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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

एकनवतितमोऽध्यायः हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा जनमेजय उवाच यज्ञे सक्ता नृपतयस्तपःसक्ता महर्षयः । शान्तिव्यवस्थिता विप्राः शमे दम इति प्रभो ॥ १ ॥ जनमेजयने कहा—प्रभो! राजालोग यज्ञमें संलग्न होते हैं, महर्षि तपस्यामें तत्पर रहते हैं और ब्राह्मणलोग शान्ति (मनोनिग्रह)-में स्थित होते हैं। मनका निग्रह हो जानेपर इन्द्रियोंका संयम स्वतः सिद्ध हो जाता है ॥ १ ॥ तस्माद् यज्ञफलैस्तुल्यं न किंचिदिह दृश्यते । इति मे वर्तते बुद्धिस्तथा चैतदसंशयम् ॥ २ ॥ अतः यज्ञफलकी समानता करनेवाला कोई कर्म यहाँ मुझे नहीं दिखायी देता है। यज्ञके सम्बन्धमें मेरा तो ऐसा ही विचार है और निःसंदेह यही ठीक है ॥ २ ॥ यज्ञैरिष्ट्वा तु बहवो राजानो द्विजसत्तमाः । इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयुः ॥ ३ ॥ यज्ञोंका अनुष्ठान करके बहुत-से राजा और श्रेष्ठ ब्राह्मण इहलोकमें उत्तम कीर्ति पाकर मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३ ॥ देवराजः सहस्राक्षः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । देवराज्यं महातेजाः प्राप्तवानखिलं विभुः ॥ ४ ॥ सहस्र नेत्रधारी महातेजस्वी देवराज भगवान् इन्द्रने बहुत-सी दक्षिणावाले बहुसंख्यक यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका समस्त साम्राज्य प्राप्त किया था ॥ ४ ॥ यदा युधिष्ठिरो राजा भीमार्जुनपुरःसरः । सदृशो देवराजेन समृद्ध्या विक्रमेण च ॥ ५ ॥ भीम और अर्जुनको आगे रखकर राजा युधिष्ठिर भी समृद्धि और पराक्रमकी दृष्टिसे देवराज इन्द्रके ही तुल्य थे ॥ ५ ॥ अथ कस्मात् स नकुलो गर्हयामास तं क्रतुम् । अश्वमेधं महायज्ञं राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥ फिर उस नेवलेने महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस अश्वमेध नामक महायज्ञकी निन्दा क्यों की? ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच यज्ञस्य विधिमग्र्यं वै फलं चापि नराधिप ।

