अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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बहुत अधीन पुत्र हित हारी। करी अस्नान सूर्य व्रतधारी।। अंचल लै विनवै कर जोरी। रुदन करे चित सुत कह दौरी।। तत्क्षण हम अंचल पर आवा। हम कहँ देखि नारि हरषावा।।
बाल रूप धरि भेंट्यो वोही। विप्र नारि गृह लै गइ मोही।। कहँ नारि कृपा प्रभु कीना। सूर्य व्रत कर फल यह दीना।।
अब मैं उन्हें समझाने लगा, पर वे माने नहीं, तो मैं गुप्त हो गया। पुनि हम सत्य शब्द गोहराई। बहु प्रकार ते उनहिँ समझाई।। ता हृदय नहिँ शब्द समायी। बालक जान प्रतीत न आयी।। ताहि देह चीन्हसि नहिँ मोही। भयो गुप्त तहँ तन तज वोही।।
तो फिर दूसरे जन्म में वे शाह-शाहनी हुए, चन्दन और ऊदा उनके नाम हुए।
नारी द्विज दोई तन त्यागा। दरश प्रभाव मनुज तन जागा।। ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ। पुरुष नाम चंदन धरिगयऊ।। परसोतमते हम चलि आये। तह चंदवारा जाइ प्रगटाये।। बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा। किन्हउ ताल माहिँ विश्रामा।। कमल पत्र पर आसन लाई। आठ पहर हम तहाँ रहाई।। पीछे ऊदा अस्नानहि आयी। सुन्दर बालक देखि लुभायी।। दरश दियो तेहि शिशुतन धारी। ले गई बालक निज घर नारी।।
तब मैं उनके गाँव आया और समीप के सरोवर में प्रगट हुआ। एक दिन वहीं रहा। सुबह जब नारी स्नान करने आई तो सुंदर बालक देख मोहित हुई और घर ले आई।
कह चन्दन के मूरख नारी। वेगि जाहु दै बालक डारी।। जाति कुटुंब हँसिहँ सब लोगा। हँसत लोग उपजै तन सोगा।।
चंदन ने कहा कि यह किसे उठा लाई हो, जाओ वापिस छोड़ आओ, नहीं तो लोग हँसी करेंगे। तब चंदन के डर से ऊदा मुझे वापिस छोड़ने जा रही थी।