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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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विष्णु ने कहा

कहे विष्णु मोसम को आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥ काम मोक्ष धर्मारथ माही । चाहे जौन देउँ मैं ताही ॥

विष्णु ने कहा कि मेरे समान कौन है ! कहा-मेरे पास धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चारों पदार्थ हैं, इनमें से तुम्हें जो चाहिए, मैं दे सकता हूँ।

साहिब ने कहा

सुनहु सो विष्णु मोक्ष कस तोही । मोक्ष अक्षर परले तर होही ॥ तुम नाहीं थिर थिर कस करहु । मिथ्या साखि कवण गुण भरहु ॥ रहे सकुच सुन निरभय बानी । निज हिय विस्नु आप डर मानी ॥

साहिब ने कहा कि तुम्हारे पास जो मोक्ष है, वो तो प्रलय तक रहेगा। तुम खुद ही स्थिर नहीं हो, फिर दूसरों को स्थिर कैसे करोगे ! यह सुन विष्णु जी मौन हुए।

तब पुनि नाग लोक चलि गयऊ । तासे कछु-2 कहिबे लयऊ ॥ पुरुष भेद कोइ जानत नाहीं । लागे सबहिं काल की छाहीं ॥ राखनहार कहँ चीन्हो भाई । यम सो को तुहिं लेइ छुड़ाई ॥

साहिब कहते हैं कि तब मैं नाग लोक चला और थोड़ी -2 बात परम पुरुष की करते हुए कहा कि उसका भेद कोई नहीं जानता है, सभी काल के पीछे लगे हुए हैं, इसलिए रक्षक को पहचानो, जो तुम्हें यम से छुड़ा ले।

ब्रह्मा विष्णु रुद्र जिहि ध्यावैं । वेद जासु गुण निशि दिन गावैं ॥ सोइ पुरुष महिं राखनहारा । का करिहैं यमराज बिचारा ॥

शेषनाग ने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव जिसका ध्यान करते हैं और जिसके गुणों का गान वेद भी दिन-रात करते हैं, वही मेरा रक्षक है, बेचारा यमराज क्या करेगा !