भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५९


देहबुद्धिर्यदा नष्टा तदा किं शेषमस्ति हि । सुखं दुःखं तु देहस्य न मे किञ्चिद्भवेन्नर ॥४१॥
तिष्ठन्त्वयं वा पततु देहो भोगाश्रयः प्रभो । अहं स्वदंश एवात्र पृथगुपाधिकः स्मृताः ॥४२॥
यथा कुम्भे गर्भिण्यो दृश्यन्तेऽत्र ह्युपाधितः । तथोऽहं ... भिन्ना व्योमवद्व्यापको ह्यहम् ॥४३॥
इति तन्मातृवचनं श्रुत्वा रामः स्मिताननः । कौशल्यां प्राह जननीं मुक्ताऽस्म्यत्र न संशयः ॥४४॥
मयाप्येवं स्थितं चित्ते द्वावद्याप्यर्थं विमृश्य । गच्छ पितुः सुतं गेहे नित्यं बुद्धिं दृढां कुरु ॥४५॥
किमर्थं न मया पूर्वं युष्मभ्यमुपदेशनम् हि । उपदेशः गुरुर्ज्ञेयः सन्मर्त्ये न्य निक्षिपम् ॥४६॥
उपदेशो गुरुर्ज्ञेयो युष्माकं तनयोस्म्यहम् । कथं युष्मास्वत्र मान्यन्माह चोपदि शाम्यहं ॥४७॥
स्त्रीणां पतिर्गुरुर्ज्ञेयः श्रीनिर्मान्यो गुरुः सदा । कार्यस्तस्मान्मया नैव युष्मभ्यं स्वाम्योपदेशिकम् ॥४८॥
पौराणां च गुरुश्वात्तथा स्वीयपुरोहितः । अननेन यदि नया स्वान्दास्योपदेशिकम् ॥४९॥
परार्थ्यरेव पृथक्काप्युपदेशः कृतो मया । गच्छ गेहे पुरा तिष्ठ सदा मां परिचिन्तय ॥५०॥
इदं रामवचनं श्रुत्वा कौशल्या तुष्टमानसा । रामं नत्वा ययौ गेहं प्रहृष्टा संस्थिता सुखम् ॥५१॥
एवं ता रामचन्द्रेण प्रेषिता मातरः शुभाः । स्वस्वान्तःपुरे सर्वे सर्वाः व्यहेतान्मुमुदुः सुखम् ॥५२॥
रामसान्निध्यमात्रेण विमुक्तास्तन्मयास्थिताः । रामु गन्तुं वैकुण्ठं राघवेश्चैव संस्तुताः ॥५३॥
शिष्य तासां महद्रूपं यासां गणादिनिर्मिभिः । एतन्ले करादिस कर्मक हर्योऽभवन्निर्विषाः ॥५४॥
एवं शिष्य मया प्रोक्ता नामामृतमगोश्वर । उपदेशस्तथा तासां प्रोक्ताश्चाग्रेव ते मया ॥५५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ... सर्गः ॥ २ ॥


जब यह समझ लिया है कि यह 'देह' मेरा देहम् रूपान्तर अथवा छू-आत्मभाव से तबसे मैंने इसका परित्याग कर दिया है। परमात्माके रूपसे मेरा यह द्वैतबुद्धि भी नष्ट हो गयी है कि मे इनकी हूँ ॥४०॥ जब कि यह बुद्धि नष्ट हो गयी, तब फिर बची ही क्या वस्तु । हे रघुनन्दन ! मैने समझा है कि म... के भोग हेतु इस देह रहे हैं अथवा गिर पड़े ।४१। भोगोंका आश्रयस्वरूपिणी यह काया रहे अथवा गिर जाय। हे प्रभो ! वास्तवमें तो मैं आपका एक अंश हूँ । माताभाव तो केवल उपाधिमात्र है ॥ ४२ ॥ जिस तरह ईश कि घामने घट रख देनेपर उसमें एक सूर्य और दिख... देने लगता है आपस के म... के व... म... भी पृथक् ही नही सकती । मै ही ब्रह्मा हूँ । ॥४३॥ इस प्रकार ... माता के वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी मुस्कराते हुए बोले माता ! तुम आज मुक्त हो गयीं। ... मे भी यही स्थिति थी ... । इस विषय पर बहुत देरतक विचार किया है। अब जाओ, आनन्दसे घरपर रहो और अपनी इस बुद्धि को दृढ बनाये रक्खो ॥४४, ४५॥ हे मातेश्वरी ! जब आप लोगोंने मुझसे उपदेश सुनना चाहा था और मैने कुछ काल टाल दिया ... जब उपदेश दिया, उसका भी कारण सुनो ॥ ४६ ॥ इसमें यह भेद है कि स्वामि... मान्य होता है, किन्तु मै आपका पुत्र हूँ । ऐसी दशामें उपदेश कैसा हो ? ॥४७॥ स्त्री...का भी कहना है कि पतिको ही गुरु मानती हैं, और किसी को अपना गुरु न बनाए । इसीलिये मैने आपको अपने मुंहसे कुछ भी उपदेश नहीं दिया । ४८, ४९॥ प्रत्येक दूसरेको के द्वारा उपदेश दिलाया। जाओ परम आनन्दपूर्वक बैठे और निरन्तर मेरा ध्यान करती रहो ।५०। रामकी बात सुनकर कौशल्या प्रसन्न मनसे अपने घरपर चली गयीं और सुखपूर्वक रहने लगीं ॥५१॥ इस तरह रामचन्द्रजीके द्वारा उपदेश पाकर वे अपनी बहुओं सहित सब अन्तःपुरमे लौट आयीं और साधु-ध्यानमे लीन होकर इन दिन व्यतीत करने लगीं ॥५२॥ रामके नाम स्मरणके प्रभावसे मुक्तप्राय होकर वे सब वैकुण्ठधाम गयीं ॥५३॥ हे शिष्ये ! इन माताओंके इस भव्य चरित्रको सुनकर प्राणी अनेक प्रकारके दुःखदायी पापोसे छूट जाते है और मुक्त हो जाते हैं । ॥५४॥ इस प्रकार ... माताओं के नामस्मरणके माहात्म्य तथा उपदेश आदि कह सुनाया ॥५५॥ इति श्रीमत्कोटिकल्पचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २