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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

५६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २

मेमेमत्या बहिर्जाता चाऽस्माकं सकला जनाः। मेमेबुद्धिगता ह्येषुत्वां गतिः सैव भविष्यति ॥९१॥
एवं तो बोधयन्त्यत्र जनान्प्रत्यवचोभिः सदा। न तद्वाक्यं जनैर्बुद्ध्या कदा चित्ते विचार्यते ॥९२॥
तासां वाक्यौघदाहेन प्रनष्टा मेमतेः स्मरा। मेमेबुद्धिर्गता प्रत्यक्सोऽहं मुक्तोऽस्म्यहं न्विह ॥९३॥
मे देहोऽस्तिति संबुद्धेर्यत् मनः संप्रदाह तदा कि शेषमत्र्यत्र संसारे दुःखदायके ॥९४॥
अस्त्वद्य वाऽद्य यातु देहः सोऽस्त्वस्तु न । कः पुत्रः कस्य को भ्राता सर्वं ब्रह्म न संशयः ॥९५॥
अहमेवं परं ब्रह्म मनो मत्परं न हि। यत् यदुच्यते चेदं मायैषा तव राघव ॥९६॥
नश्वरां बुद्बुदाकारं ज्ञानं चेदं सदा प्रभो । इत्येवं वचः श्रुत्वा श्रीरामः प्राह सस्मितः ॥९७॥
सम्यग् विचारितं बुद्ध्या त्वयाऽपि भवनाशनम् । गच्छेतानीं सुखं गेहे जीवन्मुक्ताऽधुना ह्यसि ॥९८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कैकेयी तोषमागता। देहाभिमानहीना सा नत्वा सीतां रघूत्तमम् ॥९९॥
ययौ भरतगेहे हि नामक्ता क्वापि मानव्रते । एवं शिष्य मया प्रोक्तमवियाक्योपदेशतः ॥१००॥
यथा ज्ञानं हि कैकेय्यै ज्ञातं तल्लिखितं तव । इदानीं शृणु यच्चान्यत्ते वदामि कुतूहलम् ॥१०१॥
सुमित्रा त्वेकदा रामं सीतया रहसि स्थितम् । विलोक्य नत्वा तं प्राह राम राजीवलोचन ॥१०२॥
किंचिते प्रार्थयाम्यद्य किंचिदुपदिशस्व माम् । तस्या वचनं श्रुत्वा तामाह रघुनन्दनः ॥१०३॥
का त्वं चेति वदाग्रे मां पश्चादुपदिशामि ते । गच्छ गेहं स्वस्थ्यबुद्ध्या हृदि सम्यग्विचार्य च ॥१०४॥
श्वो मामेत्य मम प्रश्नस्योत्तरं देहि वै ततः। महदुपदेशमास्येऽद्य येन तुष्टा भविष्यसि ॥१०५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सुमित्रा विस्मितानना। तूष्णीमेव ययौ गेहं रामवाक्यं व्यचिन्तयत् ॥१०६॥
काऽहं पृष्टा राघवेण किं वा देयं मयोत्तरम् । काऽहं देवी चामुता वा मानवी राक्षसी तथा ॥१०७॥
मानुषी चेत्पदं मत्वा यदि रामं वदामि वै। तर्हि नानादुरीराणि ध्रियन्ते नटवन्मया ॥१०८॥


छोड़ना चाहिए कि इस ममताका परित्याग कर दें, इसका आधार बर्त्ताव करें ॥ ९० ॥ ९०॥ 'यह मेरा है' इस बुद्धिमें पड़ने कि प्राप्त सङ्कटा जो गति हमारी हुई है वही गति तुम्हारी भी होगी ॥ ९१ ॥ अपनी वचनोंसे वे सबदा सब लोगोंको उपदेश देती रहती है। किन्तु संसारी लोग उनका बातोंपर विचार नहीं करते ॥ ९२ ॥ हे राघव ! आपको कृपा और उन बातोंके सदृश मेरा ममतामोह नष्ट हो गया है। इसलिए अब मैं मुक्त हो गयी हूँ ॥ ९३ ॥ 'यह देह मेरा है' इस अवस्था में आमत्व था। वह दम्भदायिनी भ्रान्ति नष्ट हो गयी तब और रह ही क्या गया है। यहां कौन किसका बेटा है, कौन किसकी माता है? सब सच्चिदानन्दमय ब्रह्मका रूप है। इसमें न संशय नहीं है। ९४-९५ ॥ यह जो प्रकष्ट है। मुझमें दरे कुछ है ही नहीं। हे राघव ! संसारमें जो कुछ दिखायी पड़ रहा है, वह सब तुम्हारा माया है। ९६ ॥ मैंने इस अध्रुव शरीरको पानीके बुलबुलेकी तरह नश्वर समझ लिया है। इस प्रकार कैकेयीकी बात सुनकर मुस्कराते हुए राम बोले - ॥ ९७ ॥ ठीक है, तुमने भेदोंकी बातपर बहुत अच्छा विचार किया है। अब जाओ और सुखसे अपने घरमें बैठो। हे कैकेयी ! अब तुम जीवन्मुक्त हो गयी हो ॥ ९८ ॥ रामका ज्ञान सुनकर प्रसन्न मन कैकेयी देहाभिमानसे रहित होकर सीता तथा रामको प्रणाम करके अपने बेटे भरतके भवनमें चली गयी और तबसे वह किसी वस्तुमें आसक्त नहीं हुई। इस प्रकार ब्रह्माकी बातसे कैकेयीको जिस तरह ज्ञान प्राप्त हुआ था, सो वृत्तांत कह सुनाया। अब मैं तुम्हें एक और कुतूहल भरा वृत्तांत सुनाता हूँ। ९९-१०१ । एक दिन राम सीताके साथ किसी एकान्त स्थानमे बैठे थे। तब तक सुमित्रा वहाँ आ पहुंची और कहने लगीं हे राजीवलोचन राम ! मै तुमसे विनय करती हूँ कि मुझे भी कुछ उपदेश दे दो। उसकी बात सुनकर रामने कहा- पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो? अपने घर जाओ और स्वस्थबुद्धिसे विचार करके कल मेरे पास आकर बताओ। उस समय मै तुम्हें ऐसा उपदेश दूंगा, जिससे तुम बहुत प्रसन्न होओगी ॥ १०२-१०५ ॥ इस तरह रामका आदेश सुनकर वह आश्चर्य भरे मनसे उसी बातको सोचती हुई चुपचाप चली गयीं ॥ १०६ ॥ वह सोचने लगी कि

सर्गः २] मनोहरकाण्डम् ५६७

सर्गः २] मनोहरकाण्डम् ५६७


तदा ह्यहं मानुषीन्द्रमन्य जन्म्यां घटेन्न मे । यदाहं मानुषी नैव न चैवान्या कदाचन ॥१०९॥ मानुषी राक्षसी चैवीत्यादि नामानि यानि च । देहापेक्षेण वर्त्तन्ते देहस्तु नश्वरः स्मृतः ॥११०॥ देहाद्भिन्नोऽस्मि काष्ठेभ्यो यथा वह्निर्विवेकिनाम् । धार्यमाणोऽथ भूत्वाऽहं धारये चेति वेद्म्यहम् ॥१११॥ इदानीं तु मया ज्ञातं यथा विष्णुस्तथा त्वहम् । नानारूपाणि सोऽप्यत्र मत्स्यादीनि दधाति हि ॥११२॥ तथा नानाम्वरूपाणि धार्यन्तेऽत्रापि वै मया । एवमेव हि वस्त्वस्ति नहि मे तस्य चान्तरम् ॥११३॥ स्वतन्त्रोऽस्ति महाविष्णुस्त्वहं विष्णुवशा गता । अतो विष्णोः कला चाहं मन्येयं मदाशयः ॥११४॥ विष्णोर्मे नैव भेदोऽस्ति यथा गङ्गाजले घटे । तत्रैवाssपत्य तद्गच्छे द्विश्वगेवाह्यमस्मि हि ॥११५ । अहमेव यदा विष्णुस्तदा किं चावशेषितम् । व्यष्टव्यं न ममाद्य जीवन्मुक्ताऽहमस्मि वै ॥११६॥ एवं सुमित्रा संचिन्त्य गताज्ञाना मुदान्विता । अतिलङ्घ्य निशां सा भा प्रभाते राघवं ययौ ॥११७॥ गत्वा रामं तदा प्राह मया सर्वं विचिन्तितम् । का त्वं पृष्टो मया पूर्वं तदहं ननु राघव ॥११८॥ स्वतो नान्यच्च प्रष्टव्यं त्वद्विद्वाऽहं कदापि न । इत्युक्त्वा सा यथा गेहे निश्चित्य हृदि मद्रितम् ॥११९॥ तत्सर्वं श्रावयित्वा तं जीवन्मुक्ताऽभवत्तदा सुमित्रां राघवोऽप्याह गच्छाय यथा विचिन्तितम् १२०। जीवन्मुक्ताऽसि चाध्वन्त्वं गच्छ गेहं सुखं वस । ततः सुमित्रा नमस्कृत्य गच्छेण नृपसत्तम ॥१२१॥ सीतां चापि पृथक् नीत्वा ययौ लक्ष्मणगेहकम् । एवं विचार्य मया प्रोक्तं काऽहं चेति विचारणः ॥१२२॥ जीवन्मुक्ता सुमित्रा सा बभूव सुवनिर्मला । अन्यच्च ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व द्विजोत्तम ॥१२३॥

रामने हमसे यही पूछा है न कि मै कान हूं ? सो इसका क्या उत्तर दे । आखिर मै देवी हूं, दानवी हूं, राक्षसी हूं या मानुषी या क्या हूं ? यदि रामसे जाकर कहूं कि मै मानुषी हूं, तो भी नहीं बनता । क्योंकि ऐसा कहना हम नाटकक पात्रका तरह अनेक रूप धारण करने वाले हैं । इससे निश्चय हुआ कि मैं न मानुषी हूं, न और हो कुछ । पूर्वापर बात मानुषी आदि सारे शरीरों हम देखती हूँ और यह देह नाशवान् पदार्थ है। इससे यह मालूम होता है कि इन समस्त पूर्व्व हो मै धारि हूं और पूर्वापर तरह तरहके रूप धारण करती हूँ। लेकिन यह जो मैं हूँ वह तो नहीं नष्ट जान पड़ता ॥ ११० - १११ ॥ हाँ, सब यह ज्ञात हुआ। जिस तरह भगवान् अनेक रूप धारण करके इस दृष्टिमण्डलमे आते हैं ठीक उसीकी तरह मै भी हूं । वे भी मत्स्य-कूर्म आदि कितने अवतार धारण करके आते हैं तो मैं भी इस समय मनुष्य विवेचक प्रकारक रूप धारण करके जगतम मै भी जाती आती हूं । फिर हम और विष्णु भगवान्‌मे अन्तर ही क्या है ? ॥११२॥११३॥ अन्तर यही है कि विष्णु स्वाधीन है और मै विष्णुभगवान केही अधीन हूं। अतएव यह निश्चय हुआ कि मै विष्णुभगवान्‌की एक कला हूँ ॥ ११४ ॥ अब यह भी निश्चित हो गया कि हममे और भगवानमे कोई भेद नहीं है। जिस तरह गङ्गाका जल गङ्गाके प्रवाहस बहता हुआ गङ्गाजल रहता है, उसी तरह घटमे आकर भी गङ्गाजल ही रहता है। इसका सार यह निकला कि हममें और भगवान्‌में कोई भेद नहीं है। हम और भगवान् एक ही है। जब मै स्वयं विष्णुभगवान् हूं तो बाकी क्या रहा जो जाकर रामसे पूछूं । मैं तो जीवन्मुक्त हूँ ॥११५॥११६॥ इस प्रकार विचार करनेसे उनका अज्ञान नष्ट हो गया। वह रात्रि बिताकर सवेरे प्रसन्नतापूर्वक रामके पास पहुंचीं । ११७ ॥ वहां रामको प्रणाम करके सुमित्रा कहने लगीं-कल आपने मुझसे जो पूछा था कि मै कौन हूं ? सो विचार करनेपर मुझे मालूम हुआ कि मैं साक्षात् ब्रह्म ही हूं ॥ ११८ ॥ अब मुझे आपसे कुछ भी नहीं पूछना है । क्योंकि मैं आपसे पृथक् हूँ ही नहीं ऐसा कहकर रात्रिमे उन्होंने अपने हृदयमें जैसा विचार किया था सो कह सुनाया । वह सब सुनकर वह वास्तवमे जीवन्मुक्त हो गयी यह सीखकर रामने कहा- हे माता ! तुमने बहुत ठीक विचार किया है ॥ ११९ ॥ १२० ॥ अब तुम जीवन्मुक्त हो गयी। जाकर आनन्दसे अपने घरमे निवास करो। इससे सुमित्राका मोह नष्ट हो गया और वे राम तथा सीता दोनोंको अलग अलग प्रणाम करके लक्ष्मणके यहां चली गयी। हे शिष्य ! इस विचारसे कि मै कौन हूं, सुमित्रा जीवन्मुक्त हो गयीं और उनके आनन्दका ठिकाना नहीं रहा। हे द्विजोत्तम ! मै तुम्हें एक और वृतान्त बतलाता हूं, सो सुनो

५१८आनन्दरामायणे[ सर्गः २

एकदा राघवं दृष्ट्वा कौसल्या जानकी रहः । आसने चित्रशालायां सीतया सह संस्थितम् ॥ १२४॥ एकान्तेऽथ समेत्याथ श्रीरामं सान्त्व्य विष्णुमव्ययम् । राम त्वं महतामहो किञ्चिदुपदिशस्व माम् ॥ १२५॥ तन्मातृवचनं श्रुत्वा श्रीरामो विस्मयं ह्यगात् । चाप्रभाते समुत्थाय गन्ता गोष्ठं कियान्क्षणम् ॥ १२६॥ धन्या गोस्तनदुग्धाशनिमग्नास्ता न संशयः । मयात्रिकथ्यते नाहि त्वमस्य वचनान्मम ॥ १२७॥ उपदेशं करिष्यामि नतोऽहं तव वत्सलः । इत्याद्यं वचनं श्रुत्वा कौसल्या विस्मिता तदा ॥ १२८॥ मत्वा रामं ममार्तं न तूर्णमेव गृहं ययौ । ततो निजं समभ्यर्च्य कौसल्याऽथारुणोदये ॥ १२९॥ गोष्ठं गत्वा क्षणं स्थित्वा धेनुवत्सरवाञ्च सा । अह मा नित्विति श्रुत्वा सुश्रवा वै मुहुर्मुहुः ॥ १३०॥ तानि वाक्यानि वत्सानां श्रुत्वा चित्तेऽविचारयत् । अह मानित्विति रुतस्य किं भवेदिति सुस्पष्टुम् ॥ १३१॥ इमानि किं बोधयन्ति मां वत्साश्च मुहुर्मुहुः । इत्यात्माराममथ ध्यात्वा हृदि सम्यग्विचार्य च ॥ १३२॥ वत्सवक्यार्थं कौसल्या गताऽथात्मारामं ययौ । तत्र गत्वाऽथ तं रामं नत्वा तं प्राह हर्षिता ॥ १३३॥ राम विष्णो रमानाथ वनदाऽहं परात्मने । भव्यंऽहं रामचन्द्र गताज्ञानाऽस्मि राघव ॥ १३४॥ तवोपदेशवाञ्छा मे न किञ्चिद्रामचन्द्र मयि । लब्धत्वाज्ज्ञानं मया रामावनावस्मिन् कदापि न ॥ १३५॥ तन्मातृवचनं श्रुत्वा कौसल्यां प्राह राघवः । वत्सानां वैः कथं लब्धं त्वया ज्ञानं वदस्व माम् ॥ १३६॥ तद्राघववचनं श्रुत्वा कौसल्या प्राह राघवम् । अह मानित्वि वाक्यानि तेषां श्रुत्वा रघूत्तम ॥ १३७॥ इमानि किं बोधयन्ति मां वत्सोक्तिरिति वै मुहुः । एवं विचारितं ध्यात्वा क्षणं स्वहृदये मया ॥ १३८॥ वाक्यार्थश्च मया ज्ञातस्त्वहं मानं करोति जनः । यस्तस्माद्देव वेश्यन्ति न ज्ञानेन जनेन्सु यत् ॥ १३९॥ अहङ्कारी देहपदो यदा स्यात्सो व्यर्थश्च हि । अतः देहि वह मावा चेति बुद्धिर्गता मम ॥ १४०॥


