भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

जाहि कहहु तुम राखनहार। सो तुमहिं लै करहि अहारा ॥ राखनहार और कोउ आही। करु विश्वास मिलाऊँ ताही ॥

साहिब ने कहा कि जिसे तुम रक्षक कह रहे हो, वो तो तुम्हें खा जायेगा; वो भक्षक है; रक्षक कोई ओर है; यदि तुम विश्वास करो तो मैं तुम्हें उससे मिला दूँगा।

शेषनाग विष तेज सुभाऊ। वचन प्रतीत हृदय नहिं आऊ ॥ सुनहु सुलच्छन धर्मन नागर। तब आयो मैं या भवसागर ॥ आये जब मृत्यु मण्डल माहीं। जीव पुरुष कोइ देख्यो नाहीं ॥ का कहैं कहियो पुरुष उपदेश। सो तो अधिक यम को भेषा ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि विपैले स्वभाव वाले शेषनाग के हृदय में मेरे वचन सुन विश्वास नहीं हुआ, तो फिर मैं सीधा भवसागर चला आया। जब यहाँ आया तो एक भी जीव परम पुरुष की भक्ति करने वाला नहीं दिखा, मैं किसे उसका उपदेश दूँ, सब ही तो काल का भेष धारण किये हुए थे।

मैं आया संसार में, फिरा गाँव की छोर।

ऐसा बंदा ना मिला, जो लीजै फटक पछोर ॥

कहा-गाँव-2 घूमा, गली-2 घूमा, कोई भी नहीं मिला, जो मेरी बात को समझे।..... इस तरह सौ साल धरती पर रहकर साहिब बापिस गये, कोई नहीं माना। तब साहिब ने गुप्त वस्तु दी, कहा-यह देना।

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