अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
मानसरोवर में आकर काल-निरंजन बड़ा खुश हुआ और आनन्द से रहने लगा। वहाँ वो पुनः परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। अबकी बार उसने पुनः 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर ध्यान किया। परम-पुरुष के हृदय में दया आयी।
विकस्यो पुहुप उदयो जब बानी । बोलत वचन उदयो अधरानी । जाहु सहज तुम धरम कै पास। अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥
परम-पुरुष ने तब सहज को निरंजन के पास भेजा, कहा-पूछो कि अब क्यों ध्यान कर रहे हो, क्या चाहते हो!
चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥ कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥ अब का माँगहु सो कह मोही । पुरुष अवाज दीन्ह यह तोही ॥
परम-पुरुष की आज्ञा पाकर उन्हें प्रणाम करके निरंजन के पास आए और कहा-हे भाई! परम-पुरुष तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हैं, इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भिजवाया है कि अब जो माँगना चाहते हो, मुझसे कहो।
निरंजन ने कहा
अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिनती जाई ॥ इतना ठाँव न मोहि सुहाई । अब मोहि बकसि देहु ठकुराई ॥ मोरे चित अस भौ अनुरागा । देऊ देश मोहि करहु सभागा ॥ कै मोहि देहु लोक अधिकारा । कै मोहि देहु देस यक न्यारा ॥
निरंजन ने सहज से कहा कि तुम मेरे बड़े भाई हो, तुम परम-पुरुष के पास जाकर विनती करते हुए कहना कि मैं इतने स्थान से खुश नहीं हूँ, इसलिए अब कृपा करके या तो अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर अलग से एक न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो।
चले सहज सुनि धर्म के बाता । जाय पुरुष सो कहे विख्याता ॥ जो कछु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