भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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त्वयैतद्धि समातीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा ॥ ४४ ॥ 'बेटा! इस कार्यमें तुम किसी तरह घृणा न करो; क्योंकि गौतमके आश्रममें रहते समय तुमने अनेक बार ऐसा किया है' ॥ ४४ ॥ उत्तङ्क उवाच कथं भवन्तं जानीयामुपाध्यायाश्रमं प्रति । यन्मया चीर्णपूर्वं हि श्रोतुमिच्छामि तद्धयहम् ॥ ४५ ॥ उत्तंकने पूछा—गुरुदेवके आश्रमपर मैंने कभी आपका दर्शन किया है, इसका ज्ञान मुझे कैसे हो? और आपके कथनानुसार वहाँ रहते समय पहले जो कार्य मैं अनेक बार कर चुका हूँ, वह क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ४५ ॥ अश्व उवाच गुरोर्गुरुं मां जानीहि ज्वलनं जातवेदसम् । त्वया ह्यहं सदा विप्र गुरोरर्थेऽभिपूजितः ॥ ४६ ॥ विधिवत् सततं विप्र शुचिना भृगुनन्दन । तस्माच्छ्रेयो विधास्यामि तवैवं कुरु मा चिरम् ॥ ४७ ॥ घोड़ेने कहा—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु जातवेदा अग्नि हूँ, यह तुम अच्छी तरह जान लो। भृगुनन्दन! तुमने अपने गुरुके लिये सदा पवित्र रहकर विधिपूर्वक मेरी पूजा की है। इसलिये मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा। अब तुम मेरे बताये अनुसार कार्य करो, विलम्ब न करो ॥ ४६-४७ ॥