अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
वो सतलोक चला जायेगा। साहिब ने कहा—जहाँ आशा होगी, वहीं वास होगा, तुमने परम पुरुष को भुला दिया, इसलिए काल पुरुष ने तुम्हें खा लिया।
जीवों ने कहा
कहे जीव सुन पुरुष पुराना। देह धरी विसर्यो यह ज्ञाना ॥
पुरुष जान सुमरे उ यमराई। वेद पुराण कहे समुझाई ॥
वेद पुराण कहे मत एहा। निराकार ते कीजे नेहा ॥
सुर नर मुनि तैतीस करोरी। बाँधे सबै निरंजन डोरी ॥
जीवों ने कहा कि हे साहिब! मनुष्य तन में जाकर हमें ज्ञान नहीं रहा, हम भूल गये, काल को ही परम पुरुष जानकर पूजने लगे, क्योंकि वेद पुराण आदि भी इसी निराकार की भक्ति करने को कह रहे हैं, सुर, नर, मुनि, 33 करोड़ देवता आदि सभी निरंजन को मान रहे हैं।
साहिब ने कहा
सुनो जीव यह छल यम कैरा। यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥
साहिब ने कहा कि काल ने ही यह जाल फैलाया है।
काल कन्या अनेक कीन्हे, जीव कारण जाल हो।
तीरथ व्रत जग योग फन्दे, कोई ना पावत बाट हो ॥
देह धरि नर परगट हो, फिरि ताहि आशा कीन्हे ऊ ॥
भरमत इत उत काल बस, बहु पुण्य में चित दीन्हे ऊ ॥
काल और माया ने जीवों को फँसाने के लिए तीर्थ, योग, यज्ञ, तप आदि के अनेक जाल बनाए हैं, अनेक फंदे बनाए हैं, कोई भी सच्चा रास्ता नहीं पा रहा है। नर तन पाकर जीव काल की ही आशा में इधर उधर भटकते हुए पुण्य कर्मों में उलझ रहे हैं।
गुप्त वस्तु है नाम
गुप्त वस्तु है नाम
धर्मदास ने पूछा
धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिं कहो समझायी ॥ जो कछु पुरुष शब्द मुख भाखो । सो साहिब मोहिं गोय न राखो ॥ कौन शब्द ते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥
धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि परम पुरुष ने वो कौन-सा शब्द पुकारा, जिसे लेकर आप इस संसार में आए, और जिससे आप जीवों का कल्याण करते हैं !
साहिब ने कहा
पुरुष मोहिं जैसो फुरमायी । सो सब तुमसों संधि लखायी ॥ यहेउ मोहिं बहु विधि समझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥ गुप्त वस्तु प्रभु मो कहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्ति कर चीन्हा ॥ दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहिं सौँप्यो नाथा ॥ बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगम ते लिखि पावे कोई ॥ पंच अमीय मुक्ति का मूला । जातें मिटे गर्भ अस्थूला ॥ यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारी तासु इकोत्तर बंसा ॥ नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥ ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥ जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहुँ शिष्य सहिदाना ॥
साहिब ने कहा कि परम पुरुष ने मुझसे जैसा कहा, सो मैं तुमसे कहता हूँ। उन्होंने मुझे कहा कि शब्द से जीवों को चिताकर ले आओ। उन्होंने मुझे गुप्त वस्तु दी, विदेह नाम दिया; उसमें बिना मुख के आवाज़ (Sound Less Sound) होती है। गुरु-कृपा से कोई ही उसे देख पाता है। जो उस नाम को विश्वास के साथ पकड़े रखता है, मैं उसके 71 वंश तारता हूँ। नाम की डोरी से ही जीव उस लोक में जाता है और ऐसे जीव को देख काल भी डर जाता है।
गुरु भक्ति का महत्व
गुरु भक्ति का महत्व
साहिब कहते हैं
गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥ पिया नेह जिमि कामिनि लागे । तिमि गुरु रूप शिष्य अनुरागे ॥ पल पल निरखे गुरुमुख कांति । शिष्य चकोर गुरु शशि शांति ॥ पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीय पुरुष सपने नहिं जाने ॥ पतिव्रता दोउ कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संत मति आगर ॥ ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा अस शिष्य जुगावे ॥ गुरु ते अधिक और कोई नाहिं । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरु ते अधिक कोई नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरु पूजा ॥ तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अर्पि जो लावैं सेवा ॥ तौ नहिं वचन कहें हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥
साहिब कहते हैं कि नाम रूपी रस का पान करते हुए गुरु के शब्दों को ही हृदय में धारण किये रखो। चंद चकोर की प्रीत की तरह गुरु के मुख को निहारते रहो। जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री सपने में भी किसी दूसरे पुरुष की तरफ नहीं जाती, ऐसे ही गुरु के प्रति भाव रखो, गुरु आज्ञा में ही हर समय रहो, गुरु से अधिक किसी को नहीं मानो, सब भ्रम के जाल तोड़ कर केवल गुरु की मूर्ति का ही ध्यान करो। जो संसारी लोग हैं, वे तीर्थ, धाम, देव-पूजा आदि में भूले हुए हैं, पर तुम ऐसा मत करो।
गुरु भक्ति अटल अमान धर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं। जप योग तप व्रत दान पूजा, तृण सदृश यह जग कहीं।।
साहिब कहते हैं कि गुरु भक्ति सर्वोपरि है, उसके समान दूसरी कोई भक्ति नहीं। जप, योग, तप, व्रत, दान आदि उसके आगे तिनके के समान हैं।
शुकदेव भये गरभ योगेश्वर । उन समान नहिं थाप्यो दूसर ॥
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तजके तेज गये हरि धामा। गुरु बिन नहिं लहे विश्रामा॥ विष्णु कहे ऋषि कहँवा आये। गुरुबिहीन तप तेज भुलोये॥ गुरु बिहीन नर मोहि न भावे। फिर-2 जो इन सकट आवे॥ जाहु पलट करहु गुरु सयाना। तब पैरो यहँवा अस्थाना॥ सुनि मुनि शुक्देव वेगि सिधाये। गुरु बिहीन तहँ रहन न पाये॥ जनक बिदेह कीन्ह गुरु जानी। हरषि मिले तब सांगपानी॥ नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी, यह सब कथा जगत में जानी॥ और देव ऋषि मुनिवर जेते। जिनगुरु कीन्ह उतर सो तेते॥ जो गुरु मिले तो पंथ बतावे। सार असार परख दिखलावे॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे। और गुरु कोइ काम ना आवे॥ सत्य पुरुष के कहे संदेशा। जन्म जन्म का मिटै अंदेशा॥ पाप पुन्य की आशा पाहीं। बैठै अक्षय वृक्ष की छाहीं॥ भुंङ्गी मत होवे जिहि पास। सोई गुरु सत्य सुनि धर्मदासा॥
महायोगेश्वर शुक्देव गुरु के बिना भक्ति कर रहा था तो नहीं पहुँच पाया था। विष्णु जी ने वापिस किया था, कहा कि गुरु के बिना इंसान मुझे अच्छा नहीं लगता। तब शुक्देव ने राजा जनक को गुरु किया था और जगह मिली थी। फिर ब्रह्मा का बेटा नारद तो इस अभिमान में था कि मुझे गुरु की आवश्यकता नहीं है। पर विष्णु जी ने उसे भी गुरु करने को कहा था, जो सब जानते हैं। जब सच्चे गुरु मिलते हैं, तभी सही राह मिलती है। जो गुरु सत्य पुरुष का संदेश देने वाला हो, वही सच्चा हो सकता है, और कोई नहीं। ऐसा गुरु ही जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ाकर अमर लोक ले जा सकता है। हे धर्मदास! जिस गुरु के पास भूंगे की तरह अपना शब्द सुनाकर शिष्य को अपनी तरह करने की शक्ति हो वही सत्य गुरु है।
सतयुग में आए साहिब
सतयुग में आए साहिब
धर्मदास जो पूछयो मोहिं । युग-2 कथा कहौं मैं तोहि ॥ कहैं कबीर सुन धर्मन नागर । सतयुग हम आयेऊँ भौसागर ॥
धर्मदास जी द्वारा पूछने पर साहिब ने युग-2 की कथा का वर्णन किया, कहा कि मैं हर युग में संसार में आया। सबसे पहले मैं सतयुग में आया।
आया चतुरानन के पास। तासों कीन्ह शब्द परकाशा ॥ ब्रह्मा चित दै सुनने लीन्हा। पूछयो बहुत पुरुष को चीन्हा ॥ तबहि निरंजन कीन्ह उपाई। जेठ पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥ निरंजन मन घट विराजै। ब्रह्मा बुद्धि फेर उपराजै ॥
साहिब कह रहे हैं कि सतयुग में सबसे पहले मैं ब्रह्मा के पास आया और उसे परम पुरुष की बात समझायी। ब्रह्मा ध्यान से सुनने लगा, परम पुरुष का भेद पूछने लगा। इतने में निरंजन ने देखा कि मेरा बड़ा पुत्र ब्रह्मा तो मेरे शिर्कंजे से जा रहा है, उसने ब्रह्मा के अन्दर बैठ उसकी बुद्धि पलट दी।
ब्रह्मा ने कहा
निराकार निर्गुण अविनाशी। ज्योति स्वरूप शून्य का वासी ॥ ताहि पुरुष कहैं वेद बखाने। आज्ञा वेद ताही हम जाने ॥
ब्रह्मा ने कहा कि वेद से हमने जाना है कि परमात्मा निराकार है, निर्गुण है, ज्योति स्वरूप है और वो शून्य में रहता है।
जब देखा तेहि काल भटकाओ। तहाँ ते उठ विष्णु पहुँ आयो ॥ विष्णुहि कहौ पुरुष उपदेशो। कालवश नहिं गहो सँदेशो ॥
तब साहिब ने देखा कि ब्रह्मा की बुद्धि तो काल ने पलट दी है, तब वे विष्णु के पास आए, विष्णु से परम पुरुष का भेद कहा, पर कालवश उसने भी साहिब का सँदेश नहीं पकड़ा।
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विष्णु ने कहा
कहे विष्णु मोसम को आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥ काम मोक्ष धर्मारथ माही । चाहे जौन देउँ मैं ताही ॥
विष्णु ने कहा कि मेरे समान कौन है ! कहा-मेरे पास धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चारों पदार्थ हैं, इनमें से तुम्हें जो चाहिए, मैं दे सकता हूँ।
साहिब ने कहा
सुनहु सो विष्णु मोक्ष कस तोही । मोक्ष अक्षर परले तर होही ॥ तुम नाहीं थिर थिर कस करहु । मिथ्या साखि कवण गुण भरहु ॥ रहे सकुच सुन निरभय बानी । निज हिय विस्नु आप डर मानी ॥
साहिब ने कहा कि तुम्हारे पास जो मोक्ष है, वो तो प्रलय तक रहेगा। तुम खुद ही स्थिर नहीं हो, फिर दूसरों को स्थिर कैसे करोगे ! यह सुन विष्णु जी मौन हुए।
तब पुनि नाग लोक चलि गयऊ । तासे कछु-2 कहिबे लयऊ ॥ पुरुष भेद कोइ जानत नाहीं । लागे सबहिं काल की छाहीं ॥ राखनहार कहँ चीन्हो भाई । यम सो को तुहिं लेइ छुड़ाई ॥
साहिब कहते हैं कि तब मैं नाग लोक चला और थोड़ी -2 बात परम पुरुष की करते हुए कहा कि उसका भेद कोई नहीं जानता है, सभी काल के पीछे लगे हुए हैं, इसलिए रक्षक को पहचानो, जो तुम्हें यम से छुड़ा ले।
ब्रह्मा विष्णु रुद्र जिहि ध्यावैं । वेद जासु गुण निशि दिन गावैं ॥ सोइ पुरुष महिं राखनहारा । का करिहैं यमराज बिचारा ॥
शेषनाग ने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव जिसका ध्यान करते हैं और जिसके गुणों का गान वेद भी दिन-रात करते हैं, वही मेरा रक्षक है, बेचारा यमराज क्या करेगा !
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साहिब बन्दगी
जाहि कहहु तुम राखनहार। सो तुमहिं लै करहि अहारा ॥ राखनहार और कोउ आही। करु विश्वास मिलाऊँ ताही ॥
साहिब ने कहा कि जिसे तुम रक्षक कह रहे हो, वो तो तुम्हें खा जायेगा; वो भक्षक है; रक्षक कोई ओर है; यदि तुम विश्वास करो तो मैं तुम्हें उससे मिला दूँगा।
शेषनाग विष तेज सुभाऊ। वचन प्रतीत हृदय नहिं आऊ ॥ सुनहु सुलच्छन धर्मन नागर। तब आयो मैं या भवसागर ॥ आये जब मृत्यु मण्डल माहीं। जीव पुरुष कोइ देख्यो नाहीं ॥ का कहैं कहियो पुरुष उपदेश। सो तो अधिक यम को भेषा ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि विपैले स्वभाव वाले शेषनाग के हृदय में मेरे वचन सुन विश्वास नहीं हुआ, तो फिर मैं सीधा भवसागर चला आया। जब यहाँ आया तो एक भी जीव परम पुरुष की भक्ति करने वाला नहीं दिखा, मैं किसे उसका उपदेश दूँ, सब ही तो काल का भेष धारण किये हुए थे।
मैं आया संसार में, फिरा गाँव की छोर।
ऐसा बंदा ना मिला, जो लीजै फटक पछोर ॥
कहा-गाँव-2 घूमा, गली-2 घूमा, कोई भी नहीं मिला, जो मेरी बात को समझे।..... इस तरह सौ साल धरती पर रहकर साहिब बापिस गये, कोई नहीं माना। तब साहिब ने गुप्त वस्तु दी, कहा-यह देना।
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राम नाम का रहस्य
राम नाम का रहस्य
साहिब कहते हैं
ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादी । सब मिलि कीन्ह शून्य समाधी ॥ कवन नाम सुमिरो करतारा । कवन नाम ध्यान अनुसार ॥ सबहिं शून्य महँ ध्यान लगाये । स्वाति नेह सीप ज्यों लाये ॥ तबहिं निरंजन जतन बिचारा । शून्य गुफा ते शब्द उचारा ॥ ररां सु शब्द उठा बहु बारा । मा अक्षर माया संचारा ॥ दोउ अक्षर कहँ सम कै राखा । राम नाम सबहिन अभिलाखा ॥ रामनाम लै जगहि दृढ़ायो । काल फन्द कोइ चीन्ह न पायो ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादि ने मिलकर विचार किया कि परमात्मा का कौन सा नाम जपें, किस नाम से उसका ध्यान करें। तब सबने मिलकर शून्य में समाधि लगायी। ऐसे में निरंजन ने शून्य गुफा से ररां शब्द उच्चार और माया ने मा शब्द उच्चार। दोनों को मिलाया गया और राम नाम को चुना गया। सभी राम नाम का जाप करने लगे, पर काल के फंदे को कोई समझ नहीं पाया।