गदतः शृणु मे राजन् यथावदिह भारत ॥ ७ ॥ वैशम्पायनजीने कहा—नरेश्वर! भरतनन्दन! मैं यज्ञकी श्रेष्ठ विधि और फलका यहाँ यथावत् वर्णन करता हूँ, तुम मेरा कथन सुनो ॥ ७ ॥ पुरा शक्रस्य यजतः सर्व ऊचुर्महर्षयः । ऋत्विक्षु कर्मव्यग्रेषु वितते यज्ञकर्मणि ॥ ८ ॥ हूयमाने तथा वह्नौ होत्रे गुणसमन्विते । देवेष्वाहूयमानेषु स्थितेषु परमर्षिषु ॥ ९ ॥ सुप्रीतैस्तथा विप्रैः स्वागमैः सुस्वरैर्नृप । अश्रान्तैश्चापि लघुभिरध्वर्युवृषभैस्तथा ॥ १० ॥ आलम्भसमये तस्मिन् गृहीतेषु पशुष्वथ । महर्षयो महाराज बभूवुः कृपयान्विताः ॥ ११ ॥ राजन्! प्राचीन कालकी बात है, जब इन्द्रका यज्ञ हो रहा था और सब महर्षि मन्त्रोच्चारण कर रहे थे, ऋत्विज्लोग अपने-अपने कर्मोंमें लगे थे, यज्ञका काम बड़े समारोह और विस्तारके साथ चल रहा था, उत्तम गुणोंसे युक्त आहुतियोंका अग्निमें हवन किया जा रहा था, देवताओंका आवाहन हो रहा था, बड़े-बड़े महर्षि खड़े थे, ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ वेदोक्त मन्त्रोंका उत्तम स्वरसे पाठ करते थे और शीघ्रकारी उत्तम अध्वर्युगण बिना किसी थकावटके अपने कर्तव्यका पालन कर रहे थे। इतनेहीमें पशुओंके आलम्भका समय आया। महाराज! जब पशु पकड़ लिये गये, तब महर्षियोंको उनपर बड़ी दया आयी ॥ ८—११ ॥ ततो दीनान् पशून् दृष्ट्वा ऋषयस्ते तपोधनाः । ऊचुः शक्रं समागम्य नायं यज्ञविधिः शुभः ॥ १२ ॥ उन पशुओंकी दयनीय अवस्था देखकर वे तपोधन ऋषि इन्द्रके पास जाकर बोले —'यह जो यज्ञमें पशुवधका विधान है, यह शुभकारक नहीं है ॥ १२ ॥ अपरिज्ञानमेतत् ते महान्तं धर्ममिच्छतः । न हि यज्ञे पशुगणा विधिदृष्टाः पुरंदर ॥ १३ ॥ 'पुरंदर! आप महान् धर्मकी इच्छा करते हैं तो भी जो पशुवधके लिये उद्यत हो गये हैं, यह आपका अज्ञान ही है; क्योंकि यज्ञमें पशुओंके वधका विधान शास्त्रमें नहीं देखा गया है ॥ १३ ॥ धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो । नायं धर्मकृतो यज्ञो न हिंसा धर्म उच्यते ॥ १४ ॥ 'प्रभो! आपने जो यज्ञका समारम्भ किया है, यह धर्मको हानि पहुँचानेवाला है। यह यज्ञ धर्मके अनुकूल नहीं है, क्योंकि हिंसाको कहीं भी धर्म नहीं कहा गया है ॥ १४ ॥ आगमेनैव ते यज्ञं कुर्वन्तु यदि चेच्छसि ॥ १५ ॥

विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान् भवेत् । 'यदि आपकी इच्छा हो तो ब्राह्मणलोग शास्त्रके अनुसार ही इस यज्ञका अनुष्ठान करें। शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करनेसे आपको महान् धर्मकी प्राप्ति होगी ।। १५ १/२ ।। यज बीजैः सहस्राक्ष त्रिवर्षपरमोषितैः ।। १६ ।। एष धर्मो महान् शक्र महागुणफलोदयः । 'सहस्र नेत्रधारी इन्द्र! आप तीन वर्षके पुराने बीजों (जौ, गेहूँ आदि अनाजों)-से यज्ञ करें। यही महान् धर्म है और महान् गुणकारक फलकी प्राप्ति करानेवाला है' ।। १६ १/२ ।। शतक्रतुस्तु तद् वाक्यमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।। १७ ।। उक्तं न प्रतिजग्राह मानान्मोहवशं गतः । तत्त्वदर्शी ऋषियोंके कहे हुए इस वचनको इन्द्रने अभिमानवश नहीं स्वीकार किया। वे मोहके वशीभूत हो गये थे ।। १७ १/२ ।। तेषां विवादः सुमहान् शक्रयज्ञे तपस्विनाम् ।। १८ ।। जङ्गमैः स्थावरैर्वापि यष्टव्यमिति भारत । इन्द्रके उस यज्ञमें जुटे हुए तपस्वी लोगोंमें इस प्रश्नको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया। भारत! एक पक्ष कहता था कि जंगम पदार्थ (पशु आदि)-के द्वारा यज्ञ करना चाहिये और दूसरा पक्ष कहता था कि स्थावर वस्तुओं (अन्न-फल आदि)-के द्वारा यजन करना उचित है ।। १८ १/२ ।। ते तु खिन्ना विवादेन ऋषयस्तत्त्वदर्शिनः ।। १९ ।। तदा संधाय शक्रेण पप्रच्छुर्नृपतिं वसुम् । धर्मसंशयमापन्नान् सत्यं ब्रूहि महामते ।। २० ।। भरतनन्दन! वे तत्त्वदर्शी ऋषि जब इस विवादसे बहुत खिन्न हो गये, तब उन्होंने इन्द्रके साथ सलाह लेकर इस विषयमें राजा उपरिचर वसुसे पूछा—'महामते! हमलोग धर्मविषयक संदेहमें पड़े हुए हैं। आप हमसे सच्ची बात बताइये ।। १९-२० ।। महाभाग कथं यज्ञेष्ववागमो नृपसत्तम । यष्टव्यं पशुभिर्मुख्यैरथो बीजै रसैरिति ।। २१ ।। 'महाभाग नृपश्रेष्ठ! यज्ञोंके विषयमें शास्त्रका मत कैसा है? मुख्य-मुख्य पशुओंद्वारा यज्ञ करना चाहिये अथवा बीजों एवं रसोंद्वारा' ।। २१ ।। तच्छ्रुत्वा तु वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम् । यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति प्रोवाच पार्थिवः ।। २२ ।। यह सुनकर राजा वसुने उन दोनों पक्षोंके कथनमें कितना सार या असार है, इसका विचार न करके यों ही बोल दिया कि 'जब जो वस्तु मिल जाय, उसीसे यज्ञ कर लेना चाहिये' ।। २२ ।। एवमुक्त्वा स नृपतिः प्रविवेश रसातलम् ।

