अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
वो सतलोक चला जायेगा। साहिब ने कहा—जहाँ आशा होगी, वहीं वास होगा, तुमने परम पुरुष को भुला दिया, इसलिए काल पुरुष ने तुम्हें खा लिया।
जीवों ने कहा
कहे जीव सुन पुरुष पुराना। देह धरी विसर्यो यह ज्ञाना ॥
पुरुष जान सुमरे उ यमराई। वेद पुराण कहे समुझाई ॥
वेद पुराण कहे मत एहा। निराकार ते कीजे नेहा ॥
सुर नर मुनि तैतीस करोरी। बाँधे सबै निरंजन डोरी ॥
जीवों ने कहा कि हे साहिब! मनुष्य तन में जाकर हमें ज्ञान नहीं रहा, हम भूल गये, काल को ही परम पुरुष जानकर पूजने लगे, क्योंकि वेद पुराण आदि भी इसी निराकार की भक्ति करने को कह रहे हैं, सुर, नर, मुनि, 33 करोड़ देवता आदि सभी निरंजन को मान रहे हैं।
साहिब ने कहा
सुनो जीव यह छल यम कैरा। यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥
साहिब ने कहा कि काल ने ही यह जाल फैलाया है।
काल कन्या अनेक कीन्हे, जीव कारण जाल हो।
तीरथ व्रत जग योग फन्दे, कोई ना पावत बाट हो ॥
देह धरि नर परगट हो, फिरि ताहि आशा कीन्हे ऊ ॥
भरमत इत उत काल बस, बहु पुण्य में चित दीन्हे ऊ ॥
काल और माया ने जीवों को फँसाने के लिए तीर्थ, योग, यज्ञ, तप आदि के अनेक जाल बनाए हैं, अनेक फंदे बनाए हैं, कोई भी सच्चा रास्ता नहीं पा रहा है। नर तन पाकर जीव काल की ही आशा में इधर उधर भटकते हुए पुण्य कर्मों में उलझ रहे हैं।