इस तरह राम शब्द में निरंजन और माया दोनों आ गये। इसलिए सत्य नाम इससे परे है।
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सतयुग के हंस
सत्ययुग के हंस
धर्मदास सुन सत्ययुग भाऊ। जिन जीव को नाम सुनाऊ॥ नृप धोंधल पहुँ हम चलि गयऊ। सत्य शब्द सो ताहि सुनयऊ॥ तिन शब्द हमारो सत्य माना। दीन्ह तिनको मैं पान परमाना॥
साहिब ने कहा—हे धर्मदास! अब जिन जीवों को मैंने शब्द सुनाया, उनका नाम बताता हूँ। सबसे पहले राजा धोंधल को मैंने अपने सत्य शब्द का भेद सुनाया तो उसने सत्य करके माना और उसे मैंने नाम(शब्द) दिया।
धोंधल शब्द चिताय, तब आयउ मथुरा नगर। खेमसरी आयो धाय, नारि वृद्ध गोवालि सों॥
साहिब कहते हैं कि धोंधल राजा को शब्द से चिताकर फिर मथुरा नगर में आया, वहाँ वृद्ध ग्वालिन खेमसरी रहती थी। मुझे देख वो दौड़कर मेरे पास आ गयी।
कहे खेमसरी पुरुष पुराना। कहँवा ते तुम कीन्ह पयाना॥ तासों कहे उ शब्द उपदेसा। पुरुष भाव अरु यम को भेसा॥
खेमसरी ने कहा कि तुम कहाँ से आए हो? तुम परम पुरुष और काल की बातें कर रहे हो।
पै धोखा इक ताहि रहाई। देखे लोक तब मन पतियाई॥ राखेउ देह हंस लै धावा। पल इक माहिँ लोक पहुँचावा॥ लोक दिखाय हंस लै आयो। देह पाय खेमसरी पछतायो॥ हे साहिब लै चलु वहि देश। यहाँ बहुत है काल कलेशा॥
खेमसरी कुछ संशय में थी तो साहिब ने उसे अमर लोक ले जाकर उसका धोखा मिटा दिया, उसे विश्वास हो गया। जब वापिस आए तो वो पछताने लगी, कहने लगी कि वहीं ले चलो, यहाँ बहुत कष्ट हैं।
तासों कहँ सुनो यह बानी। जो मैं कहूँ लेहु सो मानी॥
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जबलौं ठीका पूर न आई। तब लग रहो नाम लौं लाईं ॥ तुम तो देखा लोक हमारा। जीवन को उपदेसहु सारा ॥ एकहु जीव शरणागत लावे। सो जीव सत्पुरुष को भावे ॥ जैसे गऊ बाघ मुख जायी। सो कपिलहि कोउ आय छुड़ायी ॥ ता नर को सब सुयश बखाने। गऊ छुड़ाय बाघ ते आने ॥ एक जीव को भक्ति दृढ़ावे। सो कोटिक गऊ पुण्य सो पावे ॥
साहिब ने कहा कि जब तक जीवन की अवधि पूरी नहीं हो जाती, नाम में लौ लगाए रखो। तुमने तो हमारा लोक देख लिया, अब दूसरों को समझाकर इस सत्य भक्ति में लगाओ, जो एक भी जीव को शरणागत लाता है, वो परम पुरुष को बड़ा अच्छा लगता है। जैसे भोली-भाली गाउँ शेर के मुख में जाती है, पर जो गाय को शेर से छुड़ा लाता है, सब उसकी प्रशंसा करते हैं कि गाय को शेर से छुड़ा लाया। ऐसे ही जो एक जीव को भी काल पुरुष की भक्ति से छुड़ाकर सत्य भक्ति में लगा देता है, वो करोड़ों गाय को बचाने का फल पाता है।
खेमसरी परै चरण पर आयी। हे साहिब मोहि लेहु बचायी ॥ मो पर दाय करहु प्रकाशा। अब नहिं परौं काल की फाँसा ॥
खेमसरी चरणों पर गिर पड़ी, कहा-हे साहिब! मुझे काल से बचा लो।
सुन खेमसरी यह यम को देश। बिना नाम नहिं मिटै अदेशा ॥
पुरुष नाम बीरा जो पावे। फिरके भवसागर नहिं आवे ॥
साहिब ने खेमसरी से कहा कि यह काल का देश है; बिना नाम के संशय नहीं मिटने वाला; जो परम पुरुष का गुप्त नाम पा जाता है, वो फिर भवसागर में नहीं आता।
कह खेमसरी परवाना दीजे। यम सों छोरि आपन करि लीजे ॥
और जीव हमरे गृह आही। नाम पान प्रभु दीजै ताही ॥
खेमसरी ने कहा कि अब नाम रूपी परवाना देकर यम से छुड़ा लो, अपना बना लो, और भी जो जीव मेरे घर में हैं, उन्हें भी नाम दो। तब साहिब उसके घर गये और सबको नाम दिया, आरती करने की विधि भी समझायी। सत्ययुग में साहिब ने चार हंसों को अमर लोक पहुँचाया।
त्रेतायुग में साहिब का आगमन
त्रेतायुग में साहिब का आगमन