उक्त्वाथ वितथं प्रश्नं चेदीनामीश्वरः प्रभुः ॥ २३ ॥ इस प्रकार कहकर असत्य निर्णय देनेके कारण चेदिराज वसुको रसातलमें जाना पड़ा ॥ २३ ॥ तस्मान्न वाच्यं ह्येकेन बहुज्ञेनापि संशये । प्रजापतिमपाहाय स्वयम्भुवमृते प्रभुम् ॥ २४ ॥ अतः कोई संदेह उपस्थित होनेपर स्वयम्भू भगवान् प्रजापतिको छोड़कर अन्य किसी बहुज्ञ पुरुषको भी अकेले कोई निर्णय नहीं देना चाहिये ॥ २४ ॥ तेन दत्तानि दानानि पापेनाशुद्धबुद्धिना । तानि सर्वाण्यनादृत्य नश्यन्ति विपुलान्यपि ॥ २५ ॥ उस अशुद्ध बुद्धिवाले पापी पुरुषके दिये हुए दान कितने ही अधिक क्यों न हों, वे सब- के-सब अनाहत होकर नष्ट हो जाते हैं ॥ २५ ॥ तस्याधर्मप्रवृत्तस्य हिंसकस्य दुरात्मनः । दानेन कीर्तिर्भवति न प्रेत्येह च दुर्मतेः ॥ २६ ॥ अधर्ममें प्रवृत्त हुए दुर्बुद्धि दुरात्मा हिंसक मनुष्य जो दान देते हैं, उससे इहलोक या परलोकमें उनकी कीर्ति नहीं होती ॥ २६ ॥ अन्यायोपगतं द्रव्यमभीक्ष्णं यो ह्यपण्डितः । धर्माभिशंकी यजते न स धर्मफलं लभेत् ॥ २७ ॥ जो मूर्ख अन्यायोपार्जित धनका बारंबार संग्रह करके धर्मके विषयमें संशय रखते हुए यजन करता है, उसे धर्मका फल नहीं मिलता ॥ २७ ॥ धर्मवैतंसिको यस्तु पापात्मा पुरुषाधमः । ददाति दानं विप्रेभ्यो लोकविश्वासकारणम् ॥ २८ ॥ जो धर्मध्वजी, पापात्मा एवं नराधम है, वह लोकमें अपना विश्वास जमानेके लिये ब्राह्मणोंको दान देता है, धर्मके लिये नहीं ॥ २८ ॥ पापेन कर्मणा विप्रो धनं प्राप्य निरङ्कुशः । रागमोहान्वितः सोऽन्ते कलुषां गतिमश्नुते ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मण पापकर्मसे धन पाकर उच्छृंखल हो राग और मोहके वशीभूत हो जाता है, वह अन्तमें कलुषित गतिको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ अपि संचयबुद्धिर्हि लोभमोहवशंगतः । उद्वेजयति भूतानि पापेनाशुद्धबुद्धिना ॥ ३० ॥ वह लोभ और मोहके वशमें पड़कर संग्रह करनेकी बुद्धिको अपनाता है। कृपणतापूर्वक पैसे बटोरनेका विचार रखता है। फिर बुद्धिको अशुद्ध कर देनेवाले पापाचारके द्वारा प्राणियोंको उद्वेगमें डाल देता है ॥ ३० ॥ एवं लब्ध्वा धनं मोहाद् यो हि दद्याद् यजेत वा ।