॥ १२१-१२३ ॥ एक दिन सीताके साथ रामको चित्रशालामें देखकर उनकी माता कौसल्या उन एकान्त स्थानमें रामके पास आ गई और उस प्रकार सन्मान किया और कहने लगी— हे महाबाहो राम ! मुझे भी कुछ उपदेश दे दो। तुम साक्षात् प्रभु जुझ भक्तोंकी भक्ति ही जानते ॥ १२४॥ १२५॥ माताकी ऐसी बात सुनी तो उन्होंने मुस्कराकर कहा कि आप गोशालामें जाइए और वहांपर कुछ देर तक बछड़ोंकी आवाज सुनकर उसपर ध्यानकर के विचार कर फिर मेरे पास आइए। उस समय इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मैं आपको उपदेश दूंगा। रामका यह वचन सुनकर कौसल्या विस्मित भावसे सोचा और रामको प्रणाम करके अपने महलमें चली गईं। तदनन्तर अपने नित्यकर्म समाप्तकरके अरुणोदयके समय कौसल्या गोशालेमें पहुँचीं, वहाँ थोड़ी देर तक उन्होंने बछड़ोंकी आवाज सुनी। बछड़े "अहंभा-अहंमा" की आवाज लगा रहे थे और कौसल्या शान्त चित्तसे विचारने लगीं ॥ १२६-१३० ॥ बछड़ोंके इन वाक्योंको सुनकर उन्होंने अपने मनमें विचार किया कि यह बछड़ा बार-बार "अहं मा" कह कर चिल्ला रहा है इसका क्या मतलब है। ये बछड़े बार-बार चिल्ला कर क्या शिक्षा सीख रहे हैं। ऐसा सोचकर कौसल्या ने थोड़ी देर तक ध्यानपूर्वक इन बातोंपर विचार किया जिससे क्षणभरमें उनका अज्ञान नष्ट हो गया और प्रसन्न मनसे रामके पास पहुंचीं। वहाँ रामको प्रणाम करके कहने लगीं ॥ १३१-१३३ ॥ हे रमानाथ ! हे राम ! हे विष्णो ! आपके कथनानुसार मैंने बछड़ोंकी आवाज सुनी जिससे मेरा अज्ञान नष्ट हो गया, इससे अब हमें आपका उपदेश सुननेकी इच्छा नहीं है। इस प्रकार अज्ञान दूर होनेपर मैं जन्म और मरणसे कोई भय नहीं देखती ॥ १३४, १३५ ॥ इस प्रकार कौसल्याके वचन सुनकर रामने उनसे कहा कि उन बछड़ोंके शब्दसे तुमने ज्ञान किस प्रकार प्राप्त हुआ, कृपाकरके बताइए ॥ १३६ ॥ रामके वचन सुनकर कौसल्याने कहा कि जबके 'अहं मानित्वं' इस प्रकारके मुहुर्मुहुः कहते हैं कि ये बछड़े अपने वाक्यसे किस बातका बोध करा रहे हैं। तदन्तर मैंने अपने मनमें विचार किया ॥ १३७, १३८ ॥ तब मुझे उसका अर्थ ज्ञात हो गया। जिसका तात्पर्य यह था कि हे संसारके लोगों ! 'अहं मा वद' मैं हूँ, ऐसा अहंकार मत करो। ये बछड़े सदा लोगोंको यह पुकार उपदेश देते रहते हैं। फिर भी लोग नहीं समझ पाते ॥ १३९ ॥ मैंने

सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५९


देहबुद्धिर्यदा नष्टा तदा किं शेषमस्ति हि । सुखं दुःखं तु देहस्य न मे किञ्चिद्भवेन्नर ॥४१॥
तिष्ठन्त्वयं वा पततु देहो भोगाश्रयः प्रभो । अहं स्वदंश एवात्र पृथगुपाधिकः स्मृताः ॥४२॥
यथा कुम्भे गर्भिण्यो दृश्यन्तेऽत्र ह्युपाधितः । तथोऽहं ... भिन्ना व्योमवद्व्यापको ह्यहम् ॥४३॥
इति तन्मातृवचनं श्रुत्वा रामः स्मिताननः । कौशल्यां प्राह जननीं मुक्ताऽस्म्यत्र न संशयः ॥४४॥
मयाप्येवं स्थितं चित्ते द्वावद्याप्यर्थं विमृश्य । गच्छ पितुः सुतं गेहे नित्यं बुद्धिं दृढां कुरु ॥४५॥
किमर्थं न मया पूर्वं युष्मभ्यमुपदेशनम् हि । उपदेशः गुरुर्ज्ञेयः सन्मर्त्ये न्य निक्षिपम् ॥४६॥
उपदेशो गुरुर्ज्ञेयो युष्माकं तनयोस्म्यहम् । कथं युष्मास्वत्र मान्यन्माह चोपदि शाम्यहं ॥४७॥
स्त्रीणां पतिर्गुरुर्ज्ञेयः श्रीनिर्मान्यो गुरुः सदा । कार्यस्तस्मान्मया नैव युष्मभ्यं स्वाम्योपदेशिकम् ॥४८॥
पौराणां च गुरुश्वात्तथा स्वीयपुरोहितः । अननेन यदि नया स्वान्दास्योपदेशिकम् ॥४९॥
परार्थ्यरेव पृथक्काप्युपदेशः कृतो मया । गच्छ गेहे पुरा तिष्ठ सदा मां परिचिन्तय ॥५०॥
इदं रामवचनं श्रुत्वा कौशल्या तुष्टमानसा । रामं नत्वा ययौ गेहं प्रहृष्टा संस्थिता सुखम् ॥५१॥
एवं ता रामचन्द्रेण प्रेषिता मातरः शुभाः । स्वस्वान्तःपुरे सर्वे सर्वाः व्यहेतान्मुमुदुः सुखम् ॥५२॥
रामसान्निध्यमात्रेण विमुक्तास्तन्मयास्थिताः । रामु गन्तुं वैकुण्ठं राघवेश्चैव संस्तुताः ॥५३॥
शिष्य तासां महद्रूपं यासां गणादिनिर्मिभिः । एतन्ले करादिस कर्मक हर्योऽभवन्निर्विषाः ॥५४॥
एवं शिष्य मया प्रोक्ता नामामृतमगोश्वर । उपदेशस्तथा तासां प्रोक्ताश्चाग्रेव ते मया ॥५५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ... सर्गः ॥ २ ॥


जब यह समझ लिया है कि यह 'देह' मेरा देहम् रूपान्तर अथवा छू-आत्मभाव से तबसे मैंने इसका परित्याग कर दिया है। परमात्माके रूपसे मेरा यह द्वैतबुद्धि भी नष्ट हो गयी है कि मे इनकी हूँ ॥४०॥ जब कि यह बुद्धि नष्ट हो गयी, तब फिर बची ही क्या वस्तु । हे रघुनन्दन ! मैने समझा है कि म... के भोग हेतु इस देह रहे हैं अथवा गिर पड़े ।४१। भोगोंका आश्रयस्वरूपिणी यह काया रहे अथवा गिर जाय। हे प्रभो ! वास्तवमें तो मैं आपका एक अंश हूँ । माताभाव तो केवल उपाधिमात्र है ॥ ४२ ॥ जिस तरह ईश कि घामने घट रख देनेपर उसमें एक सूर्य और दिख... देने लगता है आपस के म... के व... म... भी पृथक् ही नही सकती । मै ही ब्रह्मा हूँ । ॥४३॥ इस प्रकार ... माता के वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी मुस्कराते हुए बोले माता ! तुम आज मुक्त हो गयीं। ... मे भी यही स्थिति थी ... । इस विषय पर बहुत देरतक विचार किया है। अब जाओ, आनन्दसे घरपर रहो और अपनी इस बुद्धि को दृढ बनाये रक्खो ॥४४, ४५॥ हे मातेश्वरी ! जब आप लोगोंने मुझसे उपदेश सुनना चाहा था और मैने कुछ काल टाल दिया ... जब उपदेश दिया, उसका भी कारण सुनो ॥ ४६ ॥ इसमें यह भेद है कि स्वामि... मान्य होता है, किन्तु मै आपका पुत्र हूँ । ऐसी दशामें उपदेश कैसा हो ? ॥४७॥ स्त्री...का भी कहना है कि पतिको ही गुरु मानती हैं, और किसी को अपना गुरु न बनाए । इसीलिये मैने आपको अपने मुंहसे कुछ भी उपदेश नहीं दिया । ४८, ४९॥ प्रत्येक दूसरेको के द्वारा उपदेश दिलाया। जाओ परम आनन्दपूर्वक बैठे और निरन्तर मेरा ध्यान करती रहो ।५०। रामकी बात सुनकर कौशल्या प्रसन्न मनसे अपने घरपर चली गयीं और सुखपूर्वक रहने लगीं ॥५१॥ इस तरह रामचन्द्रजीके द्वारा उपदेश पाकर वे अपनी बहुओं सहित सब अन्तःपुरमे लौट आयीं और साधु-ध्यानमे लीन होकर इन दिन व्यतीत करने लगीं ॥५२॥ रामके नाम स्मरणके प्रभावसे मुक्तप्राय होकर वे सब वैकुण्ठधाम गयीं ॥५३॥ हे शिष्ये ! इन माताओंके इस भव्य चरित्रको सुनकर प्राणी अनेक प्रकारके दुःखदायी पापोसे छूट जाते है और मुक्त हो जाते हैं । ॥५४॥ इस प्रकार ... माताओं के नामस्मरणके माहात्म्य तथा उपदेश आदि कह सुनाया ॥५५॥ इति श्रीमत्कोटिकल्पचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २

५७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


तृतीयः सर्गः

( रामपूजाका विस्तार )

विष्णुदास उवाच

कथं श्रीराघवस्यात्र रामोपासकमानवैः। कार्या वै मानसी पूजा बहिःपूजा तथा शुभा ॥ १ ॥
कथं वोपासना ग्राह्या गुरो श्रीराघवस्य च । का श्रेष्ठोपासना चात्र कः श्रेष्ठोऽत्र गुरुस्तथा ॥ २ ॥
के के मन्त्रा राघवस्य भक्तानां सिद्धिकायकाः । तिथिभेदेन तस्य किं किं तत्तोषवर्द्धनम् । ३ ॥
कः श्रेष्ठोऽत्र वरो देवो यस्य ग्राह्या ह्युपासना । तन्मे विस्तरेणैव गुरो त्वं वक्तुमर्हसि । ४ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु। सर्वं तद्विस्तरेणाथ त्वदग्रे कथ्यते मया ॥ ५ ॥
आदौ गुरु परीक्ष्यात्र तच्चिह्नैश्च द्विजोत्तम । उपदेशस्ततस्तस्माद्ग्राह्योऽतीर्थे विधानतः ॥ ६ ॥
गुरोश्चैवात्र चिह्नानि तत्रादौ प्रवदाम्यहम् । क्रोधी कुष्ठी महारोगी मलिनो निर्घृणो जडः ॥ ७ ॥
अपण्डितो निन्दकश्च लोलुपो विषयातुरः । दांभिको गर्वसंयुक्तः पापात्मा दुष्टवंशजः । ८ ।
घाती परद्रोहकर्ता परद्रव्यापहारकः । अजितात्मा वेदवाह्यः परदाररतः सदा ॥ ९ ॥
परदोषारोपकश्च कृपणश्चाजितेन्द्रियः । वेददैवद्विजातीनां यतितीर्थगवामपि ॥१०॥
तुलसीवह्रिसूर्याणां द्वेष्टा योग्यो गुरुर्न हि । वेत्ता सकलधर्माणां शास्त्रेषु परिनिष्ठितः ॥११॥
सत्यवाङ् मितभुग्ज्ञानी कुलाभिज्द्विजोत्तमः । सत्कर्मनिष्ठो धर्माणांमुपदेष्टा सुबुद्धिदः ॥१२॥
योगाभ्यासकलाभिज्ञो योगवान्समदर्शनः । कृतकर्मा तीर्थसेवी धर्माधर्मविवेचकः ॥१३॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । स्वाश्रमाचारसनिष्ठो बुद्धिमान्विजितेन्द्रियः ॥१४॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! इस संसारम रामकी उपासना करनेवालोंको रामकी मानसी पूजा किस प्रकार करनी चाहिए ? ॥ १ ॥ और फिर गुरुके पासस उपासना किस प्रकार ग्रहण करनी चाहिए ? समस्त उपासनाओंमें सर्वश्रेष्ट उपासना कौन-सी है और श्रेष्ठ गुरु कैसा होता है भा भो बतला दीजिए॥ २ ॥ साथ ही यह भी बतलाइए कि रामके कौन कौनसे ऐसे मन्त्र हैं जिनसे भक्तोका आनन्द प्राप्त होता है। कौन-कौनसी तिथियां ऐसी हैं, जिनसे भक्तोंका मन्न सन्तुष्ट होता है । ३ । इस संसारमें कौन श्रेष्ठ देवता है, जिसकी उपासना की जाय । हे गुरो यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ ४ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमन बहुत अच्छी बात पूछी है। मै तुम्हारे प्रश्नके अनुसार सारी बातें विस्तारपूर्वक कहता हूँ। सावधान होकर सुनो ॥ ५ ॥ लोगोको चाहिये कि पहले गुरुकी परीक्षा करके उनके चिह्न समझ । इसके अनन्तर किसी पवित्र तीर्थम उनसे विधिवत् उपदेश ग्रहण करे ॥ ६ ॥ प्रकृतूवश पहले मै तुम्हें गुरुके लक्षण बतलाता हूँ। जो क्रोधी, कुष्ठी, महारोगका रोगी (जिसको भूत-वेताल आदि लगत हों), मैला कुचैला, निर्दयी, जड़ ॥ ७ ॥ अपण्डित, अच्छा बुरा न जाननेवाला), निन्दक. लोलुप, विषयी, पाखण्डी, अभिमानी, पापी दूषित कुलमें उत्पन्न ॥ ८ । विश्वासघाती दूसरेसे द्रोह करनेवाला, दूसरेका धन अपहरण करनेवाला, अजितात्मा (जिसने अपनी आत्माको नहीं जीता है) वेदसे बहिष्कृत (नास्तिक, दूसरेकी स्त्रीसे प्रेम करनेवाला ॥ ९ ॥ दूसरेपर दोषारोप करनेवाला, कृपण (कंजूस) तथा वेद, देवता, ब्राह्मण, सन्त, तीर्थ, गौ, तुलसी, अग्नि और सूर्य इनसे द्वेष रखनेवाला हा ऐसोको भूलकर भी गुरु नहीं बनाना चाहिए। जो सब धर्मोका ज्ञाता, शास्त्रोपर विश्वास करनेवाला ॥ १० ॥ ११ ॥ सत्य बोलनेवाला, मिताहारी, ज्ञानी, कुलाबिद ब्राह्मणके वंशम उत्पन्न अच्छे कामोम लगा हुआ, धर्मका उपदेश अच्छी बुद्धि देनेवाला ॥ १२॥ योगाभ्यासकी कलाओंका ज्ञाता, योगी, सबको समान दृष्टिसे देखनेवाला, केवल उपदेश न देकर स्वयं कर्म करनेवाला, तीर्थसेवी, धर्म अधर्मकी विवेचना करनेमे निपुण ॥ १३॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थाश्रमी, योगी,

