अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसोलह सुत की उत्पत्ति
दूजे शब्द जु पुरुष परकासा। निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥ तीजे शब्द भये जु पुरुष उच्चार। ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥ टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ। आज्ञा पुरुष द्वीप तिन्ह दएऊ ॥ चौथे शब्द भये पुनि जबही। विवेक नाम सुत उपजे तबहीं ॥ आप पुरुष किये द्वीप निवासा। पंचम शब्द सो तेज परकासा ॥ पांचव शब्द जब पुरुष उच्चार। काल निरंजन भो औतारा ॥ तेज अंग ते काल है आवा। ताते जीवन कह संतावा ॥ जीवरा अंश पुरुष का आहीं। आदि अंत कोउ जानत नाहीं ॥ छठएँ शब्द पुरुष मुख भाषा। प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥ सतएँ शब्द भयो संतोष। दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥ अठएँ शब्द पुरुष उच्चार। सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥ नवमें शब्द अनंद अपारा। दशएँ शब्द छमा अनुसारा ॥ ग्यारहें शब्द नाम निष्काम। बारहें सब्द सुत जलरंगी नामा ॥ रहें सब्द अचिन्त सुत जानो। चौदहें शब्द सुत प्रेम बखानो ॥ पन्द्रहें शब्द सुत दीन दयाला। सोलहें सब्द भे धीर्य रसाला ॥ सत्रहें शब्द सुत योग संतायन। एक नाल षोडश सुत पायन ॥
जैसे ही परम-पुरुष ने इच्छा करके दूसरा शब्द पुकारा तो उससे कूर्म उत्पन्न हुआ। इसी तरह तीसरे शब्द से ज्ञान और चौथे से विवेक उत्पन्न हुआ। ये सब परम-पुरुष ने इच्छा से पैदा किए, पर आत्मा इच्छा से नहीं बनी, वो परम-पुरुष का अंश है। फिर परम पुरुष ने पांचवा शब्द तेज अंग से पुकारा। जिसके तेज से निरंजन पैदा हुआ। तो छठे शब्द से सहज की उत्पत्ति हुई, सातवें से संतोष, ग्यारहवें से निष्काम, बारहवें से जलरंगी, तेरहें से अचिन्त, चौदहें से प्रेम, पन्द्रहवें से दीनदयाल, सोलहवें से धैर्य और सत्रहवें शब्द से योग संतायन हुए। ये सब परम-पुरुष के 16 पुत्र
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