अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाल निरंजन कीन्हों तपस्या
यहि बिधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥ धर्मराय अस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझहु धर्मदासा ॥ युग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढ़ पुरुष चित दीन्हा ॥ सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा ॥
अमर लोक में सबको आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके बाद पाँचवाँ पुत्र निरंजन परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर एकाग्रचित्त परम-पुरुष का ध्यान किया। जब उसने इतना कठिन तप किया तो परम-पुरुष प्रसन्न हुए।
परम पुरुष ने कहा
पुरुष अवाज् उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥
परम-पुरुष ने पूछा कि इतनी घोर सेवा, तप क्यों कर रहे हो!
निरंजन ने कहा
कहै धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहाँ बैठों जायी ॥
निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं स्थान दे दो।
परम पुरुष ने कहा
आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ । मानसरोवर दीप है जहवाँ ॥
कहा-हे पुत्र! जाओ, तुम मानसरोवर द्वीप में जाकर रहो।
चले धरम तब मानसरोवर । बहुत हरषचित्त करत कलौहर ॥ मानसरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरम पुनि तहिया ॥ बहु रि ध्यान पुरुष को कीन्हा । सत्तर युग सेवा चित दीन्हा ॥ यक पग ठाढ़ सेवा सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥
27