न तस्य स फलं प्रेत्य भुङ्क्ते पापधनागमात् ॥ ३१ ॥ इस प्रकार जो मोहवश अन्यायसे धनका उपार्जन करके उसके द्वारा दान या यज्ञ करता है, वह मरनेके बाद भी उसका फल नहीं पाता; क्योंकि वह धन पापसे मिला हुआ होता है ॥ ३१ ॥ उञ्छं मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः । दानं विभवतो दत्त्वा नराः स्वर्यान्ति धार्मिकाः ॥ ३२ ॥ तपस्याके धनी धर्मात्मा पुरुष उञ्छ (बीने हुए अन्न), फल, मूल, शाक और जलपात्रका ही अपनी शक्तिके अनुसार दान करके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं ॥ ३२ ॥ एष धर्मो महायोगो दानं भूतदया तथा । ब्रह्मचर्यं तथा सत्यमनुक्रोशो धृतिः क्षमा ॥ ३३ ॥ सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत् सनातनम् । श्रूयन्ते हि पुरा वृत्ता विश्वामित्रादयो नृपाः ॥ ३४ ॥ यही धर्म है, यही महान् योग है, दान, प्राणियोंपर दया, ब्रह्मचर्य, सत्य, करुणा, धृति और क्षमा—ये सनातन धर्मके सनातन मूल हैं। सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्र आदि नरेश इसीसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे ॥ ३३-३४ ॥ विश्वामित्रोऽसितश्चैव जनकश्च महीपतिः । कक्षसेनार्ष्टिषेणौ च सिन्धुद्वीपश्च पार्थिवः ॥ ३५ ॥ एते चान्ये च बहवः सिद्धिं परमिकां गताः । नृपाः सत्यैश्च दानैश्च न्यायलब्धैस्तपोधनाः ॥ ३६ ॥ विश्वामित्र, असित, राजा जनक, कक्षसेन, आर्ष्टिषेण और भूपाल सिन्धुद्वीप—ये तथा अन्य बहुत-से राजा तथा तपस्वी न्यायोपार्जित धनके दान और सत्यभाषणद्वारा परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ३५-३६ ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये चाश्रितास्तपः । दानधर्माग्निना शुद्धास्ते स्वर्गं यान्ति भारत ॥ ३७ ॥ भरतनन्दन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जो भी तपका आश्रय लेते हैं, वे दानधर्मरूपी अग्निसे तपकर सुवर्णके समान शुद्ध हो स्वर्गलोकको जाते हैं ॥ ३७ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि हिंसामिश्रधर्मनिन्दायामेकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें हिंसामिश्रित धर्मकी निन्दाविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥

द्विनवतितमोऽध्यायः महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा जनमेजय उवाच धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ १ ॥ जनमेजयने कहा—भगवन्! धर्मके द्वारा प्राप्त हुए धनका दान करनेसे यदि स्वर्ग मिलता है तो यह सब विषय मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं ॥ १ ॥ तस्योञ्छवृत्तेर्यद् वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् । कथितं तु मम ब्रह्मंस्तथ्यमेतदसंशयम् ॥ २ ॥ ब्रह्मन्! उञ्छवृत्ति धारण करनेवाले ब्राह्मणको न्यायतः प्राप्त हुए सत्तूका दान करनेसे जिस महान् फलकी प्राप्ति हुई, उसका आपने मुझसे वर्णन किया। निस्संदेह यह सब ठीक है ॥ २ ॥ कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चयः परमोऽभवत् । एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ ॥ ३ ॥ परंतु सभी यज्ञोंमें यह उत्तम निश्चय कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है। द्विजश्रेष्ठ! इस विषयका मुझसे पूर्णतः प्रतिपादन कीजिये ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम ॥ ४ ॥ वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! इस विषयमें पहले अगस्त्य मुनिके महान् यज्ञमें जो घटना घटित हुई थी, उस प्राचीन इतिहासका जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥ पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् । प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥ महाराज! पहलेकी बात है, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले महातेजस्वी अगस्त्य मुनिने एक समय बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ५ ॥ तत्राग्निकल्पा होतार आसन् सत्रे महात्मनः । मूलाहाराः फलाहाराः साश्मकुट्टा मरीचिपाः ॥ ६ ॥ परिपृष्टिका वैघसिकाः प्रसंख्यानास्तथैव च ।

यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवुः पर्यवस्थिताः ॥ ७ ॥ उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे। जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अश्मकुट्ट१, मरीचिप२, परिपृष्टिक३, वैघसिक४ और प्रसंख्याने५ आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे ॥ ६-७ ॥ सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिताः ॥ ८ ॥ वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिताः । उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षयः ॥ ९ ॥ वे सब-के-सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे। उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे-ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८-९ ॥ यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् । तस्मिन् सत्रे तु यद् वृत्तं यद् योग्यं च तदाभवत् ॥ १० ॥ भगवान् अगस्त्य मुनिने उस यज्ञके लिये यथाशक्ति विशुद्ध अन्नका संग्रह किया था। उस समय उस यज्ञमें वही हुआ, जो उसके योग्य था ॥ १० ॥ तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः । एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाध्वरे । न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥ उनके सिवा और भी अनेक मुनियोंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे। भरतश्रेष्ठ! महर्षि अगस्त्यका ऐसा यज्ञ जब चालू हो गया, तब देवराज इन्द्रने वहाँ वर्षा बंद कर दी ॥ ११ ॥ ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः । कथेयमभिनिर्वृत्ता मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ राजन्! तब यज्ञकर्मके बीचमें अवकाश मिलनेपर जब विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनि एक-दूसरेसे मिलकर एक स्थानपर बैठे, तब उनमें महात्मा अगस्त्यजीके सम्बन्धमें इस प्रकार चर्चा होने लगी— ॥ १२ ॥ अगस्त्यो यजमानोऽसौ ददात्यन्नं विमत्सरः । न च वर्षति पर्जन्यः कथमन्नं भविष्यति ॥ १३ ॥ 'महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं। वे ईर्ष्यारहित हो श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देते हैं। परंतु इधर मेघ जलकी वर्षा नहीं कर रहा है। तब भविष्यमें अन्न कैसे पैदा होगा? ॥ १३ ॥ सत्रं चेदं महद् विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् । न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ॥ १४ ॥

'ब्राह्मणो! मुनिका यह महान् सत्र बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला है; परंतु इन्द्रदेव इन बारह वर्षोंमें वर्षा नहीं करेंगे ।। १४ ।। एतद् भवन्तः संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः । अगस्त्यस्यातितपसः कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम् ।। १५ ।। 'यह सोचकर आपलोग इन अत्यन्त तपस्वी बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यपर अनुग्रह करें (जिससे इनका यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जाय)' ।। १५ ।। इत्येवमुक्ते वचने ततोऽगस्त्यः प्रतापवान् ।। १६ ।। प्रोवाच वाक्यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् । उनके ऐसा कहनेपर प्रतापी अगस्त्य उन मुनियोंको सिरसे प्रणाम करके उन्हें राजी करते हुए इस प्रकार बोले— ।। १६ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १७ ।। चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं चिन्तनमात्रके द्वारा मानसिक यज्ञ करूँगा। यह यज्ञकी सनातन विधि है ।। १७ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १८ ।। स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं स्पर्शयज्ञ* करूँगा। यह भी यज्ञकी सनातन विधि है' ।। १८ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १९ ।। ध्येयात्मना हरिष्यामि यज्ञानेतान् यतव्रतः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं व्रत-नियमोंका पालन करता हुआ ध्यानद्वारा ध्येयरूपसे स्थित हो इन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा ।। १९ १/२ ।। बीजयज्ञो मयायं वै बहुवर्षसमाचितः ।। २० ।। बीजैर्हि तं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति । 'यह बीज-यज्ञ मैंने बहुत वर्षोंसे संचित कर रखा है। उन बीजोंसे ही मैं अपना यज्ञ पूरा कर लूँगा। इसमें कोई विघ्न नहीं होगा ।। २० १/२ ।। नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन ।। २१ ।। वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति । 'इन्द्रदेव यहाँ वर्षा करें अथवा यहाँ वर्षा न हो, इसकी मुझे परवा नहीं है, मेरे इस यज्ञको किसी तरह व्यर्थ नहीं किया जा सकता ।। २१ १/२ ।। अथवाभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामतः ।। २२ ।। स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजाः ।

