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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

साहिब पुनः परम पुरुष की आज्ञा से उन्हें माथ नवाकर चले। जब धरती पर द्वारप युग आया, तब उनका नाम करुणामय हुआ।

गढ़ गिरनार तबहि चलि आये। चन्द्रविजय नृप तहाँ रहाये ॥ ताको नारि रहै सयानी। पूजै साधु महातम जानी ॥ तिन सुधि जब हमरी पाई। वृष ली अपनी दीन्ह पठाई ॥ आई चेरी विनती कीन्ह। तुब दर्शन रानी चित्त दीन्ह ॥

साहिब द्वारप में गिरनार में आए, वहाँ के राजा चन्द्रविजय की रानी साधु महात्माओं की महत्ता जानती थी। जब उसे साहिब के आने का पता चला तो अपनी दासी को साहिब को लाने भेजा। दासी ने आकर साहिब से रानी का सँदेश कहा कि रानी आपके दर्शन करना चाहती हैं।

तब ज्ञानी कहि वचन सुनावै। राज रावघर हम नहिं जावै ॥

राज काज है मान बड़ाई। हम साधू नृप गृह नहिं जाई ॥

साहिब ने उससे कहा कि हम राजा लोगों के घर नहीं जाते, उन्हें बड़ा अभिमान रहता है।

चलि वृषली रानी पहँ आयी। द्वै कर जोर विनय सुनायी ॥

साधुन आवे मोर बुलाई। राज राव घर हम नहिं जाई ॥

सुन इन्द्रमती उठि चलि आऊँ। कीन्ह दण्डवत टेके पाऊँ ॥

दासी ने रानी के पास जाकर साहिब का सँदेश दिया। यह सुन रानी इन्द्रमती खुद आई और दण्डवत करके चरण स्पर्श किये।

इन्द्रमती ने कहा

हे साहिब मोपर करू दया। मोरे गृह अब धारिये पाया ॥

रानी ने कहा कि मेरे घर में चरण रखें।

साहिब कहते हैं

प्रीति देख हम भवन सिधारै। राजा घर तबहीं पग धारे।

कहे रानी चलु मंदिर मोरे। भयो सुखी दर्शन लिये तोरे ॥