सतयुग गयो त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव समुझावा ॥ जब आयेउ जीवन उपदेशा । धर्मराय हित भयेउ अँदेशा ॥ इन भवसागर मोर उजारा । जिव लै जाहि पुरुष दरबारा ॥ परबस होय मौन सो गहिया । सोच विचार मनहिं मन रहिया ॥
सतयुग बीतने पर त्रेतायुग में साहिब मुनींद्र जी के नाम से भवसागर में विख्यात हुए, जब जीवों को उपदेश देने लगे तो निरंजन को संदेह हुआ कि यह मेरी दुनिया उजाड़ देंगे, हंसों को परम पुरुष के पास ले जायेंगे।
त्रेतायुग जबही पगु धारा । मृत्यु लोक कीन्हों पैसारा ॥ जीव अनेकन पूछा जाई । यम से को तुहि लेहि छुड़ाई ॥ कहें भरम वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥ कोई विष्णु महेश की आस लगावें । कोई चण्डी देवी कहैं गावें ॥ जो ग्रासे जिव सेवैं ताही । अनचीन्है यम मुख में जाहीं ॥
जैसे ही त्रेतायुग आया तो साहिब पुनः मृत्यु लोक आए, आकर बहुतों से पूछा कि तुम्हें काल से कौन बचायेगा! तब कोई कहता कि विष्णु जी हमें काल से छुड़ायेंगे, कोई कहता कि शिवजी छुड़ायेंगे, कोई कहता कि चण्डी देवी जी छुड़ायेंगी। भ्रमवश जीव उसी की भक्ति कर रहे थे, जो भक्षण करने वाला था और बिना सत्य की पहचान किये सब काल के मुख में जा रहे थे।
चहुँ दिशि फिरि आयेउँ गढ़ लंका । भाट विचित्र मिल्यो निःसंका ॥ तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥ सुना विचित्र तबहि भ्रम भागा । अति अधीन है चरणन लागा ॥ कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजे काजू ॥
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कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥ तृण तोर बीरा तिहि दीन्हा । ताकैं गृह में काहु न चीन्हा ॥ सुमिरन ध्यान ताहि सो भाखा । पुरुष डोर गाय नहिं राखा ॥
साहिब चारों दिशाओं में फिरकर लंका में आए तो विचित्र नाम का भाट मिला, उसने साहिब की बात को समझा और अधीन होकर चरणों पर गिर पड़ा, कहा कि मेरे जीव का आज कल्याण करो। तब साहिब ने उसे नाम दिया और खेमसरी की भाँति आरती करना बताया, ध्यान सुमिरन करना बताया।
तब विचित्र की स्त्री रानी मंदोदरी के पास गयी और कहा कि कोई साधु आया है, बहुत सुंदर है, श्वेत वस्त्र धारण किए हैं। ऐसा साधु कभी नहीं देखा। तब मंदोदरी आयी और देखकर चकित हुई, विनती की— कहे मँदोदरी शुभ दिन मोरा । विनती करों दोई कर जोरा ॥ ऐसा तपसी कबहुँ न देखा । श्वेत अंग सब श्वेतहि भेखा ॥ हे समरथ मोहिं करहु सनाथा । भव बूढ़त गहि राखो हाथा ॥
तब मंदोदरी ने विनती की, कहा कि ऐसा तपस्वी तो कभी नहीं देखा। वो प्रभावित हुई, कहा कि मुझे सनाथ करो, भवसागर में डुबने से बचा लो।
सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥ ज्ञान दृष्टि सो परखहु आई । खरा खोट तोहि देउँ चिन्हाई ॥ पुरुष अमान अंजर मनि सारा । सो तो तीन लोक ते न्यारा ॥ तेहि साहिब कहँ सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥
साहिब ने मंदोदरी से कहा कि नाम की ताकत से ही यम का बंधन कट सकता है। ज्ञान दृष्टि से परखो, तुम्हें अच्छे बुरे की पहचान बताता हूँ, जो सत्य पुरुष है, वो तीन लोक से न्यारा है, जो उस साहिब का सुमिरन करता है, उसका आवागमन मिट जाता है।
सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचि मन अनुरागा ॥
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साहिब बन्दगी
हे साहिब मोहि लीजे शरणा। मेटहु मोर जन्म अरु मरणा॥ दीन्हों ताहि पान परवाना। पुरुष डोर सौँप्यो सहिदाना॥
मंदोदरी ने जब साहिब के शब्द सुने तो उसका भ्रम दूर हो गया, उसका हृदय स्वच्छ हो गया और प्रेम उमड़ आया, उसने कहा—हे साहिब! मुझे अपनी शरण में लेकर जन्म मरण से दूर कर दो। तब साहिब ने उसे नाम दिया।
तब मैं रावण पहुँ चलि आओ। द्वारपाल सों वचन सुनायो॥ तोसों एक बात समुझाई। राजा कहँ तुम आव लिवाई॥
साहिब तब रावण के महल में पहुँचे और द्वारपाल से कहा कि रावण को संदेश दो कि कोई साधु आया है, आकर उसे महल में ले आओ।
