भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 589

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५७३


चतुर्वर्णात्मकश्चापि तथा वर्णत्रयात्मकः । द्व्यक्षरो राममन्त्रश्च मनुष्वेकाक्षरोऽपि च ॥ ५० ॥
एवं नानाविधा मन्त्राः सन्त्येतेष्व महत्तमाः । गुरोस्त्वेकं गृहीत्वाऽत्र जपेन्मत्रीतमस्तधीः ॥ ५१ ॥
उपासनाविधानं च रामोपासकमानवैः । यथा मन्त्रस्य रूपं हि विज्ञेयं मन्त्रशास्त्रतः ॥ ५२ ॥
अधुना मानसी पूजाविधानं च मयोच्यते । दण्डके सुतीक्ष्णाय कथितं कुम्भजन्मना ॥ ५३ ॥
सुतीक्ष्णस्त्वेकदाऽगत्य दृष्ट्वा रहसि संस्थितम् । प्रणम्य भक्त्या मन्त्रार्थं प्रापाय विनयान्वितः ॥ ५४ ॥

सुतीक्ष्ण उवाच
हृदये मानसी पूजा कीदृशी च वद प्रभो । उपचारैः कतिविधैः पूज्यते रघुनन्दनः ॥ ५५ ॥

अगस्त्य उवाच
रामं पद्मविशालाक्षं कालाम्बुदसमप्रभम् । पद्मासनस्थं सुखमासीनं चिन्तयेच्चित्तपुष्करे ॥ ५६ ॥
रागादिकंलुषं चित्तं वैराग्येण सुनिश्चितम् । कृत्वा भवभयान्मुक्त्यै रामं भावयितुं क्षमे ॥ ५७ ॥
प्रातः शुद्धवपुर्भूत्वा त्यक्त्वा दम्भादिकानधः । विविक्तदेशमाविश्य ध्यानं पूजां समारभेत् ॥ ५८ ॥
नाभिकुण्डसमुद्भूतं कदलीकुसुमोपमम् । अधोवक्त्रं स्निग्धवर्णं ध्यायेद्धृदयपङ्कजम् ॥ ५९ ॥
तन्मध्ये रामनाम्नैव फुल्लं कृत्वाऽस्य मध्यमे । भानुसोमाग्निसण्डलाननुभावयेत् ॥ ६० ॥
तस्योपरि न्यसेद्देवं पीठं रत्नमपोज्ज्वलम् । तन्मध्ये राघवं ध्यायेत्सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ ६१ ॥
इन्दीवरनिभं शांतं विशालाक्षं सुवक्त्रकम् । उद्यद्दिवाकराभ-कुण्डलाभ्यां विराजितम् ॥ ६२ ॥
सुनासं सुकिरीटं च सुकपोलं शुचिस्मितम् । विज्ञानमुद्रां द्विभुजं कम्बुग्रीवं सुकुन्तलम् ॥ ६३ ॥
नानारत्नमयैर्हारैर्मणिभिश्चोपशोभितम् । विद्युत्पुञ्जप्रतीकाशं धनुर्बाणधरं हरिम् ॥ ६४ ॥


अक्षरोंका, एक नौ अक्षरोंका एक आठ अक्षरोंका, एक सात अक्षरोंका, एक छ अक्षरोंका, एक पाँच अक्षरोंका, एक चार वर्णोंका, एक तीन अक्षरोंका, एक दो अक्षरोंका और एक एक अक्षरका राममंत्र है ॥ ४७-५० ॥ एक तरह अनेक प्रकारके राममन्त्र हैं। उपासकको चाहिये कि उनमेंसे किसी जो एक मंत्रको गुरुसे ग्रहण करे और श्रीरामचन्द्रजीके पास बैठकर उसका जप करे ॥ ५१ ॥ रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि उपासनाकी विधि और मन्त्रका स्वरूप मन्त्रशास्त्रसे समझ लें ॥ ५२ ॥ अब मैं यहाँ रामकी मानसी पूजाका विधान बतला रहा हूँ। जिसे कि दण्डक वनमें अगस्त्यजीने सुतीक्ष्ण ऋषिको बतलाया था ॥ ५३ ॥ एक दिन अगस्त्यजी एकान्तमें बैठे थे। उस समय मुनीन्द्रने आकर परम भक्तसे अगस्त्यको प्रणाम किया और विनयपूर्वक बहुत स्तुति ॥ ५४ ॥ सुतीक्ष्णने कहा—हे प्रभो ! उपासकोंका मानसी पूजा कैसे करनी चाहिये। इस पूजामें किन किन उपचारोंसे रामका पूजन किया जाता है, सो आप बतलाइये ॥ ५५ ॥ अगस्त्यने कहा कि उपासकको चाहिये कि पहले वह अपने हृदयरूपी कमलपर बैठे हुए रामका इस प्रकार ध्यान करे—जिनके कमलकी तरह विशाल नेत्र हैं। काल मेघके समान नील वर्ण है। मुस्कराता हुआ मुख है और वे आनन्दपूर्वक बैठे हैं। ॥ ५६ ॥ उपासकका यह भी कर्तव्य है कि रागद्वेष आदिसे कलुषित चित्तको वैराग्यसे निर्गल कर ले। तब भवपाशसे मुक्त होनेके लिए रामका ध्यान करे ॥ ५७ ॥ सबेरे शरीरको पवित्र करके दम्भादि सर्वथा छोडकर किसी एकान्त स्थानमें ध्यान और पूजन करे ॥ ५८ ॥ नाभि-कुण्डसे निकले हुए कदलीपुष्पके समान आठ दलोंवाले और खिले हृदयरूपी कमलका ध्यान करे ॥ ५९ ॥ उस कमलको रामनामसे विकसित करके बीचमें सूर्य, शश एवं अग्निमण्डलके दा अधिक प्रकाशमान तेजका ध्यान करे ॥ ६० ॥ उसपर रत्नमय उज्ज्वल पीठको रखनेकी भावना करके उसके बीचोंबीच करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान रामका ध्यान करे। ६१ ॥ कमलका भाई जिनका विशाल आँख है। चमकती हुई दीप्तिसे प्रकाशित कुण्डल जिनके कानोंमें पड़े हैं ॥ ६२ ॥ जिनकी सुन्दर नासिका है, जो सुन्दर किरीट धारण किये हैं, जिनका सुन्दर कपोल है, मीठी मुसकान है, वे विज्ञानमुद्रा धारण किये हैं, उनकी दो भुजाएँ हैं, शंखके समान ग्रीवा है, उनके काले और चमकते हुए केशपाश हैं, जो अनेक रत्नोंसे जुडी दिव्य माला पहने हैं, जिनका छबी भी