'अथवा यदि इन्द्र इच्छानुसार जल बरसानेके लिये की हुई मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो मैं स्वयं इन्द्र हो जाऊँगा और समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करूँगा।। यो यदाहारजातश्च स तथैव भविष्यति ॥ २३ ॥ विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः पुनरतीव हि। 'जो जिस आहारसे उत्पन्न हुआ है, उसे वही प्राप्त होगा तथा मैं बारंबार अधिक मात्रामें विशेष आहारकी भी व्यवस्था करूँगा।। २३ १/२ ।। अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद् वसु किंचन ।। २४ ॥ त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागम्यतां स्वयम्। 'तीनों लोकोंमें जो सुवर्ण या दूसरा कोई धन है, वह सब आज यहाँ स्वतः आ जाय।। २४ १/२ ।। दिव्याश्चाप्सरसां संघा गन्धर्वाश्च सकिन्नराः ॥ २५ ॥ विश्वावसुश्च ये चान्ये तेऽप्युपासन्तु मे मखम्।

महर्षि अगस्त्यकी यज्ञके समय प्रतिज्ञा

'दिव्य अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व, किन्नर, विश्वावसु तथा जो अन्य प्रमुख गन्धर्व हैं, वे सब यहाँ आकर मेरे यज्ञकी उपासना करें ।। २५ १/२ ।। उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत् किंचिद् वसु विद्यते ।। २६ ।। सर्वं तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपतिष्ठतु । स्वर्गः स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वयमेव तु ।। २७ ।। ‘उत्तर कुरुवर्षमें जो कुछ धन है, वह सब स्वयं यहाँ मेरे यज्ञोंमें उपस्थित हो। स्वर्ग, स्वर्गवासी देवता और धर्म स्वयं यहाँ विराजमान हो जायें' ।। २६-२७ ।। इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत् तपसा मुनेः । तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजसः ।। २८ ।। प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, अतिशय कान्तिमान् महर्षि अगस्त्यके इतना कहते ही उनकी तपस्याके प्रभावसे ये सारी वस्तुएँ वहाँ प्रस्तुत हो गयीं ।। २८ ।। ततस्ते मुनयो हृष्टा ददृशुस्तपसो बलम् । विस्मिता वचनं प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत् ।। २९ ।। उन महर्षियोंने बड़े हर्षके साथ महर्षिके उस तपोबलको प्रत्यक्ष देखा। देखकर वे सब लोग आश्चर्यचकित हो गये और इस प्रकार महान् अर्थसे भरे हुए वचन बोले ।। २९ ।। ऋषय ऊचुः प्रीताः स्म तव वाक्येन न त्विच्छामस्तपोव्ययम् । तैरेव यज्ञैस्तुष्टाः स्म न्यायेनेच्छामहे वयम् ।। ३० ।। ऋषि बोले—महर्षे! आपकी बातोंसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम आपकी तपस्याका व्यय होना नहीं चाहते हैं। हम आपके उन्हीं यज्ञोंसे संतुष्ट हैं और न्यायसे उपार्जित अन्नकी ही इच्छा रखते हैं ।। ३० ।। यज्ञं दीक्षां तथा होमान् यच्चान्यन्मृगयामहे । न्यायेनोपार्जिताहाराः स्वकर्माभिरता वयम् ।। ३१ ।। यज्ञ, दीक्षा, होम तथा और जो कुछ हम खोजा करते हैं, वह सब हमें यहाँ प्राप्त है। न्यायसे उपार्जित किया हुआ अन्न ही हमारा भोजन है और हम सदा अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं ।। ३१ ।। वेदांश्च ब्रह्मचर्येण न्यायतः प्रार्थयामहे । न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वयम् ।। ३२ ।। हम ब्रह्मचर्यका पालन करके न्यायतः वेदोंको प्राप्त करना चाहते हैं और अन्तमें न्यायपूर्वक ही हम घर छोड़कर निकले हैं ।। ३२ ।। धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम् । भवतः सम्यगिष्टा तु बुद्धिर्हिंसाविवर्जिता ।। ३३ ।।