सर्गः ३ ] मनोहरकाण्डम् ५७१


धर्मी कृपालुर्मृदुवाक् सुमुखः सौम्यदर्शनः । अनिशं समुद्योगी शान्तात्मा परतोषकः ॥१४॥
औदार्यवान् ज्ञाननिष्ठः शुचिरुत्पन्नसंग्रहः । इत्यादिगुणयुक्तो यः स गुरुः परमोत्तमः ॥१५॥
तस्य सेवां चिरं कृत्वा सेवया तं प्रसाद्य च । तस्मादुपासना ग्राह्या सुतीर्थे विधिपूर्विका ॥१६॥
उपासनास्त्रयः सन्ति सात्त्विकी राजसी तथा । तामसी च तृतीया सा गर्हिताऽत्र निगद्यते ॥१७॥
भूतवेतालकूष्माण्डपिशाचानामुपासना । सा ज्ञेया तामसी घोरा देवानां सात्त्विकी स्मृता ॥१८॥
यक्षाणां राक्षसानां च या ज्ञेया सा तु राजसी । शैवा शौरेश्च गाणेशाः शाक्ताश्च वैष्णवास्तथा ॥१९॥
अवतारस्तदस्मत्याः पञ्चानां सन्ति भूतले । तेषामुपासना ग्राह्या गुरोरास्याद् द्विजन्मभिः ॥२०॥
पञ्चानामवतारेषु विष्णोरेव वदाम्यहम् । चतुश्चत्वारिंशन्मितानवतारान्महत्त्वमान् ॥२१॥
पुरुषोत्तमो विधिश्चैव रुद्रो नारायणस्तथा । हंसोऽथ दत्तात्रेयश्च कुमारो ऋषभस्तथा ॥२२॥
हयग्रीवस्तथा मत्स्यः कूर्मो वाराह एव च । नारसिंहो वामनश्च जामदग्न्यस्तथैव च ॥२३॥
रामः कृष्णस्तथा बौद्धः कल्किर्यज्ञो हरिश्च सः । वालखिन्योऽथोड्डारङ्कश्च पृथुर्धन्वन्तरिस्तथा ॥२४॥
मोहिनी नारदो व्यासः कपिलः केशवस्तथा । माधवाख्य गोविन्दो मधुसूदन एव च ॥२५॥
त्रिविक्रमः श्रीधरश्च पद्मनाभस्तथा स्मृतः । दामोदरस्तथा सङ्कर्षणः प्रद्युम्न एव च ॥२६॥
अनिरुद्धोऽच्युतश्च शङ्खनाथ जनार्दनः । उपेन्द्र हृषीकेशश्चैते ज्ञेया महत्तमाः ॥२७॥
मत्स्याद्या अवताराश्च दशैतेष्वपि चोत्तमाः । दशावतारमध्येऽपि रामकृष्णौ महत्तमौ ॥२८॥
ताभ्यामपि वरः पूर्णः सत्यसन्धो रघूत्तमः । एकपत्नीव्रतो वीरस्त्वेकबाणो नृपोत्तमः ॥२९॥
सहस्रौघपतिः श्रीमांश्छत्रचामरमण्डितः । एवं ज्ञात्वोपासनाऽत्र ग्राह्या श्रीरामचन्द्र च ॥३०॥
गुरूपदिष्टविधिना सुमुहूर्ते शुभस्थले । अथवा तन्नरेन्द्राणां ग्राह्या तज्जन्ममस्तियो ॥३१॥


जिस आश्रममें हो उसके नियमोंका पालन करनेवाला बुद्धिमान्, इन्द्रियोंका वशमें रखनेवाला, ॥१४॥ क्षमाशील, कृपालु मधुरभाषी, अच्छे मुखवाला, सौम्यदर्शी, कम सानेवाला, सदा उद्योगमें लगा हुआ, शान्तात्मा, दूसरोंका प्रसन्न करनेवा लाहो, ॥१५॥ उदार ज्ञाननिष्ठ पवित्र और दान आदि ग्रहण करनेमें पराङ्मुख, इन गुणोंसे विभूषित पुरुष ही उत्तम गुरु होता है ।१६।। ऐसे गुरुका बहुत दिनोंतक सेवा करके उसे प्रसन्न करे । तब किसी अच्छे तीर्थमें उससे विधिपूर्वक उपासनाका उपदेश ग्रहण करे ।।१७।। उपासना भी तीन प्रकारकी होती है। सात्त्विकी, राजसी और तामसी । इनमेंसे तामसी उपासना निन्दित मानी गयी है ।। १८ ।। भूत, वेताल, कूष्माण्ड और पिशाच आदिकी घोर उपासना तामसी कही गयी है। देवताओंकी उपासना सात्त्विकी कही जाती है ॥१९॥ यक्षों और राक्षसोंकी उपासना राजसी उपासना कहलाती है शिव, सूर्य, गणेश, शक्ति तथा विष्णु इन पाँचों देवोंके अगणित अवतार हैं। लोगोंको चाहिये कि गुरुके मुखसे इन्हीं पाँच देवतामसे किसी एककी उपासना ग्रहण करें ।। २० ।। २१ ।। ऊपर कहे गये देवताओंमें से यहाँ विष्णु भगवान्के बडे बडे चौतालीस अवतार बतला रहा हूँ ।। २२ ।। पुरुषोत्तम, गरुड नारायण, हंस, दत्तात्रेय, कुमार, ऋषभ हयग्रीव, मत्स्य, कूर्म वराह नृसिंह वामन परशुराम, । २३ । २४ ।। राम कृष्ण, बौद्ध, कल्कि, यज्ञ, हरि, बालखिल्य, उद्धारक पृथु, धन्वन्तरि मोहिनी, नारद व्यास, कपिल, केशव, माधव, गोविन्द, मधुसूदन, ।२५।। २६ । त्रिविक्रम श्रीधर, पद्मनाभ, दामोदर, संकर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, अच्युत, शङ्खुन जनार्दन, उपेन्द्र और हृषीकेश ये श्रेष्ठ अवतार माने गये हैं। इन अवतारोंमें भी मत्स्य-कूर्मादि दस अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं और इन दशोंमें भी राम और कृष्ण श्रेष्ठ माने गये हैं । २७ ।। २८ ।। २९ । इन दोनोंमें भी सत्यप्रतिज्ञ रामचन्द्र सबसे श्रेष्ठ हैं। क्योंकि ये एकपत्नीव्रती वीर एक बाणधारी और सब राजाओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ३० ॥ ये साठौ हौघेके अधिपति, श्रीमान्, छत्र और चमरसे सुशोभित हैं। ऐसा समझकर भक्तोंको चाहिए कि गुरुके द्वारा उपदिष्ट विधिके अनुसार अच्छे मुहूर्त तथा पवित्र स्थानमें श्रीरामचन्द्रजीकी उपासनाका मन्त्र लें। अथवा ऊपर गिनाये देवताओंमेंसे जिनपर जिसकी रुचि हो, उसको

५७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


चैत्रे मासि दिने पक्षे नवम्यां रामजन्मनि । उपासनान्तरं हि रामं भक्त्या प्रपूजयेत् ॥ ३३ ॥
एवं यस्यानतारस्य गृहीतोपासना नरैः । वैस्तस्य जन्मदिवसे कार्या पूजा महोत्सवैः ॥ ३४ ॥
अथो दशावताराणां शिष्य जन्मदिनानि ते । प्रोच्यन्तेऽत्र शृणुष्व त्वं येषु सम्पूजयेन्नरः ॥ ३५ ।
चैत्रे तु शुक्लपञ्चम्यां भगवान्मीनरूपधृक् । ज्येष्ठे तु शुक्लद्वादश्यां कूर्मरूपधरो हरिः ॥ ३६ ।
चैत्रे कृष्णनवम्यां तु हरिवाराहरूपधृक् । वैशाखेऽभूच्चतुर्दश्यां शुक्लपक्षे नृकेसरी . ३७ ।
मासि भाद्रपदे शुक्ले द्वादश्यां वामनोऽभवत् । वैशाखे जामदग्न्यस्तु तृतीयायां सिते त्वभूत् । ३८ ।
चैत्रे शुक्लनवम्यां तु मध्याह्ने राघवस्त्वभूत् । कृष्णाष्टम्यां श्रावणे हि कृष्णोऽभून्मधुरापुरि ॥ ३९ ।
पौषे शुक्ला सप्तमी या बुद्धजन्मतिथिस्तु सा । माघे शुक्लतृतीया तु कल्किनः सा तिथिः स्मृता ॥ ४० ॥
अह्नो मध्ये वामनो राघवो मौ मत्स्यः क्रोडश्चापराह्णे विभागे ।
कूर्मः सिंहो बुद्धकल्कौ च सायं कृष्णो रात्रौ कालसाम्ये च पूर्वे ॥ ४१ ॥
एवं तज्जन्मकालञ्च ज्ञात्वा तेषामुपासकैः । उत्सवः परमः कार्यस्तत्तद्देवप्रपूजने ॥ ४२ ॥
नित्यपूजा प्रकर्तव्या भक्त्या तैस्तूपुपासकैः । विशेषतज्जन्मदिवसे कार्य तन्पूजनं मुदा ॥ ४३ ।
गुरोर्गृहीतो यो मन्त्रस्तं नित्यं हृदये जपेत् । राममन्त्रास्त्वनेकाश्च शतान्येकत्रिंशन्मतो मनुः ॥ ४४ ।
पञ्चाशद्वर्णकश्चापि द्विचत्वारिंशदक्षरः द्वात्रिंशदक्षाश्च सप्तविंशाक्षरस्तथा ॥ ४५ ॥
पञ्चविंशद्वर्णकश्च चतुर्विंशाक्षरस्तथा एकविंशद्वर्णकश्च विशद्वर्णात्मकस्तथा । ४६ ।
अष्टादशवर्णकश्च षोडशाक्षर एव च । पञ्चदशवर्णकश्च चतुर्दशाक्षरस्तथा ॥ ४७ ॥
त्रयोदशाक्षरश्चापि द्वादशाक्षर एव च एकादशाक्षरश्चापि तथा मन्त्रो दशाक्षरः ॥ ४८ '
नवाक्षरोऽष्टवर्णश्चापि सप्ताक्षरमनुस्तथा । षडक्षरो राममन्त्रस्तथा पञ्चाक्षरो मनुः ॥ ४९ ।

जन्मतिथिपर उसकी उपासना ग्रहण करे । ३२ ॥ ३३ । रामकी उपासना ग्रहण करनेवालोको चाहिए कि चैत्रमासके शुक्लपक्षमें नवमी (रामजन्म) के दिन उपासना ग्रहण करे । उसके बाद भक्तिपूर्वक रामका पूजन करे ॥ ३३॥ इस तरह जिस अवतारकी उपासना ग्रहण करती हो, उसके जन्मदिनपर महान् उत्सवके साथ पूजा करना चाहिए ॥ ३४ ॥ हे शिष्य ! अब मैं तुम्हे दशो अवतारोंके जन्मदिवस बतलाता हूँ। जिसमें नरको अपने उपास्य देवताका पूजन करना चाहिए । ३५॥ चैत्र शुक्ल पञ्चमीको भगवान् मत्स्यावतार लिया था । ज्येष्ठ शुक्लपक्षकी द्वादशीको भगवान् कूर्मरूप धारण किया था । चैत्र कृष्ण नवमीको भगवान्ने बाराहरूप धारण किया था । वैशाख शुक्ल चतुर्दशीको नृसिंहरूप धारण किया था । ३६ ॥ ३७॥ भाद्रपद शुक्ल द्वादशीको वामनरूप धारण किया था । वैशाख शुक्ल तृतीयाको वे परशुराम बने थे । ३८ ॥ चैत्र शुक्ल नवमीको मध्याह्नकालमें भगवान्ने रामका अवतार लिया था । भाद्रपद कृष्णपक्षकी अष्टम को भगवान्ने मधुरामें कृष्णरूपस अवतार लिया था । ३९ । पौष शुक्ल सप्तमीको बुद्धकी जन्मतिथि होती है । माघ शुक्ल तृतीयाको कल्कि भगवान्की जन्मतिथि होती है । ४० । दोपहरके समय वामन, राम और कल्कीका जन्म हुआ था । मत्स्य वाराह इन दोनोंका जन्म दिनके तीसरे पहर हुआ था । कूर्म, नृसिंह, बुद्ध और कल्कीका अवतार सन्ध्याके समय हुआ था और श्रीकृष्णचन्द्रजीका जन्म आधी रातको हुआ था । ४१॥ इस प्रकार अपने अपने उपास्य देवोका जन्मकाल जानकर उस समय महान् उत्सव मनाते हुए उनकी पूजा करनी चाहिए ॥ ४२ ॥ उपासकोको उचित है कि नित्य अपने आराध्य देवकी पूजा करें । विशेषकर उनके जन्मदिवसकी उत्सव और पूजन अवश्य करना चाहिये ॥ ४३ ॥ गुरुसे जो मन्त्र मिले, हृदयमें सर्वदा उसका जप करता रहे । राममन्त्र भी अनेक प्रकारके हैं । उनमेंसे एक सौ अक्षरोंका, एक पचास अक्षरोंका, एक बयालिस अक्षरोंका, एक बत्तीस अक्षरोंका, एक सत्ताइस अक्षरोंका, एक चौबीस अक्षरोंका, एक इक्कीस अक्षरोंका, एक बीस अक्षरोंका, ॥ ४४-४६॥ एक अठारह अक्षरोंका, एक सोलह अक्षरोंका, एक पन्द्रह अक्षरोंका, एक चौदह अक्षरोंका, एक तेरह अक्षरोंका, एक बारह अक्षरोंका, एक ग्यारह अक्षरोंका, एक दश

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५७३

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५७३


चतुर्वर्णात्मकश्चापि तथा वर्णत्रयात्मकः । द्व्यक्षरो राममन्त्रश्च मनुष्वेकाक्षरोऽपि च ॥ ५० ॥
एवं नानाविधा मन्त्राः सन्त्येतेष्व महत्तमाः । गुरोस्त्वेकं गृहीत्वाऽत्र जपेन्मत्रीतमस्तधीः ॥ ५१ ॥
उपासनाविधानं च रामोपासकमानवैः । यथा मन्त्रस्य रूपं हि विज्ञेयं मन्त्रशास्त्रतः ॥ ५२ ॥
अधुना मानसी पूजाविधानं च मयोच्यते । दण्डके सुतीक्ष्णाय कथितं कुम्भजन्मना ॥ ५३ ॥
सुतीक्ष्णस्त्वेकदाऽगत्य दृष्ट्वा रहसि संस्थितम् । प्रणम्य भक्त्या मन्त्रार्थं प्रापाय विनयान्वितः ॥ ५४ ॥

सुतीक्ष्ण उवाच
हृदये मानसी पूजा कीदृशी च वद प्रभो । उपचारैः कतिविधैः पूज्यते रघुनन्दनः ॥ ५५ ॥

