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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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हो, ऐसे ही सब उनमें खो गये। फिर तीनों भाई काम के वशीभूत हुए और उनमें ही रम गए। जिससे देवताओं और दैत्यों की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी और विष्णु जी से देवताओं की और शिवजी से राक्षसों की उत्पत्ति हुई। इसलिए आगे चलकर शिवजी ने ही राक्षसों को वरदान भी दिये।

माता बहुरि कहै समुझायी। अब फिर सिंधु मथो तुम जाईं ॥ जो जेहि मिलै लेहु सो जाईं। अब जनि करो विलंब तुम भाईं ॥

माता ने पुत्रों से कहा कि अब फिर से समुद्र मंथन के लिए जाओ और अबकी बार विलंब न करना।

त्रय सुत चले माथ नवायी। जो कछु कहै उ करब हम जायी ॥ मथ्यो सिंधु कछु विलंब न कीना। निकसे चौदह रतन सो लीन्हा ॥ चौदह रतन की निकसी खानी। ले माता पहँ पहुँचे आनी ॥ तीनहु बन्धु हरषित हैं लीन्हा। विस्नु सुधा पायउ हर विष दीन्हा ॥

तीनों माता को प्रणाम करके पुनः मंथन के लिए चले और अबकी बार 14 रतन की खानी निकली और उन्हें लेकर माता के पास आए। तब उसमें से विष्णु जी को अमृत और शिवजी को विष दिया गया।