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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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वेद चारों नहीं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ।

वेद को तब मूल नहीं, अकथ कथा बखानियाँ॥

साहिब ने धर्मदास से कहा कि मैं तुमको आदि उत्पत्ति का रहस्य कहता हूँ, जिसे कोई नहीं जानता है। साकार-निराकार, लोक-लोकान्तर आदि सब बाद में बने, अतः गवाही किसकी दूँ! चारों वेद भी सत्य-पुरुष की कहानियाँ नहीं जानते हैं और निराकार यानी काल-पुरुष की कथाएँ कहते हैं।

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये। कारण करण नहीं निरमाये॥

समपुट कमल रह गुप्त सनेहा। पुहुप माहिं रह पुरुष विदेहा॥

इच्छा कीन्ह अंश उपजाये। हंसन देख हरष बहु पाये॥

प्रथमहिं पुरुष शब्द परकाश। दीप लोक रचि कीन्ह निवासा॥

चारि कर सिंहासन कीन्हा। तापर पुहुप दीप कर चीन्हा॥

पुरुष कला धरि बैठे जहिया। प्रगटी अगर वासना सहिया॥

सहस अठासी दीप रचि राखा। पुरुष इच्छा तै सब अभिलाखा॥

सबै द्वीप रहु अगर समायी। अगर वासना बहुत सुहायी॥

साहिब कह रहे हैं कि आरम्भ में परम-पुरुष गुप्त थे, उनका न कोई साथी था, न संगी। एक समय उनकी मौज हुई और उन्होंने अंश उत्पन्न किये। सबसे पहले उन्होंने एक शब्द पुकारा, अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न किया और स्वयं उस प्रकाश में समा गये; वो ही अमर-लोक कहाया। फिर उनकी इच्छा हुई और उन्होंने अनेक द्वीपों की रचना की।

वास्तव में यह रहस्य छिपाया गया। मैं बताता हूँ। सर्वप्रथम परम-पुरुष ने इच्छा करके एक शब्द पुकारा, जिससे एक अद्भुत श्वेत रंग का प्रकाश हुआ और वो प्रकाश अनन्त में फैल गया। वो प्रकाश सांसारिक प्रकाश की तरह न था; वो इतना अद्भुत था कि जिसका एक-एक कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे।

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