भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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गुप्त वस्तु है नाम

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिं कहो समझायी ॥ जो कछु पुरुष शब्द मुख भाखो । सो साहिब मोहिं गोय न राखो ॥ कौन शब्द ते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥

धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि परम पुरुष ने वो कौन-सा शब्द पुकारा, जिसे लेकर आप इस संसार में आए, और जिससे आप जीवों का कल्याण करते हैं !

साहिब ने कहा

पुरुष मोहिं जैसो फुरमायी । सो सब तुमसों संधि लखायी ॥ यहेउ मोहिं बहु विधि समझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥ गुप्त वस्तु प्रभु मो कहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्ति कर चीन्हा ॥ दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहिं सौँप्यो नाथा ॥ बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगम ते लिखि पावे कोई ॥ पंच अमीय मुक्ति का मूला । जातें मिटे गर्भ अस्थूला ॥ यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारी तासु इकोत्तर बंसा ॥ नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥ ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥ जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहुँ शिष्य सहिदाना ॥

साहिब ने कहा कि परम पुरुष ने मुझसे जैसा कहा, सो मैं तुमसे कहता हूँ। उन्होंने मुझे कहा कि शब्द से जीवों को चिताकर ले आओ। उन्होंने मुझे गुप्त वस्तु दी, विदेह नाम दिया; उसमें बिना मुख के आवाज़ (Sound Less Sound) होती है। गुरु-कृपा से कोई ही उसे देख पाता है। जो उस नाम को विश्वास के साथ पकड़े रखता है, मैं उसके 71 वंश तारता हूँ। नाम की डोरी से ही जीव उस लोक में जाता है और ऐसे जीव को देख काल भी डर जाता है।