अगस्त्य उवाच
रामं पद्मविशालाक्षं कालाम्बुदसमप्रभम् । पद्मासनस्थं सुखमासीनं चिन्तयेच्चित्तपुष्करे ॥ ५६ ॥
रागादिकंलुषं चित्तं वैराग्येण सुनिश्चितम् । कृत्वा भवभयान्मुक्त्यै रामं भावयितुं क्षमे ॥ ५७ ॥
प्रातः शुद्धवपुर्भूत्वा त्यक्त्वा दम्भादिकानधः । विविक्तदेशमाविश्य ध्यानं पूजां समारभेत् ॥ ५८ ॥
नाभिकुण्डसमुद्भूतं कदलीकुसुमोपमम् । अधोवक्त्रं स्निग्धवर्णं ध्यायेद्धृदयपङ्कजम् ॥ ५९ ॥
तन्मध्ये रामनाम्नैव फुल्लं कृत्वाऽस्य मध्यमे । भानुसोमाग्निसण्डलाननुभावयेत् ॥ ६० ॥
तस्योपरि न्यसेद्देवं पीठं रत्नमपोज्ज्वलम् । तन्मध्ये राघवं ध्यायेत्सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ ६१ ॥
इन्दीवरनिभं शांतं विशालाक्षं सुवक्त्रकम् । उद्यद्दिवाकराभ-कुण्डलाभ्यां विराजितम् ॥ ६२ ॥
सुनासं सुकिरीटं च सुकपोलं शुचिस्मितम् । विज्ञानमुद्रां द्विभुजं कम्बुग्रीवं सुकुन्तलम् ॥ ६३ ॥
नानारत्नमयैर्हारैर्मणिभिश्चोपशोभितम् । विद्युत्पुञ्जप्रतीकाशं धनुर्बाणधरं हरिम् ॥ ६४ ॥


अक्षरोंका, एक नौ अक्षरोंका एक आठ अक्षरोंका, एक सात अक्षरोंका, एक छ अक्षरोंका, एक पाँच अक्षरोंका, एक चार वर्णोंका, एक तीन अक्षरोंका, एक दो अक्षरोंका और एक एक अक्षरका राममंत्र है ॥ ४७-५० ॥ एक तरह अनेक प्रकारके राममन्त्र हैं। उपासकको चाहिये कि उनमेंसे किसी जो एक मंत्रको गुरुसे ग्रहण करे और श्रीरामचन्द्रजीके पास बैठकर उसका जप करे ॥ ५१ ॥ रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि उपासनाकी विधि और मन्त्रका स्वरूप मन्त्रशास्त्रसे समझ लें ॥ ५२ ॥ अब मैं यहाँ रामकी मानसी पूजाका विधान बतला रहा हूँ। जिसे कि दण्डक वनमें अगस्त्यजीने सुतीक्ष्ण ऋषिको बतलाया था ॥ ५३ ॥ एक दिन अगस्त्यजी एकान्तमें बैठे थे। उस समय मुनीन्द्रने आकर परम भक्तसे अगस्त्यको प्रणाम किया और विनयपूर्वक बहुत स्तुति ॥ ५४ ॥ सुतीक्ष्णने कहा—हे प्रभो ! उपासकोंका मानसी पूजा कैसे करनी चाहिये। इस पूजामें किन किन उपचारोंसे रामका पूजन किया जाता है, सो आप बतलाइये ॥ ५५ ॥ अगस्त्यने कहा कि उपासकको चाहिये कि पहले वह अपने हृदयरूपी कमलपर बैठे हुए रामका इस प्रकार ध्यान करे—जिनके कमलकी तरह विशाल नेत्र हैं। काल मेघके समान नील वर्ण है। मुस्कराता हुआ मुख है और वे आनन्दपूर्वक बैठे हैं। ॥ ५६ ॥ उपासकका यह भी कर्तव्य है कि रागद्वेष आदिसे कलुषित चित्तको वैराग्यसे निर्गल कर ले। तब भवपाशसे मुक्त होनेके लिए रामका ध्यान करे ॥ ५७ ॥ सबेरे शरीरको पवित्र करके दम्भादि सर्वथा छोडकर किसी एकान्त स्थानमें ध्यान और पूजन करे ॥ ५८ ॥ नाभि-कुण्डसे निकले हुए कदलीपुष्पके समान आठ दलोंवाले और खिले हृदयरूपी कमलका ध्यान करे ॥ ५९ ॥ उस कमलको रामनामसे विकसित करके बीचमें सूर्य, शश एवं अग्निमण्डलके दा अधिक प्रकाशमान तेजका ध्यान करे ॥ ६० ॥ उसपर रत्नमय उज्ज्वल पीठको रखनेकी भावना करके उसके बीचोंबीच करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान रामका ध्यान करे। ६१ ॥ कमलका भाई जिनका विशाल आँख है। चमकती हुई दीप्तिसे प्रकाशित कुण्डल जिनके कानोंमें पड़े हैं ॥ ६२ ॥ जिनकी सुन्दर नासिका है, जो सुन्दर किरीट धारण किये हैं, जिनका सुन्दर कपोल है, मीठी मुसकान है, वे विज्ञानमुद्रा धारण किये हैं, उनकी दो भुजाएँ हैं, शंखके समान ग्रीवा है, उनके काले और चमकते हुए केशपाश हैं, जो अनेक रत्नोंसे जुडी दिव्य माला पहने हैं, जिनका छबी भी

५७४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३


वीरासनस्थं संतानतरुमूलनिवासिनम् । महासुगन्धलिप्ताङ्गं वनमालाविराजितम् ॥ ६५ ॥
वामपार्श्वे स्थितां सीतां चामीकरसमप्रभाम् । लीलावसन्धरां देवीं चारुहासां शुचिस्मिताम् ॥ ६६ ॥
पश्यन्तीं स्निग्धया दृष्ट्या दिव्यां कल्पविराचिताम् । छत्रचामरहस्तेन लक्ष्मणेन सुसेवितम् ॥ ६७ ॥
हनुमत्प्रमुखैर्नित्यं वानरैः परिवारितम् । स्तूयमानमृषिगणैः सेवितं भरतादिभिः ॥ ६८ ॥
सनन्दनादिभिश्चाग्रेयोगिवृन्दैः स्तुतं सदा । सर्वशास्त्रार्थकुशलं योगदं योगसिद्धिदम् ॥ ६९ ॥
एवं ध्यात्वा रामचन्द्रं मणिवृक्षसुशोभितम् । शुद्धेन मनसा रामं पूजयेत्सततं हृदि । ७० ॥

इति ध्यानम् ।

आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् । कौशल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥ ७१ ॥
राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते । रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥ ७२ ॥
श्रीरामागच्छ भगवन् रघुवीर रघूत्तम । जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ७३ ॥
रामचन्द्र महेष्वास रावणांतक राघव । यावत्पूजां समाप्येऽहं तावत्त्वं सन्निधौ भव ॥ ७४ ॥
रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलोचन । रघुवंशज मे देव श्रीरामाभिमुखो भव ७५ ॥
प्रसीद जानकीनाथ सुप्रसिद्ध सुरेश्वर । प्रत्यक्षी भव मे राजन् सर्वज्ञ मधुसूदन ॥ ७६ ॥
शरणं मे जगन्नाथ शरणं भक्तवत्सल । वरदो भव मे राजन् शरणं मे रघूत्तम । ७७ ॥
त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक । पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन । ७८ ।
परिपूर्ण परानन्द नमो रामाय वेधसे । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन । ७९ ।
ॐ नमो वासुदेवाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । मधुपर्कं गृहाणाम राजांगजाय ते नमः । ८० ॥


विनाश नहीं होता, जो विद्युद्युक्त समान रङ्ग। हुए वस्त्रोंके जोड़े पहने हैं, वीरासनसे बैठे हैं, कल्पवृक्षके नीचे निवास करत हैं, उत्तम सुगन्धि जिनके शरीरभरमें लगा हुई है और वन वनमाला धारण किये हुए हैं ॥ ६५ ॥
जिनके बांये बगलमे सीताजी बैठी हैं, उनका भी सुवर्ण का सा तेज है, व हाथमें लीलारकमल लिये हैं, मुखपर मन्द मुस्कराहट है, सुन्दर चेहरा है ओर प्रेमभरी दृष्टिसे रामका निहारती हुई कल्पवृक्षके नीचे बैठी हैं हाथम छत्र और चमर लेकर लक्ष्मणजी उनकी सेवा कर रहे हैं ॥ ६६ । ६७ ॥ हनुमान आदि वानरोंसे व नित्य घिरे रहते हैं। कितने ही ऋषि स्तुति करते हैं और भरत आदि भ्राता उनकी सेवा कर रहे हैं। सनन्दन आदि कितने ही योगी उनकी स्तुति कर रहे हैं। व राम समस्त शास्त्रक अर्थ जाननेम कुशल हैं। योगप्रकारको भी वे जानते हैं और योगाभ्यासकी सिद्धि दाता हैं ॥ ६८ । ६९ ॥ कौस्तुभमय चिन्तामणि इन दोनो मणियोंसे सुशोभित रामचन्द्रका ध्यान करके शुद्ध मनसे तांत्रिकविद्या विधिके अनुसार सदा हृदयम उनका पूजन करें ॥ ७० ॥ संसारके ईश, जानकीके वल्लभ, कौशल्याके पुत्र, प्रकृतिके परे और विष्णुरूपधारी श्रीरामका में आवाहन करता हूँ ॥ ७१ ॥ हे राजाओंके राजा रामचन्द्र हे महापत ! में आपको रत्नमय सिंहासन देता हू, उसे स्वीकार करो ॥ ७२ ॥ हे श्रीराम ! हे भगवन् ! हे रघुवीर ! हे रघूत्तम ! हे राजेन्द्र ! आप जानकीजीक साथ आइये और इस हृदयासनपर बैठिए ॥ ७३ ॥ हे रामचन्द्र हे महत् धनुष धारण करनेवाले ! हे रावणांतक ! हे राघव ! जब तक में पूजन समाप्त न कर लूं, तब तक आप मेरे पास रहिए ॥ ७४ ॥ हे रघुनन्दन ! हे राजर्षे ! हे राजीवलोचन राम हे रघुवंशज ! हे देव ! हे श्री राम ! आप मेरे सम्मुख प्रकट हो ॥ ७५ ॥ हे जानकीनाथ ! हे सुप्रसिद्ध सुरेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न हो । हे राजन् ! हे सर्वज्ञ ! हे मधुसूदन ! आप मेरेपर प्रसन्न हों ॥ ७६ ॥ हे जगन्नाथ ! मैं आपकी शरणमें हूँ । हे भक्तवत्सल , आप मेरे वरदाता हो । हे रघूत्तम ! मैं आपकी शरणम हूँ ॥ ७७ ॥ हे अनन्त ! हे त्रैलोक्यपावन ! हे रघुनायक ! आपको प्रणाम है। हे राजर्षे ! इस पद्यको ग्रहण करिए। हे राजीवलोचन राम ! आपको प्रणाम है ॥ ७८ ॥ परिपूर्ण परमानन्द बहुरूपधारी रामको प्रणाम है । हे कृष्ण ! हे विष्णो ! हे जनार्दन ! मेरे दिये हुए अर्ध्यको आप ग्रहण करें ॥ ७९ ॥ तत्वज्ञानके साक्षात् स्वरूप वासुदेवको प्रणाम है। हे राजराज ! आपको प्रणाम है। आप मेरे

सर्गः ३ } मनोहरकाण्डम् ५७५

सर्गः ३ } मनोहरकाण्डम् ५७५

नमः सत्याय शुद्धाय बुध्द्याय ज्ञानरूपिणे । गृहाणाचमनं देव सर्वलोकैकनायक ॥८१॥ ब्रह्मांडोदरमध्यस्थैस्तीर्थेश्च रघुनन्दन । स्नापयिष्याम्यहं भक्त्या त्वं गृहाण जनार्दन ॥८२॥ संतप्तकांचनप्रख्यं पीतांबरमिमं हरे । संगृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥८३॥ श्रीरामाच्युत यज्ञेश श्रीघनानन्द राघव । ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण रघुनायक ॥८४॥ किरीटहारकेयूररत्नकुंडलमेखलाः । ग्रैवेयकौस्तुभं हारं रत्नकंकणनूपुरान् ॥८५॥ एवमादीनि सर्वाणि भूषणानि रघूत्तम । अहं दास्यामि ते भक्त्या संगृहाण जनार्दन ॥८६॥ कुंकुमागकुकस्तूरीकर्पूरेणमिश्रचन्दनम् । तुभ्यं दास्यामि विश्वेश श्रीराम स्वीकुरु प्रभो ॥८७॥ तुलसीकुन्दमन्दारजातिपुन्नागचम्पकैः । कदंबकरवीरैश्च कुसुमैः शतपत्रकैः ॥८८॥ नीलांबुजैर्बिल्वदलैः पुष्पमाल्यैश्च राघव । पूजयिष्याम्यहं भक्त्या संगृहाण नमोऽस्तु ते ॥८९॥ वनस्पतिरसैर्दिव्यैर्गन्धाढ्यैः सुमनोहरैः । रामचन्द्र महीपाल धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥९०। ज्योतिषां पतये तुभ्यं नमो रामाय वेधसे । गृहाण दीपकं राजंस्त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥९१॥ इदं दिव्यान्नममृतं रसैः षड्भिरन्वितम् । श्रीराम राजराजेन्द्र नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥९२॥ नागवल्लीदलैर्युक्तं पूगीफलसमन्वितम् । तांबूलं गृह्यतां राम कर्पूरादिममन्वितम् ॥९३॥ मङ्गलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे । संगृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥९४॥

अथ नमस्काराष्टकमन्त्राः

ॐ नमो भगवते श्रीरामाय परमात्मने । सर्वभूतान्तरस्थाय सीतीताय नमो नमः ॥९५॥ ॐ नमो भगवते श्रीराम रामचन्द्राय वेधसे । सर्ववेदांतवेद्याय सीताय नमो नमः ॥९६॥ ॐ नमो भगवते श्रीविष्णवे परमात्मने । परात्पराय रामाय सीताय नमो नमः ॥९७॥


किये हुए इस पूजनको ग्रहण करिए ॥८०॥ सत्य, शुद्ध, बुद्ध्य और ज्ञानस्वरूप सत्यवान्‌को प्रणाम है । हे देव ! हे सर्वलोकैकनायक ! मेरे दिये हुए इस आचमनको आप ग्रहण करें ॥८१॥ ब्रह्माण्डमें जितने तीर्थ हैं, उनके जलसे मैं आपको स्नान कराऊँगा सो आप स्वीकार करें ॥८२॥ हे हरे ! अच्छी तरह तपाये हुए सुवर्णके समान इस पीताम्बरको आप ग्रहण कीजिए । हे जगन्नाथ ! हे रामचन्द्र ! आपको प्रणाम है ॥८३॥ हे श्रीराम ! हे अच्युत ! हे यज्ञेश ! हे श्रीघनानन्द ! हे राघव ! हे रघुनायक ! उत्तरीय वस्त्रके साथ दिये हुए मेरे इस यज्ञोपवीतको आप ग्रहण करें ॥८४॥ किरीट, हार, केयूर, रत्नजड़ित कुण्डल, मेखला, माला, कौस्तुभका हार, रत्नजटित कंकण, नूपुर, इस प्रकार सब तरहके आभूषण मैं आपको भक्तिपूर्वक दूंगा, सो आप ग्रहण करिए ॥८५ । ८६॥ कुमकुम, अगरु, कस्तूरी तथा कपूरसे मिश्रित चन्दन हे विश्वेश ! हे श्रीराम ! हे प्रभो ! मैं आपको दूंगा। सो आप स्वीकार करें ॥८७॥ तुलसी, कुन्द, मन्दार, जूही, पुन्नाग, चम्पक, कदम्ब, करवीर तथा शतपत्रके फूल, नीलकमल, बिल्वपत्र और पुष्पमाल्यादिसे मैं आपका पूजन करूँगा । उसे आप ग्रहण करें। मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥८८ । ८९॥ वनस्पतिके दिव्य रसों और सुगन्धसे मिश्रित दिव्य धूप आपको आघ्रापन कराऊँगा हे रामचन्द्र, हे महीपाल ! आप इसे ग्रहण करें ॥९०॥ संसारके सारे ज्योतिर्मय पदार्थोंके पति हे राम ! हे वेध ! आपको नमस्कार है । हे राजन् ! तीनोंलोकका अंधकार नष्ट करनेवाले इस दीपकको आप ग्रहण करिए । छः रसोंसे युक्त तथा अमृतके समान सुस्वादु यह दिव्यान्न तैयार है । हे श्रीराम ! हे राजराजेन्द्र ! आप इस नैवेद्यको ग्रहण करिए ॥९१ । ९२॥ पानके पत्तोंसे जोड़े हुए, सुपारी तथा कर्पूरादि मसालोंसे युक्त इस ताम्बूलको आप ग्रहण करें ॥९३॥ हे महीपाल ! हे हरे ! मङ्गलके निमित्त दिये हुए मेरे इस नीराजनको आप ग्रहण करें। हे जगन्नाथ ! हे रामचन्द्र आपको प्रणाम है ॥९४॥ अब आठ नमस्कार बतलाते हैं । भगवान्, श्रीराम, परमात्मा, सब प्राणियोंके भीतर रहनेवाले, सीताके माप रामचन्द्रज- को प्रणाम है ॥९५॥ भगवान् श्रीरामचन्द्र, ब्रह्मा और सब वेदांत जाननेवाले सीताके पति रामको प्रणाम है ॥९६॥ भगवान् विष्णु, परमात्मा, परात्पर एवं सीताके साथ विराजमान रामको प्रणाम है ॥९७॥

