अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनमेजय! उस वज्रके प्रहारसे विदीर्ण होकर पृथ्वीने नागलोकका रास्ता प्रकट कर दिया ॥ ३६ ॥ स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह । ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रशः ॥ ३७ ॥ उसी मार्गसे उन्होंने नागलोकमें प्रवेश किया और देखा कि नागोंका लोक सहस्रों योजन विस्तृत है ॥ ३७ ॥ प्राकारनिचयैर्दिव्यैर्मणिमुक्तास्वलंकृतैः । उपपन्नं महाभाग शातकुम्भमयैस्तथा ॥ ३८ ॥ महाभाग! उसके चारों ओर दिव्य परकोटे बने हुए हैं; जो सोनेकी ईंटोंसे बने हुए हैं और मणि-मुक्ताओंसे अलंकृत हैं ॥ ३८ ॥ वापीः स्फटिकसोपाना नदीश्च विमलोदकाः । ददर्श वृक्षांश्च बहून् नानाद्विजगणायुतान् ॥ ३९ ॥ वहाँ स्फटिक मणिकी बनी हुई सीढ़ियोंसे सुशोभित बहुत-सी बावडियों, निर्मल जलवाली अनेकानेक नदियों और विहगवृन्दसे विभूषित बहुत-से मनोहर वृक्षोंको भी उन्होंने देखा ॥ ३९ ॥ तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वहः । पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ॥ ४० ॥ भृगुकुलतिलक उत्तंकने नागलोकका बाहरी दरवाजा देखा, जो सौ योजन लंबा और पाँच योजन चौड़ा था ॥ ४० ॥ नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत् तदा । निराशश्चाभवत् तत्र कुण्डलाहरणे पुनः ॥ ४१ ॥ नागलोककी वह विशालता देखकर उत्तंक मुनि उस समय दीन—हतोत्साह हो गये। अब उन्हें फिर कुण्डल पानेकी आशा नहीं रही ॥ ४१ ॥ तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः । ताम्रास्यनेत्रः कौरव्य प्रज्वलन्निव तेजसा ॥ ४२ ॥ इसी समय उनके पास एक घोड़ा आया, जिसकी पूँछके बाल काले और सफेद थे। उसके नेत्र और मुँह लाल रंगके थे। कुरुनन्दन! वह अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ॥ ४२ ॥ धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे । ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले ॥ ४३ ॥ उसने उत्तंकसे कहा—विप्रवर! तुम मेरे इस अपान मार्गमें फूँक मारो। ऐसा करनेसे ऐरावतके पुत्रने जो तुम्हारे दोनों कुण्डल लाये हैं, वे तुम्हें मिल जायँगे ॥ ४३ ॥ मा जुगुप्सां कृथाः पुत्र त्वमत्रार्थे कथंचन ।