अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
धर्मदास जी ने कलयुग के अन्य जीवों के बारे में पूछा, जिनपर साहिब ने उनके द्वारा कृपा की।
धर्मदास ने विनती की
धन सतगुरु तुम मोहि चैतावा । काल फंद ते मोहि मुकतावा ॥ मैं किंकंर तुम दास के दासा । लीन्हों मोरि काटि जम फाँसा ॥
मैं अघकर्मी कुटिल कठोरा । रहेउ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥
कहा जानि तुम मोहि जगाये । कौने तप हम दर्शन पाये ॥
धर्मदास जी ने कहा कि मैं तो कठोर हृदय का था, बुरा इंसान था, अचेत था, फिर क्या सोचकर आपने मुझे जगाया !
साहिब ने कहा
इच्छा कर जो पूछो मोही । अब मैं गोइ न राखों तोही ।
धर्मन सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहो विख्याता ॥
संत सुदर्शन द्वारपर भयऊ । तासु कथा तोहि प्रथम सुनयऊ ॥
तेहि ले गयो निज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
कहे सुपच सतगुरु सुन लीजे । हमरे मात पिता गति दीजे ॥
बंदीछोर करो प्रभु जाई । यम के देश बहुत दुख पाई ॥
साहिब ने कहा कि द्वार के सुपच सुदर्शन की कथा तुम्हें मैंने सुनाई थी। जब मैं उसे अमर लोक ले गया तो उसने मुझसे प्रार्थना की कि मेरे माता-पिता को भी नाम दो, अमर-लोक ले चलो। मैंने उन्हें बहुत समझाया पर वे माने नहीं, नाम नहीं लिया। तब सुपच की विनती सुन मैंने कहा कि मैं इन्हें पार जरूर उतारूँगा। अगले जन्म में वे सुपच के प्रभाव से ब्राह्मण-ब्राह्मणी हुए, फिरसे मानव देही मिली। उनको पुत्र नहीं था, वो सूर्य से पुत्र माँग रही थी, इतने में मैं झोली में आकर गिर पड़ा। उसने सोचा कि सूर्य ने पुत्र दे दिया....घर ले आई।
संत सुदर्शन नाम प्रतापा । मानुष देह विप्र के छापा ॥
दोनों जन्म दाय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीना ॥
कुलपति नाम विप्र कर कहिया । नारी नाम महे सरि रहिया ॥