५७६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

ॐ नमो भगवते श्रीरघुनाथाय शार्ङ्गिणे । चिन्मयानन्दरूपाय ससीताय नमो नमः ॥९८॥ ॐ नमो भगवते श्रीराम श्रीकृष्णाय चक्रिणे । विशुद्धज्ञानदेहाय ससीताय नमो नमः ॥९९॥ ॐ नमो भगवते श्रीवासुदेवाय धीविष्णवे । पूर्णानन्दरूपाय ससीताय नमो नमः ॥१००॥ ॐ नमो भगवते श्रीराम रामभद्राय वेधसे । सर्वलोकशरण्णाय ससीताय नमो नमः ॥१०१॥ ॐ नमो भगवते श्रीरामयामिततेजसे । ब्रह्मानन्दैकरूपाय ससीताय नमो नमः ॥१०२॥ इति नमस्काराष्टकमन्त्रा ।

नृत्यगीतादिवाद्यादिपुराणपठनादिभिः । राजोपचारैर्निखिलैः सन्तुष्टो भव राघव ॥१०३॥ विशुद्धज्ञानदेहाय रघुनाथाय वेधसे । अन्तःकरणशुद्धिं देहि मे रघुनन्दन ॥१०४॥ नमो नारायणानंत श्रीराम करुणानिधे । मामुद्धर जगन्नाथ घोरान्संसारसागरात् ॥१०५॥ रामचन्द्र महेश्वास शरणागतवत्सर । त्राहि मां सर्वलोकेश तापत्रयमहाबलात् ॥१०६॥ श्रीकृष्ण श्रीकर श्रीश श्रीराम श्रीनिधे हरे श्रीनाथ श्रीमहारिष्णो श्रीनृसिंह कृपानिधे ॥१०७॥ गर्भजन्मजराव्याधिघोरसंसारसागरात् मामुद्धर जगन्नाथ कृष्ण विष्णो जनार्दन ॥१०८॥ श्रीराम गोविन्द मुकुंद कृष्ण श्रीनाथ विष्णो भगवन्नमस्ते । प्रौढारिषड्वर्गमहाभयेभ्यो मां त्राहि नारायण विश्वमूर्ते । १०९ ॥ श्रीरामाग्रज यज्ञेश श्रीधरानन्द राघव । श्रीगोविन्द हरे विष्णो नमस्ते जानकीपते ॥११०.। ब्रह्मानन्दैकविज्ञनं त्वन्नामस्मरणं नृणाम् । स्वत्पादाम्बुजसद्भक्तिं देहि मे रघुपल्लभ । १११ । नमोऽस्तु नारायण विश्वमूर्ते नमोऽस्तु ते शाश्वत विश्वयोने । त्वमेव विश्वं सचराचरं च त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः ॥११२॥ नमोऽस्तु ते कारणकारणाय नमोऽस्तु कैवल्यफलप्रदाय नमो नमस्तेऽस्तु जगन्मयाय वेदान्तवेद्याय नमो नमस्ते ।११३

भगवान् श्रीरघुनाथ, शार्ङ्गी चिन्मयानन्दरूप और सीतासहित रामको प्रणाम है । ९८ ॥ भगवान् श्रीरामकृष्ण चक्री, विशुद्ध ज्ञानदेहधारी, सीता के साथ रामको प्रणाम है, ९९ ॥ भगवान् श्रीवासुदेव-स्वरूप विष्णु पूर्णानन्दरूप सीताके साथ रामको प्रणाम है ॥१००॥ भगवान् श्रीरामभद्र, वेधा (ब्रह्मा) और सब लोगोंके शरणदाता सीताके साथ रामको प्रणाम है ॥१०१॥ जो अनन्त तेजधारी भगवान् रामचन्द्रजी हैं। उन ब्रह्मानन्दके एकमात्र रूपधारी सीताके साथ रामको प्रणाम है ॥१०२॥ हे राघव ! मेरे नृत्य, गीत, वाद्य तथा पुराण पठन आदि समस्त राजोचित उपचारांसे आप प्रसन्न हो । १०३ ॥ विशुद्ध ज्ञानरूप देह धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीको प्रणाम है। हे रघुनन्दन ! आप हमें अन्तःकरणकी शुद्धि प्रदान करिए । १०४॥ हे नारायण ! हे अनन्त ! हे श्रीराम ! हे करुणानिधे ! आपको प्रणाम है। हे जगन्नाथ ! हमारा घोर संसारसागरसे उद्धार करें ॥१०५॥ हे रामचन्द्र ! हे महेश्वास ! हे शरणागतवत्सल ! हे सर्वलोकेश ! इस तापत्रयरूपी महानलसे बचाइए ॥१०६॥ हे कृष्ण ! हे श्रीश ! हे श्रीराम ! हे श्रीनिधे ! हे श्रीनाथ ! हे महाविष्णो ! हे श्रीनृसिंह ! हे कृपानिधे ! गर्भ, जन्म, जरा तथा व्याधिरूप घोर संसारसागरसे मुझे उद्धारिए ! हे जगन्नाथ ! हे कृष्ण ! हे विष्णो ! हे जनार्दन ! १०७-१०८॥ हे श्रीराम ! हे गोविन्द ! हे मुकुन्द ! हे कृष्ण ! हे श्रीनाथ ! हे विष्णो ! हे भगवन् ! आपको नमस्कार है । हे नारायण ! हे विश्वमूर्ति ! प्रौढ़ अरिषड्वर्गके महाभयसे मेरी रक्षा करिए । १०९ हे श्रीराम ! हे अग्रभुन ! हे यज्ञेश ! हे श्रीधरानन्द राघव ! हे गोविन्द ! हे हरे ! हे विष्णो ! हे जानकीपत, आपको नमस्कार है । ११० ॥ हे रघुपल्लभ ! आपका नामस्मरण ब्रह्मानन्दक विज्ञानको उत्पन्न करता है। आप हम अपने चरणकमलकी सद्भाक्ति प्रदान करिए ॥ १११ ॥ हे कारणोंके भी कारण ! आपको नमस्कार है। हे कैवल्य फल प्रदान करनेवाले प्रभो ! आपको प्रणाम है । हे जगन्मय ! हे वेदान्तवेद्य ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११२ ॥ हे भरतके अग्रज !

सर्गः ३ ] मनोहरकाण्डम् ५७७

सर्गः ३ ] मनोहरकाण्डम् ५७७

नमो नमस्ते मखपालनाय नमोऽस्तु यज्ञप्रतिपालनाय । अनन्त यज्ञेश हरे मुकुंद गोविंद विष्णो भगवन्मुरारे ॥११४॥ श्रीवल्लभानन्त जगन्निवास श्रीराम राजेंद्र नमो नमस्ते । श्रीजानकीकांत विशालनेत्र राजाधिराज त्वयि मेऽस्तु भक्तिः ॥११५। तप्तजाम्बूनदेनैव निर्मितं रत्नभूषितम् । स्वर्णपुष्पं रघूश्रेष्ठ दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥११६॥ हृत्पद्मकर्णिकामध्ये सीतया सह राघव । निवसाम्ब रघूश्रेष्ठ सर्वैरावरणैः सह ॥११७॥ मनोवाक्कायजनितं कर्म यद्वा शुभाशुभम् । तन्ममं प्रीतये भूयान्नमो रामाय शार्ङ्गिणे ॥११८॥ अपराधसहस्राणि क्रियंतेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व रघुपूंगव ॥११९॥ नमस्ते जानकीनाथ रामचंद्र महीपते । पूर्णानंदैकरूप त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥१२०॥ एवं यः कुरुते पूजां बहिर्वा हृदयेऽपि च । सकृत्पूजनमात्रेण राम एव भवेन्नरः ॥१२१। किं पुनः सततं ब्रह्मण्येवं पूज्य स्थितो हि सः । सर्वान्कामानवाप्नोति चेह लोके परत्र च । १२२। एवं सुतीक्ष्ण ते प्रोक्तं यथा पृष्टं त्वया मम । हृदये मानसीपूजाविधानं राघवस्य च ॥१२३।

श्रीरामदास उवाच

एवं शिष्य सुतीक्ष्णाय मुनयेऽगस्तिना पुरा । यत्प्रोक्तं तन्मया सर्वं तव प्रोक्तं सविस्तरात् ॥१२४॥ शिष्याधुना बहिःपूजाविधानं च मयोच्यते । नरः प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचादिकाः क्रियाः ॥१२५॥ स्नात्वा संध्यादिकं कृत्वा देवपूजां समारभेत् । तीर्थे देवालये वाऽपि गोष्ठे पुण्यस्थलेषु च ॥१२६। नद्यास्तटे देवगेहे तुलसीसन्निधौ तथा । लिप्त्वा भूमिं गोमयेन ततो यन्त्राणि लेखयेत् ॥१२७॥ सितरक्तहरित्पीतनीलकृष्णादिमद्भवैः । नानावर्णैश्चित्रितानि तत्र पूजां समारभेत् ॥१२८॥


हे यज्ञका प्रतिपालन करनेवाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे अनन्त ! हे यज्ञेश ! हे हरे ! हे मुकुन्द ! हे विष्णो ! हे मुरारे ! हे भावल्लभ ! हे अनन्त ! हे जगन्निवास ! श्रीराम ! हे राजेन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे श्रीजानकीकान्त ! हे विशालनेत्र ! हे राज धिराज ! आपमें मेरी भक्ति हो ॥ ११४-११५ ॥ तपाये हुए सुवर्णसे निर्मित और रत्नोंसे विभूषित यह सुवर्णपुष्प मैं आपको अर्पण करता हूँ। हे प्रभो ! इसे आप स्वीकार करें ॥ ११६ ॥ हृदयरूपी कमलके बीचमें आप सीता तथा समस्त आवरणोंके साथ उसपर बैठिए ॥ ११७ ॥ मन, वचन अथवा शरीरसे मैंने जो शुभ या अशुभ कर्म किया हो, वह सब आपकी प्रसन्नताका कारण बने। हे धनुर्धारी राम ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ ११८ ॥ हे रघुपूंगव ! रात-दिन मैं हजारों प्रकारके पातक करता हूँ। मुझे अपना दास समझकर आप क्षमा करें ॥ ११९ ॥ हे जानकीनाथ ! हे महीपते ! हे रामचन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे पूर्णानन्दस्वरूप ! मैं आपको अर्घ्य देता हूँ, इसे आप ग्रहण करें ॥ १२० ॥ इस रीतिसे जो मनुष्य हृदयके भीतर या बाहर पूजन करता है वह केवल एक बारके पूजनसे साक्षात् राम हो जाता है ॥ १२१ ॥ फिर उसके लिए क्या कहना, जो रात-दिन उसीमें लीन रहता हो ? वह प्राणी इहलोक और परलोक, दोनोंकी अभीष्ट कामनाएं प्राप्त कर लेता है। हे सुतीक्ष्ण ! तुमने हमसे जैसे पूछा, उस प्रकार मैंने मानसी पूजाका सारा विधान कह सुनाया ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! इस तरह सुतीक्ष्ण मुनिके लिए अगस्त्य ऋषिने उस समय जो विधान बतलाया था, सो मैंने विस्तारपूर्वक तुम्हें बतला दिया ॥ १२४ ॥ हे शिष्य ! अब मैं बाह्यपूजाका विधान बतला रहा हूँ। उपासकको चाहिये कि प्रातःकाल उठे और शौचादि-से निवृत्त होकर स्नान संध्या आदि करे। फिर किसी तीर्थ, देवालय, गोष्ठ वा या पवित्र स्थानमें देवपूजा प्रारम्भ करे ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ ऊपर बताये स्थानोंके सिवाय किसी नदीका तट, देवमन्दिर तथा तुलसीके पास गोबरसे लीपकर सफेद, लाल, हरे, पीले, नीले, काले, इस तरह नाना प्रकारके रंगोंसे चित्र-विचित्र पद्म बनाकर पूजन प्रारम्भ करे ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ एक आसन एक हजार आठ श्रीरामनामक बनता है। एक आसन आठ

५७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

अष्टोत्तरसहस्रश्रीरामलिंगात्मकासनम् चाष्टोत्तरशतं श्रीमद्रामलिंगात्मकासनम् ॥१२९॥
अष्टोत्तरसहस्रश्रीरामभद्रासनं हि वा । चाष्टोत्तरशतं श्रीमद्रामभद्रासनं शुभम् ॥१३०॥
बहून्यन्यानि शतशः संति लघ्वासनानि हि । तेषां मध्यादेकमेवासनं संस्थाप्य चित्रितम् ॥१३१॥
पीठोपरि कृतं वस्त्रं पत्रादिष्वपि वा कृतम् । आसनोपरि जानक्या राघवादीन्निवेशयेत् ॥१३२॥
आसने सर्वतोभद्रमध्ये पद्मोपरि न्यसेत् । सीतया राघवं रम्यं वरसिंहासने स्थितम् ॥१३३॥
रामस्य पृष्ठभागे च लक्ष्मणं स्थापयेत्ततः । रामस्य दक्षिणे पार्श्वे भरतं विन्यसेत्सुधीः ॥१३४॥
रामस्य वामपार्श्वे हि शत्रुघ्नं विन्यसेच्छुभम् । पुरतो रामचन्द्रस्य वायुपुत्रं तु विन्यसेत् ॥१३५॥
रामस्य वायुदिग्भागे सुग्रीवं स्थापयेत्ततः । ईशान्ये रामचन्द्रस्य विन्यस्य च विभीषणम् १३६॥
रामस्य वह्निदिग्भागे विन्यसेदंगदं ततः । नैऋत्यां रामचंद्रस्य जांबवंतं तु विन्यसेत् ॥१३७॥
पूज्यपूजकयोर्मध्ये प्राग्दिशेत्यार्चने न्विह । सर्वशास्त्रेष्वेवमेव निर्णयः कथ्यते बुधैः ॥१३८॥
लक्ष्मणस्य करे देयं छत्रं मुक्ताविराजितम् । भरतस्य करे देयं चामरं रुक्ममण्डितम् ॥१३९॥
शत्रुघ्नस्य करे देयं व्यजनं चित्रितं शुभम् । हनुमतः करे देयं रामस्य पादुकाद्वयम् ॥१४०॥
सुग्रीवस्य करे देयं जलपात्रं मनोहरम् । करे विभीषणस्यापि देयं मुकुटमुत्तमम् ॥१४१॥
देयं तांबूलपात्रं च वालिनन्दनमत्करे । जांबवतः करे देयो वस्त्रकोशो महत्तरः ।१४२।
नवायतनमेवं हि स्थापयेद्रामवस्य च । अथवा यन्त्ररत्नं स्थापयेदासनेोपरि ॥१४३॥
सीतया रामचन्द्रं च मध्ये पृष्ठे तु लक्ष्मणम् । भरतं सव्यपार्श्वे च शत्रुघ्नं वामपार्श्वके । १४४॥
पुरतो वायुपुत्रं च पूर्वोक्तोपचारकैः एवं संस्थापयेद्भक्त्या रामं भद्रासनोपरि ॥१४५॥
अथवा सीतया रामं मध्ये स्थाप्य ततः परम् । रामस्य पृष्ठे सौमित्रिं रामाग्रे वायुनन्दनम् ।१४६॥
स्थाप्यैवं पूजयेद्भक्त्या रामं धृतशरासनम् । अथवा सीतया रामं लक्ष्मणं परिपूजयेत् ॥१४७।


