भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५७४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३


वीरासनस्थं संतानतरुमूलनिवासिनम् । महासुगन्धलिप्ताङ्गं वनमालाविराजितम् ॥ ६५ ॥
वामपार्श्वे स्थितां सीतां चामीकरसमप्रभाम् । लीलावसन्धरां देवीं चारुहासां शुचिस्मिताम् ॥ ६६ ॥
पश्यन्तीं स्निग्धया दृष्ट्या दिव्यां कल्पविराचिताम् । छत्रचामरहस्तेन लक्ष्मणेन सुसेवितम् ॥ ६७ ॥
हनुमत्प्रमुखैर्नित्यं वानरैः परिवारितम् । स्तूयमानमृषिगणैः सेवितं भरतादिभिः ॥ ६८ ॥
सनन्दनादिभिश्चाग्रेयोगिवृन्दैः स्तुतं सदा । सर्वशास्त्रार्थकुशलं योगदं योगसिद्धिदम् ॥ ६९ ॥
एवं ध्यात्वा रामचन्द्रं मणिवृक्षसुशोभितम् । शुद्धेन मनसा रामं पूजयेत्सततं हृदि । ७० ॥

इति ध्यानम् ।

आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् । कौशल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥ ७१ ॥
राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते । रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥ ७२ ॥
श्रीरामागच्छ भगवन् रघुवीर रघूत्तम । जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ७३ ॥
रामचन्द्र महेष्वास रावणांतक राघव । यावत्पूजां समाप्येऽहं तावत्त्वं सन्निधौ भव ॥ ७४ ॥
रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलोचन । रघुवंशज मे देव श्रीरामाभिमुखो भव ७५ ॥
प्रसीद जानकीनाथ सुप्रसिद्ध सुरेश्वर । प्रत्यक्षी भव मे राजन् सर्वज्ञ मधुसूदन ॥ ७६ ॥
शरणं मे जगन्नाथ शरणं भक्तवत्सल । वरदो भव मे राजन् शरणं मे रघूत्तम । ७७ ॥
त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक । पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन । ७८ ।
परिपूर्ण परानन्द नमो रामाय वेधसे । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन । ७९ ।
ॐ नमो वासुदेवाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । मधुपर्कं गृहाणाम राजांगजाय ते नमः । ८० ॥


विनाश नहीं होता, जो विद्युद्युक्त समान रङ्ग। हुए वस्त्रोंके जोड़े पहने हैं, वीरासनसे बैठे हैं, कल्पवृक्षके नीचे निवास करत हैं, उत्तम सुगन्धि जिनके शरीरभरमें लगा हुई है और वन वनमाला धारण किये हुए हैं ॥ ६५ ॥
जिनके बांये बगलमे सीताजी बैठी हैं, उनका भी सुवर्ण का सा तेज है, व हाथमें लीलारकमल लिये हैं, मुखपर मन्द मुस्कराहट है, सुन्दर चेहरा है ओर प्रेमभरी दृष्टिसे रामका निहारती हुई कल्पवृक्षके नीचे बैठी हैं हाथम छत्र और चमर लेकर लक्ष्मणजी उनकी सेवा कर रहे हैं ॥ ६६ । ६७ ॥ हनुमान आदि वानरोंसे व नित्य घिरे रहते हैं। कितने ही ऋषि स्तुति करते हैं और भरत आदि भ्राता उनकी सेवा कर रहे हैं। सनन्दन आदि कितने ही योगी उनकी स्तुति कर रहे हैं। व राम समस्त शास्त्रक अर्थ जाननेम कुशल हैं। योगप्रकारको भी वे जानते हैं और योगाभ्यासकी सिद्धि दाता हैं ॥ ६८ । ६९ ॥ कौस्तुभमय चिन्तामणि इन दोनो मणियोंसे सुशोभित रामचन्द्रका ध्यान करके शुद्ध मनसे तांत्रिकविद्या विधिके अनुसार सदा हृदयम उनका पूजन करें ॥ ७० ॥ संसारके ईश, जानकीके वल्लभ, कौशल्याके पुत्र, प्रकृतिके परे और विष्णुरूपधारी श्रीरामका में आवाहन करता हूँ ॥ ७१ ॥ हे राजाओंके राजा रामचन्द्र हे महापत ! में आपको रत्नमय सिंहासन देता हू, उसे स्वीकार करो ॥ ७२ ॥ हे श्रीराम ! हे भगवन् ! हे रघुवीर ! हे रघूत्तम ! हे राजेन्द्र ! आप जानकीजीक साथ आइये और इस हृदयासनपर बैठिए ॥ ७३ ॥ हे रामचन्द्र हे महत् धनुष धारण करनेवाले ! हे रावणांतक ! हे राघव ! जब तक में पूजन समाप्त न कर लूं, तब तक आप मेरे पास रहिए ॥ ७४ ॥ हे रघुनन्दन ! हे राजर्षे ! हे राजीवलोचन राम हे रघुवंशज ! हे देव ! हे श्री राम ! आप मेरे सम्मुख प्रकट हो ॥ ७५ ॥ हे जानकीनाथ ! हे सुप्रसिद्ध सुरेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न हो । हे राजन् ! हे सर्वज्ञ ! हे मधुसूदन ! आप मेरेपर प्रसन्न हों ॥ ७६ ॥ हे जगन्नाथ ! मैं आपकी शरणमें हूँ । हे भक्तवत्सल , आप मेरे वरदाता हो । हे रघूत्तम ! मैं आपकी शरणम हूँ ॥ ७७ ॥ हे अनन्त ! हे त्रैलोक्यपावन ! हे रघुनायक ! आपको प्रणाम है। हे राजर्षे ! इस पद्यको ग्रहण करिए। हे राजीवलोचन राम ! आपको प्रणाम है ॥ ७८ ॥ परिपूर्ण परमानन्द बहुरूपधारी रामको प्रणाम है । हे कृष्ण ! हे विष्णो ! हे जनार्दन ! मेरे दिये हुए अर्ध्यको आप ग्रहण करें ॥ ७९ ॥ तत्वज्ञानके साक्षात् स्वरूप वासुदेवको प्रणाम है। हे राजराज ! आपको प्रणाम है। आप मेरे