द्वारपाल ने कहा
द्वारपाल तब विनती लाई। महा प्रचण्ड है रावण राई॥ महागर्व अरु क्रोध अपारा। कहों जाय मोहि पल में मारा॥
द्वारपाल ने कहा कि रावण बड़ा प्रचण्ड है, शक्तिशाली है, उसमें बड़ा क्रोध और अभिमान भी है, यदि उससे ऐसी बात कहूँगा तो मुझे वहीं मार देगा।
साहिब ने कहा
मानहु वचन जाव यहि बारा। रोम बंक नहिं होय तुम्हारा॥ सत्य वचन तुम हमरा मानो। रावण जाय तुरत तुम आनो॥
साहिब ने कहा कि तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होगा, मेरा वचन सत्य मानो और तुरंत रावण को यह संदेश देकर आओ।
ततक्षण गा प्रतिहार जनायी। द्वै कर जोरे ठाढ रहाई॥ सिद्ध एक तो हम पहुँ आई। तेकह राजहि लाव बुलाई॥
तभी द्वारपाल अन्दर गया और दोनों हाथ जोड़ रावण से कहा कि एक सिद्ध आया है, कहता है कि राजा रावण को बुलाओ।
अनुरागसागर वाणी
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सुन नृप क्रोध कीन्ह तेहि बारा । मैं मति हीन आहि प्रतिहारा ॥ यहि मति ज्ञान हरोँ किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥ दर्श मोर शिवसुत नहिं पावत । मैं कह भिक्षुक कहा बुलावत ॥
रावण ने क्रोधित हो कहा—हे द्वारपाल ! तेरी बुद्धि का किसने हरण कर लिया, जो तू मुझे बुलाने आया है, मेरा दर्शन शिवजी के पुत्र भी नहीं पा सकते, फिर तू मुझे कहने आया है कि भिक्षु बुला रहा है ।
रावण चला शस्त्र लै हाथा । तुरत जाय तिहि काटों माथा ॥ मारों ताहि सीस खसि परयी । देखों भुक्षुक मोर का करयी ॥ जहँ मुनीन्द्र तहँ रावण राई । सत्तर बार अस्त्र कर लाई ॥ लीन्ह मुनीन्द्र तृण कर ओटा । अति बल रावण मारै चोटा ॥
रावण ने क्रोध में आकर हाथ में तलवार ली, सोचा, अभी उसका शीश काट देता हूँ, देखता हूँ कि वो मेरा क्या करता है । रावण ने आकर 70 बार तलवार चलायी, पर साहिब एक तिनके पर उसका वार रोक देते थे । रावण ने बड़े बल का प्रयोग किया, पर कुछ न बना ।
तृण ओट यहि कारणे है , गर्व धारी राय हो ॥
तेही कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आय हो ॥
साहिब ने तिनके का सहारा इसलिए लिया, क्योंकि रावण बड़ा घमण्डी था, उसे शर्म आ सके , उसका घमण्ड चूर हो सके ।
रावण को अमान करि, तब अवध नगरहि आय ।
दशा संत की जान के , मधुकर पकरै पाय ॥
रावण का घमण्ड तोड़ फिर साहिब अवध में आए, वहाँ मधुकर ब्राह्मण मिला, वो साहिब के चरण पकड़ उन के अधीन हुआ ।
देख्यो ताहि बहु त लवलीना । तासों कह्यो ज्ञान को चीन्हा ॥
पुरुष संदेश कहेउ तिहिं पास । सुनत बचन जिय भयउ हुलासा ॥
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साहिब बन्दगी
साहिब ने उसका प्रेम देखा ते उसे परम पुरुष का ज्ञान दिया, जिसे सुन वो बहुत प्रसन्न हुआ।
अंबु मिलत अंकर सुख माना । तैसहिं मधुकर सब्दहिं जाना ॥ पुरुष भाव सुन तेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥
जैसे जल मिलने से अंकुर फूटकर मानो अपनी खुशी प्रकट कर देते हैं, ऐसे ही मधुकर साहिब के शब्द सुन प्रसन्न हो गया और कहने लगा कि मुझे वो लोक दिखाओ
राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोक लैं तिहिं पहुँचाये ॥ सोभा लोक देख हरषाना । तब मधुकर को मन पतियाना ॥
तब साहिब उसकी आत्मा को शरीर से निकाल अमर लोक गये। अमर लोक की सोभा को देख वो बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे विश्वास हो गया।
इसके अतिरिक्त शृंगी ऋषि, वशिष्ठ मुनि, आदि सहित सात जीवों को साहिब ने त्रेता में तारा।
मधुकर जेते जीव, लोकहिं कीन्ह पयान ॥ तातैं नाम मुनीन्द्र कहि, जीव सत्त दान ॥
द्वापार में आए साहिब
द्वापर में आए साहिब
द्वापर युग प्रवेश भा जबही । पुरुष अवाज् कीन्ह पुनि तबही ॥ ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । यम सों जीवन करहु उबारा ॥ काल देत जीव कहँ त्रासा । काटो जाय तिनहिं को फाँसा ॥
द्वापर में पुनः परम पुरुष ने साहिब को बुलाकर कहा कि संसार में जाओ और काल से जीवों को छुड़ाओ, वो जीवों को कष्ट दे रहा है ।