एतामहिंसां यज्ञेषु ब्रूयास्त्वं सततं प्रभो । प्रीतास्ततो भविष्यामो वयं तु द्विजसत्तम ॥ ३४ ॥ विसर्जिताः समाप्तौ च सत्रादस्माद् व्रजामहे । धर्मशास्त्रमें देखे गये विधि-विधानसे ही हम तपस्या करेंगे। आपको हिंसारहित बुद्धि ही अधिक प्रिय है; अतः प्रभो! आप यज्ञोंमें सदा इस अहिंसाका ही प्रतिपादन करें। द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे हम आपपर बहुत प्रसन्न होंगे। यज्ञकी समाप्ति होनेपर जब आप हमें विदा करेंगे, तब हम यहाँसे अपने घरको जायँगे ।। ३३-३४ १/२ ।। तथा कथयतां तेषां देवराजः पुरंदरः ।। ३५ ।। ववर्ष सुमहातेजा दृष्ट्वा तस्य तपोबलम् । आसमाप्तेश्च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रमः ।। ३६ ।। निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय । जनमेजय! जब ऋषि लोग ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महा तेजस्वी देवराज इन्द्रने महर्षिका तपोबल देखकर पानी बरसाना आरम्भ किया। जबतक उस यज्ञकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक अमितपराक्रमी इन्द्रने वहाँ इच्छानुसार वर्षा की ।। ३५-३६ १/२ ।। प्रसादयामास च तमगस्त्यं त्रिदशेश्वरः । स्वयमभ्येत्य राजर्षे पुरस्कृत्य बृहस्पतिम् ।। ३७ ।। राजर्षे! देवेश्वर इन्द्रने स्वयं आकर बृहस्पतिको आगे करके अगस्त्य ऋषिको मनाया ।। ३७ ।। ततो यज्ञसमाप्तौ तान् विससर्ज महामुनीन् । अगस्त्यः परमप्रीतः पूजयित्वा यथाविधि ।। ३८ ।। तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर अत्यन्त प्रसन्न हुए अगस्त्यजीने उन महामुनियोंकी विधिवत् पूजा करके सबको विदा कर दिया ।। ३८ ।। जनमेजय उवाच कोऽसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै । प्राह मानुषवद् वाचमेतत् पृष्टो वदस्व मे ।। ३९ ।। जनमेजयने पूछा—मुने! सोनेके मस्तकसे युक्त वह नेवला कौन था, जो मनुष्योंकी- सी बोली बोलता था? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ।। ३९ ।। वैशम्पायन उवाच एतत् पूर्वं न पृष्टोऽहं न चास्माभिः प्रभाषितम् । श्रूयतां नकुलो योऽसौ यथा वाक् तस्य मानुषी ।। ४० ।। वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! यह बात न तो तुमने पहले पूछी थी और न मैंने बतायी थी। अब पूछते हो तो सुनो। वह नकुल कौन था और उसकी मनुष्योंकी-सी बोली

