अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु भक्ति का महत्व
साहिब कहते हैं
गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥ पिया नेह जिमि कामिनि लागे । तिमि गुरु रूप शिष्य अनुरागे ॥ पल पल निरखे गुरुमुख कांति । शिष्य चकोर गुरु शशि शांति ॥ पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीय पुरुष सपने नहिं जाने ॥ पतिव्रता दोउ कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संत मति आगर ॥ ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा अस शिष्य जुगावे ॥ गुरु ते अधिक और कोई नाहिं । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरु ते अधिक कोई नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरु पूजा ॥ तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अर्पि जो लावैं सेवा ॥ तौ नहिं वचन कहें हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥
साहिब कहते हैं कि नाम रूपी रस का पान करते हुए गुरु के शब्दों को ही हृदय में धारण किये रखो। चंद चकोर की प्रीत की तरह गुरु के मुख को निहारते रहो। जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री सपने में भी किसी दूसरे पुरुष की तरफ नहीं जाती, ऐसे ही गुरु के प्रति भाव रखो, गुरु आज्ञा में ही हर समय रहो, गुरु से अधिक किसी को नहीं मानो, सब भ्रम के जाल तोड़ कर केवल गुरु की मूर्ति का ही ध्यान करो। जो संसारी लोग हैं, वे तीर्थ, धाम, देव-पूजा आदि में भूले हुए हैं, पर तुम ऐसा मत करो।
गुरु भक्ति अटल अमान धर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं। जप योग तप व्रत दान पूजा, तृण सदृश यह जग कहीं।।
साहिब कहते हैं कि गुरु भक्ति सर्वोपरि है, उसके समान दूसरी कोई भक्ति नहीं। जप, योग, तप, व्रत, दान आदि उसके आगे तिनके के समान हैं।
शुकदेव भये गरभ योगेश्वर । उन समान नहिं थाप्यो दूसर ॥
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