अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर वाणी
119
प्रीति देखि तेहि भवन सिधाये । दीन्ह सिंहासन चरण खटाये ॥ दीन्ह सिंहासन चरण पखारी । चरण पर छालन अंगोछा धारी ॥ चरण धोय पुनि राखे सिरानी । पट पद पोंछ जन्म शुभ जानी ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि रानी की प्रीत देख मैं उसके घर गया। रानी ने मुझे बैठने के लिए सिंहासन दिया, मेरे चरण धोये और अपने जन्म को सफल माना।
रानी ने कहा
पुनि प्रसाद को आज्ञा माँगी। हे प्रभु मोकहँ करहु सुभागी ॥ जूठन परै मोर गृह माहीं। सीत प्रसाद लै हमहूँ खाहीं ॥
फिर रानी ने साहिब से शीत प्रसाद की माँग की।
साहिब ने कहा
सुन रानी मोहि क्षुधा ना होई। पंच तत्व पावे जेहि सोई ॥ अमृत नाम अहार है मोरा। सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥ देह हमारि तत्व गुण न्यारी। तत्व प्रकृति तिहिँ काल रचिवारी ॥ असी पंच किहु काल समीरा। पंच तत्व की देह खमीरा ॥ तामह आदि पवन इक आही। जीव सोहँ ग बीलियो ताही ॥ यह जिव अहै पुरुष को अंशा। रोकसि काल ताहि दे संशा ॥ नाना फंद रचि जीव गरासै। देइ लोभ तब जीवहि फाँसै ॥ जिव तारन हम यहि जग आये। देइ लोभ तब जीवहि फाँसै ॥ धर्मराय अस बाजी कीन्हा। धोक अनेक जीव कहँ दीन्हा ॥ नीर पवन कृत्रिम किहु काला। विनशि जाय बहु करै बिहाला ॥ तन हमार यहि साज ते न्यारा। मम तन नहिँ सिरज्यो करतारा ॥ शब्द अमान देह है मोरा। परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥
साहिब ने रानी से कहा कि मुझे भूख नहीं लगती है, क्योंकि मेरी देही पंच तत्व की नहीं है; मैं तो अमृत का आहार ही करता हूँ। कहा कि