भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

हुए, जिन्हें उन्होंने सुरति की एक नाल से पिरो दिया।

शब्दहिते भयो सुतन अकारा । शब्द ते लोक द्वीप विस्तारा ॥

अग्र अमी दिय अंश अहारा । द्वीप द्वीप अंशन बैठारा ॥

अंशन शोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा बसंता ॥

सब सुत करें पुरुष को ध्याना । अमी अहार सदा सुख माना ॥

शब्द से ही परम-पुरुष ने पुत्र उत्पन्न किये और शब्द से ही अमर-लोक के द्वीपों की रचना की। हरेक द्वीप पर अंशों को स्थान दिया और सब उस अमृत(परम-पुरुष के स्वरूप) का पान करने लगे। अंशों की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता; वहाँ सदा आनन्द रहता है। सभी पुत्र परम-पुरुष का ध्यान करने लगे और अमृत भोजन करते हुए सुख से रहने लगे।

द्वीप करि को अनंत सोभा, नहिं बरनत सो बनै ।

अमिय कला अपार अद्भुत, सुतन शोभा को गनै ॥

पुरुष के उजियार से सुत, सबै दीप उजियार हो ।

सतपुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द्र सूर्य करोर हो ॥

अमर-लोक के द्वीपों और परम-पुरुष के पुत्रों की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। परम-पुरुष के प्रकाश से सब द्वीप प्रकाशित रहते हैं; उनके एक रोम मात्र का प्रकाश करोड़ों सूर्यों और चन्द्रमा के बराबर है।

सतपुर आनन्द धाम, सोक मोह दुख तहाँ नहीं ।

हंसन को बिसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥

सत्य लोक आनन्द का घर है; वहाँ दुख, मोह आदि नहीं है; वहाँ हंस सत्य पुरुष के अमृत का पान करते हैं।