भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

कह्यो सहज तब धर्म की बाता । जो कछु धर्म कही विख्याता ॥

तब सहज ने निरंजन की विनती सुना दी ।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा । सुनो सहज तुम बचन हमारा ॥

कूर्म उदर आहि सब साजा । सो ले धरम करे निज काजा ॥

विनती करे कूर्म सो जायी । माँगि लेइ तेहि माथ नवायी ॥

परम-पुरुष ने सहज को आज्ञा दी, कहा कि कूर्म के पेट में रचना का सब सामान है; तुम निरंजन को कहो कि कूर्म के पास जाकर विनती करे और उससे वो सामान माँग ले ।

गये सहज पुनि धर्म के पास । आज्ञा पुरुष कीन्ह परगासा ॥

विनती करो कूर्म सो जाई । माँगि लेहु तेहि सीस नवाई ॥

जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं कृपा बहुत तब पावहु ॥

सहज ने निरंजन के पास जाकर परम-पुरुष की आज्ञा सुनाई, कहा कि कूर्म के पास जाकर विनती करना और उससे माँग लेना; वो तुम्हें दे देगा ।

चलि भौ धरम हरष तब बाढ़ो । मनहिं कीन गुमान अति गाढ़ो ॥

जाय कूर्म के सन्मुख भयऊ । दंड परनाम एक नहिं कियऊ ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई । तपत न तनि को अति शितलाई ॥

करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाला ॥

बारह पालँग कूर्म शरीरा । छै पालँग धरम बलवीरा ॥

धौवै चहुँ दिश रहै रिसाई । किहि विधि लीजे उत्पति भाई ॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा । जाय कूर्म के सन्मुख भीरा ॥

कीन्हो काल सीस नख घाता । उदरते निकसे पवन अघाता ॥

तीन सीस के तीनहु अंशा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बंशा ॥

पाँच तत्व धरती आकाश । चन्द्र सूर्य उडगन रहिवासा ॥

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