अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकनवतितमोऽध्यायः हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा जनमेजय उवाच यज्ञे सक्ता नृपतयस्तपःसक्ता महर्षयः । शान्तिव्यवस्थिता विप्राः शमे दम इति प्रभो ॥ १ ॥ जनमेजयने कहा—प्रभो! राजालोग यज्ञमें संलग्न होते हैं, महर्षि तपस्यामें तत्पर रहते हैं और ब्राह्मणलोग शान्ति (मनोनिग्रह)-में स्थित होते हैं। मनका निग्रह हो जानेपर इन्द्रियोंका संयम स्वतः सिद्ध हो जाता है ॥ १ ॥ तस्माद् यज्ञफलैस्तुल्यं न किंचिदिह दृश्यते । इति मे वर्तते बुद्धिस्तथा चैतदसंशयम् ॥ २ ॥ अतः यज्ञफलकी समानता करनेवाला कोई कर्म यहाँ मुझे नहीं दिखायी देता है। यज्ञके सम्बन्धमें मेरा तो ऐसा ही विचार है और निःसंदेह यही ठीक है ॥ २ ॥ यज्ञैरिष्ट्वा तु बहवो राजानो द्विजसत्तमाः । इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयुः ॥ ३ ॥ यज्ञोंका अनुष्ठान करके बहुत-से राजा और श्रेष्ठ ब्राह्मण इहलोकमें उत्तम कीर्ति पाकर मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३ ॥ देवराजः सहस्राक्षः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । देवराज्यं महातेजाः प्राप्तवानखिलं विभुः ॥ ४ ॥ सहस्र नेत्रधारी महातेजस्वी देवराज भगवान् इन्द्रने बहुत-सी दक्षिणावाले बहुसंख्यक यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका समस्त साम्राज्य प्राप्त किया था ॥ ४ ॥ यदा युधिष्ठिरो राजा भीमार्जुनपुरःसरः । सदृशो देवराजेन समृद्ध्या विक्रमेण च ॥ ५ ॥ भीम और अर्जुनको आगे रखकर राजा युधिष्ठिर भी समृद्धि और पराक्रमकी दृष्टिसे देवराज इन्द्रके ही तुल्य थे ॥ ५ ॥ अथ कस्मात् स नकुलो गर्हयामास तं क्रतुम् । अश्वमेधं महायज्ञं राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥ फिर उस नेवलेने महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस अश्वमेध नामक महायज्ञकी निन्दा क्यों की? ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच यज्ञस्य विधिमग्र्यं वै फलं चापि नराधिप ।