ॥ १३६ ॥ रामके वचन सुनकर कौसल्याने कहा कि जबके 'अहं मानित्वं' इस प्रकारके मुहुर्मुहुः कहते हैं कि ये बछड़े अपने वाक्यसे किस बातका बोध करा रहे हैं। तदन्तर मैंने अपने मनमें विचार किया ॥ १३७, १३८ ॥ तब मुझे उसका अर्थ ज्ञात हो गया। जिसका तात्पर्य यह था कि हे संसारके लोगों ! 'अहं मा वद' मैं हूँ, ऐसा अहंकार मत करो। ये बछड़े सदा लोगोंको यह पुकार उपदेश देते रहते हैं। फिर भी लोग नहीं समझ पाते ॥ १३९ ॥ मैंने