सौ रामके नामसे अङ्कित करके बनाया जाता है। एक हजार आठ नामासे अङ्कित करके एक श्रीरामभद्रासन बनता है। दूसरा एक सौ आठ नामोंसे अङ्कित करके श्रीरामभद्रासन बनता है ॥१२९॥ १३०॥ इसी तरह बहुतसे और भी छोटे-छोटे आसन बनते हैं। उनमें से रंगकर कोई एक आसन बनाये ॥१३१॥ इस आसनकी रचना वस्त्र बिछाकर पट्टपर करे। इसके ऊपर जानकी तथा राम आदिको बैठाये ॥१३२॥ सर्वतोभद्रके मध्यमें बने हुए कमलके ऊपर पहले एक सुन्दर सिंहासनपर राम तथा सीताको बिठाले ॥ १३३ ॥ रामके पीछे लक्ष्मणको स्थापित करे। रामके दाहिने बगल भरतको स्थापित करे और रामके पार्श्वमें शत्रुघ्नको बिठाले। रामचन्द्रजीके आगे हनुमान्जीकी स्थापना करे ॥ १३४ ॥ १३५ ॥ रामके वायव्य कोणमें सुग्रीवकी स्थापना करे। ईशानकोणमें विभीषणको स्थापित करके अग्निकोणमें अंगदको तथा नैऋत्यकोणमें जाम्बवान्‌की स्थापना करे ॥ १३६ ॥ १३७ ॥ पूज्य और पूजक इन दोनोंके लिए प्राची दिशा ही पूजन करनेमें श्रेष्ठ है। पण्डितोंका कहना है कि समस्त शास्त्रोंमें इसी प्रकारका निर्णय किया गया है ॥ १३८ ॥ लक्ष्मणके हाथमें मोतियोंसे सुसज्जित छत्र दे। भरतके हाथमें सुवर्णसे मण्डित चमर दे ॥ १३९। शत्रुघ्नके हाथमें चित्रित व्यजन (पंखा) दे और हनुमान्जीके हाथमें रामकी दोनों पादुकाएँ दे ॥ १४० ॥ सुग्रीवके हाथमें मनोहर जलपात्र और विभीषणके हाथमें उत्तम शीश दे ॥ १४१ । अङ्गदके हाथमें सुन्दर ताम्बूलपात्र दे, जाम्बवान्‌के हाथमें कपड़ोंकी पेटी दे। इस तरह श्रीरामचन्द्रजीके नवायतनकी स्थापना करे ॥१४२॥१४३॥ मध्यभागमें सीताके साथ रामचन्द्रजीको बिठाले, पीछे लक्ष्मणको, दाहिने बगल भरतको बायें बगल शत्रुघ्नको तथा सामने हनुमान्‌जीको पूर्वोक्त उपचारोंके साथ बिठाले । इस तरह सुन्दर आसनपर रामकी स्थापना करे। इसे ही रामपञ्चायतन कहते हैं ॥ १४४॥ १४५॥ अथवा सीताके साथ-साथ रामको मध्यमें बिठाळकर रामके पीछे लक्ष्मण और आगे हनुमान्‌जीकी स्थापना करके धनुर्धारी रामका पूजन करे। अथवा सीताके साथ राम और लक्ष्मणकी पूजा

सर्गः १ ] | मनोहरकाण्डम् | ५७५

सर्गः १ ]मनोहरकाण्डम्५७५

सीतागुहो विना पूजा रामस्यैकस्य नाचरेत् , कृता चेद्विघ्नकर्त्री सा भवदत्र न संशयः ॥ १४८ ॥
नवायतनपूजा सा श्रेष्ठा ज्ञेया शुभप्रदा । या पञ्चायतनी पूजा ज्ञेया सा मध्यमाऽत्र हि ॥ १४९ ॥
त्रिदेवत्या तु या पूजा कनिष्ठा सा निगद्यते । अतिकनिष्ठा पूजा सा द्विदैवत्या स्मृता हि सा ॥ १५० ॥
कोदण्डं वामहस्ते च तूणीरं वामपार्श्वके । निजनामाङ्कितं बाणं दधानं दक्षिणे करे ॥ १५१ ॥
एवं श्रीरामचन्द्रं स्थाप्य ततः पूजां समारभेत् । आत्मनो वामभागे च जलकुम्भं निधाय हि ॥ १५२ ॥
आत्मनो दक्षिणे भागे पूजापात्रं निवेदयेत् । आत्मनः पुरतः पात्रं स्थापयेद्विस्तृतं वरम् ॥ १५३ ॥
प्राङ्मुखः सुखमासीनो धृतपद्मासनः शुचिः मौनी धृताक्षतुलसीमालो निश्चलमानसः ॥ १५४ ॥
बद्धग्रंथिशिखः शुद्धवस्त्रो धृतपवित्रकः । मृद्गङ्गाद्यतीर्थमृत्तिलको मुद्रिकाङ्कितः ॥ १५५ ॥
नमस्त्वादौ गणराजं च निधिवार्गादि कीर्तयेत् ।
भूमिशुद्धिं भूतशुद्धिं न्यासौ कृत्वा यथाक्रमम् । प्रोक्षणीपात्रमेकं तु जलपूर्णं प्रकारयेत् ॥ १५६ ॥
दूर्वागन्धाक्षतपुष्पैरन्यत्पात्रं परिपूरयेत् । प्रोक्षयेत्तेन नीरेण पूजाद्रव्यं महामनाः ॥ १५७ ॥
पाद्यार्घ्याचमनार्थं तु त्रीणिपात्राणि विन्यसेत् । गणराजं पूजयित्वा सम्पूज्य रुरुजं ततः ॥ १५८ ॥
पाञ्चजन्यं पूजयित्वा प्रोक्षयेत्तज्जलैरपि पूजाद्रव्यं पूर्वोक्तं स्वात्मानं च गुरुं तथा ॥ १५९ ॥
धेनुशङ्खचक्रधनुराजमुद्राः प्रदर्शयेत् शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती ॥ १६० ॥
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाऽष्टविधा स्मृता । अथ ध्यायेद्रामचन्द्रं ससीतं पुरतः स्थितम् ॥ १६१ ॥
द्विभुजं धृततूणीरं चापबाणधृतायुधम् । दिव्यलङ्कृतसंयुक्तं पीतकौशेयवाससम् ॥ १६२ ॥
सलक्ष्मणं सशत्रुघ्नं भरतेन समन्वितम् । हनुमत्सेवितपदं सिंहासनविराजितम् ॥ १६३ ॥
सितछत्रसमायुक्तं दिव्यचामरवीजितम् । विभीषणनमत्पुक्तं सुग्रीवपरिवेष्टितम् ॥ १६४ ॥

करे ॥ १४६ ॥ १४७ ॥ सीता और लक्ष्मण बिना अकेले रामकी पूजा कभी न करे यदि ऐसा पूजा का जाता है तो वह प्रायः विघ्न करनेवाली ही हुआ करती है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १४८ ॥ नवायतनपूजा सर्वश्रेष्ठ और पञ्चायतन पूजा मध्यम होती है ॥ १४९ ॥ त्रिदेवकी पूजा कनिष्ठ कहा गया है। वह पूजा तो अत्यन्त कनिष्ठ होती है जिसमें केवल दो देवताओंकी पूजा की जाती है ॥ १५० ॥ जिनके बायें हाथमें धनुष और बायें बगल तरकश है, अपने नामसे अङ्कित बाण दाहिने हाथमें है ॥ १५१ ॥ इस तरहके रामचन्द्रकी स्थापना करके पूजा प्रारम्भ करे। पूजा करते समय वामभागमें एक कलश भी अवश्य रख लेना चाहिए ॥ १५२ ॥ अपने दाहिने बगल पूजापात्र रखना चाहिए और आगे भी विस्तृत पात्र रखना उचित है। १५३ ॥ उपासकको चाहिए कि ज्ञानपूर्वक पूर्वकी ओर मुख करके पद्मासनसे बैठे और निश्चल मन करके तुलसीकी माला लिये, शिखामें ग्रन्थि दिये, हाथोमे पवित्री तथा शरीरमें पवित्र वस्त्र धारण किये, द्वारकाकी शुद्ध मृत्तिकाका तिलक लगाकर ॥ १५४ ॥ १५५ ॥ पहले गणेशजीको प्रणाम करे; फिर क्रमशः निधि-वार आदिका उच्चारण करके भूमिशुद्धि, भूतशुद्धि तथा अङ्गन्यास करन्यास करके प्रोक्षणपात्रमे जल भरे। दूर्वा, गन्धाक्षत, पुष्प आदि उसमें डाले और प्रोक्षणीपात्रके जलसे पास रक्खी हुई पूजनसामग्रीका प्रोक्षण करे। पाद्य, अर्घ्य एवं आचमनके लिये सामने तीन पात्र रक्खे। फिर गणेशजी, शङ्ख तथा पाञ्चजन्य शंखका पूजन करके उसके जलसे अपना, पूजन-सामग्री तथा गुरुजीका प्रोक्षण करे ॥ १५६-१५९ ॥ इसके अनन्तर सुरभी, शंख, चक्र, गरुड़ एवं राममुद्राका प्रदर्शन करे। पत्थरकी, काष्ठकी, चूना-ईंटकी रङ्गके बनी, चित्रकारी की हुई, बालूकामयी, मानसी और मणिमयी ये आठ प्रकारकी प्रतिमाएँ होती हैं। ऊपर बतलायी क्रियायें कर लेनेके बाद उपासकको चाहिए कि सीताके साथ बैठे हुए इस प्रकारके रामका ध्यान करे जिनके दो भुजाएँ हैं, जो तूणीर तथा धनुष-बाण आदि विविध प्रकारके शस्त्र धारण किये हैं, उनके शरीरमें दिव्य अलङ्कार पड़े हैं और वे पीला कौशेय वस्त्र धारण किये हैं ॥ १६०-१६२ ॥ लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न उनके साथ हैं, हनुमान्जी उनके चरणकी सेवा कर रहे हैं और रत्न जड़ान सिंहासनपर बैठे हैं ॥१६३॥ ऊपर सफेद छत्र लगा है, दिव्य चामर ढल रहे हैं, विभीषण और सुग्रीव

५८० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


जाम्बवता समायुकमङ्गदेन परिष्टुतम् । अयोध्यावासिनं राममेवं हृदि विचिन्तयेत् ॥१६५॥ सीताराम समागच्छ मदग्रे त्वं स्थिरो भव । गृहाण पूजां महतां कृतमावाहनं तव ॥१६६॥ हिरण्मयं रत्नयुक्तं नानारत्नविचित्रितम् । सिंहासनं सुवस्त्रं च कामनाथे ददामि ते ॥१६७। चन्दनागुरुसंयुक्तैर्जलैस्तीर्थसमुद्भवैः । पाद्यं गृहाण श्रीराम मया दत्तं प्रमोद मे ॥१६८। पुष्करादिषु तीर्थेषु गङ्गादिषु सरित्सु च । यत्तोयं तन्मयाऽऽनीतं दत्तमर्घ्यं गृहाण भोः ॥१६९। सुगन्धवामितं तोयं बहुतीर्थसमुद्भवम् । आचमनार्थमानीतं गृहाण त्वं सुरेश्वर ॥१७०। हरिद्राकुङ्कुमैर्युक्तं सुगन्धद्रव्यमिश्रितम् । सुगन्धस्नेहसम्मिश्रमुद्वत्तनमथास्तु ते ॥१७१। कामधेनूद्भवं क्षीरं नन्दिन्या दधि सुन्दरम् । कपिलाया घृतं श्रेष्ठं मधु विन्ध्याद्रिसम्भवम् ॥१७२। सितोपलसमानाभं सितायुक्तं मनोहरम् । पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं त्वं गृहाण भोः ॥१७३॥ गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदा सिन्धुकावेरी सरयू गण्डकी तथा ॥१७४॥ ताम्रपर्णी भीमरथी कृष्णा वेणी महानदी । गोमती सागराः सप्त पयोष्णी मत्रनाशिनी ॥१७५। पूर्णा तापी तुङ्गभद्रा क्षिप्रा वेगवती तथा । पिनाकी प्रवरा सिन्धुरेशा सार्द्धत्रयो नदाः ।१७६॥ घृतमाला कृतमाला मही निक्षेपिका तथा । पयोष्णी प्रेमगङ्गा च चित्रगङ्गा करानदी ॥१७७। नीरा चर्मण्वती वृद्धा वज्रा च पुनः पुनः । सिन्धुशीरा च वैकुण्ठाऽलकनन्दा च वारणा ॥१७८। इत्यादिसर्वतीर्थेषु यत्तोयं वर्तते शुभम् । तन्मयाऽऽनीतमद्यात्र स्नानं कुरु रघूत्तम ॥१७९॥ पुनराचमनं रम्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम् । गृहाण रघुनाथ त्वं दीयते यन्मया तव ॥१८०॥ सुवर्णतन्तुमिश्रितं पीतकौशेयसम्भवम् । वस्त्रयुग्मं प्रदास्यामि गृहाण रघुनायक ॥१८१॥ शुद्धं हेममयं रम्यं नवतन्तुसमुद्भवम् । ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं यज्ञसूत्रं प्रगृह्यताम् ॥१८२॥


आगे खड़े वन्दना कर रहे हैं ॥ १६४ ॥ जाम्बवान्‌के साथ साथ अङ्गदभी खड़े स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार अयोध्यावासी रामका मनमें ध्यान करे । १६५ ॥ और कहे-हे सीताराम ! आप मेरे सामने आकर बैठिए । मैं आपका पूजन करूंगा। मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप आइए और मेरी पूजा स्वीकार करिए ॥ १६६ ॥ सुवर्णका बना हुआ तथा रत्नखचित होनेसे चित्र-विचित्र मालूम पड़नेवाला और सुन्दर वस्त्रस सहित सिंहासन मैं आपकी बैठनेके लिए देता हूँ ॥ १६७ ॥ चन्दन और पुष्पसे मिले हुए तीर्थोंके जलका पाद्य बनाकर आपको देता हूँ । इसे आप स्वीकार करें और मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ १६८ ॥ पुष्कर आदि तीर्थों तथा गङ्गा आदि नदियों-से लाये जलका अर्घ्य बनाकर मैं आपको देता हूँ, इसे स्वीकार करिए ॥ १६९ ॥ सुगन्धसे वासित एवं कितने ही तीर्थोंसे लाया हुआ जल मैं आपको आचमनके लिए देता हूँ । हे सुरेश्वर ! इसे आप ग्रहण कीजिए । १७० ॥ हल्दी कुमकुम और बहुतसे सुगन्धद्रव्योंसे मिश्रित तथा सुगन्धमय तेल आदिस मिला हुआ जल मैं आपको स्नान करानेके लिये देता हूँ ॥ १७१ । कामधेनुका दूध नन्दिनी गौका दही, कपिला गौका घृत विन्ध्य-पर्वतसे उत्पन्न उत्तम मधु, ॥ १७२ । सफेद पत्थरके समान चमकती हुई चीनीसे मिल्य पंचामृत मैं आपको स्नान करानेके लिए देता हूँ। इसे आप ग्रहण करिए ॥ १७३ ॥ गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, सरयू, गण्डकी, ताम्रपर्णी, भीमरथी, कृष्णा, वेणी, महानदी, गोमती, सातों सागर, मवनाशिनी, पयोष्णी, पूर्णा, तापी, तुङ्गभद्रा, क्षिप्रा, वेगवती, पिनाकी, प्रवरा, सिन्धुरेशा, स'ढे तीन नद, घृतमाला, कृतमाला, मही, निक्षेपिका पयोष्णी प्रेमगङ्गा, चित्रगङ्गा, करानदी, नीरा, चर्मण्वती, वृद्धा, वज्जरा, सिन्धुशीरा, वैकुण्ठा अलकनन्दा, वारणा इत्यादि ॥ १७४-१७८ ॥ नदियोंमें जो पवित्र जल विद्यमान है वह मैं आज यहाँ ले आया हूँ । हे रघूत्तम आप इससे स्नान कीजिए ॥ १७९ ॥ सब तीर्थोंका पवित्र जल मैं आपको पुनराचमनके लिये दे रहा हूँ । इसे आप ग्रहण कीजिए ॥ १८० ॥ सुवर्णके सूतोसे बना तथा चित्र-विचित्र दीखनेवाला पीत कौशेय वस्त्र मैं आपको दे रहा हूँ, इसे स्वीकार करिये । १८१ ॥ शुद्ध, सुवर्णमय,

