भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 144 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

अनुरागसागर वाणी

29

निरंजन की बात सुनकर सहज वापिस परम-पुरुष के पास आए और जो कुछ निरंजन ने कहा, वो सुना दिया।

सुन्यो सहज के बचन जबहीं, पुरुष बैन उच्चारै ऊ।

धरम से संतुष्ट हैं हम, बचन मम हिय धारे ऊ॥

लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू॥

करहु रचना जाय तहवाँ, सहज वचन सुनावहू॥

परम-पुरुष ने सहज के वचन सुनकर कहा कि मैं निरंजन से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए उसके पास जाकर कहो कि मैंने उसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है; वो शून्य में एक अलग देश बसा ले।

आय सहज तब वचन सुनावा। सत्य पुरुष जस कहि समुझावा॥

सुनतहिं बचन धर्म हरषाना। कल्लु क हरष कल्लु विस्मय आना॥

जब सहज ने निरंजन को परम-पुरुष की आज्ञा सुनाई तो निरंजन बहुत खुश हुआ। पर उसे कुछ आश्चर्य भी था। तो कहा-

कहे धर्म सुनु सहज पियारा। कै से रचौं करौं विस्तारा॥

पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू। जानू न भेद करौं किम काजू॥

गम्य अगम्य मोहि नाहिं आयी। करो दया सो युक्ति बतायी॥

विनती करौ पुरुष सों मोरी। अहो भ्रात बलिहारी तोरी॥

किहि विधि रचूँ नौ खंड बनाई। हे भ्राता सो आज्ञा पाई॥

मो कहँ देहु साज प्रभु सोई। जाते रचना जगत की होई॥

निरंजन ने सहज से कहा कि परम-पुरुष ने मुझे तीन-लोक का राज्य तो दिया, पर मुझे रचना का भेद मालूम ही नहीं तो फिर कैसे करूँ! मुझे वो सामग्री तो दो, जिससे मैं रचना कर सकूँ।

तबही सहज लोक पगु धारा। कीन्ह दण्डवत् बारंबारा॥

सहज फिर परम-पुरुष के पास गया और दण्डवत् प्रणाम किया।

अहो सहज कस इहवाँ आऊ। सो हमसों तुम सब्द सुनाऊ॥

परम-पुरुष ने सहज से पूछा कि किस कारण से आए हो, सो मुझे बताओ।