अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
जब वो प्रकाश अनन्त में फैल गया तो फिर वे सत्य पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये। अब वो प्रकाश चेतन हो गया, जीवित हो गया। जिस प्रकार आत्मा के शरीर में आने से शरीर चेतन हो जाता है, उसी प्रकार वो प्रकाश भी जीवित हो उठा। प्रकाश में आने से पहले वे सत्य-पुरुष गुप्त थे जबकि प्रकाश में आकर ही वे सत्य पुरुष कहलाए और वो अद्भुत प्रकाश, जो स्वयं सत्य-पुरुष ही थे, अमर लोक कहलाया।
अभी भी सत्य-पुरुष अकेले ही थे। फिर उनकी मौज हुई और उन्होंने उस प्रकाश को अर्थात अपने ही स्वरूप को अपने में से खिटका दिया।.....अनन्त बिन्दुएँ हुईं, जो वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आयीं। जिस प्रकार समुद्र में से पानी को मुट्ठी में या हाथों में भरकर उछालने से कई कण बिखर जाते हैं, उसी तरह उस प्रकाश में से भी अनेक कण बिखर गये। लेकिन जिस प्रकार समुद्र की बूँदें पुनः समुद्र में गिर समुद्र का ही रूप हो जाती हैं, उसी तरह वे अनन्त कण भी वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आए, लेकिन अचरज यह था कि वे बिन्दुएँ जब वापिस प्रकाश में आयीं तो वे प्रकाशमय नहीं हुईं, क्योंकि सत्य-पुरुष ने इच्छा की कि इनका अपना अलग अस्तित्व भी रह जाए। वे ही जीव कहलाए। वे सब जीव उसी अद्भुत प्रकाश में विचरण करने लगे।
आत्माओं का उस प्रकाश में अलग अस्तित्व के साथ विचरण करना बड़े अचरज की बात थी, क्योंकि समुद्र की बूँदों का समुद्र में अपना अलग अस्तित्व नहीं होता। जिस प्रकार पानी में मछली घूमती रहती है, उसी तरह सभी जीव उस प्रकाश में घूमने लगे। यह देख परम-पुरुष बड़े खुश हुए और उन आत्माओं को बहुत प्यार करने लगे। बहुत समय ऐसे व्यतीत हो गया और सभी जीव उस अद्भुत प्रकाश में विचरण करते हुए परम आनन्द लूट रहे थे। फिर परम-पुरुष ने शब्दों से पुत्र उत्पन्न किये अर्थात जो बोल रहे थे, वो पुत्र बन रहा था।