अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ
कहे उ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो। शून्य गुफहि निवास कीन्हो, भेद लह को ताहि हो ॥ वह गुप्त भा पुनि संग सबकैं, मन निरंजन जानिये। मन पुरुष ध्यान उच्छे द देवै, आपु परगट आनिये ॥
निरंजन गुप्त होकर शून्य में समा गया और मन रूप में सबके साथ हो गया। यही मन परम पुरुष का ध्यान नहीं करने देता है।
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगाय के। आप चलावे चाल, कष्ट देय पुनि जीव को ॥
काल स्वयं ही चाल चलकर जीवों से कर्म करवाता है और फिर स्वयं ही उन्हें कष्ट देता है।
गुप्त भयो है संग सबके। मन ही निरंजन जानिये ॥
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