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२

मुकुटं कुण्डले रम्ये मुद्रिकाः कङ्कणे तथा। नूपुरे रत्नजालानाः केयूरे रत्नमण्डिते ॥१८४॥ इत्यादीन्नामभूषांश्च दिव्यस्वर्णमयान्यविभो। त्वदर्थं च मयानीतानलङ्कारान् गृहाण भोः ॥१८४॥ छत्रं सव्यजनं रम्यं चामरद्वयसंयुतम्। त्वदर्थं च मयाऽऽनीतं गृहाण विपुलोदन ॥१८५॥ सुगन्धं चन्दनं दिव्यं कस्तूरीमिश्रितं तथा। रक्तचन्दनसंयुक्तं गृहाण त्वं मयाऽर्पितम् ॥१८६॥ अक्षतांश्च वरान् दिव्यान्मुक्ताफलविनिर्मितान्। कर्पूराद्रान्द्रुमेशान्चान् गृहाण परमेश्वर ॥१८७॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयाऽहृतानि पूजार्थं गृहाण रघुपायक ॥१८८॥ वनस्पतिरसोद्भूतं गन्धयुक्तं सुशोभनम्। आघ्रेयं सर्वदेवानां धूपं गृहाण राघव ॥१८९॥ आज्यं त्रिवर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण भो राम त्रैलोक्यतिमिरपह ॥१९०॥ अन्नमन्नरसं सम्यक् पायसंघृतमिश्रितम्। शर्करामधुसंयुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥१९१॥ आम्रादीनि सुपक्वानि फलानि विविधानि च। समर्पितानि ते राम गृहाण रघुनन्दन ॥१९२॥ पूगीफलसमायुक्तं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरैलायुतं ताम्बूलं स्वीकुरु प्रभो ॥१९३॥ हिरण्यं ब्रह्मसम्भूतं वह्नितेजःसमुद्भवम्। दीयते दक्षिणार्थे ते गृहाण रघुनन्दन ॥१९४॥ एवं मया षोडशोपचाराः सविस्तरं ते कथिताः विशाम्पते। आवाहनाद्यश्च हि दक्षिणांतः शेषा अप्यंशं सकलां हि दृश्ये ॥१९५॥ पञ्चवर्तिमसंयुक्तं कपिलाऽऽज्यविमिश्रितम्। वह्निना योजितं रम्यं गृहाण त्वं निराजनम् ॥१९६॥ जाती चंपककन्दारौ केतकी तुलसी तथा। दमनो मुनिकुन्दैश्च ददामि स्वामिनं तव ॥१९७॥ एभिर्नवविधैः पुष्पैर्मन्त्रपुष्पाणि राघव। मयाऽर्पितानि गृहाण प्रसीद परमेश्वर ॥१९८॥ यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ॥१९९॥


२८४ नवोर सूत्रसे बना तथा सुवर्णसंयुक्त यज्ञसूत्र मैं आपको देता हूँ, इसे आप स्वीकार करिये ॥ १८२ । मुकुट, रत्न कुण्डल, मुद्रिका, कंकण, नूपुर स्वर्णनिर्मित जंजीरका माला, रत्नमण्डित केयूर इत्यादि परम रम्य, दिव्य, स्वर्ण और बाणमय दन अलंकार मैं आपके लिए लाया हूँ। इन आप ग्रहण करिए ॥ १८४ ॥ १८४.५ ॥ व्यजन और चमर संयुक्त छत्र मैं आपके लिए लाया हूँ। हे रघुनन्दन, इसे आप स्वीकार करिए ॥ १८५ ॥ सुन्दर गन्धयुक्त, दिव्य कस्तूरी अमिश्रित तथा लाल चन्दन (घिसा चन्दन) मैं आपके लिए लाया हूँ सो आप ग्रहण कीजिए ॥ १८६ । पाजाके टुकड़ासे बनाया हुआ कर्पूरा और दुमट्ममिश्रित अक्षत मैं आपको समर्पण करता हूँ, इसे आप ग्रहण करें ॥ १८७ ॥ मालती आदि सुगन्धित कुशस बनी माला मैं आपको पूजाके निमित्त लाया हूँ, हे रघुपायक ! इन आप ग्रहण कीजिए ॥ १८८ ॥ वनस्पतिकारस उत्पन्न, गन्ध-युक्त, उत्तम सूंघनेवाला और सब देवताओंके सूँघने योग्य धूप आपके लिए लाया हूँ इसे ग्रहण कीजिए ॥ १८९ ॥ घीसे भीगी तीन बत्तियोंवाले दीपकको लाया हूँ। हे तीनों लोकोंका अन्धकार दूर करनेवाले राम ! इसे आप ग्रहण करिए ॥ १९० ॥ साने योग्य अन्न, दूध घी, चामर तथा मधुमिश्रित नैवेद्य मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करिए ॥ १९१ ॥ आम्र आदिक खूब पके अच्छे अच्छे फल मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करें ॥ १९२ ॥ सुपारी युक्त पानके पत्तोंस झाड़ा हुआ और अनेक मसालों युक्त ताम्बूल आप ग्रहण करें । १९३ ॥ हे रघुनन्दन ! ब्रह्मस उत्पन्न तथा अग्निके तेजसे आयमान सुवर्ण मैं दक्षिणाके लिए आपको देता हूँ, उसे आप स्वीकार करें ॥ १९४ ॥ हे वत्स ! इस तरह मैंने विस्तारपूर्वक आवाह्नसे दक्षिणा तकके षोडश उपचायोंको कह सुनाया। शेष पूजनादि आगे बतलाता हूँ ॥ १९५ ॥ पाँच वत्तियोंसे युक्त, कपिला गौके घृतसे मिश्रित एवं अग्निसे संयोजित रम्य नीराजन मैं आपको अर्पण करता हूँ सो स्वीकार करिए ॥ १९६ ॥ जूही, चम्पा, कन्दार, केतकी, तुलसी दमनक, अगस्त और दो प्रकारके मुनिकुन्द इन नौ फूलोंका मन्त्रपुष्प मैं आपको देता हूँ। हे परमेश्वर ! इसे स्वीकार करिए और मेरेपर प्रसन्न होइए । १९७ ॥ १९८ ॥ जन्मान्तरमें भी मैने जिस किन्हीं पापोंको किया हो, वे नष्ट हो जायें।

५८२ आनन्दरामायणे [सर्गः ३


उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां साष्टांगश्च नमोऽस्तु ते ॥२००॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥२०१। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं रघूत्तम । यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥२०२॥ एवं श्रीरामचन्द्रस्य भक्त्या कार्यं प्रपूजनम् । निरन्तरं तथा कार्यं नवम्यां च विशेषतः ॥२०३॥

विष्णुदास उवाच गुरो नवविधैः पुष्पैस्त्वया पुष्पांजलिः कथम् । निवेदितोऽत्र रामस्य पूजने तद्वदस्व माम् ॥२०४। त्वत्तो नानाविधाः पूजाः सुरणां च मया श्रुताः । एवं तन्मे श्रुतो नैव नवपुष्पांजलिः कदा ॥२०५॥

श्रीरामचन्द्र उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । आसीत्पुरा द्विजवरः कावेर्या उत्तरे तटे ॥२०६। रामनाथपुरे कश्चित्सुन्दरश्चाऽतिभक्तिमान् । तस्याऽभवन् पुत्राश्च रामचिंतनतत्पराः ॥२०७॥ चन्द्रोऽथचन्द्रश्चन्द्राभश्चन्द्रायश्चंद्रशेखरः । चन्द्रांशुर्जितचन्द्रश्च चन्द्रचूड़ोऽष्टमः स्मृतः ॥२०८॥ रामचन्द्रांशतः नव गृहाप्ताश्च नव स्मृताः । एकदा ते त्रयोऽोध्यायां रामं भक्तकृपाकरम् ॥२०९॥ द्रष्टुं मधुचैत्रमासे तस्थुस्ते सरयूतटे तावत्तत्र समायाता नानादेशान्तरस्थिताः । २१०॥ जनानां कोटयश्च नानावाहनसंस्थिताः । सरय्यां शमतीर्थे हि चैत्रस्नानमादरात् ॥२११। तेषां समागतानां हि समर्द्दस्तत्र वै बभूत् । समर्दाद्रामचन्द्रस्य तेषां नाभूच्च दर्शनम् ॥२१२॥ तदा ते मंत्रयामासुर्नव विप्राः परस्परम् । कथं श्रीरामवभ्रयात्र समर्दे दर्शनं भवेत् ॥२१३.। खेजातं त्वतियत्नेन तर्हि यत्किं न दर्शनम् यावत्सम्येन मनसा राघवो न निरीक्षितः । २१४। तावत्तद्दर्शनं नैव तृप्तिं नो जनयिष्यति । तदा चन्द्रोऽब्रवीज्ज्येष्ठस्त्वत्रैव शमदर्शनम् ॥२१५।


एक-एक पग चलकर मैं आपकी प्रदक्षिणा करता हूँ ॥१९९॥ हृदयसे, मस्तकसे, दृष्टिसे, मनसे, वचनसे, हाथोंसे, पैरोंसे और घुटनोंसे मैं साष्टांग प्रणाम करता हूँ ॥२००॥ हे परमेश्वर ! न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना आता है। पूजन करना भी मैं नहीं जानता। यदि कुछ भ्रम हुआ हो तो आप क्षमा करें ॥२०१॥ हे रघूत्तम ! मंत्रसे, क्रियासे और भक्तिसे हीन मैने जो कुछ पूजा की है हे देव ! वह सब परिपूर्ण हो जाय । २०२। इस तरह निरन्तर भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए और नवमीको विशेष करके ऐसा करना उचित है ॥२०३॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! इस पूजनके प्रसङ्गमें आपने नौ प्रकारके फूलोंसे पुष्पाञ्जलि देनेकी विधि क्यों बतलाई है ? सो आप हमसे कहिये ॥२०४॥ अबतक आपने मुझे बहुतसे देवताओंका विविध पूजन बताया, किन्तु उनमें नवपुष्पाञ्जलि आपने कहीं नहीं बतलायी ॥२०५॥ श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सो सावधान मन होकर सुनो। बहुत दिनों-की बात है, कावेरी नदी के उत्तर तटपर रामनाथपुरम अति भक्तिमान् सुन्दर नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह रामका ध्यान करता था। रामका ध्यान करनेवाले उस भक्तके नौ बेटे थे ॥२०६॥२०७॥ चन्द्र, अति-चन्द्र, चन्द्राभ, चन्द्राय, चन्द्रशेखर, चन्द्रांशु, जितचन्द्र, चन्द्रचूड़ और गूढ़ाम रामचन्द्र ये उन लड़कोंके नाम थे। एक बार चैत्रके महीनेमें वे नवों लड़के भगवान् रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिये अयोध्या गये। वहीं पहुंचकर वे सरयूके तटपर पहुंचे। तब तक अनेक देशोंके रहनेवाले करोड़ों मनुष्य चैत्रमास स्नानके लिये अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर वहाँ आ पहुंचे ॥२०८-२११॥ उन आये हुए लोगोंकी भारी भीड़के कारण वे नवों ब्राह्मणकुमार रामचन्द्रजी का दर्शन नहीं पा सके ॥ २१२॥ उस समय उन्होंने परस्पर मंत्रणा की कि इस प्रकारका भीड़में रामचन्द्रजीका दर्शन कैसे हो ॥२१३॥ बहुत प्रयत्न करनेपर यदि थोड़ा-सादर्शन हो भी जाय तो जबतक अच्छी तरह उन्हें न देख सकूँ तो दर्शनसे लाभ ही क्या ? ॥२१४॥ उस क्षणिक दर्शनसे हमें सन्तोष नहीं होगा। उनमेंसे ज्येष्ठ भ्राता चन्द्र बोला कि हमलोग तीव्र तपस्या करके यहीं ही रामचन्द्रजीका

सर्गः १] मनोहरकाण्डम् ५८३


वयं क्षेणेण तपसा प्राप्स्यामस्तत्फलं हरः। तच्चन्द्रवचनं श्रुत्वा पुनः प्रोचुर्द्विजोत्तमाः ॥११६॥
एककाले तु सर्वेषां वक्ष्यामस्त्वन्तरेण हि। कस्यादौ रामचन्द्रश्च दास्यत्यत्र प्रहर्शनम् ॥११७॥
कस्य दास्यति पश्चाच्च विदितं तद्भविष्यति। कस्यास्मासु दृढा भक्तिर्विदिता सा भविष्यति ॥११८॥
एवं परस्परं चोक्त्वा ते सर्वे द्विजसूनवः। त्यक्तादाश बाष्पुमञ्चार्थकान्ते तत्परेण हि ॥११९॥
गत्वाऽतिदूरं संमर्दात्सेदुः सर्वे तपो महत्। तत्सर्वं राघवौ ज्ञात्वा सर्वसाक्षी जगत्प्रभुः ॥१२०॥
तेषां स्वदर्शनं दातुं नवमे दिवसे मुदा। संवादामास श्रीरामः सर्ग चिन्ते समास्थितः ॥१२१॥
एककाले तु सर्वेषां यदि दास्यामि दर्शनम्। तर्ह्येष तुष्टिः सर्वेषां भविष्यति न चेतरहि ॥१२२॥
अतोऽद्याहं करिष्यामि नव रूपाणि निश्चयात्। एवं संमन्त्र्य श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥१२३॥
शिविकामानयस्वाद्य बहिर्गच्छाम्यहं मुदा। तथेति राघववाक्येन शिविकां लक्ष्मणाऽथवा ॥१२४॥
आनयामास दूतैः स राघवाय न्यवेदयत्। तदा सिंहासनाद्रामश्चोत्थार्य शिविकास्थितः ॥१२५॥
बन्धुमित्रैर्विवृत्तैश्च सुहृन्मित्रादिभिर्युतः। वाहैः शनैश्चयोध्याया ययौ रामो मुदान्वितः ॥१२६॥
ततस्तं जनसंमर्दं समतिक्रम्य राघवः। चकार नव रूपाणि ह्यात्मनः परमेश्वरः ॥१२७॥
शिविकाः सुहृदो भ्रातॄन्तान्मित्रान्भ्रातृन्वाहनान्। चकार नवधा राघवेन्द्रा म क्षणमात्रतः ॥१२८॥
निरीक्षितुं समायाता नास्यान तान् जनानापि। चकार नवधा रामस्तद हुतमिवाभवत् ॥१२९॥
ततस्तैस्तैर्जनैर्मित्रैर्हूतैर्बन्धुजनैः सह। नवानां भूसुराणां हि ययावग्रे रघूत्तमः ॥१३०॥
ततस्ते भूसुराः सर्वे तदेकसमये प्रभुम्। आत्मनः पुरतो रामं ददृशुस्तं पृथक् पृथक् ॥१३१॥
तुष्टुष्टमनसः सर्वे प्रणेमू रघुनन्दनम्। शिविकाभ्योऽवततारामस्तवुरुढ्वा पृथक् पृथक् ॥१३२॥
नवरूपधराः सर्वांन्विप्रानालिंग्य सादरम्। ऊचुर्मधुरया वाचा प्रसन्नमुखपङ्कजाः ॥१३३॥


