श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३ ] मनोहरकाण्डम् ५७१
धर्मी कृपालुर्मृदुवाक् सुमुखः सौम्यदर्शनः । अनिशं समुद्योगी शान्तात्मा परतोषकः ॥१४॥
औदार्यवान् ज्ञाननिष्ठः शुचिरुत्पन्नसंग्रहः । इत्यादिगुणयुक्तो यः स गुरुः परमोत्तमः ॥१५॥
तस्य सेवां चिरं कृत्वा सेवया तं प्रसाद्य च । तस्मादुपासना ग्राह्या सुतीर्थे विधिपूर्विका ॥१६॥
उपासनास्त्रयः सन्ति सात्त्विकी राजसी तथा । तामसी च तृतीया सा गर्हिताऽत्र निगद्यते ॥१७॥
भूतवेतालकूष्माण्डपिशाचानामुपासना । सा ज्ञेया तामसी घोरा देवानां सात्त्विकी स्मृता ॥१८॥
यक्षाणां राक्षसानां च या ज्ञेया सा तु राजसी । शैवा शौरेश्च गाणेशाः शाक्ताश्च वैष्णवास्तथा ॥१९॥
अवतारस्तदस्मत्याः पञ्चानां सन्ति भूतले । तेषामुपासना ग्राह्या गुरोरास्याद् द्विजन्मभिः ॥२०॥
पञ्चानामवतारेषु विष्णोरेव वदाम्यहम् । चतुश्चत्वारिंशन्मितानवतारान्महत्त्वमान् ॥२१॥
पुरुषोत्तमो विधिश्चैव रुद्रो नारायणस्तथा । हंसोऽथ दत्तात्रेयश्च कुमारो ऋषभस्तथा ॥२२॥
हयग्रीवस्तथा मत्स्यः कूर्मो वाराह एव च । नारसिंहो वामनश्च जामदग्न्यस्तथैव च ॥२३॥
रामः कृष्णस्तथा बौद्धः कल्किर्यज्ञो हरिश्च सः । वालखिन्योऽथोड्डारङ्कश्च पृथुर्धन्वन्तरिस्तथा ॥२४॥
मोहिनी नारदो व्यासः कपिलः केशवस्तथा । माधवाख्य गोविन्दो मधुसूदन एव च ॥२५॥
त्रिविक्रमः श्रीधरश्च पद्मनाभस्तथा स्मृतः । दामोदरस्तथा सङ्कर्षणः प्रद्युम्न एव च ॥२६॥
अनिरुद्धोऽच्युतश्च शङ्खनाथ जनार्दनः । उपेन्द्र हृषीकेशश्चैते ज्ञेया महत्तमाः ॥२७॥
मत्स्याद्या अवताराश्च दशैतेष्वपि चोत्तमाः । दशावतारमध्येऽपि रामकृष्णौ महत्तमौ ॥२८॥
ताभ्यामपि वरः पूर्णः सत्यसन्धो रघूत्तमः । एकपत्नीव्रतो वीरस्त्वेकबाणो नृपोत्तमः ॥२९॥
सहस्रौघपतिः श्रीमांश्छत्रचामरमण्डितः । एवं ज्ञात्वोपासनाऽत्र ग्राह्या श्रीरामचन्द्र च ॥३०॥
गुरूपदिष्टविधिना सुमुहूर्ते शुभस्थले । अथवा तन्नरेन्द्राणां ग्राह्या तज्जन्ममस्तियो ॥३१॥
जिस आश्रममें हो उसके नियमोंका पालन करनेवाला बुद्धिमान्, इन्द्रियोंका वशमें रखनेवाला, ॥१४॥ क्षमाशील, कृपालु मधुरभाषी, अच्छे मुखवाला, सौम्यदर्शी, कम सानेवाला, सदा उद्योगमें लगा हुआ, शान्तात्मा, दूसरोंका प्रसन्न करनेवा लाहो, ॥१५॥ उदार ज्ञाननिष्ठ पवित्र और दान आदि ग्रहण करनेमें पराङ्मुख, इन गुणोंसे विभूषित पुरुष ही उत्तम गुरु होता है ।१६।। ऐसे गुरुका बहुत दिनोंतक सेवा करके उसे प्रसन्न करे । तब किसी अच्छे तीर्थमें उससे विधिपूर्वक उपासनाका उपदेश ग्रहण करे ।।१७।। उपासना भी तीन प्रकारकी होती है। सात्त्विकी, राजसी और तामसी । इनमेंसे तामसी उपासना निन्दित मानी गयी है ।। १८ ।। भूत, वेताल, कूष्माण्ड और पिशाच आदिकी घोर उपासना तामसी कही गयी है। देवताओंकी उपासना सात्त्विकी कही जाती है ॥१९॥ यक्षों और राक्षसोंकी उपासना राजसी उपासना कहलाती है शिव, सूर्य, गणेश, शक्ति तथा विष्णु इन पाँचों देवोंके अगणित अवतार हैं। लोगोंको चाहिये कि गुरुके मुखसे इन्हीं पाँच देवतामसे किसी एककी उपासना ग्रहण करें ।। २० ।। २१ ।। ऊपर कहे गये देवताओंमें से यहाँ विष्णु भगवान्के बडे बडे चौतालीस अवतार बतला रहा हूँ ।। २२ ।। पुरुषोत्तम, गरुड नारायण, हंस, दत्तात्रेय, कुमार, ऋषभ हयग्रीव, मत्स्य, कूर्म वराह नृसिंह वामन परशुराम, । २३ । २४ ।। राम कृष्ण, बौद्ध, कल्कि, यज्ञ, हरि, बालखिल्य, उद्धारक पृथु, धन्वन्तरि मोहिनी, नारद व्यास, कपिल, केशव, माधव, गोविन्द, मधुसूदन, ।२५।। २६ । त्रिविक्रम श्रीधर, पद्मनाभ, दामोदर, संकर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, अच्युत, शङ्खुन जनार्दन, उपेन्द्र और हृषीकेश ये श्रेष्ठ अवतार माने गये हैं। इन अवतारोंमें भी मत्स्य-कूर्मादि दस अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं और इन दशोंमें भी राम और कृष्ण श्रेष्ठ माने गये हैं । २७ ।। २८ ।। २९ । इन दोनोंमें भी सत्यप्रतिज्ञ रामचन्द्र सबसे श्रेष्ठ हैं। क्योंकि ये एकपत्नीव्रती वीर एक बाणधारी और सब राजाओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ३० ॥ ये साठौ हौघेके अधिपति, श्रीमान्, छत्र और चमरसे सुशोभित हैं। ऐसा समझकर भक्तोंको चाहिए कि गुरुके द्वारा उपदिष्ट विधिके अनुसार अच्छे मुहूर्त तथा पवित्र स्थानमें श्रीरामचन्द्रजीकी उपासनाका मन्त्र लें। अथवा ऊपर गिनाये देवताओंमेंसे जिनपर जिसकी रुचि हो, उसको