अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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तजके तेज गये हरि धामा। गुरु बिन नहिं लहे विश्रामा॥ विष्णु कहे ऋषि कहँवा आये। गुरुबिहीन तप तेज भुलोये॥ गुरु बिहीन नर मोहि न भावे। फिर-2 जो इन सकट आवे॥ जाहु पलट करहु गुरु सयाना। तब पैरो यहँवा अस्थाना॥ सुनि मुनि शुक्देव वेगि सिधाये। गुरु बिहीन तहँ रहन न पाये॥ जनक बिदेह कीन्ह गुरु जानी। हरषि मिले तब सांगपानी॥ नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी, यह सब कथा जगत में जानी॥ और देव ऋषि मुनिवर जेते। जिनगुरु कीन्ह उतर सो तेते॥ जो गुरु मिले तो पंथ बतावे। सार असार परख दिखलावे॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे। और गुरु कोइ काम ना आवे॥ सत्य पुरुष के कहे संदेशा। जन्म जन्म का मिटै अंदेशा॥ पाप पुन्य की आशा पाहीं। बैठै अक्षय वृक्ष की छाहीं॥ भुंङ्गी मत होवे जिहि पास। सोई गुरु सत्य सुनि धर्मदासा॥
महायोगेश्वर शुक्देव गुरु के बिना भक्ति कर रहा था तो नहीं पहुँच पाया था। विष्णु जी ने वापिस किया था, कहा कि गुरु के बिना इंसान मुझे अच्छा नहीं लगता। तब शुक्देव ने राजा जनक को गुरु किया था और जगह मिली थी। फिर ब्रह्मा का बेटा नारद तो इस अभिमान में था कि मुझे गुरु की आवश्यकता नहीं है। पर विष्णु जी ने उसे भी गुरु करने को कहा था, जो सब जानते हैं। जब सच्चे गुरु मिलते हैं, तभी सही राह मिलती है। जो गुरु सत्य पुरुष का संदेश देने वाला हो, वही सच्चा हो सकता है, और कोई नहीं। ऐसा गुरु ही जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ाकर अमर लोक ले जा सकता है। हे धर्मदास! जिस गुरु के पास भूंगे की तरह अपना शब्द सुनाकर शिष्य को अपनी तरह करने की शक्ति हो वही सत्य गुरु है।