भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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काल निरंजन कीन्हों तपस्या

यहि बिधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥ धर्मराय अस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझहु धर्मदासा ॥ युग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढ़ पुरुष चित दीन्हा ॥ सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा ॥

अमर लोक में सबको आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके बाद पाँचवाँ पुत्र निरंजन परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर एकाग्रचित्त परम-पुरुष का ध्यान किया। जब उसने इतना कठिन तप किया तो परम-पुरुष प्रसन्न हुए।

परम पुरुष ने कहा

पुरुष अवाज् उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥

परम-पुरुष ने पूछा कि इतनी घोर सेवा, तप क्यों कर रहे हो!

निरंजन ने कहा

कहै धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहाँ बैठों जायी ॥

निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं स्थान दे दो।

परम पुरुष ने कहा

आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ । मानसरोवर दीप है जहवाँ ॥

कहा-हे पुत्र! जाओ, तुम मानसरोवर द्वीप में जाकर रहो।

चले धरम तब मानसरोवर । बहुत हरषचित्त करत कलौहर ॥ मानसरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरम पुनि तहिया ॥ बहु रि ध्यान पुरुष को कीन्हा । सत्तर युग सेवा चित दीन्हा ॥ यक पग ठाढ़ सेवा सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥

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