अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्पूर्ण संसारको जन्म देनेवाला अहंकार अध्यात्म है और अभिमान उसका अधिभूत तथा रुद्र उसके अधिष्ठाता देवता हैं ॥ ३० १/२ ॥ अध्यात्मं बुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रियविचारिणी ॥ ३१ ॥ अधिभूतं तु मन्तव्यं ब्रह्मा तत्राधिदैवतम् । पाँच इन्द्रियों और छठे मनको जाननेवाली बुद्धिको अध्यात्म कहते हैं। मन्तव्य उसका अधिभूत और ब्रह्मा उसके अधिदेवता हैं ॥ ३१ १/२ ॥ त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते ॥ ३२ ॥ स्थलमापस्तथाऽऽकाशं जन्म चापि चतुर्विधम् । अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजरायुजमथापि च ॥ ३३ ॥ चतुर्धा जन्म इत्येतद् भूतग्रामस्य लक्ष्यते । प्राणियोंके रहनेके तीन ही स्थान हैं—जल, थल और आकाश। चौथा स्थान सम्भव नहीं है। देहधारियोंका जन्म चार प्रकारका होता है—अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज। समस्त भूत-समुदायका यह चार प्रकारका ही जन्म देखा जाता है ॥ ३२-३३ १/२ ॥ अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च ॥ ३४ ॥ अण्डजानि विजानीयात् सर्वांश्चैव सरीसृपान् । इनके अतिरिक्त जो दूसरे आकाशचारी प्राणी हैं तथा जो पेटसे चलनेवाले सर्प आदि हैं, उन सबको भी अण्डज जानना चाहिये ॥ ३४ १/२ ॥ स्वेदजाः कृमयः प्रोक्ता जन्तवश्च यथाक्रमम् ॥ ३५ ॥ जन्म द्वितीयमित्येतज्जघन्यतरमुच्यते । पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जू आदि कीट और जन्तु स्वेदज कहे जाते हैं। यह क्रमशः दूसरा जन्म पहलेकी अपेक्षा निम्न स्तरका कहा जाता है ॥ ३५ १/२ ॥ भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जायन्ते कालपर्ययात् ॥ ३६ ॥ उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः । द्विजवरो! जो पृथिवीको फोड़कर समयपर उत्पन्न होते हैं, उन प्राणियोंको उद्भिज्ज कहते हैं ॥ ३६ १/२ ॥ द्विपादबहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च ॥ ३७ ॥ जरायुजानि भूतानि विकृतान्यपि सत्तमाः । श्रेष्ठ ब्राह्मणो! दो पैरवाले, बहुत पैरवाले एवं टेढ़े-मेढ़े चलनेवाले तथा विकृत रूपवाले प्राणी जरायुज हैं ॥ ३७ १/२ ॥ द्विविधा खलु विज्ञेया ब्रह्मयोनिः सनातनी ॥ ३८ ॥ तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नयः ।