श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
तृतीयः सर्गः
( रामपूजाका विस्तार )
विष्णुदास उवाच
कथं श्रीराघवस्यात्र रामोपासकमानवैः। कार्या वै मानसी पूजा बहिःपूजा तथा शुभा ॥ १ ॥
कथं वोपासना ग्राह्या गुरो श्रीराघवस्य च । का श्रेष्ठोपासना चात्र कः श्रेष्ठोऽत्र गुरुस्तथा ॥ २ ॥
के के मन्त्रा राघवस्य भक्तानां सिद्धिकायकाः । तिथिभेदेन तस्य किं किं तत्तोषवर्द्धनम् । ३ ॥
कः श्रेष्ठोऽत्र वरो देवो यस्य ग्राह्या ह्युपासना । तन्मे विस्तरेणैव गुरो त्वं वक्तुमर्हसि । ४ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु। सर्वं तद्विस्तरेणाथ त्वदग्रे कथ्यते मया ॥ ५ ॥
आदौ गुरु परीक्ष्यात्र तच्चिह्नैश्च द्विजोत्तम । उपदेशस्ततस्तस्माद्ग्राह्योऽतीर्थे विधानतः ॥ ६ ॥
गुरोश्चैवात्र चिह्नानि तत्रादौ प्रवदाम्यहम् । क्रोधी कुष्ठी महारोगी मलिनो निर्घृणो जडः ॥ ७ ॥
अपण्डितो निन्दकश्च लोलुपो विषयातुरः । दांभिको गर्वसंयुक्तः पापात्मा दुष्टवंशजः । ८ ।
घाती परद्रोहकर्ता परद्रव्यापहारकः । अजितात्मा वेदवाह्यः परदाररतः सदा ॥ ९ ॥
परदोषारोपकश्च कृपणश्चाजितेन्द्रियः । वेददैवद्विजातीनां यतितीर्थगवामपि ॥१०॥
तुलसीवह्रिसूर्याणां द्वेष्टा योग्यो गुरुर्न हि । वेत्ता सकलधर्माणां शास्त्रेषु परिनिष्ठितः ॥११॥
सत्यवाङ् मितभुग्ज्ञानी कुलाभिज्द्विजोत्तमः । सत्कर्मनिष्ठो धर्माणांमुपदेष्टा सुबुद्धिदः ॥१२॥
योगाभ्यासकलाभिज्ञो योगवान्समदर्शनः । कृतकर्मा तीर्थसेवी धर्माधर्मविवेचकः ॥१३॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । स्वाश्रमाचारसनिष्ठो बुद्धिमान्विजितेन्द्रियः ॥१४॥
विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! इस संसारम रामकी उपासना करनेवालोंको रामकी मानसी पूजा किस प्रकार करनी चाहिए ? ॥ १ ॥ और फिर गुरुके पासस उपासना किस प्रकार ग्रहण करनी चाहिए ? समस्त उपासनाओंमें सर्वश्रेष्ट उपासना कौन-सी है और श्रेष्ठ गुरु कैसा होता है भा भो बतला दीजिए॥ २ ॥ साथ ही यह भी बतलाइए कि रामके कौन कौनसे ऐसे मन्त्र हैं जिनसे भक्तोका आनन्द प्राप्त होता है। कौन-कौनसी तिथियां ऐसी हैं, जिनसे भक्तोंका मन्न सन्तुष्ट होता है । ३ । इस संसारमें कौन श्रेष्ठ देवता है, जिसकी उपासना की जाय । हे गुरो यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ ४ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमन बहुत अच्छी बात पूछी है। मै तुम्हारे प्रश्नके अनुसार सारी बातें विस्तारपूर्वक कहता हूँ। सावधान होकर सुनो ॥ ५ ॥ लोगोको चाहिये कि पहले गुरुकी परीक्षा करके उनके चिह्न समझ । इसके अनन्तर किसी पवित्र तीर्थम उनसे विधिवत् उपदेश ग्रहण करे ॥ ६ ॥ प्रकृतूवश पहले मै तुम्हें गुरुके लक्षण बतलाता हूँ। जो क्रोधी, कुष्ठी, महारोगका रोगी (जिसको भूत-वेताल आदि लगत हों), मैला कुचैला, निर्दयी, जड़ ॥ ७ ॥ अपण्डित, अच्छा बुरा न जाननेवाला), निन्दक. लोलुप, विषयी, पाखण्डी, अभिमानी, पापी दूषित कुलमें उत्पन्न ॥ ८ । विश्वासघाती दूसरेसे द्रोह करनेवाला, दूसरेका धन अपहरण करनेवाला, अजितात्मा (जिसने अपनी आत्माको नहीं जीता है) वेदसे बहिष्कृत (नास्तिक, दूसरेकी स्त्रीसे प्रेम करनेवाला ॥ ९ ॥ दूसरेपर दोषारोप करनेवाला, कृपण (कंजूस) तथा वेद, देवता, ब्राह्मण, सन्त, तीर्थ, गौ, तुलसी, अग्नि और सूर्य इनसे द्वेष रखनेवाला हा ऐसोको भूलकर भी गुरु नहीं बनाना चाहिए। जो सब धर्मोका ज्ञाता, शास्त्रोपर विश्वास करनेवाला ॥ १० ॥ ११ ॥ सत्य बोलनेवाला, मिताहारी, ज्ञानी, कुलाबिद ब्राह्मणके वंशम उत्पन्न अच्छे कामोम लगा हुआ, धर्मका उपदेश अच्छी बुद्धि देनेवाला ॥ १२॥ योगाभ्यासकी कलाओंका ज्ञाता, योगी, सबको समान दृष्टिसे देखनेवाला, केवल उपदेश न देकर स्वयं कर्म करनेवाला, तीर्थसेवी, धर्म अधर्मकी विवेचना करनेमे निपुण ॥ १३॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थाश्रमी, योगी,