भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 775

७५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

एकादश दिनान्यत्र घटिकाश्चापि सन्मिताः । एकादश फलान्येव ते राज्यं निश्चितं मया ॥१०॥ शतकोटिमिते काव्ये पूर्व्वं तेऽवतारतः ।

तन्मध्येऽत्र व्यतीतानि सहस्राणि तथा समाः ।अतीताः शेषभूताश्च मासाः शेष दिनादिकम् ॥११॥
अष्टादशदिनैर्न्यूनमेकं वर्षं ममोद्य यत्शेषभूतं मयूरेण परिपूर्णं भविष्यति ॥१२॥
अयं कालोऽवतारस्य समाप्तेस्ते समागतःगत्वा भागीरथीं पुण्यां पूर्व्वैरानायिताऽलम् ॥१३॥
प्रापितां तत्र राजेन्द्र तस्यां स्नात्वा यथाविधिस्तुतो ब्रह्मादिभिः सर्वैः पदं स्वीयं गमिष्यसि ॥१४॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत्एतावत्कालपर्य्यन्तं नलाद्याः क्व संस्थिताः ॥१५॥
कुतोऽधुना समायातास्तन्मह्यं विस्तराद्वद ।तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१६॥
शृणु राम महाबाहो सर्व्वं ते कथयाम्यहम् ।अत्रिर्मुनिः पुरा राम पूर्णिमायां कृते युगे ॥१७॥
वैशाख्यामेकदा सोमं दृष्ट्वा नारीमुखोपमम्मुमोच वीर्यं भूम्यां स तस्यानुभो बभूव ह ॥१८॥
सोमस्य दर्शनाज्जातः सोमाख्यः स बभूव ह ।सोऽरण्ये जाह्नवीतीरे चकार तप उत्तमम् ॥१९॥
एतस्मिन्समये तत्र कश्चिद्धस्ती समाययौ ।निहतः पक्षिभिस्तत्र तद्दृष्ट्वा कौतुक महत् ॥२०॥
सोमो विचारयामास पक्षिभिर्निहतः करी ।अस्या भूम्याः प्रभावोऽयं पुरं तत्र चकार सः ॥ २१॥
हस्तिनाशात्पुरं जातं तस्मात्तद्धस्तिनापुरम् ।तत्र पौरैः कृतो राजा सोम एव रघूत्तम । २२॥
तस्य जातो बुधः पुत्रस्तत्सुतौ जगतीततम् ।सद्वीपं स्ववशं कृत्वा सुरलोकं प्रजग्मतुः ॥२३॥
तत्र जित्वा सुरान्सर्व्वान्सुरस्त्रीभिश्च संयुतौमुक्त्वा देवान्स्वर्गलोके निवासं चक्रतुर्मुदा ॥२४॥
तयोर्ददौ वरान्ब्रह्मा युवां मद्धस्तमग्रतौ ।युवाभ्यां मोहितन्वन्ध देवमघपुरस्सरम् ॥२५॥
युवाभ्यां तर्ह्यहं दद्मि वरांश्छृणुत बालकौयुष्मद्वंशे नृपाः केचिदग्रे त्रिपुरुषोर्द्धवतः ॥२६॥

आपको राज्य करनेके लिए मैने निर्धारित किया था ॥ ६ ॥ १० ॥ ये बातें मैं आपके अवतारके पहले ही अपने शतकोटिसंख्यात्मक रामायणमें लिख चुका हूँ । वे ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गये । अब ग्यारह महीना और ग्यारह दिन तथा घड़ी-पल बाकि हो बाको बज है ॥ ११ ॥ सब मिलाकर अठारह दिवस न्यून एक वर्ष बाकी है । वह समय मंत्र मत समाप्त होगा ॥ १२ ॥ आपके अवतारका समय समाप्त हो रहा है । अब आप अपने पूर्वज अर्थात् भगीरथ द्वारा लायी हुई गङ्गामें विधिवत् स्नान करके ब्रह्मादिक समस्त देवताओंसे संस्तुत होकर अपने परम धामको जायँगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ वाल्मीकिकी बात सुनकर रामने कहा कि अबतक ये नल आदि राजे कहाँ थे ? ॥ १५ ॥ इस समय कहाँसे आ गये हैं, यह सब आप मुझे विस्त रपूर्वक बतलाइए । रामका वचन सुनकर वाल्मीकि बोले-हे राम ! हे महाबाहो ! मैं सब कुछ कहता हूँ, सुनिए । बहुत दिन हुए, सत्ययुगमें अत्रि ऋषिने वैशाखकी पूर्णिमाको चन्द्रमाका मुख एक स्त्री के समान सुन्दर देखकर अपना वीर्य त्याग दिया और उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १६-१८ ॥ चन्द्रमाको देखकर वह पुत्र उत्पन्न हुआ था। इसलिए वह सोम कहलाया और वनमें जाकर गङ्गाजीके तटपर उत्तम तप करने लगा ॥ १९ ॥ उसी समय वहाँ एक हाथी आ गया । उस हाथीको कुछ पक्षियोंने मिलकर मार डाला । यह महाकौतुक देखकर सोमने अपने मनमें डाया कि यहाँके पक्षियोंने हाथीका मार डाला है । यह अवश्य इस भूमिक। ही प्रभाव है । ऐसा विचार करके सोमने उसी स्थानपर एक नगर बसाया ॥ २० ॥ २१ ॥ उस स्थानपर पक्षियोंने हाथीका विनाश किया था। इस कारण उसका हस्तिनापुर नाम पड़ गया । हे रघूत्तम ! वहाँके पुरवासियोंने आग्रह करके सोमको ही वहाँका राजा बनाया । २२ ॥ सोमके बुध नामका पुत्र हुआ । फिर वश या, बुध और सोमने मिलकर सब द्वीपोंको अपने अधीन कर लिया और कुछ दिनाक अनन्तर स्वर्गलोकको गय ॥ २३ ॥ उन्होंने स्वर्गमें देवताओंको जीतकर छोड़ दिया और वे सस्त्रीक वहीं रहने लगे ॥ २४ ॥ उन दोनोंको ब्रह्मा ने अनेक वरदान दिये । ब्रह्मा ने