कैसे हुई, यह सब बता रहा हूँ ॥ ४० ॥ श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल । होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम् ॥ ४१ ॥ पूर्वकालकी बात है, एक दिन जमदग्नि ऋषिने श्राद्ध करनेका संकल्प किया। उस समय उनकी होमधेनु स्वयं ही उनके पास आयी और मुनिने स्वयं ही उसका दूध दुहा ॥ ४१ ॥ तत् पयः स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ । तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशत् ॥ ४२ ॥ उस दूधको उन्होंने नये पात्रमें, जो सुदृढ़ और पवित्र था, रख दिया। उस पात्रमें धर्मने क्रोधका रूप धारण करके प्रवेश किया ॥ ४२ ॥ जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद् विप्रिये कृते । इति संचिन्त्य धर्मः स धर्षयामास तत् पयः ॥ ४३ ॥ धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया ॥ ४३ ॥ तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह । स तु क्रोधस्ततो राजन् ब्राह्मणीं मूर्तिमास्थितः । जिते तस्मिन् भृगुश्रेष्ठमभ्यभाषदमर्षणः ॥ ४४ ॥ राजन्! मुनिने उस क्रोधको पहचान लिया; किंतु उसपर वे कुपित नहीं हुए। तब क्रोधने ब्राह्मणका रूप धारण किया। मुनिके द्वारा पराजित होनेपर उस अमर्षशील क्रोधने उन भृगुश्रेष्ठसे कहा— ॥ ४४ ॥ जितोऽस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः । लोके मिथ्या प्रवाडोऽयं यत्त्वयास्मि विनिर्जितः ॥ ४५ ॥ 'भृगुश्रेष्ठ! मैं तो पराजित हो गया। मैंने सुना था कि भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े क्रोधी होते हैं; परंतु लोकमें प्रचलित हुआ यह प्रवाद आज मिथ्या सिद्ध हो गया; क्योंकि आपने मुझे जीत लिया ॥ ४५ ॥ वशे स्थितोऽहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि । बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ४६ ॥ 'प्रभो! आज मैं आपके वशमें हूँ। आपकी तपस्यासे डरता हूँ। साधो! आप क्षमाशील महात्मा हैं, मुझपर कृपा कीजिये' ॥ ४६ ॥ जमदग्निरुवाच साक्षाद् दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः । न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै ॥ ४७ ॥

जमदग्नि बोले—क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है। तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अतः आज तुमपर मेरा रोष नहीं है ।। ४७ ।। यान् समुद्दिश्य संकल्पः पयसोऽस्य कृतो मया । पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्धयस्व गम्यताम् ।। ४८ ।। मैंने जिन पितरोंके उद्देश्यसे इस दूधका संकल्प किया था, वे महाभाग पितर ही उसके स्वामी हैं। जाओ, उन्हींसे इस विषयमें समझो ।। ४८ ।। इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत । पितॄणामभिषङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः ।। ४९ ।। मुनिके ऐसा कहनेपर क्रोधरूपधारी धर्म भयभीत हो वहाँसे अदृश्य हो गये और पितरोंके शापसे उन्हें नेवला होना पड़ा ।। ४९ ।। स तान् प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति । तैश्चाप्युक्तः क्षिपन् धर्मं शापस्यान्तमवाप्स्यसि ।। ५० ।। इस शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन्होंने पितरोंको प्रसन्न किया। तब पितरोंने कहा —'तुम धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्षेप करके इस शापसे छुटकारा पा जाओगे' ।। ५० ।। तैश्चोक्तो यज्ञियान् देशान् धर्मारण्यं तथैव च । जुगुप्समानो धावन् स तं यज्ञं समुपासदत् ।। ५१ ।। उन्होंने ही उस नेवलेको यज्ञसम्बन्धी स्थान और धर्मारण्यका पता बताया था। वह धर्मराजकी निन्दाके उद्देश्यसे दौड़ता हुआ उस यज्ञमें जा पहुँचा था ।। ५१ ।। धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः । मुक्तः शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद् युधिष्ठिरः ।। ५२ ।। धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप करते हुए सेरभर सत्तूके दानका माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शापसे मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठिरमें स्थित हो गया ।। ५२ ।। एवमेतत् तदा वृत्ते यज्ञे तस्य महात्मनः । पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा ।। ५३ ।। इस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरका यज्ञ समाप्त होनेपर यह घटना घटी थी और वह नेवला हमलोगोंके देखते-देखते वहाँसे गायब हो गया था ।। ५३ ।। १. खाद्य पदार्थको पत्थरपर फोड़कर खानेवाले। २. सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले। ३. पूछकर दिये हुए अन्नको ही लेनेवाले। ४. यज्ञशिष्ट अन्नको ही भोजन करनेवाले। ५. तत्त्वका विचार करनेवाले।

  • संचित अन्नका व्यय किये बिना ही उसके स्पर्शमात्रसे देवताओंको तृप्त करनेकी जो भावना है, उसका नाम स्पर्शयज्ञ है।