भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 776

सर्गः १ ] सूर्यकाण्डम् ७५९

अन्यैः पराजिताः सप्त पुरुषा न भवंति हि । इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा ययौ निजपदं प्रति ॥२७॥
ततः सोमाय दौहित्री दत्ता पद्मावती शुभा । इन्द्रेण तत्र तौ सोमबुधौ स्वर्गे स्थितौ चिरम् ॥२८॥
बुधस्य तनयो भूम्यां नाम्नाख्यातः पुरूरवाः । चकार राज्यं धर्मेण तथा चद्धस्तिनापुरे ॥२९॥
हस्य पुत्रश्च गव्योऽभूद्गव्यपुत्रोऽन्य उच्यते । अन्यपुत्रोनल श्रीमान् दिक्पालान् जेतुमुद्यतः । ३०॥
राज्ये पुरूरवादींश्च त्रीन् स्थाप्य निजपूर्वजान् । सप्तद्वीपन्नृपैर्युक्तः प्रतस्थौ मेरुमुन्नतम् ॥३१॥
आदौ जित्वा सबह्निं दियमं जित्वाऽथ निर्ऋतिम् प्रययौ वरुण जेतुं गरुणादिभिरन्वितः ॥३२।
एतस्मिन्नन्तरे राम तूणं सैन्येन रावणः । प्रययौ नाकलोकं हि सुरानिंद्रादिकान् रणे ॥३३ ।
जित्वा निनाय स्वां लंकां सोमो युद्धाय चाऽव्रजत् निर्भयो सुहृदः सर्वानिन्द्रादीन् मोचयितुं सुरान् ३४॥
तदा निवारयामास ब्रह्मा सोमं त्वरान्वितः । विष्णुर्भूत्वा नृवेषेण रावणं हि हनिष्यति ॥३५ ।
स्वं माऽद्य रावणं याहि वरदस्तस्मै मयाऽर्पितः । तद्वाक्याच्च न मुक्त्वा ययौ सोमोऽमरावतीम् ॥३६॥
भूम्यां नलरूपतो गत्वा प्रहृत्य पतनं तथा । जित्वा कुवेरमीशानं कृतकार्यममन्यत ॥३७॥
वात्मानं च ततः स्वर्गे चेंद्रं जेतु समुद्यतः । एवं नलेन भ्रमता गत तस्य कृत युगम् ॥३८॥
त्रेतायुगसमाप्तौ स ददर्श सकलं बलम् । नत्राऽपश्यत रावण स देवान्कृत्वाऽवशं निजति ॥३९॥
देवान्त्वशगान् कृत्वा लंकां स्वां स गतः पुनः । तत्र मध्ये तु अभवौ नलस्य नहुषः सुतः ॥४०॥
हूषहस्य जानीकरस्तत्सुतो बभ्रुदः स्मृतः । तस्य पुत्रो लघुभूतः सुरथस्तत्सुतः स्मृतः ॥४१॥
अजमीढस्तु तत्पुत्रस्त्वेवं वंशोऽभवन्पथि । ततः स मंत्रयामास नलो मंत्रिजनैः सह ॥४२॥
किमर्थमिंद्रलोकं तं गन्तव्यमधुना यदि । श्रूति देवाः समालोका लङ्कायां रावणेन हि ॥४३।

कहा-तुम दोनों मेरे वंशज हो। तुमने मेरे सहित समस्त देवताओंको जीतकर छोड़ दिया है। इसलिए मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ कि तुम्हारे वंशमें तब पह के आगे सात पुरुष तक जितने राजे होगे वे किसीसे भी पराजित नहीं होंगे। इस प्रकार वरदान देकर ब्रह्मा अपने स्थानको चले गये ॥ २५-२७ ॥ इसके अनन्तर इन्द्रने पद्मावती नामकी अपनी सुन्दरी नतिनी सोमको द दी। इस तरह व सोम और बुध आनन्दके साथ बहुत दिनों तक स्वर्गलोकमे रहे । २८ ॥ बुधका पुत्र इस संसारम पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ । उसने धर्मपूर्वक हस्तिनापुरमें राज्य किया ॥ २९ ॥ उसका पुत्र गव्य हुआ। गव्यका पुत्र अहर और अन्यका पुत्र नल हुआ । नल इतना प्रबल बोर था कि उसने दसा दिक्पालोको जीतनेकी इच्छा की। सेनाकी तैयारी करके यह हस्तिनापुरमे पुरूरवा आदि तीन पूर्वजोंको छोड़कर सातो द्वीपोंके राजाओंके साथ उन्नत शिखरवाले मेरु-पर्वतपर चढ़ गया । ३० ॥ ३१ । वहां पहुंचकर उसने पहले अग्निको, फिर यमको और उसके बाद निर्ऋतिको जीतकर रावण आदि दैत्योंके साथ वरुणको जीतनेके लिए गया ॥ ३२ ॥ उसी समय रावण अपनी सेनाके साथ स्वर्गलोक पहुंचा और इन्द्रादि देवताओंको संग्राममें जीतकर अपनी लंकाको वापस चल गया । तब सोम अपने मित्रों तथा पुत्रोंको साथ लेकर रावणस युद्ध करने तथा इन्द्रादि देवोंको छुड़ानेके लिए चल पड़ा ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ उसी समय ब्रह्माजीने आकर सोमको रावणपर चढ़ाई करनेसे रोक दिया और कहा कि स्वयं विष्णुरूपवान् मनुष्यका रूप धारण करके राक्षसका संहार करेंगे। तुम आज रावणके पास मत जाओ। ब्रह्माकी बात मानकर होम लंका न जाकर अमरावतीपुरी गया । ३५ ॥ ३६ ॥ इसके अनन्तर वही सोम नलरूपसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुआ और अपने पराक्रमसे कुबेर एवं ईशानको परास्त करके उसने अपनेको कृतकृत्य माना ॥ ३७॥ कुछ दिनों बाद इन्द्रको जीतनेके लिए नल स्वर्गलोकमें जा पहुंचा। इस तरह उसके घूमते-फिरते सत्ययुग बीत गया ॥ ३८॥ त्रेतायुगके समाप्त हो जानेपर नलने सब वीरोंको तो देखा, किन्तु रावण नहीं मिला। अन्तमें नलने फिर सब देवताओंको वशमे किया। लंकापर भी अधिकार जमाया । आगे चलकर नलके नहुष, नहुषके जातीकर, जातीकरके बभ्रुद, बभ्रुदके लघुभूत, लघुभूतके सुरथ, सुरथके अजमीढ़ पुत्र हुआ और इस प्रकार नलकी सन्तति बढ़ी। एक दिन नलने अपने मंत्रियों-