तब हम कहा पुरुष सों बानी । आज्ञा करहु शब्द परवानी ॥ कालहिं मेटि जीव लै आवो । बार-2 का जगहिं सिधावो ॥
साहिब ने तब परम पुरुष से कहा कि काल को मार सब जीवों को ले आता हूँ, बार-2 क्या भवसागर में जाना ।
कहा पुरुष सुनो हो ज्ञानी । शब्द चिताय जीव मुक्तानी ॥ जो अब कालहिं मेटो जाई । हो तबहिं मम वचन नसाई ॥ सहज भाई जग प्रगटहु जाई । जब लग जीव काल बस भाई ॥ हमसों तुमसों अन्तर नाही । जिमि तरंग जलमाहिं समाहीं ॥ हम है तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट जम सब करिहैं थाना ॥ जाहु बेगि तुम वा संसारा । जीवन खेइ उतारहु पारा ॥
परम पुरुष ने साहिब से कहा कि यदि अब काल को मिटाया तो मेरा शब्द कट जायेगा, इसलिए जब तक जीव काल के फंदे में हैं, तुम सहज
भाव से संसार में प्रगट होकर उन्हें चिताते रहो, मुझमें और तुममें कोई भेद नहीं है, जो मुझमें और तुममें कोई अन्तर मानेगा, उसके अन्दर काल निवास करेगा। अच्छा, अब जल्दी से संसार में जाओ और जीवों की जीवन रूपी नैया खेवकर उन्हें पार लगाओ ।
चले तब हम माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जग माहिं सिधायी ॥ करुणामय तब नाम धराया । द्वापर युग जब महि में आया ॥
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साहिब बन्दगी
साहिब पुनः परम पुरुष की आज्ञा से उन्हें माथ नवाकर चले। जब धरती पर द्वारप युग आया, तब उनका नाम करुणामय हुआ।
गढ़ गिरनार तबहि चलि आये। चन्द्रविजय नृप तहाँ रहाये ॥ ताको नारि रहै सयानी। पूजै साधु महातम जानी ॥ तिन सुधि जब हमरी पाई। वृष ली अपनी दीन्ह पठाई ॥ आई चेरी विनती कीन्ह। तुब दर्शन रानी चित्त दीन्ह ॥
साहिब द्वारप में गिरनार में आए, वहाँ के राजा चन्द्रविजय की रानी साधु महात्माओं की महत्ता जानती थी। जब उसे साहिब के आने का पता चला तो अपनी दासी को साहिब को लाने भेजा। दासी ने आकर साहिब से रानी का सँदेश कहा कि रानी आपके दर्शन करना चाहती हैं।
तब ज्ञानी कहि वचन सुनावै। राज रावघर हम नहिं जावै ॥
राज काज है मान बड़ाई। हम साधू नृप गृह नहिं जाई ॥
साहिब ने उससे कहा कि हम राजा लोगों के घर नहीं जाते, उन्हें बड़ा अभिमान रहता है।
चलि वृषली रानी पहँ आयी। द्वै कर जोर विनय सुनायी ॥
साधुन आवे मोर बुलाई। राज राव घर हम नहिं जाई ॥
सुन इन्द्रमती उठि चलि आऊँ। कीन्ह दण्डवत टेके पाऊँ ॥
दासी ने रानी के पास जाकर साहिब का सँदेश दिया। यह सुन रानी इन्द्रमती खुद आई और दण्डवत करके चरण स्पर्श किये।
इन्द्रमती ने कहा
हे साहिब मोपर करू दया। मोरे गृह अब धारिये पाया ॥
रानी ने कहा कि मेरे घर में चरण रखें।
साहिब कहते हैं
प्रीति देख हम भवन सिधारै। राजा घर तबहीं पग धारे।
कहे रानी चलु मंदिर मोरे। भयो सुखी दर्शन लिये तोरे ॥
अनुरागसागर वाणी
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प्रीति देखि तेहि भवन सिधाये । दीन्ह सिंहासन चरण खटाये ॥ दीन्ह सिंहासन चरण पखारी । चरण पर छालन अंगोछा धारी ॥ चरण धोय पुनि राखे सिरानी । पट पद पोंछ जन्म शुभ जानी ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि रानी की प्रीत देख मैं उसके घर गया। रानी ने मुझे बैठने के लिए सिंहासन दिया, मेरे चरण धोये और अपने जन्म को सफल माना।
रानी ने कहा
पुनि प्रसाद को आज्ञा माँगी। हे प्रभु मोकहँ करहु सुभागी ॥ जूठन परै मोर गृह माहीं। सीत प्रसाद लै हमहूँ खाहीं ॥
फिर रानी ने साहिब से शीत प्रसाद की माँग की।
साहिब ने कहा
सुन रानी मोहि क्षुधा ना होई। पंच तत्व पावे जेहि सोई ॥ अमृत नाम अहार है मोरा। सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥ देह हमारि तत्व गुण न्यारी। तत्व प्रकृति तिहिँ काल रचिवारी ॥ असी पंच किहु काल समीरा। पंच तत्व की देह खमीरा ॥ तामह आदि पवन इक आही। जीव सोहँ ग बीलियो ताही ॥ यह जिव अहै पुरुष को अंशा। रोकसि काल ताहि दे संशा ॥ नाना फंद रचि जीव गरासै। देइ लोभ तब जीवहि फाँसै ॥ जिव तारन हम यहि जग आये। देइ लोभ तब जीवहि फाँसै ॥ धर्मराय अस बाजी कीन्हा। धोक अनेक जीव कहँ दीन्हा ॥ नीर पवन कृत्रिम किहु काला। विनशि जाय बहु करै बिहाला ॥ तन हमार यहि साज ते न्यारा। मम तन नहिँ सिरज्यो करतारा ॥ शब्द अमान देह है मोरा। परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥
साहिब ने रानी से कहा कि मुझे भूख नहीं लगती है, क्योंकि मेरी देही पंच तत्व की नहीं है; मैं तो अमृत का आहार ही करता हूँ। कहा कि
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साहिब बन्दगी
जीव परम पुरुष के अंश हैं, जिन्हें काल पुरुष ने अपने भ्रम जाल में फँसाकर रोके रखा है। मैं जीवों को काल के फँदे से छुड़ाने आया हूँ। जो जीव मुझे पहचान कर मेरी शरण में आ जाते हैं, उन्हें मैं इस संसार से मुक्त करके ले जाता हूँ। काल ने जीवों को धोखे में रखा हुआ है। पवन, पानी आदि नाशवान तत्वों से देही का निर्माण किया है, पर मेरी देही इन चीजों से न्यारी है; मेरी शब्द की देही है। यह मैंने संक्षेप में थोड़ा बताया है, अब तुम इसे परख लो।
इन्द्रमती ने पूछा
हे प्रभु अस अचरज मोहि होई। अस सुभाव दूजा नहीं कोई॥ कौन आहु कहँवाते आये। तन अर्चित प्रभु कहँवा पाये॥ कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा। यह सब वरण कहो मोहि भेवा॥ हम का जानहिं भेद तुम्हारा। ताते पूछों यह व्यवहारा॥
रानी ने कहा कि मुझे एक अचरज हो रहा है कि ऐसी देही तो और किसी की नहीं सुनी, इसलिए कृपा करके मुझे बताओ कि आप कहाँ से आए हैं, यह देही आपने कहाँ से पाई है, आपका नाम क्या है! यह सब मुझे बताओ। मैं आपका भेद नहीं जानती हूँ, इसलिए यह सब पूछ रही हूँ।
इन्द्रमती कथा सुन सुहावन। तोहि समझाय कहों गुण पावन॥ देश हमार न्यार तिहुँ पुर ते। अहि पुर नर पुर अरु सुर पुर ते। तहाँ नहीं यम केर प्रवेशा। आदि पुरुष को जहवाँ देशा॥ सत्य लोक की ऐसी बाता। कोटि शशि इक रोम लजाता॥ ऐसी पुरुष कांति उजियारा। हँसन शोभा कहों बिचारा॥ एक हँस जस षोडश भाना। अग्र वासना हँस अघाना॥ कहा कहों कछु कहत न आवे। धन्य भाग जे हँस सिधावे॥ ताहि देश ते हम चलि आये। करुणामय निज नाम धराये॥
अनुरागसागर वाणी
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सतयुग सत् सुकृत त्रेता मुनीन्द्र । द्वापर करुणामय नाम धराये ॥ युगन युगन हम यहाँ चले आये । जो चीन्हा तहाँ लोक पठाये ॥
साहिब ने कहा कि मेरा देश तीन लोक से परे है, वहाँ यम प्रवेश नहीं कर सकता, वहाँ आदि पुरुष का निवास है। सत्य लोक की बात ऐसी है कि करोड़ों सूर्य चन्द्र उस परम पुरुष के मात्र एक रोम से लजा जाएँ और आत्मा का प्रकाश 16 सूर्यों का है। क्या कहूँ, वहाँ की बात कुछ कही नहीं जा सकती है; जो वहाँ पहुँचता है, उसका बड़ा भाग्य है। उसी देश से मैं आया हूँ और यहाँ आकर करुणामय नाम धराया है। वास्तव में मैं हर युग में आता हूँ; सतयुग में सतसुकृत, त्रेता में मुनीन्द्र और द्वापर में करुणामय नाम से मैं यहाँ आया हूँ और जिसने मेरी बात को समझा, विश्वास किया, उसे मैंने वहाँ पहुँचाया है।
इन्द्रमती ने कहा
जोरि पाणि बोली बिलखायी । हे प्रभु यम ते लेहु छुड़ाई ॥ राज पाट सब तुम पर वारों । धन सम्पति यह सब तजि डारों ॥ देहु शरण मुहिं दीनदयाला । बंदिछोर मुहिं करहु निहाला ॥
रानी ने साहिब से कहा—हे प्रभु! यम से छुड़ा लो। कहा कि यह राज पाट सब मैं तुम पर वार देती हूँ, यह धन—धौलत यह त्याग देती हूँ, मुझे अपनी शरण में लेकर काल के जाल से मुक्त कर दो।
साहिब ने कहा
इन्द्रमती सुन वचन हमारा । छोरों निश्चय बंदि तुम्हारा ॥ चीन्हउ मोहि परतीत दूढ़ाना । अब देहुँ तोहि नाम परवाना ॥ करहु आरती लेवहु परवाना । भागे यम तब दूर पयाना ॥ चीन्हों मोहि करो परवाती । लेहु पान चलुभौ जल जीती ॥ आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि ना काजा ॥ धनसंपति कछु मोहि ना भावा । जीव चितावन यहि जग आवा ॥ धन सम्पति तुम यहँवा लायी । करहु संत सम्मान बनायी ॥