दर्शन पा लेंगे। चन्द्रकी इस बातको सुनकर वे सब बोल उठे कि यदि हम सब भाई एक साथ तपस्या करने लग जायें तो रामचन्द्रजी किसको पहिले दर्शन देंगे ॥ ११५-११७॥ और किसको सबसे पीछे? इससे यह बात भी ज्ञात हो जायगी कि हममेंसे किसकी भक्ति दृढ है ॥११८॥ इस तरह परस्पर बातचीत करके वे सब ब्राह्मणबालक उस भीड़से दूर जा बैठे और भोजन त्यागकर केवल जप पंन्त हुए एकाग्र मनसे तपस्या करने लगे। सारे संसारके साक्षी तथा निमित्त जाननेके प्रभु रामचन्द्रसे यह बात छिपी नहीं रही ॥ ११९॥ १२०॥ नवें दिन उन्होंने अपनी सभामें उनको दर्शन देनेके विषयमं मन्त्रणा की ॥ १२१॥ इसके बाद क्षण भर अपने मनमें विचार किया कि यदि उनको एक ही समयमें दर्शन न दूंगा तो वे सन्तुष्ट नहीं होंगे ॥ १२२॥ इस कारण आज मैं नौ रूप धारण करूँगा। ऐसा निश्चय करके उन्होंने लक्ष्मणसे सादरपूर्वक कहा- ॥ १२३॥

हे लक्ष्मण ! पालकी मँगाओ। आज मैं बाहर घूमने जाऊँगा बहुत अच्छा कह तथा दूतों द्वारा लक्ष्मणने पालकी मँगवाकर रामचन्द्रजीको इसकी खबर दी तब सिंहासनसे उतरकर राम पालकी में बैठे और भाईयों, मन्त्रियों, सम्बन्धियों तथा मित्रोंके साथ धीरे धीरे अयोध्यासे बाहर निकले ॥ १२४-१२६ ॥ उस विशाल भीडको पार करके रामचन्द्रने नौ रूप धारण किया ॥ १२७॥ क्षण भरके भीतर रामने पालकी, सम्बन्धों, सब भाई, दूत तथा वाहन समेत सब मित्रोंको नौ रूपमें परिणत कर दिया ॥ १२८॥ केवल अपने तथा अपने साथियों ही की उन्होंने नौ संख्या नहीं बनायी, बल्कि जो लोग वहाँ दर्शन करने आये थे, उनको भी उन्होंने नौ संख्यामें विभक्त कर दिया। यह एक विचित्र बात हुई। १२९ ॥ इसके अनन्तर उन बन्धुओं, मित्रो दूतों, बन्धुजनों तथा ब्राह्मणोंसे आगे-आगे रामचन्द्रजी चलने लगे। १३० । फिर क्या था, उन नवों ब्राह्मणोंने एक ही समयमें प्रभुको अपने-अपने आगे खड़े देखा ॥ १३१ ॥ इससे प्रसन्न होकर उन्होंने रामको प्रणाम किया। इसके बाद वे नवों राम अपनी-अपनी पालकियोंसे उतरे और उन ब्राह्मणोंको गलेसे लगाया। फिर मीठी-मीठी वाणीमें उनसे बोले ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ उन्होंने कहा-हे ब्राह्मणों ! आप लोगोंने बड़ा कष्ट किया है।

५८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

भो विप्राः श्रमित्वा यूयं युष्माकं कृतनिश्चयम्। बुद्ध्वा वयं पृथक् रूपैर्जाताः स्मो नवधाऽद्य हि ॥२३४॥ एकाकालेऽत्र तपसां सर्वेषां दर्शनं निजम्। कस्य देयं तु पूर्वं हि पश्चात्कस्य प्रदीयताम् ॥२३५॥ इति सम्मन्त्र्य हृदयेन स्वयंकसमयेन हि। युष्माकं दर्शनं दत्तं वरप्यर्थं वरानितः ॥२३६॥ रामाणां वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्भूसुरोत्तमाः। येनास्माकं भवेत्कीर्तिः स वरो दीयतां तु नः ॥२३७। तेषां वचनं श्रुत्वा रामाः प्रोचुर्द्विजान्पुनः। युष्माकं दर्शनार्थं हि नवरूपधरा वयम् ॥२३८॥ अद्य जाता यतस्तस्माद्युष्माकं नामभिः सदा। नव रामाः परा ख्यातिं गमिष्यन्त्यवनीतले ॥२३९॥ अस्माकं नव यत्किञ्चित्प्रियं हि भविष्यति। ते तेषां तु रामाणां वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तमाः ॥२४०॥ सन्तुष्टस्ते नता नेमुः स्वं स्वं रामं मुहुर्मुहुः। तदा सर्वे जना रामान् लक्ष्मणान् भरतादिकान्॥२४१। आत्मानं नवधा जातान्दृष्ट्वा विस्मयमागताः। ततो रामाः शिविकासु स्थित्वा पृष्ट्वा द्विजोत्तमान्॥२४२॥ पश्यान्त्य ययुः सर्वे मार्गे त्वेकोऽभवन्पुनः। सर्वे जातास्त्वेकदापस्तथा ते विस्मयं ययुः । २४३ । ततो रामो बन्धुभिश्च पूर्ववन्नगरीं ययौ। गत्वा गेहे तु सीतायै सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥२४४। अतस्ते नव विप्राणां नामभिर्जगतीतले । ख्यातिं रामा यपुस्तत्र नव यच्च तप्रियम्।२४५॥ यथार्का द्वादश प्रोक्ता एकविंशद्गणाधिपः। रुद्रा एकादश प्रोक्ता यथाष्ट भैरवाः स्मृताः ॥२४६। नव दुर्गा यथा त्वत्र तथा रामा नव स्मृताः। प्रियं द्वादश सूर्याय एकादश शिवप्रियम् ॥२४७॥ एकविंशत्प्रियं यद्गगणेशाय महात्मने। प्रियमष्ट भैरवाय दुर्गायै तु नव प्रियम् ॥२४८॥ यथा यथाऽत्र रामाय नव शिष्य प्रियं सदा। तस्मान्नवविधेः पुष्पैर्गङ्गलिस्तत्प्रियो मतः ॥२४९॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकांडे रामपूजावृत्तविस्तारो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


आपके कष्टको देखकर ही मैं अलग-अलग रूप धारण करके एक ही समयमें सबके समक्ष आया हूँ ॥ २३४ ॥ मैंने अपने मनमें सोचा कि ये सब भाई एक साथ एक ही समयमें तपस्या करने वाले हैं, ऐसी अवस्थामें मैं किसे पहले दर्शन दूँ और किसे पीछे ॥ २३५ ॥ यह विचारकर मैंने आज एक ही समय तुम लोगोंको दर्शन दिया है। अब अपने इच्छानुसार वर भी मांग लो । २३६। उनकी वाणी सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—हे प्रभो ! जिससे संसारमें हमारी कीर्ति हो, हमें आप वही वरदान दीजिये ॥ २३७। इस तरह उनकी बात सुनकर रामने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आप लोगोंको दर्शन देनेके लिये मैंने नौ रूप धारण किया है। अतएव आप लोगोंके नामसे ही मैं नौ रामके नामसे विख्यात होऊँगा । २३८ ॥ २३९ ॥ जो कोई भी नौ चीजें मुझे देगा, वे हमें अतिशय प्रिय होंगी। इस तरह उनका बात सुनकर प्रसन्न मनसे उन ब्राह्मणोंने बार-बार रामको प्रणाम किया । उधर रामके साथवाले लक्ष्मण भरत आदि लोग अपनेको नौ रूपवाले देखकर बड़े चकराये । तदनन्तर वे सब राम पालकियोंमें बैठे और उन ब्राह्मणोंसे पूछकर अयोध्याके लिये लौट पड़े । २४०-२४२ । रास्तेमें रामने उन नवों रामोंका रूप समट लिया और फिर ज्योंके त्यों एक राम हो गये। यह घटना देखकर भी लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २४३ ॥ इस तरह राम अपने बान्धवोंके साथ नगरीको गये। घर पहुंचकर उन्होंने सीताको उस दिनका सारा समाचार कह सुनाया ॥२४४॥ हे शिष्या ! इसी कारण राम उन नौ नामोंसे विख्यात हुए और जो-जो चीजें नौ संख्याकी दी जाती हैं, वे उन्हें विशेष प्रिय हुआ करती हैं। २४५ ॥ जैसे बारह आदित्य माने गये हैं इक्कीस गणेशजी, ग्यारह रुद्र, आठ भैरव तथा नौ दुर्गायें मानी गयी हैं, उसी तरह राम भी नौ माने जाते हैं ॥ २४६ ॥ बारह सङ्ख्याकी चीजें सूर्यको, एक इससङ्ख्यक रुद्रको, इक्कीस गणेशजीको, आठ भैरवको और नौ वस्तुयें दुर्गाको प्रिय होती हैं ॥ २४७ ॥ २४८॥, इसी तरह जो चीजें नौ होंगी, रामको अत्यंत प्रिय हुआ करेंगी। इसलिये नौ प्रकारके फूलोंसे अञ्जलीदानका विधान मैंने बतलाया है ॥ २४९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८५

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८५


चतुर्थः सर्गः

( लघुरामोतोभद्रका विस्तार )

श्रीविष्णुदास उवाच

स्वामिंस्त्वया रामनाम्नामष्टोत्तरसहस्रकम् । भद्रमुक्तं तथा चाष्टोत्तरशतमनुत्तमम् ॥ १ ॥
रामनाम्नां भद्रमुक्तं रामचन्द्रप्रपूजने । तत्कीदृशे ते तु भद्रे लेखनीये मनोरमे ॥ २ ॥
ते मां विस्तरतो ब्रूहि यथाऽहं वेद्मि तत्त्वतः । तयोर्ये ये विशेषाश्च भद्रयोस्तेऽपि मां वद ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि भद्राणां रचनाः शुभाः । यथा पृष्टा त्वया मह्यं रामनाम्नां मनोहराः ॥ ४ ॥
अष्टोत्तरशतं रामलिङ्गतोभद्रमुत्तमम् । आदौ मया विस्तरेण कथ्यते तन्निशामय ॥ ५ ॥
अत्रोपास्या राममुद्रा रुद्रश्चोपासकः स्मृतः । श्रीरामालिङ्गतोभद्रमत एतौच्यते बुधैः ॥ ६ ॥
तिर्यगूर्ध्वे वदा रेखा द्वे शते रेखयाधिके । तत्रादौ कृष्णपरिधिस्ततो रक्तः सितस्ततः ॥ ७ ॥
ततः पीतश्च परिधि कोणेन्दुस्त्रिपदः स्मृतः । चन्द्राग्रे शृङ्खला कृष्णा स्मृता द्वादशपादिका ॥ ८ ॥
हरिता च ततो वल्ली त्रयोविंशत्यदात्मिका । ततः पीता शृङ्खला च स्मृता द्वादशपादिका ॥ ९ ॥
विंशत्पादभवं भद्रं रक्तं वापी सिता ततः । त्रयोदशपदा ज्ञेया लिंगं षड्विंशपादजम् ॥ १० ॥
कृष्णाश्चतुष्पदो मूर्द्धा नाभिर्युग्मपदः स्मृतः । मूलस्कन्धौ षट्पदजौ पार्श्वं तुर्यपदात्मके ॥ ११ ॥
ततो रक्तश्च परिधिर्मर्यादाख्योऽर्कपादजः । ततो मुद्रा तुर्यतुर्यभूमियादमिता स्मृता ॥ १२ ॥
ततो मर्यादापरिधिर्लिंगमुद्राः पुनः पुनः । एवं हरा नव ज्ञेया मुद्राश्चाष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १३ ॥
परिधयः षोडशैव हान्ते लिंगोर्ध्वपार्श्वके । निर्णेयं भद्रं नवपदैः पीतं वा हरितं क्वचित् ॥ १४ ॥
रक्तभद्रोर्ध्वतः शेषपदानि यानि सन्ति हि । पयेच्छ विचित्ररङ्गैश्च शृङ्खलार्थं नियोजयेत् ॥ १५ ॥


विष्णुदासने कहा—हे स्वामिन् ! आपने हमें रामनामका अष्टोत्तर सहस्रका भद्र ( आसन ) और अष्टोत्तरशत नामका भद्र रामचन्द्रकी पूजाके प्रसङ्गमें बतलाया है। उन भद्रोंको किस प्रकार बनाना चाहिए, यह हमें विस्तारपूर्वक बतलाइए। जिससे कि मैं ठीक तरहसे समझ सकूँ। उनकी जो विशेषतायें हों सो भी हमें बतला दीजिए। १-३॥ श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! उन भद्रोंकी रचनाका प्रकार जिस तरह तुमने पूछा है, सो मैं पहले अष्टात्तरशत रामलिङ्गतोभद्रका रचनाप्रकार विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ, सुनो ॥ ४ । ५ ॥ इसमें राममुद्रा उपास्य है और रुद्र उपासक हैं। इसी कारण लोग इसे रामलिङ्गतोभद्र कहते हैं ॥ ६ ॥ वह भद्र बनानेवालेको चाहिए कि सीधी और बंदी दो सौ रेखाएँ खींचे। उसमें पहलेकी परिधि काली, फिर लाल, फिर सफेद रक्वे ॥ ७ ॥ इसके बादकी परिधि पीली और फिर कोणमें त्रिपद चन्द्रका आकार बनाये। चन्द्रमाके आगे काले रङ्गकी ऐसी शृङ्खला बनाये, जिसमें द्वादश पाद ( कोष्ठक ) विद्यमान हों। फिर हरे रङ्गकी तेईस पदकी वल्ली बनाये। फिर द्वादश पदकी पीली शृङ्खला रक्खे ॥ ८ ॥ ९ ॥ फिर बीस पादका भद्र बनाये। तदनन्तर सफेद रङ्गकी वापिका निर्माण करे। जिसके तेईस पाद बने हों। फिर छब्बीस पादका लिंग बनाये फिर चार पाद । कोष्ठक का काले रङ्गने मस्तक बनाये, फिर दो पादकी नाभि बनाये। उसके दो मूल स्कन्ध छः छः पादोंके बनाये और चार पादका पार्श्वभाग बनाये। फिर बारह पादकी मर्यादा बनाये, जो लाल रङ्गसे रही हो। फिर चार-चार पादोंकी मुद्रा बनाये। फिर मर्यादाकी परिधि एवं लिङ्गामुद्रा बनाये। इसी तरह नौ शिव एवं आठ मुद्रायें बनाये ॥ १०-१३ ॥ फिर लिंगके ऊपर और बगलमें सोलह परिधियोंकी रचना करे। फिर नौ पादका कहीं पीले और कहीं हरे रङ्गके भद्र बनावे ॥ १४ । रक्त भद्रके ऊपर जितने भी चरण हों, उनकी शृङ्खलाके लिए चित्र-