भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 144 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

सतयुग में आए साहिब

धर्मदास जो पूछयो मोहिं । युग-2 कथा कहौं मैं तोहि ॥ कहैं कबीर सुन धर्मन नागर । सतयुग हम आयेऊँ भौसागर ॥

धर्मदास जी द्वारा पूछने पर साहिब ने युग-2 की कथा का वर्णन किया, कहा कि मैं हर युग में संसार में आया। सबसे पहले मैं सतयुग में आया।

आया चतुरानन के पास। तासों कीन्ह शब्द परकाशा ॥ ब्रह्मा चित दै सुनने लीन्हा। पूछयो बहुत पुरुष को चीन्हा ॥ तबहि निरंजन कीन्ह उपाई। जेठ पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥ निरंजन मन घट विराजै। ब्रह्मा बुद्धि फेर उपराजै ॥

साहिब कह रहे हैं कि सतयुग में सबसे पहले मैं ब्रह्मा के पास आया और उसे परम पुरुष की बात समझायी। ब्रह्मा ध्यान से सुनने लगा, परम पुरुष का भेद पूछने लगा। इतने में निरंजन ने देखा कि मेरा बड़ा पुत्र ब्रह्मा तो मेरे शिर्कंजे से जा रहा है, उसने ब्रह्मा के अन्दर बैठ उसकी बुद्धि पलट दी।

ब्रह्मा ने कहा

निराकार निर्गुण अविनाशी। ज्योति स्वरूप शून्य का वासी ॥ ताहि पुरुष कहैं वेद बखाने। आज्ञा वेद ताही हम जाने ॥

ब्रह्मा ने कहा कि वेद से हमने जाना है कि परमात्मा निराकार है, निर्गुण है, ज्योति स्वरूप है और वो शून्य में रहता है।

जब देखा तेहि काल भटकाओ। तहाँ ते उठ विष्णु पहुँ आयो ॥ विष्णुहि कहौ पुरुष उपदेशो। कालवश नहिं गहो सँदेशो ॥

तब साहिब ने देखा कि ब्रह्मा की बुद्धि तो काल ने पलट दी है, तब वे विष्णु के पास आए, विष्णु से परम पुरुष का भेद कहा, पर कालवश उसने भी साहिब का सँदेश नहीं पकड़ा।

106